- फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जीवन-परिचय और उनकी आंचलिक लेखन-शैली
- “संवदिया” शब्द का सही अर्थ और गाँववालों की उसके बारे में ग़लत धारणा
- कहानी का पूरा घटनाक्रम, शुरू से अंत तक, कारण-परिणाम सहित
- हरगोबिन और बड़ी बहुरिया का चरित्र-चित्रण
- कहानी का असली उद्देश्य और अंत का सही अर्थ
- महत्वपूर्ण पंक्तियों की व्याख्या और भाषा-शिल्प के शब्द
1 लेखक-परिचय: फणीश्वरनाथ ‘रेणु’

जन्म औराही हिंगना गाँव, पूर्णिया ज़िला, बिहार में हुआ। जीवनकाल 1921 से 1977। वे केवल लेखक नहीं, आंदोलनकारी भी थे: 1942 के ‘भारत छोड़ो’ स्वाधीनता आंदोलन में भाग लिया, और नेपाल के राणाशाही-विरोधी आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। राजनीति में वे प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक थे। 1953 ई. में वे साहित्य-सृजन के क्षेत्र में आए।
आंचलिक कथाकार उस लेखक को कहते हैं जो किसी एक विशेष अंचल (क्षेत्र) को अपनी रचना का आधार बनाता है और उसी क्षेत्र की बोली, शब्दावली और मुहावरों का उपयोग करके वहाँ के जीवन और वातावरण का सजीव चित्रण करता है। पाठ के परिचय के अनुसार रेणु हिंदी के आंचलिक कथाकार हैं।
रेणु की गहरी मानवीय संवेदना उन्हें अभावग्रस्त (साधनहीन) जनता की बेबसी और पीड़ा स्वयं भोगते-सी लगती है। साथ ही उनका यह विश्वास भी है कि आज के त्रस्त (दुखी) मनुष्य के भीतर अपनी जीवन-दशा बदल देने की अकूत (असीम) ताकत छिपी है।
| विधा | प्रमुख रचनाएँ |
|---|---|
| कहानी-संग्रह | ठुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक |
| कहानी (फ़िल्म बनी) | तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम |
| उपन्यास | मैला आँचल, परती परिकथा |
पाठ के परिचय के अनुसार रेणु ने अपनी रचनाओं के द्वारा प्रेमचंद की विरासत को नयी पहचान और भंगिमा प्रदान की। उनकी कला की अलग पहचान है: “सजग आँखें, गहरी मानवीय संवेदना और बदलते सामाजिक यथार्थ की पकड़”; और मैला आँचल, परती परिकथा जैसे उपन्यासों के साथ उन्होंने शिल्प और आस्वाद में भिन्न हिंदी कथा की नई परंपरा को जन्म दिया। उनकी भाषा संवेदनशील, संप्रेषणीय (जो सीधे मन तक पहुँचे) और भाव-प्रधान है, जो मर्मांतक (हृदय को छू लेने वाली) पीड़ा और भावनाओं के द्वंद्व को उभारने में सक्षम है। “संवदिया” इसी शैली का सशक्त उदाहरण है, जिसमें लोकभाषा की नींव पर खड़ी कहानी पहाड़ी झरने जैसी गतिमान बताई गई है।
2 “संवदिया” शब्द का अर्थ और उसका असली काम
