कक्षा 12 इतिहास अध्याय 8 किसान, ज़मींदार और राज्य महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. आइन-ए-अकबरी किसने लिखी, और यह किस बड़ी रचना का भाग थी?

उत्तर: आइन-ए-अकबरी अबुल फ़ज़्ल ने लिखी, जो अकबर के दरबारी इतिहासकार थे; यह उनकी बड़ी इतिहास-परियोजना अकबरनामा की तीसरी पुस्तक थी।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. खुद-काश्त और पाहि-काश्त किसान में क्या अंतर था?

उत्तर: खुद-काश्त किसान अपने ही गाँव में भूमि रखते थे; पाहि-काश्त किसान अनुबंध पर कहीं और भूमि जोतते थे, या तो बेहतर शर्तों के लिए अपनी इच्छा से या अकाल के कारण मजबूरी से।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. जिन्स-ए-कामिल क्या है? दो उदाहरण दीजिए।

उत्तर: जिन्स-ए-कामिल (‘उत्तम फ़सलें’) वे नक़दी फ़सलें थीं जिन्हें मुग़ल राज्य ऊँचे राजस्व के लिए प्रोत्साहित करता था, जैसे कपास और गन्ना।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. मिल्कियत भूमि क्या थी?

उत्तर: मिल्कियत ज़मींदारों की व्यक्तिगत भूमि थी, किराए या बंधुआ श्रम से उनके निजी उपयोग के लिए जोती जाती थी, और स्वतंत्र रूप से बेची, वसीयत या गिरवी रखी जा सकती थी।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. जमा और हासिल में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: जमा आँकी गई राजस्व-राशि थी, और हासिल वास्तव में वसूली गई राशि, जो स्थानीय कारणों से आँकलन से कम हो सकती थी।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. ग्राम समुदाय के तीन घटक क्या थे?

उत्तर: किसान व्यक्तिगत रूप से भूमि के स्वामी होते थे पर एक सामूहिक ग्राम समुदाय से भी संबंधित थे जिसके तीन भाग थे: कृषक, पंचायत, और मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. बेगार क्या था?

उत्तर: बेगार अवैतनिक बलात श्रम था, जिसकी पश्चिम भारत से पंचायत-याचिकाएँ प्रायः ‘श्रेष्ठ’ जातियों या राजकीय अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत करती थीं।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के समकालीन प्रयोग में ‘जंगली’ शब्द का क्या अर्थ था?

उत्तर: ‘जंगली’ का उस समय का अर्थ ‘असभ्य’ नहीं था; यह उन लोगों का वर्णन करता था जो वन-उपज संग्रहण, शिकार और स्थानांतरी कृषि से जीते थे।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. अकबर की भूमि-वर्गीकरण व्यवस्था की चार श्रेणियाँ क्या थीं?

उत्तर: पोलज (हर फ़सल की सालाना खेती, कभी खाली नहीं छोड़ी जाती), परौती (कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती ताकि ज़मीन अपनी ताकत वापस पा सके), चचर (तीन या चार वर्षों तक खाली), और बंजर (पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं)।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. राजस्व-आँकलन की कणकुत और बटाई विधियों में अंतर बताइए।

उत्तर: कणकुत में खड़ी फ़सल का अनुमान लगाया जाता था (विवाद होने पर काटकर वर्गीकृत करके); बटाई/भाओली में दोनों पक्षों की उपस्थिति में समझौते से फ़सल काटकर बाँटी जाती थी।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. ग्राम पंचायत ने जाति-सीमाओं की रखवाली की भूमिका किस प्रकार निभाई?

उत्तर: पूर्वी भारत में हर विवाह में मंडल की उपस्थिति आवश्यक थी ‘मुख्यतः उनकी जाति के विरुद्ध किसी अपराध को रोकने के लिए’; पंचायतें जुर्माना लगा सकती थीं या किसी को समुदाय से बहिष्कृत कर सकती थीं।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. मल्लाहज़ादा और हलालख़ोरान कौन थे?

