कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 11 सुमिरिनी के मनके NCERT समाधान

NCERT पाठ्यपुस्तक अंतरा भाग 2 के अध्याय 11 सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) की प्रश्न-अभ्यास (18 प्रश्न, तीनों निबंधों से) और योग्यता-विस्तार (6 प्रश्न) के सभी प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, पाठ्यपुस्तक के आधार पर। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 प्रश्न-अभ्यास: (क) बालक बच गया

प्रश्न 1

प्र. बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?

उत्तर: बालक से धर्म के दस लक्षण सुनाने को कहा गया, नौ रसों के उदाहरण पूछे गए, पानी के चार डिग्री के नीचे शीतता में फैल जाने और उससे मछलियों की प्राणरक्षा होने का कारण पूछा गया, चंद्रग्रहण का वैज्ञानिक समाधान पूछा गया, अभाव को पदार्थ मानने या न मानने का शास्त्रार्थ करवाया गया, इंग्लैंड के राजा आठवें हेनरी की स्त्रियों के नाम पूछे गए, और पेशवाओं का कुर्सीनामा (राज की अवधि) सुनाने को कहा गया। ये सभी प्रश्न आठ वर्षीय बालक की उम्र और स्वाभाविक समझ से कहीं ऊपर के थे।

प्रश्न 2

प्र. बालक ने क्यों कहा कि मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा?

उत्तर: बालक ने यह उत्तर स्वयं सोचकर नहीं, बल्कि सीखा-सिखाया होकर दिया था। जिस तरह उससे पहले धर्म के लक्षण और रस के उदाहरण रटाकर सुनवाए गए थे, उसी तरह उसे यह “आदर्श” उत्तर भी पहले से रटा दिया गया था, ताकि सुनने वालों पर अच्छा प्रभाव पड़े। यह बालक की अपनी सोच नहीं बल्कि बड़ों द्वारा थोपा हुआ, दिखावटी उत्तर था।

प्रश्न 3

प्र. बालक द्वारा इनाम में लड्डू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी?

उत्तर: जब तक बालक विद्वत्ता का रटा हुआ प्रदर्शन कर रहा था, तब तक लेखक का दम घुट रहा था, क्योंकि वह देख रहा था कि बालक की सहज बचपन वाली प्रकृति को कुचला जा रहा है। जब बालक ने पुस्तक की जगह “लड्डू” माँगा, तो इससे साबित हो गया कि उसके भीतर का स्वाभाविक बचपन अभी बचा हुआ है, रटंत-प्रणाली उसे पूरी तरह मार नहीं पाई। इसी राहत के कारण लेखक ने सुख की साँस भरी।

प्रश्न 4

प्र. बालक की प्रवृत्तियों का गला घोटना अनुचित है, पाठ में ऐसा आभास किन स्थलों पर होता है कि उसकी प्रवृत्तियों का गला घोटा जाता है?

उत्तर: पाठ में यह आभास कई स्थलों पर होता है: बालक का मुँह पीला होना, आँखें सफ़ेद होना और दृष्टि भूमि से न उठना, ये सब अत्यधिक दबाव के लक्षण हैं। उसे नुमाइश में “मिस्टर हादी के कोल्हू” की तरह दिखाया जाना भी बताता है कि उसे एक स्वतंत्र बालक की तरह नहीं, बल्कि प्रदर्शन की वस्तु की तरह प्रयोग किया जा रहा था। उम्र से कहीं ऊपर के कठिन प्रश्न पूछा जाना और अंत में लेखक का यह कहना कि “उन सबने बालक की प्रवृत्तियों का गला घोंटने में कुछ उठा नहीं रखा था” भी इसी आभास की पुष्टि करता है।

