मनुष्य दो मामलों में अद्वितीय है: उसके पास विवेक होता है और अपनी गतिविधियों में उसे व्यक्त करने की योग्यता होती है, और उसके पास भाषा का प्रयोग और एक-दूसरे से संवाद करने की क्षमता भी होती है। अन्य प्राणियों से इतर, मनुष्य अपनी अंतरतम भावनाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त कर सकता है, और जिन्हें वह अच्छा और वांछनीय मानता है, उन विचारों को साझा कर उन पर चर्चा कर सकता है। राजनीतिक सिद्धांत की जड़ें मानव अस्मिता के इन जुड़वा पहलुओं में होती हैं।
किन बुनियादी प्रश्नों का विश्लेषण करता है: समाज को कैसे संगठित होना चाहिए? हमें सरकार की ज़रूरत क्यों है? सरकार का सर्वश्रेष्ठ रूप कौन-सा है? क्या क़ानून हमारी आज़ादी को सीमित करता है? राजसत्ता की अपने नागरिकों के प्रति क्या देनदारी होती है? नागरिक के रूप में एक-दूसरे के प्रति हमारी क्या देनदारी होती है?
यह क्या करता है: यह राजनीतिक जीवन को अनुप्राणित करने वाले स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूल्यों के बारे में सुव्यवस्थित रूप से विचार करता है और इनके अर्थ और महत्त्व की व्याख्या करता है। यह अतीत और वर्तमान के कुछ प्रमुख राजनीतिक चिंतकों को केंद्र में रखकर इन अवधारणाओं की मौजूदा परिभाषाओं को स्पष्ट करता है। यह विद्यालय, दुकान, बस, ट्रेन या सरकारी कार्यालय जैसी दैनिक जीवन से जुड़ी संस्थाओं में स्वतंत्रता या समानता के विस्तार की वास्तविकता की परख करता है। आगे जाकर यह देखता है कि वर्तमान परिभाषाएँ कितनी उपयुक्त हैं और वर्तमान संस्थाओं (सरकार, नौकरशाही) और नीतियों के अनुपालन को अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए उनका परिमार्जन कैसे किया जाए।
उद्देश्य: नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नों के बारे में तर्कसंगत ढंग से सोचने और सामयिक राजनीतिक घटनाओं को सही तरीक़े से आँकने का प्रशिक्षण देना।
1 राजनीति क्या है?
लोग राजनीति के बारे में अलग-अलग राय रखते हैं। राजनेता और चुनाव लड़ने वाले लोग अक्सर कहते हैं कि राजनीति एक प्रकार की जनसेवा है। राजनीति से जुड़े कुछ अन्य लोग इसे दावपेंच से जोड़ते हैं, जो अपनी आवश्यकताओं और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के कुचक्र में लगे रहते हैं। कई अन्य के लिए राजनीति वही है, जो राजनेता करते हैं, और जब वे राजनेताओं को दल-बदल करते, झूठे वायदे और बढ़े-चढ़े दावे करते और विभिन्न तबकों से जोड़तोड़ करते देखते हैं, तो राजनीति का संबंध “घोटालों” से जोड़ देते हैं। स्वार्थपरकता के ऐसे धंधों से मोहभंग होने पर हम राजनीति से हताश हो जाते हैं। केवल साधारण लोग ही राजनीति से निराश नहीं हैं, बल्कि इससे लाभान्वित होने और विभिन्न राजनीतिक दलों को चंदा देने वाले व्यवसायी और उद्यमी भी अपनी मुसीबतों के लिए आए दिन राजनीति को कोसते रहते हैं, और सिनेमा के कलाकार भी अक्सर राजनीति की बुराई करते हैं, यह अलग बात है कि इस खेल में सम्मिलित होते ही वे ख़ुद को इसकी ज़रूरतों के अनुसार ढाल लेते हैं। इस प्रकार हमारा सामना राजनीति की परस्पर विरोधी छवियों से होता है।
