कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. भारत के चुनाव आयोग का गठन कब हुआ और पहले चुनाव आयुक्त कौन बने?

उत्तर: भारत के चुनाव आयोग का गठन 1950 के जनवरी में हुआ और सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. ‘कांग्रेस-प्रणाली’ से क्या आशय है?

उत्तर: चुनावी प्रतिस्पर्धा के पहले दशक में कांग्रेस ने शासक-दल की भूमिका भी निभायी और विपक्ष की भी, क्योंकि असली राजनीतिक होड़ कांग्रेस के भीतर के गुटों में चलती थी। इसी कारण भारतीय राजनीति के इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. पहले आम चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा की कितनी सीटें मिलीं और दूसरे नंबर पर कौन-सी पार्टी रही?

उत्तर: कांग्रेस ने कुल 489 में से 364 सीटें जीतीं। सीटों के लिहाज़ से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही, जिसे 16 सीटें मिलीं।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. ‘गुट’ किसे कहते हैं?

उत्तर: पार्टी के अंदर मौजूद विभिन्न समूह गुट कहे जाते हैं। कांग्रेस अपने गठबंधनी स्वभाव के कारण इन गुटों के प्रति सहनशील थी।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. भारतीय जनसंघ का गठन कब हुआ और इसके संस्थापक-अध्यक्ष कौन थे?

उत्तर: भारतीय जनसंघ का गठन 1951 में हुआ था और श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके संस्थापक-अध्यक्ष थे।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. 1957 में केरल में किसे सरकार बनाने का न्यौता मिला, और यह घटना दुनिया के लिए क्यों ख़ास थी?

उत्तर: राज्यपाल ने कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया। दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. कांग्रेस को ‘अव्वल और एकलौता’ होने का फायदा मिला, इसका क्या मतलब है?

उत्तर: बाकी दल अभी अपनी रणनीति सोच ही रहे होते थे कि कांग्रेस अपना अभियान शुरू कर देती थी, क्योंकि अनेक पार्टियों का गठन तो स्वतंत्रता के आस-पास या उसके बाद हुआ था जबकि कांग्रेस पहले से देशव्यापी और सुसंगठित थी।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. 1948 में समाजवादियों को कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी क्यों बनानी पड़ी?

उत्तर: 1948 में कांग्रेस ने अपने संविधान में बदलाव किया ताकि उसके सदस्य दोहरी सदस्यता न धारण कर सकें। इस वजह से कांग्रेस के समाजवादियों को मजबूरन 1948 में अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बनानी पड़ी।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. उपनिवेशवाद से आज़ाद हुए कई देशों ने लोकतंत्र क्यों नहीं अपनाया? अलोकतांत्रिक शासन के कौन-से रूप सामने आए?

उत्तर: इन देशों के नेताओं ने कहा कि राष्ट्रीय एकता उनकी पहली प्राथमिकता है और लोकतंत्र को अपनाने से मतभेद और संघर्ष को बढ़ावा मिलेगा।
अलोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के कई रूप रहे: कहीं थोड़ा-बहुत लोकतंत्र रहा पर प्रभावी नियंत्रण किसी एक नेता के हाथ में था, कहीं एक दल का शासन कायम हुआ और कहीं-कहीं सीधे-सीधे सेना ने सत्ता की बागडोर सँभाली। शुरुआत हमेशा इस वायदे से हुई कि जल्दी ही लोकतंत्र कायम कर दिया जाएगा, लेकिन एक बार पाँव जम जाने पर उसे बदल पाना मुश्किल होता गया।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. मतदाता-सूची बनाते समय महिलाओं को लेकर कौन-सी समस्या सामने आई और चुनाव आयोग ने क्या किया?

उत्तर: मतदाता-सूचियों का पहला प्रारूप प्रकाशित हुआ तो पता चला कि उसमें 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज़ होने से रह गए हैं। इन महिलाओं को ‘अलां की बेटी’ और ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज़ किया गया था।
चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को मानने से इनकार कर दिया और फ़ैसला किया कि संभव हो तो इसका पुनरावलोकन किया जाए और ज़रूरी लगे तो ऐसी प्रविष्टियों को हटाया जाए।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. पहला आम चुनाव किन आँकड़ों की वजह से एक विशाल काम था?

उत्तर: उस वक्त देश में 17 करोड़ मतदाता थे, जिन्हें 3200 विधायक और लोकसभा के लिए 489 सांसद चुनने थे। इन मतदाताओं में महज 15 फीसदी साक्षर थे।
चुनाव आयोग ने चुनाव कराने के लिए 3 लाख से ज्यादा अधिकारियों और चुनावकर्मियों को प्रशिक्षित किया, और मतपेटियों के लिए तकरीबन 20 लाख स्टील के बक्सों का इस्तेमाल हुआ।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. आज़ादी के बाद भारत में मतदान के तरीके किन तीन चरणों से गुज़रे?

