- गुलेरी जी का जीवन-परिचय
- “सुमिरिनी के मनके” का अर्थ: तीन स्वतंत्र निबंध, एक कहानी नहीं
- तीनों निबंधों की कथा और मूल तर्क
1 लेखक-परिचय: पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी
जन्म: पुरानी बस्ती, जयपुर। जीवनकाल: 1883-1922। बहुभाषाविद्: संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, ब्रज, अवधी, मराठी, गुजराती, राजस्थानी, पंजाबी, बाँग्ला, अंग्रेज़ी, लैटिन, फ्रेंच। प्रिय विषय: प्राचीन इतिहास और पुरातत्व; गहरी रुचि: भाषा विज्ञान।
- तीन कहानियाँ: सुखमय जीवन, बुद्धू का काँटा, उसने कहा था। इनमें से “उसने कहा था” कहानी तो गुलेरी जी का पर्याय ही बन चुकी है।
- 1904-1922 अध्यापन; “इतिहास दिवाकर” उपाधि; मदन मोहन मालवीय के आग्रह पर 11 फ़रवरी 1922 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य बने।
सृजनशीलता के चार पड़ाव:
2 “सुमिरिनी के मनके”: शीर्षक का अर्थ
सुमिरिनी = नाम-जाप की माला, मनका = उसका एक दाना। पाठ के अनुसार: “सुमिरिनी के मनके नाम से तीन लघु निबंध—बालक बच गया, घड़ी के पुर्ज़े और ढेले चुन लो पाठ्यपुस्तक में दिए गए हैं।” ये तीन अलग लघु निबंध हैं, लगातार एक कहानी नहीं।
पाठ शीर्षक का अर्थ अलग से नहीं समझाता। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: एक माला के तीन अलग दाने, यानी एक नाम के नीचे तीन स्वतंत्र निबंध।

“तीनों निबंध समाज की मूल समस्याओं पर विचार करने वाले हैं। इनकी भाषा-शैली सरल, बोलचाल की होते हुए भी गंभीर ढंग से विषय प्रवर्तन करने वाली है।”
3 (क) बालक बच गया
“बालक बच गया निबंध का मूल प्रतिपाद्य है शिक्षा ग्रहण की सही उम्र।” लेखक मानता है कि “हमें व्यक्ति के मानस के विकास के लिए शिक्षा को प्रस्तुत करना चाहिए, शिक्षा के लिए मनुष्य को नहीं। हमारा लक्ष्य है मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखना। मनुष्य बचा रहेगा तो वह समय आने पर शिक्षित किया जा सकेगा।”
पाठ के अनुसार लेखक ने अपने समय की शिक्षा प्रणाली और शिक्षकों की मानसिकता को प्रकट करने के लिए अपने जीवन का यह अनुभव रखा है।
एक पाठशाला के वार्षिकोत्सव में मेहमान गुलेरी जी ने देखा: प्रधान अध्यापक के आठ वर्षीय पुत्र को नुमाइश में बड़े लाड़ से दिखाया जा रहा था, मुँह पीला, नज़र ज़मीन से नहीं उठती। भविष्य पूछे जाने पर रटा उत्तर: “मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा।”
3.1 बालक से पूछे गए सातों सवाल (उम्र से ऊपर के)
धर्म के दस लक्षण
नौ रस के उदाहरण
जल 4° से नीचे फैलता है (मछलियाँ इससे बचती हैं)
चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक कारण
अभाव बनाम पदार्थ शास्त्रार्थ
हेनरी अष्टम की पत्नियाँ
पेशवा-कुर्सीनामा
वृद्ध महाशय के आशीर्वाद-इनाम पर बालक ने पुस्तक नहीं, धीरे से “लड्डू” माँगा। पिता-अध्यापक निराश हुए, लेखक को राहत मिली: “बालक बच गया”।