महात्मा गांधी ने एक बार टिप्पणी की थी कि राजनीति ने हमें साँप की कुंडली की तरह जकड़ रखा है और इससे जूझने के सिवाय कोई अन्य रास्ता नहीं है। कोई भी समाज राजनीतिक संगठन और सामूहिक निर्णय के किसी ढाँचे के बग़ैर ज़िंदा नहीं रह सकता।
राजनीति सरकार के कार्यकलापों तक ही सीमित नहीं है। सरकारें जो भी करती हैं वह प्रासंगिक होता है, क्योंकि वह लोगों के जीवन को अलग-अलग तरीक़ों से प्रभावित करता है। सरकारें हमारी आर्थिक नीति, विदेश नीति और शिक्षा नीति तय करती हैं। एक अकुशल या भ्रष्ट सरकार लोगों के जीवन और सुरक्षा को संकट में डाल सकती है, जैसे अगर सत्तारूढ़ सरकार जातीय या साम्प्रदायिक संघर्ष को हवा देती है तो बाज़ार और स्कूल बंद हो जाते हैं और पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। चूँकि सरकार की कार्रवाइयों का हम पर गहरा असर पड़ता है, हम संस्थाएँ बनाते हैं, प्रचार अभियान चलाते हैं, विरोध करते हैं और प्रदर्शन आयोजित करते हैं ताकि सरकार के लक्ष्यों को आकार दे सकें।
निष्कर्ष यह है कि राजनीति का जन्म इस तथ्य से होता है कि हमारे और हमारे समाज के लिए क्या उचित और वांछनीय है, इस बारे में हमारी दृष्टि अलग-अलग होती है। इसमें समाज में चलने वाली बहुविध वार्ताएँ शामिल हैं, जिनके ज़रिए सामूहिक निर्णय किए जाते हैं। एक स्तर पर यह सरकारों के कामकाज से जुड़ा है, दूसरे स्तर पर जनता के संघर्ष और उसके निर्णयों पर पड़ने वाले असर से।
2 राजनीतिक सिद्धांत में हम क्या पढ़ते हैं?
अगर हम गहराई से देखें तो लोकतंत्र, स्वतंत्रता या समानता जैसे कुछ मूल्य और सिद्धांत हमेशा जनता को प्रोत्साहित करते रहे हैं और नीतियों को निर्देशित करते रहे हैं। विभिन्न देश इन मूल्यों को अपने संविधान में प्रतिष्ठित कर उनकी हिफ़ाज़त करने का प्रयास करते हैं, जैसा अमेरिकी और भारतीय संविधानों में हुआ है। ऐसे संवैधानिक दस्तावेज़ रातोंरात नहीं बनते, बल्कि कौटिल्य और अरस्तू से लेकर रूसो, कार्ल मार्क्स, महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. अंबेडकर तक के समय से चली आ रही वाद-विवाद परंपरा पर टिके होते हैं।
इन विचारों ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में स्वतंत्रता और समानता को प्रतिष्ठित किया; भारतीय संविधान के अधिकार वाले अध्याय में किसी भी रूप में छुआछूत का निषेध किया गया, और गांधी के सिद्धांतों को नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया। राजनीतिक सिद्धांत उन विचारों और नीतियों को व्यवस्थित रूप से प्रतिबिंबित करता है जिनसे हमारे सामाजिक जीवन, सरकार और संविधान ने आकार ग्रहण किया है। यह क़ानून का राज, अधिकारों का बँटवारा और न्यायिक पुनरावलोकन जैसी नीतियों की सार्थकता की जाँच करता है। विभिन्न तर्कों की जाँच-पड़ताल के अलावा राजनीतिक सिद्धांतकार हमारे ताज़ा राजनीतिक अनुभवों की छानबीन भी करते हैं और भावी रुझानों तथा संभावनाओं को चिह्नित करते हैं।
नीचे दिए गए हर कथन/स्थिति में कौन-सा राजनीतिक सिद्धांत/मूल्य प्रयोग में आया है?