उत्तर: हलालख़ोरान मुस्लिम सफ़ाईकर्मी थे जो गाँव की सीमाओं के बाहर रहते थे; बिहार के मल्लाहज़ादा (‘नाविकों के पुत्र’) को काफ़ी हद तक दासों जैसा व्यवहार मिलता था।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. जजमानी व्यवस्था क्या थी, और इसका नाम कब पड़ा?

उत्तर: यह व्यक्तिगत शिल्पियों और किसान-परिवारों के बीच वस्तु-बदले-सेवा विनिमय की व्यवस्था थी, जैसे बंगाल के ज़मींदार लोहारों-बढ़इयों को दैनिक भत्ता व भोजन-राशि देते थे; इस पैटर्न को बाद में जजमानी व्यवस्था कहा गया, यद्यपि यह शब्द तब प्रयुक्त नहीं होता था।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में वनवासियों की सामाजिक स्थिति कैसे बदली?

उत्तर: जनजातीय मुखिया, गाँव के ‘बड़े आदमियों’ की तरह, अपने वंश-समूहों से सेनाएँ बनाते और कई ज़मींदार या राजा बन गए, जैसे असम के अहोम राजा और कोच राजा।

3 3 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (3 अंक)

प्र. स्रोत 5 और 6 के आधार पर अकबर की भूमि-वर्गीकरण और राजस्व-आँकलन व्यवस्था का वर्णन कीजिए।

उत्तर: भूमि को पोलज, परौती, चचर और बंजर में वर्गीकृत किया जाता था; पोलज-परौती को आगे अच्छी-मध्यम-ख़राब में बाँटा जाता, तीनों का औसत मध्यम उपज देता जिसका एक-तिहाई राजस्व दावा किया जाता। आँकलन कणकुत, बटाई, खेत-बटाई या लाँग बटाई से होता था।

प्रश्न 2 (3 अंक)

प्र. कृषि इतिहास के स्रोत के रूप में आइन के उपयोग की समस्याएँ क्या हैं?

उत्तर: आइन ‘ऊपर से देखा गया दृश्य’ देती है, दरबारी दृष्टिकोण से लिखी गई; इसमें कई योग-त्रुटियाँ हैं और असमान क्षेत्रीय कवरेज है (बंगाल-उड़ीसा के लिए ज़मींदारों की जाति-जानकारी अनुपस्थित)। इतिहासकार इसे क्षेत्रीय अभिलेखों (गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेख) से पूरक बनाकर संतुलित करते हैं।

प्रश्न 3 (3 अंक)

प्र. ग्रामीण समाज में जाति की भूमिका पर चर्चा कीजिए।

उत्तर: जाति ने किसान वर्ग को गहराई से असमान बनाया: भूमिहीन मज़ूर सबसे नीचे थे, मध्यवर्ती स्तरों पर जाति-दर्जा कम सुव्यवस्थित था (अहीर-गुज्जर-माली ऊपर उठे), और जाति पंचायतें विवाद-मध्यस्थता व विवाह-उपयुक्तता तय करती थीं।

प्रश्न 4 (3 अंक)

प्र. ज़मींदारों की सैन्य शक्ति और राज्य के साथ उनके संबंध पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर: आइन के मुताबिक मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली-जुली सैनिक शक्ति 3,84,558 घुड़सवार, 42,77,057 पैदल, 1,863 हाथी, 4,260 तोप और 4,500 नाव थी; ज़्यादातर ज़मींदारों के पास अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं। वे अकसर राज्य की ओर से कर वसूलते थे, फिर भी सत्रहवीं सदी के कई कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अकसर किसानों का समर्थन मिला।

प्रश्न 5 (3 अंक)

प्र. कृषक समाज में स्त्रियों की आर्थिक भूमिका का वर्णन कीजिए।

उत्तर: स्त्रियाँ बोतीं, निराई करतीं, गाहतीं-ओसातीं; धागा कातना, मिट्टी छानना-गूँधना, कढ़ाई भारी मात्रा में स्त्री-श्रम पर निर्भर थे। भूमिधारी अभिजात स्त्रियों के पास वास्तविक विरासत-अधिकार भी थे, बंगाल में स्त्री ज़मींदार सहित।