उत्तर: पहले दो चुनावों में हर मतदान केंद्र में प्रत्येक उम्मीदवार के लिए एक मतपेटी रखी जाती थी, जिस पर उसका चुनाव-चिह्न अंकित होता था, और मतदाता खाली मतपत्र अपनी पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डालता था।
इसके बाद मतपत्र पर हर उम्मीदवार का नाम और चुनाव-चिह्न छापा जाने लगा और मतदाता को अपनी पसंद के नाम पर मुहर लगानी होती थी। यह तरीका अगले चालीस सालों तक चला।
1990 के दशक के अंत में चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल शुरू किया और 2004 तक पूरे देश में ईवीएम चालू हो गई।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट पर 74 फीसदी सीटें कैसे मिल गईं?

उत्तर: हमारे देश की चुनाव-प्रणाली में ‘सर्वाधिक वोट पाने वाले की जीत’ का तरीका अपनाया गया है। इसमें अगर कोई पार्टी बाकियों की अपेक्षा थोड़े ज्यादा वोट हासिल करती है तो उसे वोटों के अनुपात की तुलना में कहीं ज्यादा सीटें मिल जाती हैं।
सभी गैर-कांग्रेसी उम्मीदवारों के वोट जोड़ दें तो वे कांग्रेस के कुल वोट से कहीं ज्यादा होंगे, लेकिन वे विभिन्न प्रतिस्पर्धी पार्टियों और उम्मीदवारों में बँट गए। इसी तरह कांग्रेस बाकी पार्टियों से आगे रही और उसने ज्यादा सीटें जीतीं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. 1955 में समाजवादियों के सामने कौन-सी दुविधा आ खड़ी हुई?

उत्तर: 1955 में कांग्रेस ने घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य समाजवादी बनावट वाले समाज की रचना है। ऐसे में समाजवादियों के लिए खुद को कांग्रेस का कारगर विकल्प बनाकर पेश करना मुश्किल हो गया।
इस पर दो अलग रुख़ बने: राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में कुछ समाजवादियों ने कांग्रेस से अपनी दूरी बढ़ायी और उसकी आलोचना की, जबकि अशोक मेहता जैसे कुछ अन्य समाजवादियों ने कांग्रेस से हल्के-फुल्के सहयोग की तरफदारी की।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में क्यों टूटी और इससे कौन-से दल बने?

उत्तर: चीन और सोवियत संघ के बीच विचारधारात्मक अंतर आने के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में एक बड़ी टूट का शिकार हुई।
सोवियत संघ की विचारधारा को ठीक मानने वाले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में ही रहे, जबकि इसके विरोध में राय रखने वालों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई (एम) नाम से अलग दल बनाया। ये दोनों दल आज तक कायम हैं।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. भारतीय जनसंघ बाकी दलों से किन बातों में अलग था?

उत्तर: जनसंघ ने ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’ के विचार पर जोर दिया और माना कि देश भारतीय संस्कृति और परंपरा के आधार पर आधुनिक, प्रगतिशील और ताकतवर बन सकता है।
इसने भारत और पाकिस्तान को एक करके ‘अखंड भारत’ बनाने की बात कही, अंग्रेजी को हटाकर हिंदी को राजभाषा बनाने के आंदोलन की अगुआई की, धार्मिक और सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को रियायत देने का विरोध किया, और 1964 में चीन के आण्विक-परीक्षण के बाद लगातार यह पैरोकारी की कि भारत भी अपने आण्विक हथियार तैयार करे।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. अध्याय के मुखपृष्ठ पर छपा शंकर का कार्टून क्या दर्शाता है?

उत्तर: यह कार्टून शंकर के संग्रह ‘डॉन्ट स्पेयर मी शंकर’ के मुखपृष्ठ से लिया गया है और मूल कार्टून भारत की चीन नीति पर बनाया गया था।
यहाँ यह कार्टून एक-दलीय प्रभुत्व के समय कांग्रेस द्वारा निभाई जा रही सत्ता पक्ष और विपक्ष की दोहरी भूमिका और दोहरी नीति को दर्शाता है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. 1952 का आम चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर क्यों माना जाता है?