(क) मुझे विद्यालय में कौन-सा विषय पढ़ना है, यह तय करना मेरा अधिकार होना चाहिए।
(ख) छुआछूत की प्रथा का उन्मूलन कर दिया गया है।
(ग) क़ानून के समक्ष सभी भारतीय समान हैं।
(घ) अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपनी पाठशालाएँ और विद्यालय स्थापित कर सकते हैं।
(ङ) भारत की यात्रा पर आए हुए विदेशी, भारतीय चुनाव में मतदान नहीं कर सकते।
(च) मीडिया या फ़िल्मों पर कोई भी सेंसरशिप नहीं होनी चाहिए।
(छ) विद्यालय के वार्षिकोत्सव की योजना बनाते समय छात्र-छात्राओं से सलाह ली जानी चाहिए।
(ज) गणतंत्र दिवस के समारोह में प्रत्येक को भाग लेना चाहिए।
2.1 लेकिन क्या यह सब अब हमारे लिए प्रासंगिक है? तीन कारण
भारत स्वायत्त और स्वतंत्र है, फिर भी स्वतंत्रता और समानता से संबंधित प्रश्नों का उठना बंद नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए कि स्वतंत्रता, समानता तथा लोकतंत्र से संबंधित मुद्दे सामाजिक जीवन के अनेक मामलों में उठते हैं, और विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रफ़्तार से उनकी बढ़ोतरी हो रही है।
1. हर क्षेत्र में समानता एक जैसी नहीं। राजनीतिक क्षेत्र में समानता समान अधिकारों के रूप में बनी है, लेकिन आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में उसी तरह नहीं है। लोगों के पास समान राजनीतिक अधिकार हो सकते हैं, लेकिन जाति या ग़रीबी के कारण समाज में उनके साथ अभी भी भेदभाव हो सकता है। कुछ लोगों को समाज में विशेषाधिकार प्राप्त हैं, तो कुछ दूसरे बुनियादी आवश्यकताओं तक से वंचित हैं; कई लोग भविष्य में अच्छा रोज़गार पाने के लिए ज़रूरी स्कूली पढ़ाई तक नहीं कर पाते। उनके लिए स्वतंत्रता अभी भी दूर का सपना है।
2. हरदम नई व्याख्याएँ। हमारे संविधान में स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है, फिर भी हमें हरदम नई व्याख्याओं का सामना करना पड़ता है। यह एक तरह से खेल खेलने जैसा है: जैसे शतरंज या क्रिकेट खेलते हुए हम सीखते हैं कि उसके नियमों की व्याख्या कैसे करनी है, और इस प्रक्रिया में खेल के ही नये और व्यापक अर्थ खोज निकालते हैं। ठीक इसी प्रकार नई परिस्थितियों के मद्देनज़र मौलिक अधिकारों की निरंतर पुनर्व्याख्या की जा रही है। “आजीविका के अधिकार” को “जीवन के अधिकार” में शामिल करने के लिए अदालतों द्वारा उसकी पुनर्व्याख्या की गई है, और सूचना के अधिकार की गारंटी एक नए क़ानून द्वारा की गई है। समय के साथ-साथ न्यायिक व्याख्याओं और सरकारी नीतियों के ज़रिए मौलिक अधिकारों में संशोधन भी हुए और इनका विस्तार भी।
3. आज़ादी के नए आयाम और नए ख़तरे। वैश्विक संचार तकनीक दुनिया भर में आदिवासी संस्कृति या जंगल की सुरक्षा के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं का एक-दूसरे से तालमेल आसान बना रही है, पर इसने आतंकवादियों और अपराधियों को भी अपना नेटवर्क कायम करने की क्षमता दी है। इंटरनेट द्वारा व्यापार बढ़ने के साथ ज़रूरी है कि वस्तुओं या सेवाओं की ख़रीद के लिए हम अपने बारे में जो सूचना ऑनलाइन दें, उसकी सुरक्षा हो। इसीलिए इंटरनेटजन (इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले, जिन्हें नेटिजन भी कहा जाता है) सरकारी नियंत्रण नहीं चाहते, लेकिन वैयक्तिक सुरक्षा और गोपनीयता बनाए रखने के लिए किसी न किसी प्रकार का नियमन ज़रूरी मानते हैं। इससे प्रश्न उठते हैं: क्या आप किसी अजनबी को अवांछनीय ई-मेल भेज सकते हैं? क्या आप चैट रूम में अपने उत्पाद का विज्ञापन कर सकते हैं? क्या सरकार आतंकवादियों का सुराग लगाने के लिए किसी के व्यक्तिगत ई-मेल में ताकझाँक कर सकती है? कितना नियमन न्यायोचित है और नियमन किसे करना चाहिए, सरकार को या कुछ स्वतंत्र नियामकों को?
