NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग III के अध्याय 12 ‘संविधान का निर्माण: एक नए युग की शुरुआत’ के अभ्यास के सभी ग्यारह प्रश्नों के आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में: “उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)” वाले चार प्रश्न, “लघु निबंध (लगभग 250 से 300 शब्दों में)” वाले चार प्रश्न, एक मानचित्र कार्य और दो परियोजना कार्य (कोई एक)। इनके बाद अध्याय के भीतर स्रोतों के साथ और “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए नौ प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।
1 उद्देश्य प्रस्ताव के आदर्श
प्र. उद्देश्य प्रस्ताव में किन आदर्शों पर ज़ोर दिया गया था?
उत्तर:
1. स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य। 13 दिसंबर 1946 को नेहरू द्वारा पेश उद्देश्य प्रस्ताव ने भारत को एक ‘स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य’ घोषित किया, जो अपनी जनता को न्याय, समानता और स्वतंत्रता की गारंटी दे।
2. अल्पसंख्यकों व वंचितों के लिए रक्षात्मक प्रावधान। प्रस्ताव ने वचन दिया कि ‘अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों एवं दमित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षात्मक प्रावधान किए जाएँगे’।
3. वैश्विक इतिहास में स्थान, पर कोई नक़ल नहीं। नेहरू के भाषण ने भारत को अमेरिकी, फ्रांसीसी और रूसी क्रांतियों के साथ रखा, पर साथ ही स्पष्ट किया कि ‘हम सिर्फ़ नकल करने वाले नहीं हैं… हम यहाँ जैसी चाहे सरकार बनाएँ, वह हमारे लोगों के स्वभाव के अनुरूप और उनको स्वीकार्य ज़रूर होनी चाहिए।’
4. अंतर्निहित लोकतंत्र। प्रस्ताव के पाठ में ‘लोकतांत्रिक’ शब्द न होने पर भी नेहरू ने कहा कि ‘हमारा पूरा इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि हम लोकतांत्रिक संस्थानों के ही पक्षधर हैं’, और ‘हमने इस प्रस्ताव में लोकतंत्र की अंतर्वस्तु प्रस्तुत की है’, बल्कि आर्थिक लोकतंत्र की भी।
निष्कर्ष। इस प्रस्ताव में स्वतंत्र भारत के संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी और वह फ़्रेमवर्क सुझाया गया था जिसके तहत संविधान का कार्य आगे बढ़ना था।
2 ‘अल्पसंख्यक’ की भिन्न परिभाषाएँ
प्र. विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे?
उत्तर:
1. धार्मिक परिभाषा। बी. पोकर बहादुर जैसे सदस्यों के लिए अल्पसंख्यक का अर्थ धार्मिक समुदाय था, विशेषतः मुसलमान, जिन्हें पृथक निर्वाचिका से राजनीतिक आवाज़ चाहिए थी।
2. आर्थिक परिभाषा। समाजवादी नेता एन.जी. रंगा ने इसे पूरी तरह पलट दिया: ‘असली अल्पसंख्यक तो इस देश की जनता है… इन लोगों में मूलभूत शिक्षा तक नहीं है’, यानी धर्म नहीं, आर्थिक-शैक्षिक वंचना ही असली मापदंड थी।
3. संख्यात्मक न होकर संरचनात्मक परिभाषा। आदिवासी प्रतिनिधि जयपाल सिंह ने कहा कि आदिवासी कबीले संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं हैं, लेकिन उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें उनके जंगलों और चारागाहों से बेदखल कर दिया गया।
4. जातीय-सामाजिक परिभाषा। जे. नागप्पा ने कहा कि संख्या की दृष्टि से हरिजन अल्पसंख्यक नहीं हैं (आबादी में उनका हिस्सा 20-25 प्रतिशत है); उनकी पीड़ा का कारण उन्हें बाकायदा समाज व राजनीति के हाशिए पर रखा जाना है। के.जे. खाण्डेलकर ने हज़ारों साल के दमन की बात कही।
निष्कर्ष। इस तरह ‘अल्पसंख्यक’ सभा में एक भी स्थिर श्रेणी नहीं थी, बल्कि धर्म, वर्ग, संख्या और सामाजिक बहिष्कार के आधार पर बार-बार फिर से परिभाषित होती रही।
3 प्रांतों के लिए अधिक शक्ति की माँग
प्र. प्रांतों के लिए ज़्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए?
