कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 7 शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, चार प्रवाह, वैश्वीकरण के कारण, तीनों तरह के प्रभाव, किताब के अपने उदाहरण, भारत की आर्थिक कहानी, और प्रतिरोध की सारी तारीख़ें। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

नाम पर एक बात

NCERT का हिंदी संस्करण इस अध्याय को शुरू से आख़िर तक वैश्वीकरण कहता है, और प्रश्नावली के ग्यारहों प्रश्नों में यही शब्द है। कहीं-कहीं इसी विषय के लिए भूमंडलीकरण शब्द भी चलता है। उत्तर लिखते समय वैश्वीकरण ही लिखिए, क्योंकि पेपर उसी शब्द में पूछा जाता है।

1 परिभाषाएँ

याद कर लेंपरिभाषा

वैश्वीकरण एक ऐसी परिघटना है जिसकी बुनियादी बात प्रवाह है। ये प्रवाह चार तरह के होते हैं: विश्व के एक हिस्से के विचारों का दूसरे हिस्सों में पहुँचना; पूँजी का एक से ज़्यादा जगहों पर जाना; वस्तुओं का कई-कई देशों में पहुँचना और उनका व्यापार; तथा बेहतर आजीविका की तलाश में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लोगों की आवाजाही।

याद कर लेंपरिभाषा

विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव वह जुड़ाव है जो इन प्रवाहों की निरंतरता से पैदा हुआ है और उसी से कायम भी है। किताब इसे वैश्वीकरण की सबसे ज़रूरी बात कहती है।

याद कर लेंपरिभाषा

बहुआयामी अवधारणा: वैश्वीकरण के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तीनों अवतार हैं और इनके बीच ठीक-ठीक भेद किया जाना चाहिए। इसे केवल आर्थिक परिघटना मानना ग़लत है और एकदम सांस्कृतिक परिघटना मानना भी भूल है।

याद कर लेंपरिभाषा

न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य वह राज्य है जिसने कल्याणकारी राज्य की जगह ले ली है और जो कुछेक मुख्य कामों तक अपने को सीमित रखता है, जैसे कानून और व्यवस्था बनाये रखना तथा अपने नागरिकों की सुरक्षा करना। लोक-कल्याणकारी कामों से वह हाथ खींच लेता है।

याद कर लेंपरिभाषा

सामाजिक सुरक्षा कवच: वे सांस्थानिक उपाय जिनकी माँग सामाजिक न्याय के पक्षधर करते हैं, ताकि जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं उन पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव कम किए जा सकें। दुनिया के अनेक आंदोलनों की मान्यता है कि यह बात अव्यावहारिक है और इतना भर उपाय पर्याप्त नहीं होगा।

याद कर लेंपरिभाषा

सांस्कृतिक समरूपता: वैश्वीकरण से एक जैसी संस्कृति का उभरना। पर सावधान, इसका अर्थ किसी विश्व-संस्कृति का उदय नहीं है; विश्व-संस्कृति के नाम पर दरअसल शेष विश्व पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है।

याद कर लेंपरिभाषा

सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण: वैश्वीकरण से हर संस्कृति का कहीं ज़्यादा अलग और विशिष्ट होते जाना, यानी समरूपता का ठीक उलटा प्रभाव। प्रश्नावली के प्रश्न 10 में इसी को ‘सांस्कृतिक विभिन्नता’ कहा गया है, इसलिए दोनों शब्द पहचान लीजिए।

याद कर लेंपरिभाषा

संरक्षणवाद: आज़ादी के बाद भारत की वह नीति जिसमें तय हुआ कि दूसरे पर निर्भर रहने के बजाय ख़ुद सामान बनाया जाए और दूसरे देशों को निर्यात की अनुमति नहीं होगी, ताकि अपने उत्पादक चीजें बनाना सीख सकें।

याद कर लेंपरिभाषा

पुनःउपनिवेशीकरण: कुछ अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वैश्वीकरण को इसी नाम से पुकारा है, यानी विश्व का फिर से उपनिवेश बन जाना।