राजनीतिक सिद्धांत में इन प्रश्नों के संभावित उत्तरों के सिलसिले में हमारे सीखने के लिए बहुत कुछ है, और इसीलिए यह बेहद प्रासंगिक है।
3 राजनीतिक सिद्धांतों को व्यवहार में उतारना
इस पाठ्यपुस्तक में राजनीतिक सिद्धांत के सिर्फ़ एक पहलू तक ख़ुद को सीमित रखा गया है: स्वतंत्रता, समानता, नागरिकता, न्याय, विकास, राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे सुपरिचित राजनीतिक विचारों की उत्पत्ति, अर्थ और महत्व। जब हम किसी मुद्दे पर बहस आरंभ करते हैं, तो अक्सर पूछते हैं कि “इसका अर्थ क्या है?” और “यह कैसे महत्वपूर्ण होता है?” गणित के विपरीत, जहाँ त्रिभुज या वर्ग की सिर्फ़ एक परिभाषा होती है, राजनीतिक सिद्धांत में हम समानता, आज़ादी या न्याय की अनेक परिभाषाओं से रूबरू होते हैं, क्योंकि ये शब्द किसी वस्तु के बजाय अन्य मनुष्यों के साथ हमारे संबंधों से जुड़े होते हैं।
3.1 समानता की जटिलता : एक ठोस उदाहरण
लोग अक्सर दुकानों या सरकारी कार्यालयों में कतार तोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, और जब उन्हें पीछे भेजा जाता है तो हमें ख़ुशी होती है, क्योंकि हम सब समान अवसर चाहते हैं। फिर भी अगर वृद्धों और विकलांगों के लिए अलग काउंटर हों, तो हम समझते हैं कि यह विशेष बरताव न्यायोचित है। लेकिन बहुत-से ग़रीब लोग, जैसे दिहाड़ी मज़दूर जो घंटों पत्थर काटते या ईंट पाथते हैं, दुकान या चिकित्सक के पास इसलिए नहीं जा सकते क्योंकि उनके पास सामान या सुविधाओं की क़ीमत चुकाने के लिए रुपये नहीं होते। कई बच्चे स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि उन्हें काम करना पड़ता है, और अधिसंख्य लड़कियों को माता-पिता के काम पर जाने के दौरान छोटे भाई-बहनों की देखभाल के लिए स्कूल से हटा लिया जाता है। यद्यपि भारतीय संविधान सभी को प्राथमिक शिक्षा पाने के अधिकार की गारंटी देता है, यह अधिकार अभी मात्र औपचारिक बनकर रह गया है।
इस तरह समानता की अनेक परिभाषाएँ होने की वजह यह है कि समानता का अर्थ प्रसंग पर निर्भर करता है। हम पहले अपने लिए इसका अर्थ समझते हैं, फिर दूसरों (ग़रीब, वंचित, वरिष्ठ नागरिक) के लिए; इस तरह हमने अर्थ की कई परतें खोलीं, और पूरी तरह समझे बग़ैर हम राजनीतिक सिद्धांत ही गढ़ते रहे। समानता में सिर्फ़ बराबर अवसर ही नहीं, बल्कि किसी न किसी प्रकार की निष्पक्षता भी शामिल होनी चाहिए, ताकि लोग आर्थिक कारकों की वजह से प्रतिकूल परिस्थितियों के शिकार न हों। कभी-कभी इसका मतलब यह भी होता है कि संसाधनों (रोज़गार, अच्छा वेतन, रियायती अस्पताल) का उचित बँटवारा जैसे अग्रगामी उपायों से लोगों को सहायता पाने में समर्थ बनाया जाए, जिसके लिए किसी एजेंसी को ज़िम्मेवार बनाने की ज़रूरत होती है।