संवदिया का अर्थ है संदेशवाहक, यानी वह व्यक्ति जो एक जगह से दूसरी जगह मौखिक संवाद (संदेश) पहुँचाता है। पाठ के अनुसार संवाद के प्रत्येक शब्द को याद रखना और “जिस सुर और स्वर में संवाद सुनाया गया है, ठीक उसी ढंग से जाकर सुनाना सहज काम नहीं”। कहानी की शुरुआत में गाँव-गाँव डाकघर खुल जाने के बाद भी हरगोबिन को अचरज होता है कि “आज भी किसी को संवदिया की ज़रूरत पड़ सकती है”।
यह काम दिखने में जितना आसान लगता है, असल में उतना ही कठिन है। संवाद के हर शब्द को हूबहू याद रखना पड़ता है, और उसे उसी अंदाज़ में सुनाना पड़ता है जिस अंदाज़ में वह कहा गया था। यह हर किसी के बस की बात नहीं है, इसीलिए कहा गया है कि आदमी मानो भगवान के घर से संवदिया बनकर आता है।
पाठ के अनुसार “गाँव के लोगों की गलत धारणा है कि निठल्ला, कामचोर और पेटू आदमी ही संवदिया का काम करता है”। बिना मज़दूरी लिए जो गाँव-गाँव संवाद पहुँचावे, उसे वे “औरतों का गुलाम” कहते हैं, और पूछते हैं कि “ज़रा-सी मीठी बोली सुनकर ही नशे में आ जाए, ऐसे मर्द को भी भला मर्द कहेंगे?” पर पाठ यह भी पूछता है: “गाँव में कौन ऐसा है, जिसके घर की माँ-बहू-बेटी का संवाद हरगोबिन ने नहीं पहुँचाया है?” यह गाँव वालों की धारणा है, लेखक की अपनी राय नहीं; पाठ स्वयं इसे “गलत धारणा” कहता है।
3 कहानी के प्रमुख पात्र
हरगोबिन
जलालगढ़ गाँव का संवदिया। संवेदनशील, कर्तव्यनिष्ठ, पर बड़ी बहुरिया के दुख से इतना विचलित कि उसका असली संवाद माँ तक नहीं पहुँचा पाता।
बड़ी बहुरिया
बड़ी हवेली की पुत्रवधू (बहू)। पति की मृत्यु और देवरों की उपेक्षा के बाद अकेली, बथुआ-साग खाकर गुज़ारा करने को मजबूर। संदेश में वह माँ से साफ़ कहलवाती है कि अब यहाँ नहीं रह सकेगी और माँ उसे ले जाए; पर संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछताने लगती है।
बूढ़ी माता
बड़ी बहुरिया की माँ। बेटी की चिंता में हरगोबिन से बार-बार संवाद पूछती है, और बेटे से कह चुकी है कि जाकर दीदी को लिवा लाए, “यहीं रहेगी”।
मोदिआइन और काबुली (गुल मुहम्मद आगा)
मोदिआइन गाँव की बूढ़ी महिला है, जो उधार के सौदे का बाकी-बकाया वसूलने के लिए आँगन में बैठी बड़बड़ा रही है। काबुली उधार कपड़ा बेचने वाला व्यापारी था जिसने कठोर वसूली से गाँव को नाराज़ किया था।
सूरदास (निरगुन गायक)
वापसी की ट्रेन में आने वाला “निरगुन गानेवाला सूरदास”, जिसका गीत हरगोबिन के बेचैन मन को कुछ देर के लिए शांत करता है।
4 कथा-सार (घटनाक्रम अनुसार)
4.1 बड़ी हवेली में बुलावा
- हरगोबिन को बड़ी हवेली से बुलावा आता है, उसे अचरज होता है कि डाकघर खुल जाने के बाद भी किसी को संवदिया की ज़रूरत क्यों पड़ी।
- वातावरण को सूँघकर वह अंदाज़ा लगाता है कि ज़रूर कोई गुप्त संवाद ले जाना होगा।
- बड़ी हवेली अब नाम की ही बड़ी हवेली रह गई है, बड़ी बहुरिया ख़ुद सूपे में अनाज फटक रही है, जो पहले नौकर-नौकरानियाँ करती थीं।