2 तीन उदाहरण जिनसे अध्याय शुरू होता है

पात्र क्या होता है कौन-सा पहलू
जनार्दन कॉल-सेंटर में काम; दफ़्तर में घुसते ही जॉन बन जाता है, नया लहजा और नयी भाषा; सारी रात काम, क्योंकि वह विदेशी ग्राहकों का दिन है; छुट्टियाँ भारतीय नहीं, अमरीकी कैलेंडर से मेल खाती हैं। सेवाओं का वैश्वीकरण
रामधारी नौ वर्षीया बेटी के लिए चीन में बनी पर भारत में बिक रही साइकिल; पिछले साल ‘बार्बी डॉल’ जो मूलतः संयुक्त राज्य अमरीका में बनी थी। वस्तुओं की आवाजाही
सारिका परिवार में पहली पीढ़ी की शिक्षित; स्कूल-कॉलेज में अव्वल; स्वतंत्र करिअर का अवसर, कुछ रिश्तेदार विरोध में, फिर भी उसने नौकरी करने का फ़ैसला किया। जीवन-मूल्यों के बीच दुविधा

3 पाँच ‘अलग’ उदाहरण, और उनसे निकले दो निष्कर्ष

किताब पाँच और उदाहरण देती है जो ऊपर वालों से अलग हैं:

  • फसल मारे जाने पर कुछ किसानों की आत्महत्या, जिन्होंने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बड़े महँगे बीज ख़रीदे थे।
  • एक भारतीय कंपनी ने यूरोप स्थित एक बड़ी प्रतियोगी कंपनी को ख़रीद लिया, जबकि ख़रीदी गई कंपनी के मालिक इसका विरोध कर रहे थे।
  • खुदरा दुकानदारों को भय कि बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों की खुदरा शृंखलाओं से उनकी रोज़ी-रोटी जाती रहेगी।
  • मुम्बई के एक फिल्म-निर्माता पर हॉलीवुड की फिल्म से कहानी उठाने का आरोप।
  • पश्चिमी परिधान पहनने वाली कॉलेज की छात्राओं को एक उग्रवादी संगठन की धमकी।

निष्कर्ष 1: वैश्वीकरण हर अर्थ में सकारात्मक ही नहीं होता, इसके दुष्प्रभाव भी पड़ सकते हैं, और ऐसे लोगों की संख्या ज़्यादा है जो नकारात्मक प्रभाव ज़्यादा मानते हैं।
निष्कर्ष 2: वैश्वीकरण सिर्फ आर्थिक मसलों से नहीं जुड़ा, और ज़रूरी नहीं कि प्रभाव की दिशा हमेशा धनी मुल्कों से ग़रीब मुल्कों की ओर गतिशील हो।

4 वैश्वीकरण के कारण

बात ब्योरा
कोई एक कारक नहीं वैश्वीकरण के लिए कोई एक कारक जिम्मेवार नहीं, फिर भी प्रौद्योगिकी अपने आप में एक अपरिहार्य कारण साबित हुई है।
संचार की क्रांति टेलीग्राफ, टेलीफोन और माइक्रोचिप के नवीनतम आविष्कारों ने विश्व के विभिन्न भागों के बीच संचार की क्रांति कर दिखायी है।
छपाई और राष्ट्रवाद शुरू-शुरू में छपाई (मुद्रण) की तकनीक ने राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसी तर्ज़ पर आज की प्रौद्योगिकी हमारे निजी और सामूहिक जीवन के बारे में सोचने के तरीके पर असर डालेगी।
प्रवाहों की अलग गति पूँजी और वस्तु की गतिशीलता लोगों की आवाजाही की तुलना में ज़्यादा तेज और व्यापक होगी।
सिर्फ़ साधन काफ़ी नहीं संचार-साधनों की तरक्की मात्र से वैश्वीकरण अस्तित्व में नहीं आया। ज़रूरी यह है कि लोग समझें कि वे आपस में जुड़े हुए हैं।
जुड़ाव के दो उदाहरण बर्ड फ़्लू अथवा ‘सुनामी’ किसी एक राष्ट्र की हदों में सिमटे नहीं रहते; ये घटनाएँ राष्ट्रीय-सीमाओं का जोर नहीं मानतीं। यही बात बड़ी आर्थिक घटनाओं पर भी लागू है।
नयी बात क्या है चार प्रवाहों के अर्थ में वैश्वीकरण मानव-इतिहास के अधिकांश समय जारी रहा है। नयी बात है इन प्रवाहों की गति और इनके प्रसार का धरातल।