उत्तर: 1. गरीब और अनपढ़ देश में पहली परीक्षा। इस वक्त तक लोकतंत्र सिर्फ़ धनी देशों में ही कायम था, और मतदाताओं की एक बड़ी तादाद गरीब और अनपढ़ लोगों की थी। ऐसे माहौल में यह चुनाव लोकतंत्र के लिए परीक्षा की कठिन घड़ी था।
2. सार्वभौम मताधिकार पर अमल। उस समय यूरोप के बहुतेरे देशों में महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला था, फिर भी भारत ने शुरुआत से ही सबको वोट का अधिकार दिया।
3. आलोचकों का ग़लत साबित होना। एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ कहा था और ‘आर्गनाइजर’ ने लिखा था कि नेहरू अपने जीवित रहते ही सार्वभौम मताधिकार की असफलता देखेंगे। नतीजों ने इन सबका मुँह बंद कर दिया।
4. नतीजे सबने माने। परिणाम घोषित हुए तो हारने वाले उम्मीदवारों ने भी इन्हें निष्पक्ष बताया, और देश से बाहर के पर्यवेक्षक भी हैरान थे।
5. एक दलील हमेशा के लिए ख़त्म हुई। अब यह कह पाना संभव नहीं रहा कि लोकतांत्रिक चुनाव गरीबी अथवा अशिक्षा के माहौल में नहीं कराए जा सकते। यह साबित हो गया कि दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र पर अमल किया जा सकता है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. भारत में कायम एक पार्टी का प्रभुत्व दुनिया के बाकी उदाहरणों से किस तरह अलग था?

उत्तर: 1. बुनियादी फ़र्क़। बाकी मुल्कों में एक पार्टी का प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर कायम हुआ, जबकि भारत में यह लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ।
2. संविधान से एक-दलीय देश। चीन, क्यूबा और सीरिया के संविधान में सिर्फ़ एक ही पार्टी को देश के शासन की अनुमति दी गई है।
3. कानूनी और सैन्य उपायों से। म्यांमार, बेलारूस और इरीट्रिया में एक पार्टी का प्रभुत्व कानूनी और सैन्य उपायों के चलते कायम हुआ है। अब से कुछ साल पहले तक मैक्सिको, दक्षिण कोरिया और ताईवान भी एक पार्टी के प्रभुत्व वाले देश थे।
4. भारत में होड़ असली थी। यहाँ अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में एक-दूसरे से होड़ की और तब भी कांग्रेस एक के बाद एक चुनाव जीतती गई।
5. मिलती-जुलती मिसाल। दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की समाप्ति के बाद अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस का भी कुछ ऐसा ही दबदबा कायम हुआ है। भारत का उदाहरण बहुत कुछ दक्षिण अफ्रीका से मिलता-जुलता है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस की असाधारण चुनावी सफलता के क्या कारण थे?

उत्तर: 1. स्वाधीनता-संग्राम की विरासत। कांग्रेस पार्टी को राष्ट्रीय आंदोलन के वारिस के रूप में देखा गया। आज़ादी के आंदोलन में अग्रणी रहे अनेक नेता अब कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे।
2. देशव्यापी संगठन। तब के दिनों में यही एकमात्र पार्टी थी जिसका संगठन पूरे देश में था और जिसके संगठन का नेटवर्क स्थानीय स्तर तक पहुँच चुका था।
3. नेहरू का करिश्मा। इस पार्टी में खुद जवाहरलाल नेहरू थे जो भारतीय राजनीति के सबसे करिश्माई और लोकप्रिय नेता थे। उन्होंने चुनाव अभियान की अगुआई की और पूरे देश का दौरा किया।
4. ‘अव्वल और एकलौता’ होने का फायदा। बाकी दल अभी अपनी रणनीति सोच ही रहे होते थे कि कांग्रेस अपना अभियान शुरू कर देती थी, क्योंकि अनेक पार्टियों का गठन स्वतंत्रता के आस-पास या उसके बाद हुआ था।
5. सबको समेटकर चलने वाला स्वभाव। कांग्रेस हाल-फिलहाल तक आज़ादी के आंदोलन की अगुआ रही थी और उसकी प्रकृति सबको समेटकर मेलजोल के साथ चलने की थी।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. केरल में 1957 से 1959 तक क्या हुआ? यह प्रसंग संविधान के इस्तेमाल के लिहाज़ से क्यों महत्त्वपूर्ण है?

उत्तर: 1. कम्युनिस्ट पार्टी की जीत। मार्च 1957 के विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को केरल की विधानसभा के लिए सबसे ज्यादा सीटें मिलीं, कुल 126 में से 60, और पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का भी समर्थन उसे प्राप्त था।
2. दुनिया में पहली बार। राज्यपाल ने ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया। दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी।
3. ‘मुक्ति संघर्ष’। केरल में सत्ता से बेदखल होने पर कांग्रेस पार्टी ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ़ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया। कम्युनिस्टों का कहना था कि इस संघर्ष की अगुआई निहित स्वार्थ और धार्मिक संगठन कर रहे हैं।
4. बर्खास्तगी। 1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया।
5. इसका महत्त्व। यह फ़ैसला बड़ा विवादास्पद साबित हुआ, और संविधान-प्रदत्त आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में इस फ़ैसले का बार-बार उपयोग किया गया।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. कांग्रेस के गठबंधनी स्वभाव ने उसे कौन-सी दो ताकतें दीं, और इससे विपक्ष किस कठिनाई में पड़ा?

