कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 11 सुमिरिनी के मनके महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म कहाँ हुआ था?

उत्तर: गुलेरी जी का जन्म पुरानी बस्ती, जयपुर में हुआ था।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. पाठ के अनुसार गुलेरी जी की कौन-सी कहानी उनका पर्याय बन चुकी है?

उत्तर: पाठ के अनुसार ‘उसने कहा था’ कहानी तो गुलेरी जी का पर्याय ही बन चुकी है।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. ‘सुमिरिनी के मनके’ नाम से पाठ्यपुस्तक में कितने और कौन-कौन से लघु निबंध दिए गए हैं?

उत्तर: पाठ्यपुस्तक में इसी नाम से तीन लघु निबंध दिए गए हैं: बालक बच गया, घड़ी के पुर्ज़े और ढेले चुन लो।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. बालक ने इनाम में क्या माँगा?

उत्तर: बालक ने इनाम में ‘लड्डू’ माँगा।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘दुर्लभ बंधु’ की नायिका का नाम क्या था?

उत्तर: ‘दुर्लभ बंधु’ की नायिका का नाम पुरश्री था।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. वैदिक काल की ढेलों की लाटरी का उल्लेख किन-किन गृह्यसूत्रों में है, पाठ के अनुसार?

उत्तर: पाठ के अनुसार बहुत से गृह्यसूत्रों में इस ढेलों की लाटरी का उल्लेख है, आश्वलायन, गोभिल, भारद्वाज, सभी में।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. गुलेरी जी की सृजनशीलता के चार पड़ाव किन पत्रिकाओं और किन वर्षों से जुड़े थे?

उत्तर: गुलेरी जी की सृजनशीलता के चार पड़ाव थे: समालोचक (1903-06), मर्यादा (1911-12), प्रतिभा (1918-20) और नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1920-22)।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. गुलेरी जी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य कैसे और कब बने?

उत्तर: पं. मदन मोहन मालवीय के आग्रह पर गुलेरी जी 11 फरवरी 1922 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य बने।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. ‘सुमिरिनी के मनके’ शीर्षक का क्या अर्थ है?

उत्तर: सुमिरिनी (जप की) माला को कहते हैं और मनका उसका एक दाना। पाठ में इसी नाम से तीन लघु निबंध दिए गए हैं: बालक बच गया, घड़ी के पुर्ज़े और ढेले चुन लो। पाठ शीर्षक का अर्थ अलग से नहीं समझाता। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि जैसे माला में अलग-अलग मनके एक ही धागे में पिरोए होते हैं, वैसे ही एक नाम के नीचे तीन अलग, स्वतंत्र निबंध रखे गए हैं।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. पाठशाला के वार्षिकोत्सव में बालक को किस उपमा से दिखाया जा रहा था और क्यों?

उत्तर: बालक को ‘मिस्टर हादी के कोल्हू’ की तरह दिखाया जा रहा था। जैसे नुमाइश (प्रदर्शनी) में कोई मशीन सबको दिखाई जाती है, वैसे ही प्रधान अध्यापक का पुत्र बड़े लाड़ से नुमाइश में दिखाया जा रहा था; उससे प्रश्न पूछे जा रहे थे और वह उनके उत्तर दे रहा था।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. बालक के इनाम माँगने पर पिता और अध्यापक तथा लेखक की प्रतिक्रिया में क्या अंतर था?

उत्तर: बालक द्वारा लड्डू माँगने पर पिता और अध्यापक निराश हुए, क्योंकि वे इस चिंता में थे कि ‘देखें यह पढ़ाई का पुतला कौन सी पुस्तक माँगता है’। इसके विपरीत लेखक को राहत मिली, क्योंकि उनके शब्दों में ‘पर बालक बच गया’, यानी उसका सहज बचपन अभी बचा हुआ था।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. धर्म-उपदेशक घड़ी के दृष्टांत से क्या सिद्ध करना चाहते हैं?

उत्तर: धर्म-उपदेशक घड़ी के दृष्टांत से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि जैसे आम आदमी घड़ी खोलकर उसके पुर्ज़े नहीं जान सकता, केवल समय पूछ सकता है, वैसे ही आम आदमी को धर्म का रहस्य जानने का अधिकार नहीं है, यह केवल वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का काम है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. लेखक ‘परदादा की घड़ी’ के दृष्टांत से धर्माचार्यों पर क्या व्यंग्य करते हैं?

