इस अध्याय का संक्षिप्त सार, अंतिम समय के रिवीज़न के लिए: विचारक, उद्धरण, परिभाषाएँ और तुलना-सारणियाँ। पूरे नोट्स अलग से पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं।
1 राजनीति की तीन आम छवियाँ
| छवि | कौन मानता है |
|---|---|
| जनसेवा | राजनेता, चुनाव लड़ने वाले लोग |
| दावपेंच/स्वार्थ-साधन | “गंदी राजनीति”, “घोटाले” से जोड़ने वाले लोग |
| “जो राजनेता करते हैं” | कई अन्य लोग, जो राजनीति को “घोटालों” से जोड़ते हैं |
केवल साधारण लोग ही राजनीति से निराश नहीं हैं: राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले व्यवसायी और उद्यमी भी इससे लाभ उठाते हुए अपनी मुसीबतों के लिए राजनीति को कोसते हैं, और सिनेमा के कलाकार भी अक्सर राजनीति की बुराई करते हैं।
2 उद्धरण और विचारक, याद रखने लायक़
3 सुकरात-प्लेटो : न्याय की खोज
प्लेटो की पुस्तक “द रिपब्लिक” में सुकरात, सेफलस और पॉलिमार्कस के बीच संवाद के ज़रिए यह दिखाया गया कि “दोस्तों का भला और शत्रुओं का बुरा करना” न्याय की सही परिभाषा नहीं है। तर्कबुद्धि से यह साबित होता है: किसी को भी चोट पहुँचाना किसी भी स्थिति में न्यायपूर्ण नहीं हो सकता।
4 परिभाषाएँ, ठीक उसी तरह जैसे लिखी जानी चाहिए
5 दो अलग तुलनाएँ, मत मिलाएँ
5.1 गणित बनाम राजनीतिक सिद्धांत
गणित
- त्रिभुज/वर्ग की एक ही परिभाषा
- वस्तुओं से संबंध
- एक निश्चित सही उत्तर
राजनीतिक सिद्धांत
- समानता/स्वतंत्रता/न्याय की अनेक परिभाषाएँ
- मनुष्यों के आपसी संबंधों से जुड़ाव
- विविध राय, विचार-विमर्श ज़रूरी
5.2 राजनीतिक सिद्धांत पढ़ने के चार तर्क
सभी वर्गों के लिए प्रासंगिकता (गणित सीखने जैसी तुलना), सूचित नागरिकता (संगीत-श्रोता रूपक), रोज़मर्रा का भेदभाव (जाति-धर्म-लिंग-वर्ग), और तर्कसंगत बहस-कौशल (बहस-भाषण प्रतियोगिताएँ)।
- राजनीति की तीन आम छवियाँ: जनसेवा, दावपेंच, “जो राजनेता करते हैं”
- राजनीतिक सिद्धांत की परंपरा: कौटिल्य-अरस्तू से रूसो-मार्क्स-गांधी-अंबेडकर तक
- गांधी के अनुसार राजनीति ने हमें साँप की कुंडली की तरह जकड़ रखा है, और इससे जूझना ही होगा
- सुकरात-प्लेटो: किसी को भी चोट पहुँचाना कभी न्यायपूर्ण नहीं हो सकता
- गणित बनाम राजनीतिक सिद्धांत: एक परिभाषा बनाम अनेक परिभाषाएँ, दो अलग समूह, मत मिलाएँ
- राजनीतिक सिद्धांत पढ़ने के चार तर्क: प्रासंगिकता, सूचित नागरिकता, रोज़मर्रा का भेदभाव, बहस-कौशल