उत्तर: पहली ताकत: सबको शामिल करना। गठबंधन जो भी आए, उसे अपने में शामिल कर लेता है। इस कारण उसे अतिवादी रुख़ अपनाने से बचना होता है और हर मसले पर संतुलन साधकर चलना पड़ता है। सुलह-समझौते के रास्ते पर चलना और सर्व-समावेशी होना गठबंधन की विशेषता होती है।
दूसरी ताकत: अंदरूनी सहनशीलता। गठबंधनी स्वभाव वाली पार्टी में अंदरूनी मतभेदों को लेकर ज्यादा सहनशीलता होती है और विभिन्न समूहों तथा नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं की भी उसमें समाई हो जाती है।
नतीजा: अगर कोई समूह पार्टी के रुख़ से या सत्ता में अपने हिस्से से नाखुश हो, तब भी वह पार्टी में ही बना रहता था। पार्टी छोड़कर विपक्ष की भूमिका अपनाने की जगह वह पार्टी के भीतर किसी दूसरे समूह से लड़ना बेहतर समझता था।
विपक्ष की कठिनाई: इस रणनीति की वजह से विपक्ष मुश्किल में पड़ा, क्योंकि विपक्ष जो भी बात कहना चाहे, उसे कांग्रेस की विचारधारा और कार्यक्रम में तुरंत जगह मिल जाती थी।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. 1950 के दशक में विपक्षी दलों को बहुत कम सीटें मिलीं। फिर भी उनकी भूमिका को महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

उत्तर: 1. लोकतांत्रिक चरित्र बचाए रखा। इन दलों को लोकसभा या विधानसभा में कहने भर को प्रतिनिधित्व मिल पाया, फिर भी इनकी मौजूदगी ने हमारी शासन-व्यवस्था के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभायी।
2. सिद्धांतों वाली आलोचना। इन दलों ने कांग्रेस की नीतियों और व्यवहारों की सुचिन्तित आलोचना की, और इस आलोचना में सिद्धांतों का बल होता था।
3. शासक-दल पर अंकुश। इन दलों ने शासक-दल पर अंकुश रखा और बहुधा इनके कारण कांग्रेस पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन बदला।
4. विकल्प जीवित रखा। इन दलों ने लोकतांत्रिक राजनीतिक विकल्प की संभावना को जीवित रखा और ऐसा करके व्यवस्थाजन्य रोष को लोकतंत्र-विरोधी बनने से रोका।
5. नेता तैयार किए। इन दलों ने ऐसे नेता तैयार किए जिन्होंने आगे के समय में हमारे देश की तस्वीर को संवारने में अहम भूमिका निभायी। आज की लगभग सभी गैर-कांग्रेसी पार्टियों की जड़ें 1950 के दशक की किसी न किसी विपक्षी पार्टी में खोजी जा सकती हैं।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. सोशलिस्ट पार्टी की विचारधारा क्या थी और उसकी चुनावी नाकामी के बावजूद उसका महत्त्व क्या है?

उत्तर: 1. विचारधारा। समाजवादी लोकतांत्रिक समाजवाद की विचारधारा में विश्वास करते थे और इस आधार पर वे कांग्रेस तथा साम्यवादी दोनों से अलग थे।
2. कांग्रेस की आलोचना। वे कांग्रेस की आलोचना करते थे कि वह पूँजीपतियों और जमींदारों का पक्ष ले रही है और मज़दूरों-किसानों की उपेक्षा कर रही है।
3. चुनावी नाकामी। हालाँकि सोशलिस्ट पार्टी की मौजूदगी हिंदुस्तान के अधिकतर राज्यों में थी, लेकिन पार्टी को चुनावों में छिटपुट सफलता ही मिली, जिससे उसके समर्थकों को बड़ी निराशा हुई।
4. टूट और मेल। सोशलिस्ट पार्टी के कई टुकड़े हुए और कुछ मामलों में मेल भी हुआ। इस प्रक्रिया में किसान मज़दूर प्रजा पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी जैसे दल बने।
5. आज तक की छाप। जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, राममनोहर लोहिया और एस.एम. जोशी इसके प्रमुख नेता थे। आज के समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और जनता दल (सेक्युलर) जैसे दलों पर सोशलिस्ट पार्टी की छाप देखी जा सकती है।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. आज़ादी के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को किस सवाल ने परेशान किया और उसने अपना रास्ता कैसे बदला?