प्रश्न 6 (3 अंक)

प्र. वैश्विक चाँदी-प्रवाह ने मुग़ल अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर: नई दुनिया के खुलने से एशिया में भारी चाँदी बुलियन आया, जिसका बहुत-सा भारत में बहा, जिसकी अपनी कोई प्राकृतिक चाँदी नहीं थी; इससे मुद्रा-स्थिरता, सिक्का-ढलाई का विस्तार, और नक़द में कर वसूलने की क्षमता सुदृढ़ हुई।

प्रश्न 7 (3 अंक)

प्र. स्रोत 9 के आधार पर अबुल फ़ज़्ल की आइन लिखने की पद्धति का वर्णन कीजिए।

उत्तर: अबुल फ़ज़्ल ने महामहिम की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़ इकट्ठे किए और राज्य के मुलाज़िमों व शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ की; सच बोलने वाले समझदार बुज़ुर्गों और फ़ुर्तीले दिमाग वाले, सत्यकर्मी जवानों दोनों के बयान परखकर लिखे। सूबों को हुक्म भेजा गया कि पुरानी घटनाएँ याद रखने वाले अपने संस्मरण दरबार भेजें, और जमा सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाती थी। उसने दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त, सूबों को भेजे गए हुक्मों की मूल प्रतियाँ या नकलें, ऊँचे अफ़सरों व मंत्रियों की रिपोर्टें और जानकार लोगों के मसौदे भी इस्तेमाल किए।

4 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. सोलहवीं-सत्रहवीं सदी की कृषि उत्पादन को किस हद तक निर्वाह-कृषि कहा जा सकता है? कारण दीजिए।

उत्तर: पूर्णतः नहीं: जिन्स-ए-कामिल जैसी नक़दी फ़सलें (कपास, गन्ना, तिलहन) राज्य द्वारा सक्रिय रूप से प्रोत्साहित की जाती थीं, और ये एक औसत किसान की अपनी ही ज़मीन पर निर्वाह अनाजों के साथ घनिष्ठता से जुड़ी थीं, उनके विरुद्ध नहीं। ग्राम-नगर व्यापार से नक़द अर्थव्यवस्था पहले ही विकसित हो चुकी थी, राजस्व नक़द में वसूला जाता था, और निर्यातोन्मुख शिल्पी नक़द अग्रिम पाते थे। अतः यह विशुद्ध निर्वाह-कृषि नहीं बल्कि निर्वाह व वाणिज्यिक खेती का मिश्रण था।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. पंचायतों और ग्राम-मुखियाओं ने ग्रामीण समाज को किन तरीकों से नियमित किया?

उत्तर: पंचायत, बुज़ुर्गों की सभा, ग्राम-लेखा (पटवारी की सहायता से), आपदा-राहत और अवसंरचना-निधि की देखरेख करती; मुखिया बुज़ुर्गों की सहमति व ज़मींदार के अनुमोदन से चुना जाता। जाति पंचायतें विवाद-मध्यस्थता और विवाह-उपयुक्तता तय करतीं, और गंभीर उल्लंघन पर बहिष्कार तक कर सकती थीं, यद्यपि मंडल-पटवारी मिलीभगत से धोखाधड़ी भी होती थी।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. जनजातीय मुखिया कभी-कभी ज़मींदार या राजा में कैसे रूपांतरित हुए?