- इसका कारण हरगोबिन को याद आता है, बड़े भैया (बड़ी बहुरिया के पति) की मृत्यु एक घंटे की बीमारी में हुई थी।
- इसी के बाद तीनों देवरों में आपस में लड़ाई-झगड़ा शुरू हुआ, रैयतों ने ज़मीन पर दखल कर लिया, और तीनों देवर गाँव छोड़कर शहर जा बसे।
- बँटवारे के समय बड़ी बहुरिया के गहने छीन लिए गए, उसकी बनारसी साड़ी तक तीन टुकड़ों में बाँट दी गई, जिसे हरगोबिन द्रौपदी के चीर-हरण जैसा भयानक दृश्य बताता है।
4.2 मोदिआइन और काबुली-कायदे का प्रसंग
- गाँव की मोदिआइन आँगन में बैठी पुराना बाकी-बकाया माँग रही है।
- हरगोबिन उसे छेड़ता है कि उधार वसूलने का “काबुली-कायदा” उसने ख़ूब सीख लिया है, मोदिआइन भड़क उठती है।
- इसी से पता चलता है, पाँच साल पहले गुल मुहम्मद आगा नाम का काबुली व्यापारी उधार पर कपड़ा बेचने आता था, मीठा बोलकर कपड़ा देता और ज़ोर-ज़ुल्म से एक का दो वसूलता था।
- एक बार कई उधार लेने वालों ने मिलकर उसकी ऐसी मरम्मत कर दी कि वह फिर लौटकर गाँव नहीं आया।
- इसके बाद ही “दुखनी मोदिआइन लाल मोदिआइन हो गई”, यानी वह “काबुली” या “काबुली बादाम” नाम सुनते ही चिढ़ जाती है।
- गाँव के नाचनेवालों ने भी एक बार नाच में काबुली का स्वांग रचा था, “तुम अमारा मुलुक जाएगा मोदिआइन? अम काबुली बादाम-पिस्ता-अकरोट किलायगा!”
4.3 बड़ी बहुरिया का संवाद
- मोदिआइन के जाते ही बड़ी बहुरिया कहती है, उसे आज ही एक संवाद अपनी माँ के पास ले जाना है।
- संवाद सुनाते समय वह सिसकने लगती है, हरगोबिन ने “बड़ी हवेली की लक्ष्मी” को पहली बार इस तरह सिसकते देखा है।
“अब नहीं रह सकूँगी।”
बड़ी बहुरिया का संवाद, अपनी माँ के लिए। भावार्थ: वह भाई-भाभियों की नौकरी करके भी पेट पाल लेगी, बच्चों की जूठन खाकर एक कोने में पड़ी रहेगी, पर ससुराल में अब और नहीं टिक सकती
- यदि माँ उसे यहाँ से नहीं ले गई तो वह गले में घड़ा बाँधकर पोखरे में डूब मरेगी, यह भी कह देती है।
- पूछती है, आख़िर बथुआ-साग खाकर वह कब तक जिएगी, किसके लिए इतना दुख सहेगी।
- इसी क्षण हरगोबिन को देवर-देवरानियों की निर्दयता याद आती है, वे साल में दो बार, अगहनी धान और आम के मौसम में आकर उपज बटोरकर ले जाते हैं, कर्ज़-उधार की ढेरी लगा जाते हैं, और कभी बड़ी बहुरिया की सुध नहीं लेते।
- बड़ी बहुरिया राह-खर्च के लिए पाँच रुपए का एक नोट देना चाहती है, हरगोबिन मना कर देता है और उसी दिन दस बजे की गाड़ी से निकल पड़ता है।
4.4 ट्रेन में हरगोबिन का मनोद्वंद्व
- गाड़ी पर सवार होते ही उसे पुराने दिनों और संवादों की याद आने लगती है, और एक करुण गीत की भूली हुई कड़ी उसके कानों के पास गूँजने लगती है: “पैयाँ पडूँ दाढ़ी धरूँ … हमारो संवाद ले ले जाहु रे संवदिया-या-या!”