राजनीतिक अवधारणाओं के अर्थ को राजनीतिक सिद्धांतकार यह देखते हुए स्पष्ट करते हैं कि आम भाषा में इन्हें कैसे समझा और बरता जाता है। वे विविध अर्थों और रायों पर विचार-विमर्श और उनकी जाँच-पड़ताल सुव्यवस्थित तरीक़े से करते हैं। अवसर की समानता कब पर्याप्त है? कब लोगों को विशेष बरताव की ज़रूरत होती है? ऐसा विशेष बरताव कब तक और किस हद तक किया जाना चाहिए? क्या ग़रीब बच्चों को स्कूल में बने रहने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु दोपहर का भोजन दिया जाना चाहिए? ये मसले बिल्कुल व्यावहारिक हैं: ये शिक्षा और रोज़गार के बारे में सार्वजनिक नीतियाँ तय करने में मार्गदर्शन करते हैं। स्वतंत्रता, नागरिकता, अधिकार, विकास, न्याय, समानता, राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसी अवधारणाओं पर इस किताब के अगले अध्यायों में विचार किया जाएगा।
प्राचीन यूनान के एथेंस नगर में सुकरात को सर्वाधिक विवेकशील व्यक्ति कहा जाता था। वह समाज, धर्म और राजनीति की प्रचलित मान्यताओं को चुनौती देने के लिए प्रसिद्ध था, और इसीलिए एथेंस के शासकों ने उसे मृत्युदंड दिया। उसके शिष्य प्लेटो ने अपनी पुस्तक “द रिपब्लिक” में सुकरात के नाम से एक चरित्र गढ़ा और उसके माध्यम से यह सवाल खोजा कि “न्याय क्या है?” पुस्तक सुकरात और सेफलस के बीच एक संवाद से शुरू होती है। सेफलस पहले न्याय को “सत्य बोलना और अपना ऋण चुकाना” बताता है, पर सुकरात एक अपवाद से इसे चुनौती देता है: अगर कोई मित्र शांतचित्त होकर अपने हथियार जमा कर दे और फिर पागलपन की हालत में उन्हें वापस माँगे, तो हथियार लौटाना उचित नहीं होगा। इससे सेफलस और उसके मित्र पॉलिमार्कस को यह मानना पड़ता है कि उनकी न्याय की समझ अपर्याप्त है, और वे न्याय को “दोस्तों का भला और शत्रुओं का बुरा करना” बताते हैं। सुकरात तर्कबुद्धि के ज़रिए यह भी उजागर करता है कि यह परिभाषा भी सही नहीं हो सकती, क्योंकि इस तर्क से एक न्यायपूर्ण व्यक्ति भी अंततः चोर या अन्यायी साबित हो जाता है। अंत में पॉलिमार्कस मान लेता है: किसी को भी चोट पहुँचाना किसी भी स्थिति में न्यायपूर्ण नहीं हो सकता।
4 हमें राजनीतिक सिद्धांत क्यों पढ़ना चाहिए?
पहली बात, राजनीतिक सिद्धांत उन सभी समूहों के लिए प्रासंगिक है जो राजनीति करते हैं, नीति बनाते हैं, पढ़ाते हैं, संविधान की व्याख्या करते हैं या शोषण का पर्दाफ़ाश करते हैं। छात्र के रूप में हम भविष्य में इनमें से कोई भी पेशा चुन सकते हैं, इसलिए यह परोक्ष रूप से अभी ही हमारे लिए प्रासंगिक है, ठीक वैसे ही जैसे हम गणित पढ़ते हैं भले ही हममें से सभी गणितज्ञ या इंजीनियर न बनें, क्योंकि बुनियादी अंकगणित जीवन में सामान्यतः उपयोगी होता है।
दूसरी बात, हम सभी मत देने और अन्य मसलों के फ़ैसले करने के अधिकार-संपन्न नागरिक बनने जा रहे हैं। सूचनापरक समाज में ग्रामसभा में सहभागी होने या वेबसाइट पर अपनी राय पेश करने के लिए तर्कशील और जानकार होना ज़रूरी है। नागरिक के रूप में हम किसी संगीत कार्यक्रम के श्रोता जैसे होते हैं: हम गीत-लय की व्याख्या करने वाले मुख्य कलाकार नहीं होते, पर कार्यक्रम तय करते हैं, प्रस्तुति की सराहना करते हैं और नए अनुरोध करते हैं। शिक्षित और सचेत नागरिक भी राजनीति करने वालों को जनाभिमुख बना देते हैं।