उत्तर: 1. मुख्य सवाल। आज़ादी हासिल होने पर पार्टी के भीतर कई स्वर उभरे। मुख्य सवाल यह था कि जो आज़ादी देश को हासिल हुई है उसकी प्रकृति कैसी है, यानी हिंदुस्तान सचमुच आज़ाद हुआ है या यह आज़ादी झूठी है।
2. पहला रुख़। आज़ादी के तुरंत बाद पार्टी का विचार था कि 1947 में सत्ता का जो हस्तांतरण हुआ वह सच्ची आज़ादी नहीं थी।
3. तेलंगाना। इसी विचार के साथ पार्टी ने तेलंगाना में हिंसक विद्रोह को बढ़ावा दिया। साम्यवादी अपनी बात के पक्ष में जनता का समर्थन हासिल नहीं कर सके और इन्हें सशस्त्र सेनाओं द्वारा दबा दिया गया।
4. पुनर्विचार। मजबूरन इन्हें अपने पक्ष को लेकर पुनर्विचार करना पड़ा। 1951 में पार्टी ने हिंसक क्रांति का रास्ता छोड़ दिया और आने वाले आम चुनावों में भाग लेने का फ़ैसला किया।
5. नतीजा। पहले आम चुनाव में पार्टी ने 16 सीटें जीतीं और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। इसे ज़्यादातर समर्थन आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में मिला।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. कांग्रेस एक सामाजिक और विचारधारात्मक गठबंधन कैसे बनी? विस्तार से समझाइए।

उत्तर: 1. शुरुआत एक हित-समूह के रूप में। कांग्रेस का जन्म 1885 में हुआ। उस वक्त यह नवशिक्षित, कामकाजी और व्यापारिक वर्गों का एक हित-समूह भर थी, लेकिन 20वीं सदी में इसने जनआंदोलन का रूप ले लिया। इसी वजह से यह एक जनव्यापी राजनीतिक पार्टी बनी और राजनीतिक-व्यवस्था में इसका दबदबा कायम हुआ।
2. शुरुआती सामाजिक आधार। शुरू-शुरू में कांग्रेस में अँग्रेज़ीदाँ, अगड़ी जाति, ऊँचले मध्यवर्ग और शहरी अभिजन का बोलबाला था।
3. आधार का फैलना। कांग्रेस ने जब भी सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलन चलाए, उसका सामाजिक आधार बढ़ा। कांग्रेस ने परस्पर विरोधी हितों के कई समूहों को एक साथ जोड़ा: किसान और उद्योगपति, शहर के बाशिंदे और गाँव के निवासी, मज़दूर और मालिक, तथा मध्य, निम्न और उच्च वर्ग एवं जाति, सबको इसमें जगह मिली।
4. नेतृत्व का विस्तार। धीरे-धीरे कांग्रेस का नेतृवर्ग भी विस्तृत हुआ। यह अब उच्च वर्ग या जाति के पेशेवर लोगों तक सीमित नहीं रहा; इसमें खेती-किसानी की बुनियाद वाले और गाँव-गिरान की तरफ़ रुझान रखने वाले नेता भी उभरे।
5. सतरंगा सामाजिक गठबंधन। आज़ादी के समय तक कांग्रेस एक सतरंगे सामाजिक गठबंधन की शक्ल अख़्तियार कर चुकी थी, और वर्ग, जाति, धर्म, भाषा तथा अन्य हितों के आधार पर इस गठबंधन से भारत की विविधता की नुमाइंदगी हो रही थी।
6. विचारधारात्मक गठबंधन भी। कई समूहों ने अपनी पहचान कांग्रेस के साथ एकमेक कर दी, तो कई अपने-अपने विश्वासों को मानते हुए भी कांग्रेस के भीतर बने रहे। इस अर्थ में कांग्रेस एक विचारधारात्मक गठबंधन भी थी। इसने क्रांतिकारी और शांतिवादी, कंजरवेटिव और रेडिकल, गरमपंथी और नरमपंथी, तथा दक्षिणपंथी, वामपंथी और हर धारा के मध्यमार्गियों को समाहित किया। कांग्रेस एक मंच की तरह थी, जिस पर अनेक समूह, हित और राजनीतिक दल तक आ जुटते थे।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. ‘कांग्रेस-प्रणाली’ क्या थी? गुटों की भूमिका के साथ इसे समझाइए।