उत्तर: लेखक कहते हैं, ‘हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।’ ‘परदादा की घड़ी’ से धर्म-परंपरा की ओर संकेत है। यानी लेखक को संदेह है कि धर्माचार्य स्वयं उसे चलाना या सुधारना नहीं जानते, फिर भी किसी और को उसे छूने नहीं देते। यह उनकी सत्ता पर व्यंग्य है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. वैदिक काल की ढेले-प्रथा में स्नातक पुरुष विवाह के लिए कन्या के घर क्या-क्या करता था?

उत्तर: स्नातक पुरुष विद्या पढ़कर, नहा-धोकर, माला पहनकर किसी बेटी के बाप के यहाँ पहुँच जाता। पाठ के शब्दों में ‘वह उसे गौ भेंट करता।’ फिर वह कन्या के सामने मिट्टी के कुछ ढेले (कहीं सात, कहीं कम, कहीं ज़्यादा) रख देता और उससे कहता कि इनमें से एक उठा ले।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. मसान की मिट्टी छू लेने के बारे में पाठ क्या स्पष्टीकरण देता है?

उत्तर: पाठ स्पष्ट करता है कि मसान की मिट्टी छू लेना किसी कन्या के जीवनभर अविवाहित रहने का प्रमाण नहीं है। किसी दूसरे पुरुष के सामने वही कन्या वेदि का शुभ ढेला भी उठा सकती थी और विवाह कर सकती थी।

प्रश्न 10 (2 अंक)

प्र. कबीर की उद्धृत साखी ‘पत्थर पूजे हरि मिलें…’ का लेखक के तर्क से क्या संबंध है?

उत्तर: कबीर कहते हैं कि अगर पत्थर पूजने से भगवान मिलते तो पूरा पहाड़ पूज लेना चाहिए, चक्की तो उससे भी बेहतर है क्योंकि वह काम की चीज़ है। लेखक यह साखी ‘बकौल कबीर के’ कहकर निबंध के अंत में रखते हैं। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: जैसे कबीर पत्थर-पूजा की निरर्थकता पर चोट करते हैं, वैसे ही ढेलों और दूर के ग्रहों की कल्पित गणना पर भरोसे की विडंबना सामने आती है। लेखक स्वयं निष्कर्ष नहीं देते: ‘यह मैं क्या कह सकता हूँ?’

प्रश्न 11 (2 अंक)

प्र. निम्नलिखित शब्दों के अर्थ लिखिए: (i) टंटा (ii) जस (iii) प्रतिमूर्ति (iv) उल्लास (v) कान ढलकाकर

उत्तर: (i) टंटा: झंझट, संकट। (ii) जस: यश, कीर्ति। (iii) प्रतिमूर्ति: प्रतिमा, उसके ही जैसा। (iv) उल्लास: खुशी, हर्ष। (v) कान ढलकाकर: कान खोलकर।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. ‘बालक बच गया’ निबंध के आधार पर बताइए कि बालक से कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए थे?

उत्तर: बालक से उसकी उम्र से बहुत ऊपर के प्रश्न पूछे गए: धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, पानी 4 डिग्री से नीचे फैलने और मछलियों की प्राणरक्षा का कारण, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, अभाव को पदार्थ मानने-न-मानने का शास्त्रार्थ, इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की पत्नियों के नाम, और पेशवाओं का कुर्सीनामा (राज की अवधि)। ये सभी प्रश्न आठ वर्षीय बालक की समझ से कहीं ऊपर के थे।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. ‘बालक बच गया’ निबंध का मूल संदेश अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर: पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध का मूल प्रतिपाद्य है ‘शिक्षा ग्रहण की सही उम्र’। लेखक मानता है कि ‘हमें व्यक्ति के मानस के विकास के लिए शिक्षा को प्रस्तुत करना चाहिए, शिक्षा के लिए मनुष्य को नहीं।’ ‘हमारा लक्ष्य है मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखना। मनुष्य बचा रहेगा तो वह समय आने पर शिक्षित किया जा सकेगा।’ शिक्षा बच्चे पर लादनी नहीं चाहिए, बल्कि उसके मानस में शिक्षा की रुचि पैदा करने वाले बीज डाले जाने चाहिए: ‘सहज पके सो मीठा होए’। आठ वर्ष के बालक से उम्र से ऊपर के प्रश्न पूछे जाते हैं, पर इनाम में वह ‘लड्डू’ माँगता है, इसीलिए लेखक कहते हैं ‘पर बालक बच गया’।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. ‘घड़ी के पुर्ज़े’ निबंध में लेखक ने धर्माचार्यों के तर्क का खंडन किन बिंदुओं से किया है?