“पर बालक बच गया। उसके बचने की आशा है क्योंकि वह ‘लड्डू’ की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखाने वाली खड़खड़ाहट नहीं।”
निबंध की अंतिम पंक्ति। भावार्थ: रटी विद्वत्ता के बावजूद बचपन की सहज इच्छा अभी ज़िंदा है
ज्ञान लादो मत, रुचि जगाओ
मूल प्रतिपाद्य: शिक्षा ग्रहण की सही उम्र। पाठ का परिचय: शिक्षा “बच्चे पर लादनी नहीं चाहिए बल्कि उसके मानस में शिक्षा की रुचि पैदा करने वाले बीज डाले जाएँ”, “सहज पके सो मीठा होए”।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| वार्षिकोत्सव | सालाना जलसा |
| नुमाइश | प्रदर्शनी, दिखावा |
| कोल्हू | तेल निकालने की मशीन (बैल बाँधकर) |
| यावज्जन्म | जीवनभर |
| उल्लास | खुशी, हर्ष |
| कुर्सीनामा | राज की अवधि/क्रम |
4 (ख) घड़ी के पुर्ज़े
पाठ इसे “सत्ययुगी मत” कहता है: “धर्म के रहस्य जानने की इच्छा प्रत्येक मनुष्य न करे, जो कहा जाए वही कान ढलकाकर सुन ले”। इसके समर्थन में घड़ी का दृष्टांत “बहुत तालियाँ पिटवाकर” दिया जाता है: घड़ी से समय पूछ लो, पर पुर्ज़े खोलकर जानना केवल वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का काम है, आम आदमी का नहीं। गुलेरी जी इसका खंडन चार तर्कों से करते हैं:
4.1 लेखक के चार प्रतिवाद
क्या जिज्ञासा बंद होती है?
नहीं
हम पहले से जानते हैं
गिनती, अंक, सुइयाँ पहचानते हैं, फिर रोकना क्यों?
घड़ियों में फ़र्क़ हो तो?
कम-से-कम खोलकर देखने दो
सुधारना सीखा जा सकता है
अनाड़ी को मत दो, पर परीक्षा-पास को देखने दो
“हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते इत्यादि।”
धर्माचार्यों की सत्ता पर व्यंग्य। भावार्थ: परंपरा का ठेका लिए लोग ख़ुद उसे ठीक से नहीं समझते, फिर भी सत्ता नहीं छोड़ते
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कान ढलकाकर | कान खोलकर |
| दृष्टांत | उदाहरण |
| टंटा | झंझट, संकट |
| घड़ीसाज़ी | घड़ी बनाने/मरम्मत की कला |
5 (ग) ढेले चुन लो
5.1 दो अलग रचनाएँ (पेटियों का ब्यौरा पाठ केवल दुर्लभ बंधु के लिए देता है)
मर्चेंट ऑफ़ वेनिस (शेक्सपीयर)
- नायिका: पोर्शिया
- पाठ में केवल: “अपने वर को बड़ी सुंदर रीति से चुनती है”, पेटियों का ब्यौरा नहीं
दुर्लभ बंधु (बबुआ हरिश्चंद्र)
- नायिका: पुरश्री; तीन पेटियाँ: सोना, चाँदी, लोहा (एक में प्रतिमूर्ति)
- अकड़बाज़ सोना चुनकर लौटता है; लोभी को चाँदी अंखूठा दिखाती है; सच्चा प्रेमी लोहा चुनकर घुड़दौड़ (घोड़ों की दौड़) का पहला इनाम पाता है
वैदिक काल की मिलती-जुलती “लाटरी” में भूमिका उलट: नर पूछता, नारी बूझती। स्नातक पुरुष कन्या के पिता के यहाँ पहुँचता, गौ भेंट की जाती (पाठ: “वह उसे गौ भेंट करता”), फिर वह कन्या के सामने मिट्टी के ढेले (संख्या तय नहीं, कहीं सात, कहीं कम, कहीं ज़्यादा) रखता; कन्या को बिना जाने एक चुनना होता।
| मिट्टी | फल |
|---|---|
| वेदि (यज्ञ-स्थल) | “वैदिक पंडित” संतान |