- बड़ी बहुरिया के संवाद का हर शब्द उसके मन में काँटे की तरह चुभने लगता है। संवाद में वह अपने अकेलेपन की हद बताती है: “एक नौकर था, वह भी कल भाग गया। गाय खूँटे से बँधी भूखी-प्यासी हिकर रही है।” गाड़ी बदलने के बाद उसे फिर उसकी बात याद आती है: “भगवान ने आँखें फेर लीं, लेकिन मेरी माँ तो है”। हवेली से निकलते समय भी उसने कहा था, “मैं तुम्हारी राह देख रही हूँ।”
- सहयात्री से थाना बिंहपुर में गाड़ी रुकने की पूछता है, रूखा जवाब मिलता है, इसलिए फिर मन-ही-मन संवाद दोहराने लगता है।
- उसे डर सताता है कि संवाद सुनाते समय अपने कलेजे को कैसे सँभालेगा, क्योंकि बड़ी बहुरिया जहाँ-जहाँ रोई थी, वहाँ वह भी रोएगा।
- कटिहार जंक्शन पहुँचकर भोंपे (लाउडस्पीकर) से ही प्लेटफ़ार्म की घोषणा सुनकर उसे सुराज (स्वराज) का सच्चा एहसास होता है, पहले प्लेटफ़ार्म पूछने में ही उसकी कई बार गाड़ी छूट चुकी थी।
4.5 माँ से भेंट: हरगोबिन के झूठ
- थाना बिंहपुर पहुँचकर हरगोबिन का जी भारी हो जाता है, पैर गाँव की ओर बढ़ ही नहीं रहे।
- उसे लगता है, इसी रास्ते बड़ी बहुरिया मायके लौटकर गाँव छोड़ देगी, और लोग हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे।
- गाँव में प्रवेश करते ही लोग उसे “जलालगढ़ गाँव का संवदिया” पहचान लेते हैं।
| मुख्य झूठ | हरगोबिन ने क्या कहा | असली सच्चाई |
|---|---|---|
| पहला | बड़ी बहुरिया के भाई से: “भगवान की दया से सब राजी-खुशी है।” | बड़ी बहुरिया घोर कष्ट में है और गाँव छोड़ना चाहती है |
| दूसरा | बूढ़ी माता से: “जी, संवाद तो कोई नहीं। मैं कल सिरसिया गाँव आया था, तो सोचा कि एक बार चलकर आप लोगों का दर्शन कर लूँ।” फिर बड़ी बहुरिया के नाम से कहता है कि “यदि छुट्टी हुई तो दशहरा के समय गंगाजी के मेले में आकर माँ से भेंट-मुलाकात कर जाऊँगी” | वह संवाद लेकर ही आया है। दशहरे वाली बात हरगोबिन बड़ी बहुरिया के नाम से कहता है; पाठ यह नहीं बताता कि बड़ी बहुरिया ने सचमुच ऐसा कहा था या नहीं |
| तीसरा | बड़े भाई से, राह-खर्च पूछे जाने पर: “आपकी दुआ से किसी बात की कमी नहीं” | हरगोबिन के पास इतने ही पैसे हैं कि कटिहार तक का टिकट भर आ सके |
तीन मुख्य झूठ: भाई से “सब राजी-खुशी है”, माँ से सिरसिया और दशहरे की बात, और भाई से “किसी बात की कमी नहीं”। पाठ इनका कारण सीधे नहीं बताता। पाठ में हरगोबिन का अपना डर यह है कि “सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे”; प्रसंग से करुणा भी झलकती है, और तीसरा झूठ उसके आत्म-सम्मान से जुड़ा पढ़ा जा सकता है। इनके अलावा भी वह बात सँभालने वाली बातें कहता है, जैसे “सारी गृहस्थी बड़ी बहुरिया के ऊपर ही है” और “पेटभर जलपान जो कर लिया है”। (ज़मीन-जायदाद पर उसकी बात और बूढ़ी माता की बात में पाठ दो मत रखता है।) पाठ झूठों की कोई गिनती नहीं देता।
- बूढ़ी माता अपनी ओर से ही बेटे से कह चुकी थी कि जाकर दीदी को लिवा लाए, “यहीं रहेगी”; उसके अनुसार “ज़मीन-जायदाद तो सब चली ही गई” और देवर “कोई खोज-खबर भी नहीं लेते”।