उत्तर: 1. गुट क्या हैं। पार्टी के अंदर मौजूद विभिन्न समूह गुट कहे जाते हैं। अपने गठबंधनी स्वभाव के कारण कांग्रेस विभिन्न गुटों के प्रति सहनशील थी और इस स्वभाव से गुटों को बढ़ावा भी मिला।
2. गुट किस आधार पर बनते थे। कांग्रेस के कुछ गुट विचारधारात्मक सरोकारों की वजह से बने थे, लेकिन अकसर गुटों के बनने के पीछे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा तथा प्रतिस्पर्धा की भावना भी काम करती थी।
3. गुटबाजी ताकत क्यों बनी। अंदरूनी गुटबाजी कांग्रेस की कमज़ोरी बनने की बजाय उसकी ताकत साबित हुई। चूँकि पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों की आपसी होड़ के लिए गुंजाइश थी, इसलिए विभिन्न हित और विचारधाराओं की नुमाइंदगी कर रहे नेता कांग्रेस के भीतर ही बने रहे और उन्होंने बाहर निकलकर नई पार्टी बनाना बेहतर नहीं समझा।
4. मध्यमार्गी पार्टी। कांग्रेस की अधिकतर प्रांतीय इकाइयाँ विभिन्न गुटों को मिलाकर बनी थीं। ये गुट अलग-अलग विचारधारात्मक रुख़ अपनाते थे और कांग्रेस एक भारी-भरकम मध्यमार्गी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आती थी।
5. बाकी दलों की जगह। दूसरी पार्टियाँ मुख्यतः कांग्रेस के इस या उस गुट को प्रभावित करने की कोशिश करती थीं और इस तरह हाशिए पर रहकर ही नीतियों तथा फ़ैसलों को अप्रत्यक्ष रीति से प्रभावित कर पाती थीं। वे सत्ता के वास्तविक इस्तेमाल से कोसों दूर थीं और शासक दल का कोई विकल्प नहीं था। इसके बावजूद वे लगातार कांग्रेस की आलोचना करती थीं, उस पर दबाव डालती थीं और इस क्रम में उसे प्रभावित करती थीं।
6. यही ‘कांग्रेस-प्रणाली’ है। गुटों की मौजूदगी की यह प्रणाली शासक-दल के भीतर संतुलन साधने के एक औजार की तरह काम करती थी, और इस तरह राजनीतिक होड़ कांग्रेस के भीतर ही चलती थी। इस अर्थ में चुनावी प्रतिस्पर्धा के पहले दशक में कांग्रेस ने शासक-दल की भूमिका निभायी और विपक्ष की भी। इसी कारण भारतीय राजनीति के इस कालखंड को ‘कांग्रेस-प्रणाली’ कहा जाता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. पहले आम चुनाव को कराना कितना बड़ा काम था? तैयारी से लेकर नतीजों तक की पूरी कहानी बताइए।

उत्तर: 1. उम्मीद और हक़ीक़त। संविधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ, चुनाव आयोग का गठन जनवरी 1950 में हुआ और सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने। शुरू-शुरू में ख्याल था कि यह काम महज चंद महीनों का है और पहला आम चुनाव 1950 में ही हो जाएगा।
2. दो बुनियादी काम। चुनाव कराने के लिए चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन ज़रूरी था, और फिर मतदाता-सूची यानी मताधिकार प्राप्त वयस्क व्यक्तियों की सूची बनाना भी आवश्यक था। इन दोनों कामों में बहुत सारा समय लगा।
3. महिलाओं के नाम की समस्या। मतदाता-सूचियों का पहला प्रारूप छपा तो पता चला कि उसमें 40 लाख महिलाओं के नाम दर्ज़ होने से रह गए हैं, क्योंकि उन्हें ‘अलां की बेटी’ और ‘फलां की बीवी’ के रूप में दर्ज़ किया गया था। चुनाव आयोग ने ऐसी प्रविष्टियों को मानने से इनकार कर दिया। किताब इसे हिमालय की चढ़ाई जैसा दुष्कर काम कहती है।
4. पैमाना। उस वक्त देश में 17 करोड़ मतदाता थे, जिन्हें 3200 विधायक और लोकसभा के लिए 489 सांसद चुनने थे। इनमें महज 15 फीसदी साक्षर थे, इसलिए मतदान की विशेष पद्धति सोचनी पड़ी। चुनाव आयोग ने 3 लाख से ज्यादा अधिकारियों और चुनावकर्मियों को प्रशिक्षित किया और तकरीबन 20 लाख स्टील के बक्से इस्तेमाल हुए।
5. संदेह और चुनाव। यह अपने आप में बड़ा जोखिम भरा प्रयोग था। एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ करार दिया। चुनावों को दो बार स्थगित करना पड़ा और आख़िरकार 1951 के अक्तूबर से 1952 के फरवरी तक चुनाव हुए। अभियान, मतदान और मतगणना में कुल छह महीने लगे और औसतन हर सीट के लिए चार उम्मीदवार मैदान में थे।
6. नतीजा। कुल मतदाताओं में आधे से अधिक ने वोट डाला और हारने वाले उम्मीदवारों ने भी परिणामों को निष्पक्ष बताया। टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स दोनों ने इसे सराहा, और 1952 का आम चुनाव पूरी दुनिया में लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. 1950 के दशक के तीन प्रमुख विपक्षी दलों की तुलना कीजिए: सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय जनसंघ।