उत्तर:
1. अत्यधिक बोझिल केंद्र की चेतावनी। के. सन्तनम ने तर्क दिया कि प्रस्तावित वितरण केंद्र को मज़बूत करने के बजाय कमज़ोर कर देगा: ‘यह दलील एक ज़िद-सी बन गई है कि तमाम शक्तियाँ केंद्र को सौंप देने से वह मजबूत हो जाएगा।’ उनके अनुसार ज़रूरत से ज़्यादा ज़िम्मेदारियों वाला केंद्र प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा।
2. वित्तीय दबाव का ख़तरा। राजकोषीय प्रावधान प्रांतों को खोखला कर देंगे, क्योंकि भूराजस्व के अलावा ज़्यादातर कर केंद्र के अधिकार में दे दिए गए थे; राज्य अपने लोगों की शिक्षा, साफ़-सफ़ाई या सड़कों की व्यवस्था नहीं कर पाएँगे।
3. विद्रोह की भविष्यवाणी। सन्तनम ने कहा कि पर्याप्त जाँच-पड़ताल के बिना यह वितरण लागू हुआ तो कुछ ही सालों में सारे प्रांत ‘केंद्र के विरुद्ध’ उठ खड़े होंगे। उड़ीसा के एक सदस्य ने तो यहाँ तक चेतावनी दी कि शक्तियों के बेहिसाब केंद्रीकरण के कारण ‘केंद्र बिखर जाएगा’।
4. कम से कम विषय केंद्र के पास। प्रांतों के बहुत सारे दूसरे सदस्यों ने भी ज़ोर लगाया कि समवर्ती सूची और केंद्रीय सूची में कम से कम विषय रखे जाएँ।
निष्कर्ष। फिर भी यह पक्ष अल्पमत में रहा: अम्बेडकर, गोपालस्वामी आयंगर और बालकृष्ण शर्मा जैसे बहुमत ने विभाजन के बाद की सुरक्षा-चिंताओं का हवाला देकर मज़बूत केंद्र की दिशा को जिता लिया।
4 हिंदुस्तानी पर गाँधीजी का दृष्टिकोण
प्र. महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिंदुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए?
उत्तर:
1. आसानी से समझी जाने वाली भाषा। गाँधीजी का मानना था कि हरेक को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें; हिंदी और उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी भारतीय जनता के बहुत बड़े हिस्से की भाषा थी और विविध संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी।
2. एकता का साधन। उनके अनुसार यह हिंदुओं और मुसलमानों, उत्तर और दक्षिण को एकजुट कर सकती थी, जब हिंदी और उर्दू उन्नीसवीं सदी के अंत से लगातार अलग होती जा रही थीं।
3. न अति-संस्कृतनिष्ठ, न अति-फ़ारसीनिष्ठ। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले गाँधीजी ने कहा: ‘यह हिंदुस्तानी न तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी होनी चाहिए और न ही फ़ारसीनिष्ठ उर्दू। यह दोनों का सुंदर मिश्रण होना चाहिए।’
4. क्षेत्रीय शब्दों के प्रति खुलापन। उन्होंने यह भी कहा कि इसे विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं से शब्द खुलकर उधार लेने चाहिए, और खुद को हिंदी या उर्दू से बाँध लेना ‘देशभक्ति की भावना तथा समझदारी के विरुद्ध एक अपराध होगा’।
निष्कर्ष। गाँधीजी की यह व्यापक कल्पना अंततः भाषा समिति के समझौते में एक संकरी हिंदी-राजभाषा में सिमट गई, जो उनके मूल दृष्टिकोण से भिन्न परिणाम था।
5 संविधान के स्वरूप को आकार देने वाली ऐतिहासिक ताक़तें
प्र. वे कौन सी ऐतिहासिक ताक़तें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया?