- हरगोबिन बचाव करता है, “ज़मीन-जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं। जो है, वही बहुत है।” बड़ी बहुरिया तो पूरे गाँव की लक्ष्मी है, गाँव की लक्ष्मी भला शहर कैसे जा सकती है।
- बूढ़ी माता जलपान कराती है, फिर रात के भोजन में दाल-भात, तीन किस्म की भाजी, घी, पापड़, अचार परोसती है, हरगोबिन बड़ी बहुरिया के बथुआ-साग की याद में एक निवाला भी नहीं खा पाता।
“संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है।”
लेखक की टिप्पणी: आम तौर पर संवदिया (जिसके घर संवाद लेकर जाता है, वहाँ) डटकर खाता है और पेट भरकर सोता है। भावार्थ: हरगोबिन के साथ उल्टा होता है, हरगोबिन झूठ बोलने के अपराध-बोध में रात भर सो नहीं पाता
- रातभर जागकर वह तय करता है, सुबह उठते ही बड़ी बहुरिया का असली संवाद अक्षर-अक्षर सुना देगा।
- पर सुबह होते ही वह फिर पीछे हट जाता है, जल्दी लौटने का बहाना बना देता है, माँ बासमती चूड़ा देकर उसे विदा करती है।
4.6 वापसी: बीस कोस पैदल और राह भटकना
- स्टेशन पर हिसाब लगाने पर पता चलता है, उसके पास सिर्फ़ कटिहार तक का ही टिकट ख़रीदने लायक़ पैसे हैं, चौअन्नी नकली निकली तो सैमापुर तक का ही।
- ट्रेन में निरगुन गाने वाला सूरदास मिलता है, जिसका गीत “नैहरा को सुख सपन भयो अब” हरगोबिन के बेचैन मन को कुछ देर शांत करता है।
- कटिहार पहुँचकर पता चलता है, जलालगढ़ जाने वाली गाड़ी के लिए उसके पास टिकट ही नहीं है, इसलिए वह बीस कोस का रास्ता पैदल तय करने का फ़ैसला करता है।
- महावीर-विक्रम-बजरंगी का नाम लेकर वह चल पड़ता है।
- रास्ते में चूड़े की पोटली सूँघकर तय करता है, इसमें से एक मुट्ठी भी नहीं खाएगा, यह माँ की सौगात बेटी के लिए है।
- साँझ होते ही उसे “अमावस्या का अंधकार” दिखने लगता है; बीस कोस चलकर थका हरगोबिन (पैर पहले ही लड़खड़ाने लगे थे) राह भूल जाता है और उसका मन भटकने लगता है, खेत नदी जैसे और झोंपड़े हाथियों के झुंड जैसे दिखने लगते हैं, यह भी समझ नहीं आता कि वह खड़ा है या चल रहा है।
4.7 कहानी का अंत
- बेहोशी की हालत में हरगोबिन को बड़ी बहुरिया की आवाज़ सुनाई देती है।
- होश आने पर वह पाता है, वह बिछावन पर लेटा है और बड़ी बहुरिया उसे दूध पिला रही है।
- वह बड़ी बहुरिया का पैर पकड़ लेता है, “मुझे माफ़ करो, मैं तुम्हारा संवाद नहीं कह सका।”
- वादा करता है, अब निठल्ला नहीं बैठेगा, बड़ी बहुरिया का सारा काम करेगा, कहता है, “तुम मेरी माँ, सारे गाँव की माँ हो।”
कहानी का अंत यह नहीं कहता कि हरगोबिन की विनती सुनकर बड़ी बहुरिया मान जाती है। असली बात यह है कि बड़ी बहुरिया संवाद भेजने के दिन से ही अपनी उस ग़लती पर पछता रही थी, यानी हरगोबिन के लौटने से भी पहले से वह ख़ुद अपने फ़ैसले पर पछता रही थी। इसलिए अंत को हरगोबिन की “जीत” के बजाय दोनों पात्रों के मन के मेल के रूप में पढ़ा जा सकता है।

5 कहानी का उद्देश्य और संदेश