उत्तर: 1. जन्म। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी 1934 में कांग्रेस के भीतर बनी और 1948 में अलग सोशलिस्ट पार्टी बनी। साम्यवादी समूह 1920 के दशक के शुरुआती सालों में उभरे और कम्युनिस्ट पार्टी दिसंबर 1941 में कांग्रेस से अलग हुई। भारतीय जनसंघ का गठन 1951 में हुआ।
2. विचारधारा। समाजवादी लोकतांत्रिक समाजवाद में विश्वास करते थे, जो उन्हें कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों से अलग करता था। कम्युनिस्ट रूस की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरित थे और साम्यवाद की राह की तरफ़दारी करते थे। जनसंघ ने ‘एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र’ पर जोर दिया और ‘अखंड भारत’ की बात कही।
3. संस्थापक और नेता। सोशलिस्ट पार्टी: जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, आचार्य नरेन्द्र देव, राममनोहर लोहिया और एस.एम. जोशी। सीपीआई: ए.के. गोपालन, एस.ए. डांगे, ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद, पी.सी. जोशी, अजय घोष और पी. सुंदरैया। जनसंघ: श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और बलराज मधोक।
4. चुनावी प्रदर्शन। सोशलिस्ट पार्टी को 1952 में 10 प्रतिशत वोट मिले पर 3 प्रतिशत सीटें भी नहीं; उसकी मौजूदगी अधिकतर राज्यों में थी पर सफलता छिटपुट रही। सीपीआई ने 16 सीटें जीतीं और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी। जनसंघ 1950 के दशक में हाशिए पर ही रहा, 1952 में 3 और 1957 में 4 सीटें।
5. समर्थन के इलाके। सीपीआई को ज़्यादातर समर्थन आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और केरल में मिला। जनसंघ को शुरुआती सालों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के शहरी इलाकों में समर्थन मिला।
6. आज तक की विरासत। सोशलिस्ट पार्टी की छाप समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और जनता दल (सेक्युलर) पर देखी जा सकती है। सीपीआई 1964 में टूटी और सीपीआई तथा सीपीआई (एम) दोनों आज तक कायम हैं। भारतीय जनता पार्टी की जड़ें भारतीय जनसंघ में हैं।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. भारत में लोकतांत्रिक राजनीति का पहला दौर अनूठा क्यों था, और कांग्रेस का प्रभुत्व सिर्फ़ एक दौर तक सीमित क्यों रह गया?

उत्तर: 1. समावेशी राष्ट्रीय आंदोलन। राष्ट्रीय आंदोलन का चरित्र समावेशी था और इसकी अगुआई कांग्रेस ने की थी। इसी चरित्र के कारण कांग्रेस की तरफ विभिन्न समूह, वर्ग और हितों के लोग आकर्षित हुए।
2. व्यापक गठबंधन। सामाजिक और विचारधारात्मक रूप से कांग्रेस एक व्यापक गठबंधन के रूप में उभरी, और आज़ादी की लड़ाई में उसकी मुख्य भूमिका के कारण उसे दूसरी पार्टियों की अपेक्षा बढ़त प्राप्त थी।
3. प्रभुत्व लोकतांत्रिक तरीके से। बाकी मुल्कों के उलट यहाँ यह प्रभुत्व लोकतंत्र की कीमत पर नहीं, लोकतांत्रिक स्थितियों में कायम हुआ। अनेक पार्टियों ने मुक्त और निष्पक्ष चुनाव के माहौल में होड़ की और तब भी कांग्रेस जीतती गई।
4. विपक्ष कमज़ोर था, गैर-हाज़िर नहीं। बहुदलीय लोकतंत्र वाले अन्य अनेक देशों की तुलना में उस वक्त भी भारत में बहुविध और जीवन्त विपक्षी पार्टियाँ थीं, जिन्होंने व्यवस्था का लोकतांत्रिक चरित्र बनाए रखा।
5. पारस्परिक सम्मान। शुरुआती सालों में कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं के बीच पारस्परिक सम्मान का गहरा भाव था। अंतरिम सरकार के मंत्रिमंडल में डॉ. अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे, और नेहरू ने जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं को सरकार में शामिल होने का न्यौता दिया। दलगत प्रतिस्पर्धा तेज होने के बाद यह भाव लगातार कम होता गया।
6. प्रभुत्व का अंत। सत्ता पाने की लालसा रखने वाले हर व्यक्ति और हर हित-समूह को अपने अंदर समाहित करने की कांग्रेस की क्षमता जैसे-जैसे घटी, वैसे-वैसे दूसरे राजनीतिक दलों को महत्त्व मिलना शुरू हुआ। इस तरह कांग्रेस का प्रभुत्व देश की राजनीति के सिर्फ़ एक दौर में रहा।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
किताब बताती है कि सार्वभौम मताधिकार पर अमल अपने आप में बड़ा जोखिम भरा प्रयोग था। एक हिंदुस्तानी संपादक ने इसे ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’ करार दिया। ‘आर्गनाइजर’ नाम की पत्रिका ने लिखा कि जवाहरलाल नेहरू ‘अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे और पछताएँगे कि भारत में सार्वभौम मताधिकार असफल रहा।’ इंडियन सिविल सर्विस के एक अँग्रेज़ नुमाइंदे का दावा था कि ‘आने वाला वक्त और अब से कहीं ज्यादा जानकार दौर बड़े विस्मय से लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदी नौटंकी देखेगा।’ चुनाव के बाद टाइम्स ऑफ इंडिया ने माना कि इन चुनावों ने ‘उन सभी आलोचकों के संदेहों पर पानी फेर दिया है जो सार्वभौम मताधिकार की इस शुरुआत को इस देश के लिए जोखिम का सौदा मान रहे थे।’