प्रश्न 5

प्र. “बालक बच गया। उसके बचने की आशा है क्योंकि वह ‘लड्डू’ की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखानेवाली खड़खड़ाहट नहीं” कथन के आधार पर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: इस कथन में लेखक बालक की सहज पुकार की तुलना जीवित वृक्ष के हरे पत्तों के मधुर मर्मर (सरसराहट) से करते हैं, यानी वह आवाज़ स्वाभाविक, ताज़ा और जीवंत है। इसके विपरीत, रटी हुई, थोपी हुई विद्वत्ता की तुलना मरे हुए काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट से की गई है, जो बेजान और कर्कश होती है। “लड्डू” माँगकर बालक ने दिखाया कि उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ, यानी बचपन की सरल, निश्छल इच्छाएँ, अभी जीवित हैं और रटंत-प्रणाली के दबाव में पूरी तरह नहीं मरीं।

प्रश्न 6

प्र. उम्र के अनुसार बालक में योग्यता का होना आवश्यक है किन्तु उसका ज्ञानी या दार्शनिक होना ज़रूरी नहीं। ‘लर्निंग आउटकम’ के बारे में विचार कीजिए।

उत्तर: प्रत्येक उम्र में सीखने का एक स्वाभाविक और उचित स्तर (‘लर्निंग आउटकम’, यानी सीखने का प्रतिफल) होना चाहिए, जो बालक की मानसिक और शारीरिक परिपक्वता के अनुरूप हो। आठ वर्ष के बालक से यह अपेक्षा रखना कि वह धर्मशास्त्र, इतिहास और विज्ञान का गंभीर ज्ञानी या दार्शनिक बन जाए, स्वाभाविक विकास के विरुद्ध है। सही “लर्निंग आउटकम” यह है कि बालक अपनी उम्र के अनुसार बुनियादी कौशल और समझ हासिल करे, न कि रटकर बड़ों को प्रभावित करने वाला “प्रदर्शन” बने। ज्ञान धीरे-धीरे, उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से बढ़ना चाहिए।

2 प्रश्न-अभ्यास: (ख) घड़ी के पुर्ज़े

प्रश्न 1

प्र. लेखक ने धर्म का रहस्य जानने के लिए ‘घड़ी के पुर्ज़े’ का दृष्टांत क्यों दिया है?

उत्तर: धर्म-उपदेशक यह दृष्टांत देते हैं कि जैसे आम आदमी को घड़ी से केवल समय पूछना चाहिए, उसके पुर्ज़े खोलकर देखने का अधिकार नहीं, वैसे ही धर्म का रहस्य जानने का अधिकार भी केवल वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों को है, आम आदमी को नहीं। लेखक इसी दृष्टांत को उठाकर उसका खंडन करने के लिए इसे विस्तार से रखते हैं, ताकि दिखाया जा सके कि यह उपमा कैसे आम आदमी की जिज्ञासा को अनुचित रूप से रोकती है।

प्रश्न 2

प्र. ‘धर्म का रहस्य जानना वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है।’ आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? धर्म संबंधी अपने विचार व्यक्त कीजिए।

उत्तर: इस कथन से पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता। धर्म के बुनियादी सिद्धांत और नैतिक शिक्षाएँ हर व्यक्ति के जीवन से जुड़ी हैं, इसलिए उन्हें समझने और उन पर सवाल पूछने का अधिकार भी हर व्यक्ति का होना चाहिए। विशेषज्ञों की राय और परंपरा का ज्ञान उपयोगी है, पर इसका अर्थ यह नहीं कि आम आदमी को सोचने-समझने से ही रोक दिया जाए। धर्म को समझने की प्रक्रिया में भागीदारी हर व्यक्ति की होनी चाहिए, केवल कुछ चुनिंदा लोगों का एकाधिकार नहीं।

प्रश्न 3

प्र. घड़ी समय का ज्ञान कराती है। क्या धर्म संबंधी मान्यताएँ या विचार अपने समय का बोध नहीं कराते?