पाठ के परिचय के अनुसार “संवदिया कहानी में मानवीय संवेदना की गहन एवं विलक्षण पहचान प्रस्तुत हुई है”। यह असहाय और सहनशील नारी मन के दुख, करुणा, पीड़ा और यातना की सूक्ष्म पकड़ है, जो परिचय के शब्दों में रेणु जैसे “आत्मा के शिल्पी” द्वारा ही संभव है; रेणु ने बड़ी बहुरिया की पीड़ा को, उसके भीतर के हाहाकार को, संवदिया के माध्यम से अपनी पूरी सहानुभूति प्रदान की है।
कहानी ग्रामीण जीवन के भीतर के आत्मीय रिश्तों को भी उभारती है। एक ओर वे देवर हैं जो फ़सल और आम के मौसम में आकर उपज ले जाते हैं और “फिर उलटकर कभी नहीं देखते”। दूसरी ओर हरगोबिन है, जो बड़ी बहुरिया के दुख से इतना जुड़ जाता है कि उसका संवाद माँ तक नहीं कह पाता। एक पाठ यह भी है कि संवदिया की भूमिका साधारण संदेश-साधनों से अलग है, क्योंकि उसे संवाद “जिस सुर और स्वर में” सुनाया गया, “ठीक उसी ढंग से” पहुँचाना होता है।
“डिजिटल इंडिया के दौर में संवदिया की क्या भूमिका हो सकती है” प्रश्न पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास (प्रश्न 10) में ही है। यह विचार-आधारित प्रश्न है; उत्तर में आप यह तर्क रख सकते हैं कि संदेश तो आज तुरंत पहुँच जाते हैं, पर संवाद को उसी सुर और भाव में, भरोसे के साथ पहुँचाने वाले व्यक्ति की ज़रूरत कई स्थितियों में बनी रह सकती है।
6 चरित्र-चित्रण
हरगोबिन
- जलालगढ़ गाँव का अनुभवी संवदिया
- अत्यंत संवेदनशील, दूसरों का दुख अपना दुख मान लेता है
- कर्तव्य और करुणा के बीच फँसकर बार-बार झूठ बोलता है
- अंत में अपनी ग़लती मानकर बड़ी बहुरिया की सेवा का संकल्प लेता है
बड़ी बहुरिया
- बड़ी हवेली की पुत्रवधू; हरगोबिन के शब्दों में “हमारे गाँव की लक्ष्मी है बड़ी बहुरिया”
- पति की मृत्यु और देवरों की उपेक्षा से अकेली, आर्थिक रूप से असहाय
- बथुआ-साग खाकर गुज़ारा करने को मजबूर, फिर भी सहनशील
- संवाद में साफ़ कहती है कि अब यहाँ नहीं रह सकेगी, और संवाद भेजने के बाद से ही अपनी गलती पर पछताने लगती है
7 महत्वपूर्ण पंक्तियों की व्याख्या
“बड़ी हवेली अब नाममात्र को ही बड़ी हवेली है।”
भावार्थ: हवेली “टूट भी गई है”, और जहाँ दिनरात नौकर-नौकरानियों और जन-मज़दूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहाँ आज बड़ी बहुरिया ख़ुद सूपा में अनाज फटक रही है; यानी उसकी असली शान और रौनक़ ख़त्म हो चुकी है। ज़मीन-जायदाद पर पाठ में दो मत हैं: बूढ़ी माता के अनुसार “ज़मीन-जायदाद तो सब चली ही गई”, जबकि हरगोबिन कहता है “ज़मीन-जायदाद अभी भी कुछ कम नहीं”। अब सिर्फ़ नाम में “बड़ी” रह गया है, हक़ीक़त में वहाँ ग़रीबी और सूनापन है।
“हरगोबिन ने देखी अपनी आँखों से द्रौपदी की चीरहरण लीला।”
भावार्थ: महाभारत में द्रौपदी का चीर खींचकर उसे अपमानित करने की कोशिश हुई थी। हरगोबिन बँटवारे के समय बड़ी बहुरिया के गहने छीने जाने और उसकी बनारसी साड़ी तीन टुकड़ों में बाँटे जाने को उतना ही क्रूर और अपमानजनक मानता है, इसीलिए इसकी तुलना द्रौपदी के चीर-हरण से करता है।
“बथुआ साग खाकर कब तक जीऊँ?”