(क) 1 अंक एक हिंदुस्तानी संपादक ने इस प्रयोग को क्या कहा था?
उत्तर: ‘इतिहास का सबसे बड़ा जुआ’।

(ख) 2 अंक आलोचकों के संदेह की जड़ में कौन-सी दो बातें थीं?
उत्तर: पहली, मतदाताओं की एक बड़ी तादाद गरीब और अनपढ़ लोगों की थी और इनमें महज 15 फीसदी साक्षर थे। दूसरी, इस वक्त तक लोकतंत्र सिर्फ़ धनी देशों में ही कायम था, और उस समय यूरोप के बहुतेरे देशों में तो महिलाओं को मताधिकार भी नहीं मिला था।

(ग) 3 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि चुनाव के नतीजों ने इन आलोचकों को कैसे ग़लत साबित किया, और इसका विश्व-स्तर पर क्या महत्त्व रहा।
उत्तर: चुनाव में कुल मतदाताओं में आधे से अधिक ने मतदान के दिन अपना वोट डाला, और परिणाम घोषित हुए तो हारने वाले उम्मीदवारों ने भी इन परिणामों को निष्पक्ष बताया। सार्वभौम मताधिकार के इस प्रयोग ने आलोचकों का मुँह बंद कर दिया, और देश से बाहर के पर्यवेक्षक भी हैरान थे।
विश्व-स्तर पर 1952 का आम चुनाव लोकतंत्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। अब यह दलील दे पाना संभव नहीं रहा कि लोकतांत्रिक चुनाव गरीबी अथवा अशिक्षा के माहौल में नहीं कराए जा सकते। यह बात साबित हो गई कि दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र पर अमल किया जा सकता है।

केस स्टडी
1957 में ही कांग्रेस पार्टी को केरल में हार का स्वाद चखना पड़ गया था। 1957 के मार्च महीने में जो विधानसभा के चुनाव हुए उसमें कम्युनिस्ट पार्टी को केरल की विधानसभा के लिए सबसे ज्यादा सीटें मिलीं। कम्युनिस्ट पार्टी को कुल 126 में से 60 सीटें हासिल हुईं और पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का भी समर्थन इस पार्टी को प्राप्त था। राज्यपाल ने कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद को सरकार बनाने का न्यौता दिया। दुनिया में यह पहला अवसर था जब एक कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए बनी। केरल में सत्ता से बेदखल होने पर कांग्रेस पार्टी ने निर्वाचित सरकार के खिलाफ़ ‘मुक्ति संघर्ष’ छेड़ दिया।

(क) 1 अंक कम्युनिस्ट विधायक दल के नेता कौन थे जिन्हें सरकार बनाने का न्यौता मिला?
उत्तर: ई.एम.एस. नम्बूदरीपाद।

(ख) 2 अंक गद्यांश के आँकड़ों से बताइए कि यह सरकार गठबंधन सरकार क्यों कही जाती है।
उत्तर: कम्युनिस्ट पार्टी को कुल 126 में से 60 सीटें मिलीं, यानी अपने दम पर बहुमत नहीं था। इसके साथ पाँच स्वतंत्र उम्मीदवारों का भी समर्थन इस पार्टी को प्राप्त था, और इसी समर्थन के सहारे सरकार बनी।

(ग) 3 अंक ‘मुक्ति संघर्ष’ के बाद क्या हुआ, और इस पूरे प्रसंग को संविधान के दुरुपयोग का उदाहरण क्यों माना जाता है?
उत्तर: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में इस वायदे के साथ आई थी कि वह कुछ क्रांतिकारी तथा प्रगतिशील नीतिगत पहल करेगी, और कम्युनिस्टों का कहना था कि इस संघर्ष की अगुआई निहित स्वार्थ और धार्मिक संगठन कर रहे हैं।
1959 में केंद्र की कांग्रेस सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 के अंतर्गत केरल की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त कर दिया।
यह फ़ैसला बड़ा विवादास्पद साबित हुआ, क्योंकि एक लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को केंद्र ने हटा दिया था। संविधान-प्रदत्त आपात्कालीन शक्तियों के दुरुपयोग के प्रमुख उदाहरण के रूप में इस फ़ैसले का बार-बार उपयोग किया गया।