5 राजनीतिक प्रभाव: तीन पहलू

पहलू ब्योरा
1. क्षमता में कमी कल्याणकारी राज्य की जगह न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य; लोक-कल्याणकारी कामों से हाथ खींचना; कल्याणकारी राज्य की जगह अब बाज़ार आर्थिक और सामाजिक प्राथमिकताओं का प्रमुख निर्धारक; बहुराष्ट्रीय निगमों की बढ़ी भूमिका से सरकारों की अपने दम पर फ़ैसला करने की क्षमता घटती है।
2. प्रधानता कायम राजनीतिक समुदाय के आधार के रूप में राज्य की प्रधानता को कोई चुनौती नहीं; देशों के बीच पुरानी ईर्ष्या और प्रतिद्वंद्विता की दखल अब भी; राज्य कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनिवार्य कार्य पूरे कर रहे हैं और सोच-समझकर उन्हीं दायरों से हटते हैं जहाँ उनकी मर्जी हो।
3. ताकत में इज़ाफ़ा राज्यों के हाथ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी, जिससे वे नागरिकों के बारे में सूचनाएँ जुटा सकते हैं और ज़्यादा कारगर ढंग से काम कर सकते हैं। किताब के शब्दों में उनकी क्षमता बढ़ी है, कम नहीं हुई।

6 आर्थिक प्रभाव

  • पहली दिक्कत: आर्थिक वैश्वीकरण को परिभाषित कैसे किया जाए। ज़िक्र आते ही ध्यान अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन पर जाता है, पर इसे इतने संकीर्ण नज़रिए से नहीं देखा जाना चाहिए; इनके अलावा भी कई खिलाड़ी शामिल हैं।
  • असली सवाल: आर्थिक फ़ायदों का बँटवारा, यानी किसे सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ, किसे सबसे कम, और किसने नुकसान उठाया।
  • वस्तुएँ: आयात पर लगने वाले प्रतिबंध कम हो गए हैं, इसलिए व्यापार में इज़ाफ़ा हुआ है।
  • पूँजी: आवाजाही पर अब कहीं कम प्रतिबंध; धनी देश के निवेशकर्ता विकासशील देशों में निवेश कर सकते हैं जहाँ ज़्यादा मुनाफा हो।
  • विचार: प्रवाह अबाध हो उठा है; इंटरनेट और कंप्यूटर से जुड़ी सेवाओं का विस्तार इसका उदाहरण।
  • लोग: आवाजाही उतनी नहीं बढ़ी। विकसित देश वीज़ा-नीति से अपनी सीमाओं को अभेद्य रखते हैं, ताकि दूसरे देशों के नागरिक उनके नौकरी-धंधे न हथिया लें।
  • चेतावनी: हर जगह एक समान नीति अपनाने का मतलब यह नहीं कि परिणाम भी समान होंगे; संदर्भ-विशेष पर ध्यान दीजिए।
  • बँटा हुआ जनमत: आलोचक कहते हैं कि आबादी के एक छोटे तबके को ही फ़ायदा होगा और नौकरी तथा जन-कल्याण (शिक्षा, स्वास्थ्य, साफ-सफाई) के लिए सरकार पर आश्रित लोग बदहाल हो जाएँगे; इसी से ‘सामाजिक सुरक्षा कवच’ की माँग उठती है। कुछ अर्थशास्त्रियों ने इसे विश्व का पुनःउपनिवेशीकरण कहा।
  • समर्थक: समृद्धि बढ़ती है, ‘खुलेपन’ से खुशहाली बढ़ती है, व्यापार से हर देश को अपना बेहतर कर दिखाने का मौका मिलता है, और आर्थिक वैश्वीकरण अपरिहार्य है।
  • मध्यमार्गी समर्थक: वैश्वीकरण ने चुनौतियाँ पेश की हैं और सजग-सचेत होकर पूरी बुद्धिमत्ता से इसका सामना किया जाना चाहिए।
  • जिससे इनकार नहीं: ‘पारस्परिक निर्भरता’ की रफ़्तार तेज हो चली है और सरकार, व्यवसाय तथा लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ रहा है।