भावार्थ: बथुआ-साग खाकर गुज़ारा करना उसकी आर्थिक तंगी को दिखाता है। बड़ी बहुरिया के मुँह से यह सवाल उसकी गहरी हताशा और आर्थिक तंगी को दिखाता है, वह पूछ रही है कि कब तक वह इतनी दयनीय हालत में यूँ ही जीती रहेगी, बिना किसी उम्मीद या सहारे के।
“किस मुँह से वह ऐसा संवाद सुनाएगा।”
भावार्थ: हरगोबिन सोचता है, “कैसे कहेगा कि बड़ी बहुरिया बथुआ-साग खाकर गुज़ारा कर रही है?” पाठ में उसका डर यह है कि “सुननेवाले हरगोबिन के गाँव का नाम लेकर थूकेंगे”, कि कैसा गाँव है जहाँ लक्ष्मी जैसी बहुरिया दुख भोग रही है। इसीलिए वह ख़ुद को इतना असमर्थ महसूस करता है कि सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
8 भाषा-शिल्प और शब्दार्थ
| शब्द / मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| काबुली-कायदा | ज़ोर-ज़ुल्म से, कठोरता से उधार वसूलने का तरीक़ा |
| रोम-रोम कलपने लगा | पूरे शरीर और मन में गहरा दुख या पछतावा होना |
| अगहनी धान | अगहन महीने में तैयार होने वाली धान की फ़सल |
| संवदिया | संदेशवाहक, संदेश पहुँचाने वाला |
| मारफ़त | माध्यम, ज़रिया |
| परेवा | कबूतर, कोई तेज़ उड़ने वाला पक्षी |
| सूपा | छाज, सूप (अनाज फटकने का बर्तन) |
| रैयत | प्रजा, ज़मीन जोतने वाले किसान |
| हिकर | बेचैन होकर पुकारना |
| अफरना | पेट भरकर खाना |
| चूड़ा | चिड़वा (चावल से बना खाद्य पदार्थ) |
| बहुरिया | पुत्रवधू |
| दखल | हस्तक्षेप, अधिकार माँगना |
| आगे नाथ न पीछे पगहा | कोई ज़िम्मेदारी न होना |
| कलेजा धड़कना | घबरा जाना |
| खोज ख़बर न लेना | जानकारी प्राप्त न करना, पूछताछ न करना |
| ख़ून सूख जाना | बहुत अधिक डर जाना |
- रेणु (1921-1977): आंचलिक कथाकार, 1942 भारत छोड़ो और नेपाल राणाशाही-विरोधी आंदोलन में सक्रिय, 1953 से लेखन
- संवदिया = संदेशवाहक, गाँववालों की धारणा (निठल्ला, औरतों का गुलाम) कहानी ख़ुद ग़लत साबित करती है
- बड़ी हवेली का पतन: बड़े भैया की मृत्यु, तीनों भाइयों का झगड़ा और शहर बस जाना, गहनों-साड़ी का बँटवारा (द्रौपदी चीर-हरण जैसा)
- बड़ी बहुरिया का संवाद: “अब नहीं रह सकूँगी,” डूब मरने की चेतावनी, बथुआ-साग की पीड़ा
- हरगोबिन के मुख्य झूठ: भाई से “सब राजी-खुशी है”, माँ से “संवाद तो कोई नहीं” (सिरसिया आने की बात) और बड़ी बहुरिया के नाम से दशहरे वाली बात, भाई से “किसी बात की कमी नहीं”; पाठ कारण सीधे नहीं बताता, प्रसंग से करुणा और आत्म-सम्मान झलकते हैं
- वापसी में बीस कोस पैदल, साँझ के अँधेरे में राह भटककर बेहोशी, बड़ी बहुरिया द्वारा होश में लाना
- अंत: “संवाद भेजने के बाद से ही वह अपनी गलती पर पछता रही थी”
- मुख्य भाव (पाठ-परिचय): असहाय और सहनशील नारी मन के दुख, करुणा, पीड़ा और यातना की सूक्ष्म पकड़; साथ में गाँव के आत्मीय रिश्ते और मानवीय संवेदना