उत्तर: हाँ, धर्म संबंधी मान्यताएँ और विचार भी अपने समय (काल) का बोध कराते हैं। हर युग के धार्मिक विचार उस समय के समाज, उसकी समस्याओं और उसकी सोच को दर्शाते हैं। जैसे घड़ी हमें बताती है कि अभी कौन-सा समय है, वैसे ही धर्म संबंधी मान्यताएँ बताती हैं कि किसी विशेष काल में समाज नैतिकता, न्याय और जीवन के अर्थ को किस तरह देखता था। इसलिए धर्म को केवल स्थिर, रहस्यमय वस्तु नहीं बल्कि अपने समय से जुड़ा जीवंत विचार भी माना जाना चाहिए।

प्रश्न 4

प्र. धर्म अगर कुछ विशेष लोगों वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों, मठाधीशों, पंडे-पुजारियों की मुट्ठी में है तो आम आदमी और समाज का उससे क्या संबंध होगा? अपनी राय लिखिए।

उत्तर: यदि धर्म केवल कुछ चुनिंदा लोगों की मुट्ठी में सिमट जाए, तो आम आदमी का उससे संबंध केवल आज्ञापालन तक सीमित रह जाता है, समझ और सहभागिता तक नहीं पहुँच पाता। इससे समाज में धर्म एक जीवंत, समझा जाने वाला मार्गदर्शक न रहकर एक बंद, रहस्यमय सत्ता बन जाता है, जिस पर सवाल पूछना भी अनुचित माना जाने लगता है। यह स्थिति समाज के लिए हानिकारक है, क्योंकि इससे अंधविश्वास और शोषण दोनों बढ़ने की संभावना रहती है।

प्रश्न 5

प्र. ‘जहाँ धर्म पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार धर्म को संकुचित अर्थ प्रदान करता है वहीं धर्म का आम आदमी से संबंध उसके विकास एवं विस्तार का द्योतक है।’ तर्क सहित व्याख्या कीजिए।

उत्तर: जब धर्म पर केवल कुछ लोगों का एकाधिकार होता है, तो वह एक संकुचित, बंद व्यवस्था बन जाता है जिसमें नए विचारों और प्रश्नों की कोई जगह नहीं होती, यही उसे सीमित और जड़ बना देता है। इसके विपरीत, जब आम आदमी धर्म को समझने, उस पर सवाल पूछने और उसकी व्याख्या करने में भाग लेता है, तो धर्म समय के साथ बदलती समझ को आत्मसात कर पाता है और उसका विकास व विस्तार होता है। इसीलिए धर्म का आम आदमी से जुड़ाव उसे संकुचित होने से बचाता है, एकाधिकार उसे संकुचित करता है।

प्रश्न 6

प्र. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।

(क) ‘वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है कि घड़ी के पुर्ज़े जानें, तुम्हें इससे क्या?’
उत्तर: यह पंक्ति उस पारंपरिक मत का प्रतिनिधित्व करती है जो आम आदमी को धर्म के गहरे रहस्य जानने से रोकता है। इसका आशय है कि धर्म की गहराई में जाने का अधिकार केवल कुछ चुने हुए विद्वानों को है, बाक़ी सबको केवल ऊपरी बातें मान लेनी चाहिए, प्रश्न नहीं पूछने चाहिए। लेखक इस मानसिकता का विरोधी है।

(ख) ‘अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया है, उसे तो देखने दो।’
उत्तर: इसका आशय है कि लेखक यह मान लेता है कि अनाड़ी (अयोग्य) व्यक्ति के हाथ में घड़ी, यानी धर्म की गहरी बातें, न दी जाए; पर वह माँग करता है कि जिसने योग्यता प्राप्त कर ली है (घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर लिया है), उसे तो देखने दिया जाए। जिसने विषय को गंभीरता से सीखा और समझा है, उसे रोकना अनुचित है।

(ग) ‘हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्ज़े सुधारना, तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।’
उत्तर: इसका आशय है कि जिन्होंने धर्म-परंपरा (परदादा की घड़ी) की ज़िम्मेदारी ले रखी है, हो सकता है वे स्वयं भी उसे ठीक से समझते या “चला” नहीं पा रहे हों, फिर भी वे किसी और को उसमें हाथ नहीं डालने देते। यह उनकी सत्ता की पोल खोलने वाला तीखा व्यंग्य है।

3 प्रश्न-अभ्यास: (ग) ढेले चुन लो

प्रश्न 1

प्र. वैदिक काल में हिंदुओं में कैसी लाटरी चलती थी जिसका ज़िक्र लेखक ने किया है?