उत्तर: लेखक चार बिंदुओं से खंडन करते हैं: पहला, क्या यह उपमा सचमुच जिज्ञासा को रोक देती है; दूसरा, जब हम गिनती और अंक जानते हैं और सुइयों की चाल देख सकते हैं तो हमें देखने से क्यों रोका जाए; तीसरा, अगर पड़ोस की घड़ी और अपनी घड़ी में समय का फ़र्क़ हो तो कम-से-कम खोलकर देखने की छूट होनी चाहिए; चौथा, घड़ी सुधारना कोई असंभव कला नहीं, यह सीखी और सिखाई जा सकती है, इसलिए केवल अनाड़ी को रोका जाए, हर किसी को नहीं।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. ‘ढेले चुन लो’ में शेक्सपीयर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ और बबुआ हरिश्चंद्र के ‘दुर्लभ बंधु’ के प्रसंग की तुलना कीजिए।

उत्तर: पाठ में पेटियों का पूरा ब्यौरा केवल ‘दुर्लभ बंधु’ के लिए दिया गया है: बबुआ हरिश्चंद्र की इस रचना में नायिका पुरश्री के सामने तीन पेटियाँ हैं, एक सोने की, एक चाँदी की, एक लोहे की, जिनमें से एक में उसकी प्रतिमूर्ति है। अकड़बाज़ सोना चुनकर उलटे पैरों लौटता है, लोभी को चाँदी की पिटारी अंखूठा दिखाती है (मना कर देती है), जबकि सच्चा प्रेमी लोहा चुनकर घुड़दौड़ (घोड़ों की दौड़) का पहला इनाम पाता है। ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ के लिए पाठ केवल इतना कहता है कि इसकी नायिका पोर्शिया ‘अपने वर को बड़ी सुंदर रीति से चुनती है’, पेटियों का कोई ब्यौरा इस कथा के लिए पाठ में नहीं दिया गया। लेखक इन दोनों को इसलिए साथ रखते हैं ताकि वैदिक काल की ढेले-प्रथा से इनकी समानता दिखाई जा सके।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. वैदिक काल में पाँच प्रकार की मिट्टी के ढेले चुनने पर क्या-क्या फल माने जाते थे?

उत्तर: वेदि (यज्ञ-स्थल) की मिट्टी चुनने पर संतान ‘वैदिक पंडित’ बनने की मान्यता थी। गौशाला की मिट्टी (गोबर) चुनने पर संतान ‘पशुओं का धनी’ बनती। खेत की मिट्टी चुनने पर संतान ‘ज़मींदार पुत्र’ बनती। मसान (श्मशान) की मिट्टी छूना बहुत अशुभ माना जाता था। यह पुरानी मान्यता थी (लेखक की अपनी राय नहीं) कि ऐसी कन्या से विवाह करने पर घर ही मसान बन जाएगा, यानी वह जन्मभर घर को जलाती (सताती) रहेगी। चौराहे की मिट्टी भी इस सूची में गिनाई गई है, पर पाठ में उसका अलग फल नहीं बताया गया।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. ‘ढेले चुन लो’ निबंध का असली निशाना क्या है, यह स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: पाठ के परिचय के अनुसार ‘ढेले चुन लो में लोक विश्वासों में निहित अंधविश्वासी मान्यताओं पर चोट की गई है।’ निबंध पुरानी ढेले-प्रथा का वर्णन करके एक प्रश्न रखता है: अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुनी मिट्टी पर भरोसा करना बुरा क्यों माना जाए, जबकि लाखों-करोड़ों कोस दूर बैठे मंगल, शनैश्चर और बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब पर भरोसा करना अच्छा माना जाता है। इसका उत्तर लेखक स्वयं नहीं देते: ‘यह मैं क्या कह सकता हूँ?’ फिर वे वात्स्यायन और कबीर के कथन ‘बकौल’ कहकर रखते हैं। पुरानी ढेले-प्रथा इसी तुलना का उदाहरण है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी के जीवन और उपलब्धियों का परिचय दीजिए।