तीसरी बात, स्वतंत्रता, समानता और धर्मनिरपेक्षता हमारे जीवन के अमूर्त मसले नहीं हैं। हम परिवारों, विद्यालयों और महाविद्यालयों में तरह-तरह के भेदभावों (जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर) का प्रतिदिन सामना करते हैं। राजनीतिक सिद्धांत हमें अपने विचारों और भावनाओं के परीक्षण के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे थोड़ी अधिक सतर्कता से देखने भर से हम अपने विचारों और भावनाओं में उदार होते जाते हैं। अंत में, छात्र के रूप में हम बहस और भाषण प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं, और जब हम दूसरों से बहस करते हैं, तभी हम अपने विचारों का बचाव करने की ज़रूरत महसूस करते हैं। राजनीतिक सिद्धांत हमें न्याय या समानता के बारे में सुव्यवस्थित सोच से अवगत कराता है, ताकि हम अपने विचारों को परिष्कृत कर सकें और सार्वजनिक हित में सुविज्ञ तरीक़े से तर्क-वितर्क कर सकें, जो वैश्विक सूचना-व्यवस्था में एक बड़ी संपत्ति साबित होता है।

- राजनीति सिर्फ़ सरकार तक सीमित नहीं, यह सामूहिक निर्णय की बहुविध वार्ताओं से जन्मती है
- राजनीतिक सिद्धांत की जड़ें मनुष्य की दो क्षमताओं, विवेक और भाषा, में हैं; इसका उद्देश्य नागरिकों को राजनीतिक प्रश्नों पर तर्कसंगत ढंग से सोचने और सामयिक राजनीतिक घटनाओं को आँकने का प्रशिक्षण देना है
- राजनीतिक सिद्धांत कौटिल्य-अरस्तू से रूसो-मार्क्स-गांधी-अंबेडकर तक की वाद-विवाद परंपरा पर टिका है
- आज़ादी के बाद भी राजनीतिक सिद्धांत प्रासंगिक है: हर क्षेत्र में समानता एक जैसी नहीं, अधिकारों की नई व्याख्याएँ होती रहती हैं (शतरंज या क्रिकेट के नियम सीखने जैसा), और इंटरनेट आज़ादी के नए आयाम और नए ख़तरे लाता है
- समानता की अनेक परिभाषाएँ हैं क्योंकि इसका अर्थ प्रसंग पर निर्भर करता है, गणित के त्रिभुज-वर्ग जैसा नहीं
- सुकरात का तरीक़ा: तर्कबुद्धि से किसी दृष्टिकोण की सीमाएँ उजागर करना
- राजनीतिक सिद्धांत पढ़ने के चार तर्क: सभी वर्गों के लिए प्रासंगिकता, सूचित नागरिकता, रोज़मर्रा का भेदभाव, तर्कसंगत बहस-कौशल
- क्या मुझे राजनीति की तीन आम छवियाँ (जनसेवा, दावपेंच, “जो राजनेता करते हैं”) याद हैं?
- क्या मैं राजनीतिक सिद्धांत का उद्देश्य और इसके छह बुनियादी प्रश्न लिख सकता हूँ?
- क्या मैं आज़ादी के बाद भी राजनीतिक सिद्धांत के प्रासंगिक होने के तीन कारण, शतरंज-क्रिकेट की उपमा और इंटरनेटजन के उदाहरण के साथ, बता सकता हूँ?
- क्या मुझे पाँचों नामित विचारक और उनका योगदान अलग-अलग याद है?
- क्या मुझे समानता के जटिल उदाहरण (कतार, दिहाड़ी मज़दूर, स्कूल) की कड़ियाँ याद हैं?
- क्या मुझे सुकरात-प्लेटो की न्याय की खोज का निष्कर्ष याद है?
- क्या मैं राजनीतिक सिद्धांत पढ़ने के चारों तर्क अलग-अलग गिना सकता हूँ?