उत्तर: वैदिक काल में एक स्नातक (विद्या पूरी कर चुका) पुरुष, नहा-धोकर और माला पहनकर, विवाह योग्य कन्या के पिता के घर पहुँच जाता। पाठ के शब्दों में “वह उसे गौ भेंट करता।” फिर वह कन्या के सामने मिट्टी के कुछ ढेले (कहीं सात, कहीं कम, कहीं ज़्यादा) रख देता। कन्या को उनमें से एक ढेला उठाना होता, बिना यह जाने कि हर ढेला कहाँ से लाया गया है। पुरुष जानता था कि हर ढेला किस जगह की मिट्टी का है और उसका क्या फल माना जाता है, पर कन्या नहीं जानती थी, यही इस “लाटरी” की बुझौवल (राज़) थी।

प्रश्न 2

प्र. ‘दुर्लभ बंधु’ की पेटियों की कथा लिखिए।

उत्तर: बबुआ हरिश्चंद्र के ‘दुर्लभ बंधु’ में नायिका पुरश्री के सामने तीन पेटियाँ रखी जाती हैं, एक सोने की, दूसरी चाँदी की, तीसरी लोहे की। इनमें से एक में उसकी प्रतिमूर्ति (चित्र/प्रतिमा) रखी होती है। स्वयंवर के लिए आने वाले हर पुरुष को इनमें से एक पेटी चुननी होती है। अकड़बाज़ (घमंडी) सोने की पेटी चुनकर उलटे पैरों लौटता है, लोभी को चाँदी की पिटारी अंखूठा दिखाती है (यानी मना कर देती है), जबकि सच्चा प्रेमी लोहे की पेटी चुनता है और घुड़दौड़ (घोड़ों की दौड़) का पहला इनाम पाता है। पाठ इसी प्रसंग से पहले शेक्सपीयर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ की पोर्शिया का उल्लेख करता है, जो ‘अपने वर को बड़ी सुंदर रीति से चुनती है’।

प्रश्न 3

प्र. ‘जीवन साथी’ का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ने के कौन-कौन से फल प्राप्त होते हैं?

उत्तर: वेदि (यज्ञ-स्थल) की मिट्टी उठाने पर संतान ‘वैदिक पंडित’ होने की मान्यता थी। गौशाला की मिट्टी (गोबर) चुनने पर संतान ‘पशुओं का धनी’ होती। खेत की मिट्टी छूने पर संतान ‘ज़मींदार पुत्र’ होती। मसान (श्मशान) की मिट्टी को हाथ लगाना बहुत अशुभ माना जाता था; मान्यता यह थी (लेखक इसे स्वयं नहीं मानते, यह पुरानी सोच है) कि ऐसी कन्या से विवाह करने पर घर ही मसान बन जाएगा, यानी वह जन्मभर घर को जलाती (सताती) रहेगी। चौराहे की मिट्टी भी सूची में गिनाई गई है, पर पाठ इसका अलग फल नहीं बताता। साथ ही पाठ यह भी स्पष्ट करता है कि किसी एक पुरुष के सामने अशुभ मिट्टी छू लेने का अर्थ यह नहीं कि कन्या का कभी विवाह ही न हो, किसी दूसरे पुरुष के सामने वही शुभ मिट्टी भी उठा सकती थी।

प्रश्न 4

प्र. मिट्टी के ढेलों के संदर्भ में कबीर की साखी की व्याख्या कीजिए, “पत्थर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार। इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।”