7 सांस्कृतिक प्रभाव: दोनों पक्ष

चिंता का पक्ष दूसरा पक्ष
वैश्वीकरण सांस्कृतिक समरूपता ले आता है, जिससे विश्व की संस्कृतियों को ख़तरा है। यह मान लेना भूल है कि सांस्कृतिक प्रभाव सिर्फ नकारात्मक हैं। संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं होती।
विश्व-संस्कृति के नाम पर पश्चिमी संस्कृति लादी जा रही है। यह बात अध्याय 3 में अमरीकी वर्चस्व के सांस्कृतिक अर्थ के अंतर्गत पढ़ी जा चुकी है। कुछ बाहरी प्रभाव नकारात्मक होते हैं क्योंकि उनसे हमारी पसंदों में कमी आती है; पर कभी दायरा बढ़ता है, तो कभी परंपरागत मूल्यों को छोड़े बिना संस्कृति का परिष्कार होता है।
बर्गर और नीली जीन्स की लोकप्रियता का रिश्ता अमरीकी जीवनशैली के गहरे प्रभाव से है; ऐसे तर्क देने वाले दुनिया के ‘मैक्डोनॉल्डीकरण’ की तरफ इशारा करते हैं। बर्गर मसाला-डोसा का विकल्प नहीं है, इसलिए उससे वस्तुतः कोई ख़तरा नहीं; भोजन की पसंद में बस एक चीज़ और जुड़ी।
इससे पूरे विश्व की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे ख़त्म होती है, इसलिए यह केवल ग़रीब देशों के लिए नहीं, समूची मानवता के लिए ख़तरनाक है। नीली जीन्स हथकरघा पर बुने खादी के कुर्ते के साथ खूब चलती है, और यह अनूठा पहरावा अब उसी देश को निर्यात किया जा रहा है जिसने हमें नीली जीन्स दी। जीन्स के ऊपर कुर्ता पहने अमरीकियों को देखना अब संभव है।

निष्कर्ष: समरूपता एक पहलू है तो उसका उलटा प्रभाव भी पैदा हुआ है, यानी सांस्कृतिक वैभिन्नीकरण। इसका मतलब यह नहीं कि संस्कृतियों के मेलजोल में ताकत का सवाल गौण है, पर ध्यान रहे कि सांस्कृतिक प्रभाव एकतरफ़ा नहीं होता।

8 भारत और वैश्वीकरण

दौर क्या हुआ
सदियों से पूँजी, वस्तु, विचार और लोगों की आवाजाही का भारतीय इतिहास कई सदियों का है।
औपनिवेशिक दौर ब्रिटेन के साम्राज्यवादी मंसूबों के चलते भारत आधारभूत वस्तुओं और कच्चे माल का निर्यातक तथा बने-बनाये सामानों का आयातक देश था।
आज़ादी के बाद ब्रिटेन के साथ अनुभवों से सबक लेकर तय हुआ कि ख़ुद सामान बनाया जाए और दूसरे देशों को निर्यात की अनुमति न हो। यही ‘संरक्षणवाद’ है।
संरक्षणवाद की दिक्कतें कुछ क्षेत्रों में तरक्की, पर स्वास्थ्य, आवास और प्राथमिक शिक्षा पर उतना ध्यान नहीं जितने के वे हकदार थे; भारत में आर्थिक-वृद्धि की दर धीमी रही।
1991 वित्तीय संकट से उबरने और ऊँची वृद्धि-दर की इच्छा से आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू; व्यापार और विदेशी निवेश समेत विभिन्न क्षेत्रों पर आयद बाधाएँ हटायी गईं।
अंतिम कसौटी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह भारत के लिए कितना अच्छा साबित हुआ, क्योंकि कसौटी ऊँची वृद्धि-दर नहीं बल्कि यह है कि आर्थिक बढ़वार के फायदों में सबका साझा हो ताकि हर कोई खुशहाल बने।

