- फ़िराक गोरखपुरी का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख कृतियाँ और सम्मान
- उर्दू शायरी की रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता वाली परंपरा और फ़िराक ने उसे किस तरह बदला
- रुबाई छंद क्या है, इसकी तुक-योजना और बनावट
- फ़िराक की पाँचों रुबाइयों का पूरा पाठ, शब्दार्थ और सरल भावार्थ
- इन रुबाइयों में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा किस तरह घुल-मिल गई हैं
- अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
1 कवि परिचय: फ़िराक गोरखपुरी
फ़िराक गोरखपुरी उर्दू के उन शायरों में हैं जिन्होंने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार को नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। पाठ के अनुसार उनकी रुबाई में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है।

1.1 जीवन-परिचय
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| मूल नाम | रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ |
| जन्म | 28 अगस्त, सन् 1896, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) |
| शुरुआती शिक्षा | रामकृष्ण की कहानियों से शुरुआत, बाद में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में शिक्षा |
| नौकरी और राजनीति | 1917 में डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित, पर स्वराज आंदोलन के लिए 1918 में पद-त्याग |
| जेल | 1920 में स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सेदारी के कारण डेढ़ वर्ष की जेल |
| अध्यापन | इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में अध्यापक रहे |
| निधन | सन् 1983 |
फ़िराक का मूल नाम, जन्म-वर्ष, जन्म-स्थान और डिप्टी कलेक्टर पद छोड़ने का क्रम पाठ में दिया गया है: 1917 में चयन, 1918 में स्वराज आंदोलन के लिए पद-त्याग। यह क्रम मत उलटिए।
1.2 प्रमुख कृतियाँ और सम्मान
प्रमुख कृतियाँ
- गुले-नग्मा
- बज़्मे ज़िंदगी: रंगे-शायरी
- उर्दू ग़ज़लगोई
सम्मान
- गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार
- ज्ञानपीठ पुरस्कार
- सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड
अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साज़े-ग़ज़ल
नए तराने छेड़ो, मेरे नग़मों को नींद आती है
फ़िराक की एक कृति का नाम “उर्दू ग़ज़लगोई” है। इस पाठ्यपुस्तक (2026-27) में फ़िराक की पाँच रुबाइयाँ पाठ हैं; इसमें कोई ग़ज़ल नहीं है।
2 उर्दू शायरी की परंपरा और फ़िराक का योगदान
उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है, जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए। नज़ीर अकबराबादी और इल्ताफ़ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत (परंपरा) को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फ़िराक गोरखपुरी का भी है।
- फ़िराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार को नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा
- उनकी शायरी में सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर ढला है
- इंसान के हाथों इंसान पर जो गुज़रती है, उसकी तल्ख़ सच्चाई और आने वाले कल की उम्मीद, दोनों को उन्होंने भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़ा
- उर्दू शायरी अपने लाक्षणिक प्रयोगों और चुस्त मुहावरेदारी के लिए विख्यात है
- मीर और ग़ालिब की तरह फ़िराक ने भी “कहने” की उस शैली को साधा जिसमें शेर लिखे नहीं, कहे जाते हैं, यानी एक तरह का संवाद प्रमुख होता है
- उन्होंने आम आदमी या साधारण जन से अपनी बात कही, और प्रकृति, मौसम व भौतिक जगत के सौंदर्य को शायरी का विषय बनाया
दिव्यता भौतिकता से पृथक वस्तु नहीं है। जिसे हम भौतिक कहते हैं वही दिव्य भी है।
फ़िराक गोरखपुरी, अपनी काव्य-दृष्टि पर