उत्तर: जनजातीय मुखिया, गाँव के ‘बड़े आदमियों’ की तरह, अपने वंश-समूहों से सेनाएँ बनाते थे; सिंध की जनजातियों ने 6,000 घुड़सवार व 7,000 पैदल सैनिक तैनात किए, और असम के अहोम राजाओं के पास पाइक थे। यह जनजातीय-से-राजतांत्रिक बदलाव सोलहवीं सदी तक परिपक्व हुआ, कोच राजाओं के युद्धों की शृंखला में स्पष्ट।

5 5 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (5 अंक)

प्र. आइन-ए-अकबरी की संरचना, कार्यप्रणाली और इतिहासकारों के लिए इसके महत्व व सीमाओं की विस्तृत चर्चा कीजिए।

उत्तर: 1598 में पाँच संशोधनों के बाद पूर्ण, आइन अकबरनामा की तीसरी पुस्तक थी, जिसमें पाँच पुस्तकें शामिल थीं: मंज़िल-आबादी (शाही घराना), सिपह-आबादी (सैन्य-प्रशासन), मुल्क-आबादी (वित्तीय प्रशासन, आठ-स्तंभ सारणियाँ), और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ। अबुल फ़ज़्ल ने अभिलेख-कार्यालय, प्रांतीय रिपोर्टों और मौखिक साक्ष्य की जाँच से इसे लिखा, संख्याएँ शब्दों में लिखकर त्रुटि रोकी। फिर भी योग-त्रुटियाँ और असमान क्षेत्रीय कवरेज इसकी वास्तविक सीमाएँ हैं। इसकी उपलब्धि मध्यकालीन इतिवृत्त-परंपरा से टूटना था, देश, लोगों और उत्पादों को वास्तविक विषय बनाना, जिससे इसका कृषक-संबंधों पर मात्रात्मक प्रमाण आज भी अविवादित है।

प्रश्न 2 (5 अंक)

प्र. मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।

उत्तर: ज़मींदार सीधे खेती किए बिना कृषि से जीते थे, ऊँचे सामाजिक-आर्थिक दर्जे के, आंशिक रूप से जाति से और आंशिक रूप से राज्य-सेवाओं (ख़िदमत) से। उनकी मिल्कियत भूमि, दुर्ग और सशस्त्र टुकड़ियाँ थीं; आइन उनकी मिली-जुली सैनिक शक्ति 3,84,558 घुड़सवार और 42,77,057 पैदल दर्ज करती है। वे कृषि-उपनिवेशीकरण को आगे बढ़ाते, बाज़ार स्थापित करते और राजस्व वसूलते थे। संबंध एकतरफ़ा उत्पीड़न का नहीं था: भक्ति संतों ने उन्हें किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया, उनके ग़ुस्से का निशाना आमतौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था, और कई विद्रोहों में ज़मींदार किसानों के साथ राज्य के विरुद्ध लड़े।

6 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में क्या समस्याएँ हैं, और इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?

उत्तर: आइन दरबारी दृष्टिकोण से लिखी गई ‘ऊपर से देखा गया दृश्य’ है, जिसका उद्देश्य साम्राज्य को सामाजिक सद्भाव से बँधा दिखाना था, इसलिए विद्रोह को असफल होना पूर्व-निर्धारित माना गया है। इसमें सहायकों की योग-त्रुटियाँ भी हैं, और कवरेज असमान है: बंगाल-उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति-जानकारी अनुपस्थित है, विस्तृत मूल्य-मज़दूरी आँकड़े मुख्यतः आगरा क्षेत्र से हैं। इतिहासकार इसे क्षेत्रीय राजस्व-दस्तावेज़ों (गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान से सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के अभिलेख) और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों से पूरक बनाकर संतुलित करते हैं, जो किसानों-ज़मींदारों-राज्य के बीच के संघर्षों और किसानों की अपनी अपेक्षाओं को भी दर्ज करते हैं।

7 केस स्टडी

केस स्टडी
‘हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं। वर्षों से आबाद किसी बड़े शहर के बाशिंदे उसे छोड़कर चले जाते हैं, तो वे ये काम कुछ इस तरह करते हैं कि डेढ़ दिनों के अंदर उनका हर नामोनिशान (वहाँ से) मिट जाता है। दूसरी ओर, अगर वे किसी जगह पर बसना चाहते हैं तो उन्हें पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि उनकी सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती हैं, और चूँकि हिंदुस्तान की आबादी बेशुमार है, लोग उमड़ते चले आते हैं। वे एक सरोवर या कुआँ बना लेते हैं; उन्हें घर बनाने या दीवार खड़ी करने की भी ज़रूरत नहीं होती… खस की घास बहुतायत में पाई जाती है, जंगल अपार हैं, झोंपड़ियाँ बनाई जाती हैं, और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!’
— बाबर, बाबरनामा (स्रोत 1)