उत्तर: गुलेरी जी (1883-1922) का जन्म पुरानी बस्ती, जयपुर में हुआ। वे बहुभाषाविद् थे और संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश सहित कई भारतीय और विदेशी भाषाएँ जानते थे। प्राचीन इतिहास, पुरातत्व और भाषा विज्ञान उनके प्रिय विषय थे। उन्होंने सुखमय जीवन, बुद्धू का काँटा और उसने कहा था जैसी कहानियाँ लिखीं, जिनमें उसने कहा था उनका पर्याय बन चुकी है। उन्होंने 1904 से 1922 तक अध्यापन किया, इतिहास दिवाकर की उपाधि पाई, और 1922 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्राच्य विभाग के प्राचार्य बने।

प्रश्न 8 (4 अंक)

प्र. तीनों निबंधों में गुलेरी जी की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं?

उत्तर: पाठ्यपुस्तक के अनुसार तीनों निबंधों की भाषा-शैली सरल और बोलचाल की है, फिर भी गंभीर ढंग से विषय प्रवर्तन करने वाली है। पाठ यह भी कहता है कि ‘तीनों निबंध समाज की मूल समस्याओं पर विचार करने वाले हैं’। घड़ी और ढेलों के दृष्टांतों में गुलेरी जी व्यंग्य करते हैं, जैसे ‘परदादा की घड़ी’ और ‘यह मैं क्या कह सकता हूँ?’ हर निबंध रोज़मर्रा के उदाहरणों (कोल्हू, घड़ी, मिट्टी के ढेले) से शुरू होकर गहरी सामाजिक समस्या तक पहुँचता है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. ‘बालक बच गया’ के आधार पर तत्कालीन शिक्षा-प्रणाली पर गुलेरी जी की आलोचना को विस्तार से स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: समस्या: पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध का मूल प्रतिपाद्य है ‘शिक्षा ग्रहण की सही उम्र’, और लेखक ने इसमें ‘अपने समय की शिक्षा प्रणाली और शिक्षकों की मानसिकता’ को प्रकट किया है। निबंध में प्रधान अध्यापक के आठ वर्षीय पुत्र को बड़े लाड़ से नुमाइश में दिखाया जाता है, जबकि पूछे गए प्रश्न (धर्म के दस लक्षण, नौ रस, हेनरी अष्टम की पत्नियाँ, पेशवा-कुर्सीनामा आदि) उसकी उम्र और समझ से कोसों ऊपर हैं। बालक का पीला मुँह और भूमि पर टिकी दृष्टि इस दबाव के शारीरिक लक्षण हैं। परिणाम: यह रटंत-प्रणाली बालक के भीतर के स्वाभाविक बचपन को कुचल देती है, लेखक के शब्दों में ‘उन सबने बालक की प्रवृत्तियों का गला घोंटने में कुछ उठा नहीं रखा था’। जब वृद्ध महाशय इनाम माँगने को कहते हैं तो पिता और अध्यापक सोचते हैं, ‘देखें यह पढ़ाई का पुतला कौन सी पुस्तक माँगता है’। समाधान/संदेश: बालक का ‘लड्डू’ माँगना साबित करता है कि उसका सहज मन अभी बचा हुआ है, इसीलिए लेखक कहते हैं ‘बालक बच गया’। पाठ के परिचय के अनुसार ‘हमें व्यक्ति के मानस के विकास के लिए शिक्षा को प्रस्तुत करना चाहिए, शिक्षा के लिए मनुष्य को नहीं’, लक्ष्य ‘मनुष्य और मनुष्यता को बचाए रखना’ है, और यह रुचि प्राकृतिक रूप से, अपने समय पर विकसित होनी चाहिए, ‘सहज पके सो मीठा होए’।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. ‘घड़ी के पुर्ज़े’ के आधार पर धर्म के रहस्य जानने के अधिकार पर गुलेरी जी के विचार विस्तार से लिखिए।