9 वैश्वीकरण का प्रतिरोध

खेमा तर्क
वामपंथी मौजूदा वैश्वीकरण विश्वव्यापी पूँजीवाद की एक ख़ास अवस्था है जो धनिकों को और ज़्यादा धनी (तथा इनकी संख्या में कमी) और ग़रीब को और ज़्यादा ग़रीब बनाती है। राज्य के कमजोर होने से ग़रीबों के हित की रक्षा की उसकी क्षमता घटती है।
दक्षिणपंथी राजनीतिक: राज्य के कमजोर होने की चिंता। आर्थिक: कम से कम कुछ क्षेत्रों में आर्थिक आत्मनिर्भरता और ‘संरक्षणवाद’ का दौर फिर कायम हो। सांस्कृतिक: परंपरागत संस्कृति की हानि और सदियों पुराने जीवन-मूल्यों के खोने का डर।

आंदोलनों का चरित्र: वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलन भी विश्वव्यापी नेटवर्क में भागीदारी करते हैं और दूसरे देशों के अपने जैसे लोगों से गठजोड़ करते हैं। बहुत से आंदोलन वैश्वीकरण की धारणा के विरोधी नहीं, बल्कि वैश्वीकरण के किसी ख़ास कार्यक्रम के विरोधी हैं, जिसे वे साम्राज्यवाद का एक रूप मानते हैं।

10 तारीख़ें, एक जगह

वर्ष घटना
1991 भारत में आर्थिक-सुधारों की योजना शुरू।
1999 सिएट्ल में विश्व व्यापार संगठन की मंत्री-स्तरीय बैठक; बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन। तर्क: ताकतवर देश व्यापार के अनुचित तौर-तरीके अपना रहे हैं और उदीयमान वैश्विक आर्थिक-व्यवस्था में विकासशील देशों के हितों को समुचित महत्त्व नहीं मिला।
2001 वर्ल्ड सोशल फोरम की पहली बैठक, ब्राजील के पोर्टो अलगेरे में।
2004 वर्ल्ड सोशल फोरम की चौथी बैठक, मुंबई में।
फरवरी 2024 वर्ल्ड सोशल फोरम की बैठक, नेपाल में।
10 जनवरी 2005 कॉल-सेन्टर वाली रिपोर्ट की तारीख़: द हिंदू में रंजीता उर्स की रिपोर्ट।
वर्ल्ड सोशल फोरम, एक पंक्ति में

नव-उदारवादी वैश्वीकरण के विरोध का विश्व-व्यापी मंच, जिसके तहत मानवाधिकार-कार्यकर्त्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्त्ता एकजुट होते हैं। भारत में आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ वामपंथी तेवर की आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ से भी उठी हैं और इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से भी।

11 भारत में प्रतिरोध किन रूपों में

  • सामाजिक आंदोलनों की भूमिका: इनसे लोगों को अपने पास-पड़ोस की दुनिया समझने और अपनी समस्याओं के हल तलाशने में मदद मिलती है।
  • वामपंथी तेवर: आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ आवाजें राजनीतिक दलों की तरफ से और इंडियन सोशल फोरम जैसे मंचों से उठी हैं।
  • श्रमिक और किसान: औद्योगिक श्रमिक और किसानों के संगठनों ने बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रवेश का विरोध किया है।
  • नीम: कुछ वनस्पतियों, मसलन ‘नीम’ को अमरीकी और यूरोपीय फ़र्मों ने पेटेन्ट कराने के प्रयास किए; इसका कड़ा विरोध हुआ।
  • दक्षिणपंथी खेमा: सांस्कृतिक प्रभावों का विरोध, जिसमें केबल नेटवर्क के विदेशी टी.वी. चैनल, वैलेन्टाईन-डे मनाना, और स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राओं की पश्चिमी पोशाकों के लिए बढ़ती अभिरुचि तक का विरोध शामिल है।