उत्तर: कबीर इस साखी में कहते हैं कि यदि पत्थर की पूजा करने मात्र से भगवान मिल सकते होते, तो लोगों को पूरा पहाड़ ही पूज लेना चाहिए, क्योंकि पहाड़ भी पत्थर का ही बड़ा रूप है। इससे तो घर की चक्की (आटा पीसने का पत्थर का यंत्र) कहीं बेहतर है, क्योंकि वह कम-से-कम दुनिया का पेट भरने का काम तो करती है। मिट्टी के ढेलों के प्रसंग में यह साखी निबंध के अंत में आती है। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: जैसे कबीर पत्थर-पूजा की निरर्थकता पर चोट करते हैं, वैसे ही यहाँ ढेलों और ग्रहों की कल्पित गणना पर भरोसे की विडंबना सामने आती है। लेखक यह साखी “बकौल कबीर के” कहकर रखते हैं; ढेलों और ग्रहों में कौन-सा भरोसा अच्छा है, इस पर वे स्वयं कहते हैं: “यह मैं क्या कह सकता हूँ?” पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध में “लोक विश्वासों में निहित अंधविश्वासी मान्यताओं पर चोट की गई है”।

प्रश्न 5

प्र. जन्मभर के साथी का चुनाव मिट्टी के ढेले पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिए बेटी का शिक्षित होना अनिवार्य है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के संदर्भ में विचार कीजिए।

उत्तर: जब जीवनसाथी का चुनाव मिट्टी के ढेलों जैसी अंधी प्रथा पर छोड़ दिया जाता था, तो कन्या को यह भी पता नहीं होता था कि कौन-सा ढेला कहाँ की मिट्टी का है (पाठ: “कन्या जानती न थी”)। यदि कन्या शिक्षित होती, तो वह अपने जीवन के इतने महत्वपूर्ण निर्णय में समझदारी से भाग ले पाती, अंधविश्वास पर निर्भर नहीं रहती। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के संदर्भ में विचार यह है कि शिक्षा बेटी को अपने जीवन के फ़ैसले स्वयं, समझदारी से लेने की शक्ति देती है, चाहे वह जीवनसाथी का चुनाव हो या करियर का।

प्रश्न 6

प्र. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए।

(क) ‘अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मट्टी और आग के ढेलों, मंगल, शनिश्चर और बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है।’
उत्तर: इसका आशय है कि लेखक पूछते हैं: जिस मिट्टी को अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुना गया, उस पर भरोसा करना बुरा क्यों माना जाए, और लाखों-करोड़ों कोस दूर के ग्रहों (मंगल, शनिश्चर, बृहस्पति) की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब पर भरोसा, जिसे कोई सीधे देख या परख नहीं सकता, अच्छा क्यों माना जाए। यह निबंध के सबसे तीखे व्यंग्य में से है। इसका उत्तर लेखक स्वयं नहीं देते: “यह मैं क्या कह सकता हूँ?” पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध में “लोक विश्वासों में निहित अंधविश्वासी मान्यताओं पर चोट की गई है”।

(ख) ‘आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल की मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस के तेज पिंड से।’
उत्तर: इसका आशय है कि पास की, निश्चित और आँखों देखी छोटी चीज़, दूर की बड़ी पर अनिश्चित चीज़ से अच्छी है। पहला वाक्य लेखक “बकौल वात्स्यायन के” रखते हैं। इसी के सहारे वे व्यंग्य में कहते हैं कि आँखों देखा ढेला लाखों कोस दूर के तेज पिंड (ग्रह) से “अच्छा ही होना चाहिए”। यह बात व्यंग्य में कही गई है; ठीक पहले लेखक स्वयं कह चुके हैं, “यह मैं क्या कह सकता हूँ?”