उत्तर: पारंपरिक मत: धर्म-उपदेशक घड़ी का दृष्टांत देकर कहते हैं कि आम आदमी किसी घड़ी देखना जानने वाले से समय पूछ ले या ‘घड़ी देखना स्वयं सीख ले’, पर उसके पुर्ज़े खोलकर देखना केवल वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का काम है। लेखक का खंडन: लेखक चार तर्कों से इस मत को चुनौती देते हैं, यह उपमा जिज्ञासा को रोकती नहीं, हम गिनती और अंक पहले से जानते हैं, दो घड़ियों में फ़र्क़ होने पर कम-से-कम अंदर देखने की छूट मिलनी चाहिए, और घड़ी सुधारना सीखी जा सकने वाली कला है, इसलिए केवल अनाड़ी को रोका जाए, हर किसी को नहीं। व्यंग्य का चरम: लेखक ‘परदादा की घड़ी’ के दृष्टांत से आरोप लगाते हैं कि जिन्होंने धर्म का ठेका ले रखा है, उन्हें ख़ुद ठीक से पता नहीं कि उसे कैसे चलाया जाए, फिर भी वे किसी और को हाथ नहीं लगाने देते। निष्कर्ष: गुलेरी जी का मानना है कि धर्म को समझने और सवाल पूछने का अधिकार हर व्यक्ति का है, यह किसी एक वर्ग की बपौती नहीं होना चाहिए।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. ‘ढेले चुन लो’ के आधार पर विवाह-संबंधी अंधविश्वास पर गुलेरी जी के व्यंग्य को विस्तार से समझाइए।

उत्तर: प्रसंग: निबंध शेक्सपीयर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ (पोर्शिया) और बबुआ हरिश्चंद्र के ‘दुर्लभ बंधु’ (पुरश्री) के प्रसंगों से शुरू होता है: पोर्शिया ‘अपने वर को बड़ी सुंदर रीति से चुनती है’, और ‘दुर्लभ बंधु’ में स्वयंवर के लिए आने वाला तीन पेटियों (सोना, चाँदी, लोहा) में से एक चुनता है; सच्चा प्रेमी लोहे को छूकर ‘पहिला इनाम’ पाता है। वैदिक-काल प्रथा: लेखक कहते हैं कि ‘ठीक ऐसी ही लाटरी’ वैदिक काल में हिंदुओं में चलती थी, जिसमें कन्या को बिना जाने मिट्टी के ढेलों में से एक चुनना पड़ता था, जो वेदि, गौशाला, खेत, मसान जैसी जगहों से लाए जाते थे, और हर स्रोत का अपना शुभ या अशुभ फल माना जाता था। स्पष्टीकरण और तुलना: लेखक स्पष्ट करते हैं कि मसान की मिट्टी छूना जीवनभर के लिए अशुभ नहीं होता, दूसरे वर के सामने वही कन्या शुभ ढेला भी उठा सकती थी। वे इसकी तुलना राजपूत स्वयंवर से भी करते हैं। व्यंग्य: लेखक का प्रश्न है कि आँखों देखी, हाथ से चुनी मिट्टी पर भरोसा करना बुरा क्यों माना जाए, जबकि लाखों कोस दूर के ग्रहों (मंगल, शनैश्चर, बृहस्पति) की कल्पित चाल पर भरोसा करना अच्छा माना जाता है। इस पर वे स्वयं निष्कर्ष नहीं देते: ‘यह मैं क्या कह सकता हूँ?’ फिर वात्स्यायन का कथन और कबीर की साखी ‘बकौल’ कहकर रखते हैं, और व्यंग्य में कहते हैं कि ‘आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस की तेज पिण्ड से!’ निष्कर्ष: पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध में ‘लोक विश्वासों में निहित अंधविश्वासी मान्यताओं पर चोट की गई है’।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
एक पाठशाला का वार्षिकोत्सव था। मैं भी वहाँ बुलाया गया था। वहाँ के प्रधान अध्यापक का एकमात्र पुत्र, जिसकी अवस्था आठ वर्ष की थी, बड़े लाड़ से नुमाइश में मिस्टर हादी के कोल्हू की तरह दिखाया जा रहा था। उसका मुँह पीला था, आँखें सफेद थीं, दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी। प्रश्न पूछे जा रहे थे। उनका वह उत्तर दे रहा था। धर्म के दस लक्षण वह सुना गया, नौ रसों के उदाहरण दे गया। पानी के चार डिग्री के नीचे शीतता में फैल जाने के कारण और उससे मछलियों की प्राणरक्षा को समझा गया, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान दे गया, अभाव को पदार्थ मानने न मानने का शास्त्रार्थ कह गया और इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम और पेशवाओं का कुर्सीनामा सुना गया। यह पूछा गया कि तू क्या करेगा। बालक ने सीखा सिखाया उत्तर दिया कि मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा।