12 कॉल-सेन्टर वाला बॉक्स, चार पंक्तियों में

बॉक्स में क्या है

बॉक्स का शीर्षक है ‘उफ! फिर से एक हिंदुस्तानी’। इसमें कहा गया है कि कॉल-सेन्टर का काम आँख खोल देने वाला है और असली अमरीकी संस्कृति की झलक देता है; एक औसत अमरीकी अपेक्षा से कहीं ज़्यादा जीवंत और ईमानदार लगता है। पर हर बातचीत खुशगवार नहीं होती: अविवेकी और बदज़बान लोगों के फोन भी आते हैं, और यह जानकर कि ‘कॉल’ हिन्दुस्तान में ‘अटेन्ड’ की जा रही है, फोन करने वाले का लहजा नफ़रत से भर उठता है। अमरीकी हर भारतीय को इस रूप में देखने लगे हैं मानो वह उनकी नौकरी छीनने वाला हो। स्रोत: 10 जनवरी 2005 के द हिंदू में रंजीता उर्स की रिपोर्ट।

13 प्रश्नावली के पाँच वस्तुनिष्ठ उत्तर, तुरंत दोहराव के लिए

प्रश्न सही विकल्प
1. वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन सही है? (घ) वैश्वीकरण एक बहुआयामी परिघटना है।
2. वैश्वीकरण के प्रभाव के बारे में कौन-सा कथन सही है? (क) विभिन्न देशों और समाजों पर वैश्वीकरण का प्रभाव विषम रहा है।
3. वैश्वीकरण के कारणों के बारे में कौन-सा कथन सही है? (क) वैश्वीकरण का एक महत्त्वपूर्ण कारण प्रौद्योगिकी है।
4. वैश्वीकरण के बारे कौन-सा कथन सही है? (घ) वैश्वीकरण का संबंध विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव से है।
5. वैश्वीकरण के बारे में कौन-सा कथन ग़लत है? (ग) वैश्वीकरण के पैरोकारों का तर्क है कि इससे सांस्कृतिक समरूपता आएगी।
आम ग़लती

प्रश्न 5 में ग़लत कथन पूछा गया है, सही नहीं। समरूपता की बात आलोचक करते हैं, पैरोकार नहीं, इसलिए विकल्प (ग) ही ग़लत कथन है। (घ) में वही बात आलोचकों के नाम से कही गई है, इसलिए वह सही कथन है; जल्दबाजी में उसे चुन लेना आसान है।

14 आख़िरी दोहराव

  • वैश्वीकरण = प्रवाह; चार प्रवाह = विचार, पूँजी, वस्तु, लोग; कुंजी-शब्द = विश्वव्यापी पारस्परिक जुड़ाव।
  • कारण: कोई एक नहीं, पर प्रौद्योगिकी अपरिहार्य; टेलीग्राफ, टेलीफोन, माइक्रोचिप; छपाई और राष्ट्रवाद; बर्ड फ़्लू और सुनामी।
  • राजनीतिक: कमी + प्रधानता कायम + इज़ाफ़ा, तीनों एक साथ लिखिए।
  • आर्थिक: वस्तु और पूँजी के प्रतिबंध घटे, विचार अबाध, पर लोगों की आवाजाही नहीं बढ़ी।
  • सांस्कृतिक: समरूपता बनाम वैभिन्नीकरण; बर्गर, मसाला-डोसा, नीली जीन्स, खादी कुर्ता, मैक्डोनॉल्डीकरण।
  • भारत: औपनिवेशिक निर्यातक → संरक्षणवाद → 1991 के सुधार → कसौटी है फ़ायदों में सबका साझा।
  • प्रतिरोध: 1999 सिएट्ल, 2001 पोर्टो अलगेरे, 2004 मुंबई, फरवरी 2024 नेपाल; भारत में इंडियन सोशल फोरम और नीम।