फ़िराक को “परंपरा तोड़ने वाला पहला शायर” मत लिखिए, पाठ में फ़िराक को भी उन शायरों में गिना गया है जिन्होंने यह रिवायत तोड़ी (“उनमें एक प्रमुख नाम फ़िराक गोरखपुरी का भी है”), पर पाठ के वाक्य में नज़ीर अकबराबादी और इल्ताफ़ हुसैन हाली के नाम पहले गिनाए गए हैं और फ़िराक को “एक प्रमुख नाम” कहा गया है, “पहला” नहीं। यानी फ़िराक इस श्रेय में शामिल हैं, पर पाठ उन्हें पहला नहीं कहता।
3 रुबाई छंद क्या है
रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन शैली है, जिसमें चार पंक्तियाँ होती हैं। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (काफ़िया) मिलाया जाता है, तथा तीसरी पंक्ति स्वच्छंद होती है।
(स्वच्छंद = तुक-मुक्त, यानी तीसरी पंक्ति का तुक मिलाना ज़रूरी नहीं।)

ऊपर की परिभाषा पाठ के अनुसार याद रखिए: पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक; तीसरी पंक्ति स्वच्छंद।
3.1 फ़िराक की रुबाइयों की भाषा: हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का मेल
फ़िराक की रुबाई में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है। भाषा सहज है, और प्रसंग भी सूरदास के वात्सल्य वर्णन की सादगी की याद दिलाता है, जैसे “मुझे चाँद चाहिए, मैया री, मैं चंद्र खिलौना लैहों” जैसा जाना-पहचाना बिंब (पाठ की “आपसदारी” के अनुसार सूरदास की मूल पंक्ति इसका छोटा रूप “मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों” है)। फ़िराक की रुबाइयों में भी माँ अपने बच्चे को चाँद के लिए मचलने पर एक दर्पण देकर बहलाती है।
- लोका देना, घुटनियों में लेकर कपड़े पिन्हाना, गेसुओं में कंघी करना, रूपवती मुखड़ा, नर्म दमक, ज़िदयाया बालक, रस की पुतली, ये सब हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के अनूठे गठबंधन के प्रयोग हैं
- यही भाषा-मेल गांधी जी की कल्पना की “हिंदुस्तानी” भाषा जैसा है, जिसमें हिंदी और उर्दू दोनों घुल-मिल जाती हैं
- त्योहारों के प्रसंग भी पाठ में आते हैं: दीवाली में चीनी-मिट्टी के खिलौने, राखी में “बिजली की तरह चमक रहे लच्छे”
4 पाँचों रुबाइयाँ: पूरा पाठ और भावार्थ
पहली चार रुबाइयों में एक घर का वात्सल्य-भरा माहौल है (रुबाई 1 और 4 में आँगन, रुबाई 3 में घर): बच्चे को झुलाना, नहलाना, दीवाली मनाना और चाँद के लिए मचलना। पाँचवीं रुबाई रक्षाबंधन की है, जिसमें बहन भाई को राखी बाँधती है।
पाठ की भूमिका में एक और विषय है: सबके पास महँगे खिलौने नहीं होते। पाठ कहता है, “मामा भी तो एक साक्षात खिलौना है बच्चों का—खासकर उन बच्चों का जिनके जीवन में महँगे खिलौने भले न हों”, और इसे “एक कठिन दौर” कहकर यह शेर देता है: “घर लौट बहुत रोए माँ-बाप अकेले में, / मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में”।
4.0 पाँचों रुबाइयों का अवलोकन
झुलाना और लोका देना
माँ बच्चे को गोद में झुलाती है, बच्चे की हँसी गूँजती है
नहलाना-संवारना
नहलाकर गेसू संवारना, बच्चे का प्यार से मुँह को देखना
दीवाली
घर की सजावट, चीनी-मिट्टी के खिलौने, बच्चे का घरौंदा
चाँद और दर्पण
बच्चा चाँद के लिए मचलता है, माँ दर्पण में चाँद की परछाईं दिखाकर मन बहलाती है
रक्षाबंधन
सावन की घटा, बिजली-सी चमकती राखी, बहन का भाई को बाँधना
4.1 रुबाई 1: आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
भावार्थ: माँ अपने आँगन में चाँद के टुकड़े जैसे सुंदर बच्चे को गोद में भरकर खड़ी है और उसे हाथों पर झुलाती है। बीच-बीच में जब वह बच्चे को हवा में उछाल-उछाल कर लोका देती है, तो बच्चे की खिलखिलाती हँसी पूरे आँगन में गूँज उठती है।
4.2 रुबाई 2: नहला के छलके-छलके निर्मल जल से
नहला के छलके-छलके निर्मल जल
से उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
किस प्यार से देखता है बच्चा मुँह को
जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े
भावार्थ: माँ बच्चे को छलकते हुए निर्मल जल से नहलाती है, उसके उलझे हुए बालों में कंघी करती है, और फिर उसे घुटनों पर लिटाकर कपड़े पहनाती है। इसी दौरान बच्चा बड़े प्यार से मुँह को देखता है (सहज अर्थ: माँ का मुँह)।
4.3 रुबाई 3: दीवाली की शाम घर पुते और सजे
दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए
भावार्थ: दीवाली की शाम घर पुते और सजे हुए हैं, चीनी-मिट्टी के खिलौने जगमगा रहे हैं। माँ के सुंदर चेहरे पर एक कोमल चमक है, जब वह बच्चे के घरौंदे में दिए जलाती है।
4.4 रुबाई 4: आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
भावार्थ: आँगन में बच्चा चाँद के लिए ज़िद पर अड़कर ठुनक रहा है। माँ उसे दर्पण देकर कहती है, “देख, आईने में चाँद उतर आया है।” पाठ के शब्दों में: “चाँद की परछाईं भी चाँद ही है। कल्पना की आँख का भला क्या मुकाबला।” इसी कल्पना से माँ बच्चे की ज़िद बहलाती है।
“खुद का परदा खोलने से क्या आशय है?” ‘पाठ के साथ’ अभ्यास का प्रश्न 2 है; इसका उत्तर “NCERT समाधान” पोस्ट में देखें। रुबाई 4 में आईने का “चाँद” चाँद की ही परछाईं है (पाठ: “चाँद की परछाईं भी चाँद ही है”)।
4.5 रुबाई 5: रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी
भावार्थ: रक्षाबंधन की सुबह, रस से भरी सुंदर बहन के ऊपर आकाश में हल्की-हल्की घटा छायी हुई है। राखी में लगे लच्छे बिजली की तरह चमक रहे हैं, इसी चमकती राखी को बहन अपने भाई को बाँधती है।
पाठ के अनुसार रक्षाबंधन एक मीठा बंधन है, और उसके कच्चे धागों पर बिजली के लच्छे हैं। सावन में रक्षाबंधन आता है।
पाठ के अनुसार सावन का जो संबंध झीनी घटा से है, घटा का जो संबंध बिजली से है, वही संबंध भाई का बहन से है।
5 शब्द-छवि (पाठ में दिए तीन शब्द) और अन्य कठिन शब्द
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| लोका देना | उछाल-उछाल कर प्यार करने की एक क्रिया |
| हई | है ही |
| शब | रात |
| गेसू | बाल |
| पिन्हाना | पहनाना |
| ज़िदयाया | ज़िद पर अड़ा हुआ, मचला हुआ |
| रूपवती मुखड़ा | सुंदर चेहरा |
| नर्म दमक | कोमल चमक |
| घरौंदा | बच्चों का मिट्टी का बना खिलौना-घर |
| रस की पुतली | भावों-रस से भरी सुंदर बालिका |
| लच्छे | राखी में लगे चमकीले धागे |
6 काव्य-सौंदर्य: भाषा और भाव
- भाव: रुबाई 1-4 में माँ का बच्चे के प्रति वात्सल्य केंद्र में है; रुबाई 5 में बहन का भाई के प्रति स्नेह (रक्षाबंधन) है (देखें §4)
- भाषा-शैली: हिंदी-उर्दू-लोकभाषा का सहज मेल, बिंब घरेलू और बाल-सुलभ (देखें §3.1)
- तुक-योजना: रुबाई की परिभाषा के अनुसार पहली-दूसरी-चौथी पंक्ति में तुक, तीसरी स्वच्छंद (देखें §3); जैसे पहली रुबाई में खड़ी / गोद-भरी / हँसी
झूला-नहान-दीवाली-चाँद-राखी
पाँचों रुबाइयों को क्रम से याद रखने के लिए यह पाँच शब्द याद कर लीजिए, हर शब्द एक रुबाई के मुख्य दृश्य को दर्शाता है।
7 अभ्यास प्रश्न: कहाँ मिलेंगे
पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यास प्रश्नों (“पाठ के साथ”, “टिप्पणी करें”, “कविता के आसपास”, “आपसदारी”) के पूरे मॉडल उत्तर “NCERT समाधान” पोस्ट में हैं। ‘टिप्पणी करें (क)’ गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता पूछता है; ‘आपसदारी’ में सूरदास के साथ सुमित्रानंदन पंत और कबीर की पंक्तियाँ भी हैं, जो इन नोट्स में नहीं हैं।
- फ़िराक का मूल नाम, जन्म-वर्ष, जन्म-स्थान? (§1.1)
- रुबाई की परिभाषा पाठ के अनुसार? (§3)
- पाँचों रुबाइयाँ मुख्य दृश्य से पहचान? झूला, नहान, दीवाली, चाँद, राखी (§4.0)
- रुबाई 4 में पाठ आईने के “चाँद” के बारे में क्या कहता है? (§4.4)
- फ़िराक की भाषा में हिंदी, उर्दू, लोकभाषा कैसे घुल-मिल गई हैं? (§3.1)
- फ़िराक (रघुपति सहाय): 1896 गोरखपुर – 1983, पूरा विवरण §1.1 में
- रूमानी परंपरा तोड़ने वालों में गिने गए: नज़ीर अकबराबादी, हाली, फ़िराक, पहला नाम नहीं (§2)
- रुबाई: 4 पंक्ति, पहली-दूसरी-चौथी में तुक, तीसरी स्वच्छंद (§3)
- पाँचों रुबाइयाँ: झूला-नहान-दीवाली-चाँद-राखी; पहली चार में माँ-बच्चे का वात्सल्य, पाँचवीं में बहन-भाई का स्नेह (§4.0)
- रुबाई 4 में आईने का “चाँद” = चाँद की ही परछाईं (पाठ: “चाँद की परछाईं भी चाँद ही है”) (§4.4)
- इस पाठ्यपुस्तक (2026-27) में फ़िराक की पाँच रुबाइयाँ हैं, कोई ग़ज़ल नहीं (§1)