| गौशाला (गोबर) | “पशुओं का धनी” संतान |
| खेत | “ज़मींदार पुत्र” संतान |
| मसान (श्मशान) | पुरानी मान्यता (लेखक की राय नहीं): घर मसान बनेगा: कन्या जन्मभर घर को जलाती रहेगी |
| चौराहा | पाठ में फल नहीं बताया |
मसान की मिट्टी छूना जीवनभर अविवाहित रहने का अर्थ नहीं: दूसरे पुरुष के सामने शुभ ढेला उठाकर विवाह संभव। बहुत से गृह्यसूत्रों में दर्ज: आश्वलायन, गोभिल, भारद्वाज, सभी में। राजपूतों की लड़कियाँ पिछले समय में “रूप देखकर, जस सुनकर” स्वयंवर करती थीं, वैदिक काल के हिंदू ढेले छुआकर पत्नीवरण करते थे।
आँखों देखी, हाथ से चुनी मिट्टी पर भरोसा बुरा क्यों, पर लाखों कोस दूर मंगल-शनैश्चर-बृहस्पति की “कल्पित चाल के कल्पित हिसाब” पर भरोसा अच्छा? इसका उत्तर लेखक स्वयं नहीं देते: “यह मैं क्या कह सकता हूँ?” पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध में “लोक विश्वासों में निहित अंधविश्वासी मान्यताओं पर चोट की गई है”।
“आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल के मोहर से।” (वात्स्यायन)
“पत्थर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार। इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।” (कबीर)
दोनों बातें लेखक “बकौल” (के कथनानुसार) कहकर रखते हैं। बीच में उनका व्यंग्य-भरा वाक्य है: “आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस की तेज पिण्ड से!” इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: पास की, आँखों देखी चीज़ की तुलना में दूर की कल्पित गणना पर भरोसा उलटा तर्क है
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मर्चेंट ऑफ वेनिस | शेक्सपियर का नाटक |
| पोर्शिया | उस नाटक की नायिका |
| प्रतिमूर्ति | प्रतिमा, उसके ही जैसा |
| अकड़बाज़ | अकड़ने वाला, अपने फैसले को ही सही मानने वाला, अपने आगे किसी की न मानने वाला |
| जस | यश, कीर्ति |
| मिट्टी के डगले | मिट्टी के ढेले |
6 तीनों निबंधों में एक जैसी सोच
स्कूल की कहानी, धर्म पर बहस, विवाह-प्रथा का प्रसंग: दिखने में अलग। पाठ के अनुसार “तीनों निबंध समाज की मूल समस्याओं पर विचार करने वाले हैं”। इन्हें साथ पढ़ने पर एक बात दिखती है: तीनों में बिना सवाल किए परंपरा या सत्ता मान लेने पर चोट है।
- गुलेरी जी (1883-1922): “उसने कहा था”; चार रचना-काल (समालोचक-नागरी प्रचारिणी पत्रिका); मालवीय के आग्रह पर 1922 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य
- बालक बच गया: मूल प्रतिपाद्य “शिक्षा ग्रहण की सही उम्र”; सातों सवाल क्रम से? रटी विद्वत्ता बनाम सहज इच्छा (लड्डू); “सहज पके सो मीठा होए”
- घड़ी के पुर्ज़े: चारों प्रतिवाद क्रम से? धर्म पर सवाल पूछने के हक़ की माँग
- ढेले चुन लो: पाँचों मिट्टी और फल बिना देखे? पोर्शिया/मर्चेंट ऑफ वेनिस अलग, पुरश्री/दुर्लभ बंधु अलग; पाठ के अनुसार लोक विश्वासों में निहित अंधविश्वासी मान्यताओं पर चोट