(क) 2 अंक यह विवरण किसका है, और वे कौन थे?
उत्तर: यह विवरण बाबर का है, पहले मुग़ल बादशाह, जिन्होंने 1526 में पानीपत में इब्राहिम लोदी को हराकर मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की थी।

(ख) 3 अंक गद्यांश के अनुसार बस्तियों के तेज़ी से बसने और उजड़ने के पीछे कौन-से भौतिक कारण थे?
उत्तर: फ़सलें पूरी तरह वर्षा-आधारित होती थीं इसलिए नालियाँ खोदने की ज़रूरत नहीं थी; निर्माण-सामग्री (खस-घास, लकड़ी) प्रचुर व सस्ती थी, इसलिए घर और झोंपड़ियाँ जल्दी बन जातीं और छोड़ने में कोई बड़ी हानि नहीं होती थी।

(ग) 3 अंक यह गद्यांश सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के कृषि समाज के बारे में समग्र रूप से क्या दर्शाता है?
उत्तर: यह दिखाता है कि भूमि और श्रम अपेक्षाकृत प्रचुर थे जबकि स्थायी पूँजी-निवेश (मज़बूत घर, दीवारें) की आवश्यकता कम थी, जिससे किसानों को गतिशील रहने और बेहतर शर्तों की तलाश में स्थान बदलने की वास्तविक क्षमता मिलती थी, यह एक हथियार जिसका उपयोग वे ज़मींदार या राज्य की अत्यधिक माँगों के विरुद्ध भी करते थे।

केस स्टडी
‘अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की ज़मीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया। पोलज वह ज़मीन है जिसमें एक के बाद एक हर फ़सल की सालाना खेती होती है और जिसे कभी खाली नहीं छोड़ा जाता है। परौती वह ज़मीन है जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोयी ताकत वापस पा सके। चचर वह ज़मीन है जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है। बंजर वह ज़मीन है जिस पर पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई हो। पहले दो प्रकार की ज़मीन की तीन किस्में हैं, अच्छी, मध्यम और खराब। वे हर किस्म की ज़मीन के उत्पाद को जोड़ देते हैं, और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है, जिसका एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता है।’
— आइन-ए-अकबरी (स्रोत 5)

(क) 2 अंक यह वर्गीकरण किस ग्रंथ से लिया गया है, और यह किस विषय में सहायक है?
उत्तर: यह वर्गीकरण अबुल फ़ज़्ल की आइन-ए-अकबरी से लिया गया है, और यह अकबर की भूमि-राजस्व आँकलन व्यवस्था को समझने में सहायक है।

(ख) 3 अंक पोलज और परौती भूमि को आगे किस प्रकार वर्गीकृत किया जाता था, और राजस्व की गणना कैसे होती थी?
उत्तर: पोलज और परौती दोनों की तीन किस्में थीं, अच्छी, मध्यम और खराब; हर किस्म के उत्पाद को जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता था, और उस मध्यम उत्पाद का एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क के रूप में लिया जाता था।

(ग) 3 अंक यह वर्गीकरण-व्यवस्था इतिहासकारों को मुग़ल राज्य के बारे में क्या दिखाती है?
उत्तर: यह दिखाती है कि मुग़ल राजस्व-प्रशासन बहुत सूक्ष्म और व्यवस्थित था: भूमि को इस आधार पर बाँटा जाता था कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है, हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय होता था, और पहले दो प्रकार की ज़मीन को अच्छी, मध्यम और खराब में बाँटकर मध्यम उत्पाद के आधार पर शाही शुल्क तय किया जाता था। अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की राज्य की कोशिश भी इसमें दिखती है।