(क) 1 अंक गद्यांश में बालक की अवस्था क्या बताई गई है?
उत्तर: गद्यांश में बालक की अवस्था आठ वर्ष बताई गई है।

(ख) 1 अंक बालक को किसकी तरह दिखाया जा रहा था?
उत्तर: बालक को ‘मिस्टर हादी के कोल्हू’ की तरह दिखाया जा रहा था।

(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि बालक के मुँह और आँखों की दशा कैसी थी, और इससे क्या संकेत मिलता है?
उत्तर: बालक का मुँह पीला था, आँखें सफ़ेद थीं और दृष्टि भूमि से उठती नहीं थी। इससे संकेत मिलता है कि नुमाइश में किए जा रहे इस प्रदर्शन का दबाव बालक पर भारी था।

(घ) 2 अंक गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि बालक से पूछे गए प्रश्न उसकी उम्र के अनुकूल क्यों नहीं थे?
उत्तर: गद्यांश में आठ वर्ष के बालक से धर्म के दस लक्षण, नौ रसों के उदाहरण, पानी के चार डिग्री से नीचे फैलने और मछलियों की प्राणरक्षा का कारण, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान, अभाव को पदार्थ मानने-न-मानने का शास्त्रार्थ, आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम और पेशवाओं का कुर्सीनामा पूछा गया। ये विषय आठ वर्ष के बालक की समझ से कहीं ऊपर के थे।

केस स्टडी
अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों-करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मट्टी और आग के ढेलों—मंगल और शनैश्चर और बृहस्पति—की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है, यह मैं क्या कह सकता हूँ? बकौल वात्स्यायन के, आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल के मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस की तेज पिण्ड से!

(क) 1 अंक गद्यांश में किन तीन ग्रहों का नाम लिया गया है?
उत्तर: गद्यांश में मंगल, शनैश्चर और बृहस्पति का नाम लिया गया है।

(ख) 1 अंक गद्यांश में लेखक किसका कथन उद्धृत करते हैं?
उत्तर: लेखक वात्स्यायन का कथन उद्धृत करते हैं।

(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर लेखक का मुख्य तर्क क्या है?
उत्तर: लेखक प्रश्न रखते हैं कि आँखों देखी और हाथ से चुनी मिट्टी पर भरोसा करना बुरा क्यों है और लाखों-करोड़ों कोस दूर के ग्रहों की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा अच्छा क्यों। इसका उत्तर वे सीधे नहीं देते (‘यह मैं क्या कह सकता हूँ?’); व्यंग्य में कहते हैं कि आँखों देखा ढेला ‘अच्छा ही होना चाहिए’।

(घ) 2 अंक वात्स्यायन के कथन ‘आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से’ का गद्यांश के संदर्भ में क्या अर्थ है?
उत्तर: इस कथन का अर्थ है कि पास की, निश्चित और आँखों देखी चीज़ दूर की, अनिश्चित पर बड़ी लगने वाली चीज़ से बेहतर होती है। इसके ठीक बाद लेखक व्यंग्य में कहते हैं कि ‘आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस की तेज पिण्ड से!’