4 योग्यता-विस्तार

ये क्रियाकलाप-आधारित प्रश्न हैं। नीचे हर प्रश्न के लिए उत्तर की दिशा दी गई है, विद्यार्थी अपने विचार और उदाहरण जोड़कर उत्तर लिखें।

(क) बालक बच गया: प्रश्न 1

प्र. बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विकास में ‘रटना’ बाधक है, कक्षा में संवाद कीजिए।

उत्तर: संवाद में यह बात रखी जा सकती है कि रटने से बालक बिना समझे उत्तर दोहराता है, जैसे पाठ का बालक ‘मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा’ जैसा सीखा-सिखाया उत्तर देता है। रटने पर ज़ोर देने से उसकी जिज्ञासा, कल्पना और अपनी रुचियाँ दब जाती हैं। पाठ के परिचय के अनुसार शिक्षा बच्चे पर लादनी नहीं चाहिए बल्कि उसके मानस में शिक्षा की रुचि पैदा करने वाले बीज डाले जाने चाहिए, ‘सहज पके सो मीठा होए’।

(क) बालक बच गया: प्रश्न 2

प्र. ज्ञान के क्षेत्र में ‘रटने’ का निषेध है किंतु क्या आप रटने में विश्वास करते हैं। अपने विचार प्रकट कीजिए।

उत्तर: (विद्यार्थी अपने विचार लिखें।) एक संतुलित उत्तर यह हो सकता है कि कुछ चीज़ें, जैसे पहाड़े, सूत्र या कविता की पंक्तियाँ, याद करना उपयोगी है, पर बिना समझे केवल रटना ज्ञान नहीं है। पहले विषय को समझना और फिर उसे याद रखना ही सही तरीका है।

(ख) घड़ी के पुर्ज़े: प्रश्न 1

प्र. धर्म संबंधी अपनी मान्यता पर लेख / निबंध लिखिए।

उत्तर: (यह लेखन-कार्य है, विद्यार्थी अपनी मान्यता स्वयं लिखें।) लेख में धर्म का अपना अर्थ, उसमें नैतिकता और मानवता का स्थान, और यह विचार रखा जा सकता है कि धर्म को समझने और उस पर प्रश्न पूछने का अधिकार हर व्यक्ति को है, जैसा पाठ में घड़ी के दृष्टांत से कहा गया है।

(ख) घड़ी के पुर्ज़े: प्रश्न 2

प्र. ‘धर्म का रहस्य जानना सिर्फ़ धर्माचार्यों का काम नहीं, कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर उस रहस्य को जानने की कोशिश कर सकता है, अपनी राय दे सकता है’, टिप्पणी कीजिए।

उत्तर: यह कथन पाठ के तर्क से मेल खाता है। लेखक कहते हैं कि गिनती हम जानते हैं, अंक पहचानते हैं, सुइयों की चाल भी देख सकते हैं, फिर हमें ही क्यों न देखने दिया जाए। जो घड़ीसाज़ी का इम्तहान पास कर आया है उसे तो देखने दो। इसी तरह कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर धर्म को समझने का प्रयास कर सकता है और अपनी राय दे सकता है; धर्म पर मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार उसे संकुचित करता है।

(ग) ढेले चुन लो: प्रश्न 1

प्र. समाज में धर्म संबंधी अंधविश्वास पूरी तरह व्याप्त है। वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में धर्म, विश्वास और आस्था पर निबंध लिखिए।

उत्तर: (यह निबंध-लेखन है।) निबंध में आस्था और अंधविश्वास का अंतर, वैज्ञानिक सोच (प्रमाण और तर्क) का महत्त्व, और पाठ का यह तर्क रखा जा सकता है कि आँखों देखी, परखी हुई बात पर भरोसा करना दूर की कल्पित गणना पर भरोसा करने से बेहतर है।

(ग) ढेले चुन लो: प्रश्न 2

प्र. अपने घर में या आस-पास दिखाई देने वाले किसी रिवाज या अंधविश्वास पर एक लेख लिखिए।

उत्तर: (यह लेखन-कार्य है, विद्यार्थी अपने अनुभव से लिखें।) लेख में उस रिवाज का वर्णन, लोग उसे क्यों मानते हैं, उसका कोई तर्कसंगत आधार है या नहीं, और उसके प्रभाव पर अपने विचार लिखे जा सकते हैं।