उत्तर:
1. राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत। संविधान सभा को राष्ट्रीय आंदोलन से सीधे खुली सार्वजनिक बहस की एक आदत विरासत में मिली; सभा के 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस से थे, यद्यपि पार्टी के भीतर समाजवादियों से लेकर ज़मींदार-हितैषियों तक विविध विचारधाराएँ थीं।
2. विभाजन की हिंसा और शरणार्थी-संकट। दिसंबर 1946 से नवंबर 1949 तक चली बहसों की पृष्ठभूमि में विभाजन की भीषण हिंसा, करोड़ों शरणार्थी और रियासतों का अस्पष्ट भविष्य लगातार बना रहा, जिसने सुरक्षा और एकता की चिंता को हर बड़े फ़ैसले में शामिल कर दिया।
3. वैश्विक क्रांतियों का इतिहास। नेहरू के उद्देश्य प्रस्ताव ने भारत को अमेरिकी, फ्रांसीसी और रूसी क्रांतियों के व्यापक इतिहास में रखा, साथ ही एक विशिष्ट भारतीय संश्लेषण (उदार लोकतंत्र + समाजवादी आर्थिक न्याय) पर ज़ोर दिया।
4. सामाजिक-सुधार आंदोलनों की परंपरा। अध्याय बताता है कि लोकतंत्र, समानता और न्याय जैसे आदर्श उन्नीसवीं सदी से सामाजिक संघर्षों से जुड़ चुके थे: समाज सुधारकों का बाल-विवाह विरोध और विधवा-विवाह समर्थन, विवेकानंद का हिंदू धर्म-सुधार, ज्योतिबा फुले का दमित जातियों की पीड़ा का सवाल उठाना, और कम्युनिस्टों-सोशलिस्टों का मजदूरों और किसानों को एकजुट करना। संविधान सभा स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वालों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का साधन मानी जा रही थी।
5. पहले के संवैधानिक प्रयोग। जैसे-जैसे प्रतिनिधित्व की माँग बढ़ी, अंग्रेज़ों को चरणबद्ध ढंग से संवैधानिक सुधार करने पड़े: प्रांतीय सरकारों में भारतीयों की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कई कानून (1909, 1919 और 1935) पारित किए गए; 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के अंतर्गत प्रांतीय कार्यपालिका लगभग पूरी तरह विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनी, और 1937 के चुनावों में 11 में से 8 प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी। परंतु इन कानूनों को औपनिवेशिक सरकार ने लागू किया था, भारतीयों ने इन पर बहस नहीं की थी, और 1935 में भी मताधिकार वयस्क आबादी के 10-15 प्रतिशत हिस्से तक ही सीमित था; इसलिए स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य की कल्पना निरंतरता के साथ-साथ एक नई शुरुआत भी थी।
6. सांप्रदायिक आशंकाएँ। पृथक निर्वाचिकाओं की बहस, भाषा-विवाद और केंद्र-राज्य शक्ति-विभाजन तीनों पर सांप्रदायिक हिंसा की छाया स्पष्ट दिखती है।
निष्कर्ष। इस तरह संविधान न किसी एक विचारधारा की उपज था, न किसी एक देश की नक़ल, बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत, तात्कालिक राजनीतिक संकट और वैश्विक बौद्धिक इतिहास के संगम से गढ़ा गया दस्तावेज़ था।
6 दमित समूहों की सुरक्षा पर विभिन्न दावे
प्र. दमित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1. धार्मिक अल्पसंख्यक: पृथक निर्वाचिका की माँग और उसकी अस्वीकृति। बी. पोकर बहादुर ने तर्क दिया कि शासन में मुसलमानों की सार्थक हिस्सेदारी के लिए पृथक निर्वाचिका के अलावा और कोई रास्ता नहीं। पटेल और पंत ने इसका ज़ोरदार विरोध किया: पटेल ने कहा कि अंग्रेज़ जाते-जाते ‘शरारत का बीज’ बो गए हैं, और पंत ने इसे अल्पसंख्यकों के लिए आत्मघाती बताया; बेगम एजाज़ रसूल जैसी मुस्लिम सदस्य भी सहमत थीं। परिणाम: पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था नहीं अपनाई गई।
2. आदिवासी: आरक्षित सीटों की माँग। जयपाल सिंह पृथक निर्वाचिका के हक में नहीं थे, लेकिन उन्हें लगता था कि विधायिका में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व के लिए सीटों का आरक्षण ज़रूरी है; उनके अनुसार आदिवासियों को उनके जंगलों और चारागाहों से बेदखल किया गया और शेष समाज उन्हें हिकारत की नज़र से देखता है, इसलिए उन्हें संरक्षण चाहिए।
3. दलित वर्ग: सामाजिक बनाम राजनीतिक सुरक्षा। अम्बेडकर की पुरानी पृथक निर्वाचिका की माँग विभाजन के बाद छोड़ी गई; कुछ सदस्यों का आग्रह था कि अस्पृश्यों की समस्या केवल संरक्षण से हल नहीं होगी, क्योंकि उसके पीछे जाति-विभाजित समाज के कायदे-कानून हैं; जे. नागप्पा और के.जे. खाण्डेलकर ने यही बात उठाई। सभा ने सुझाव दिया कि अस्पृश्यता का उन्मूलन हो, हिंदू मंदिर सभी जातियों के लिए खुलें, और निचली जातियों को विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिले।
4. आर्थिक रूप से वंचित: रंगा की पुनर्परिभाषा। एन.जी. रंगा ने तर्क दिया कि क़ानूनी अधिकार अकेले पर्याप्त नहीं, आर्थिक ‘सहारे’ और ‘सीढ़ी’ के बिना; उनके लिए असली अल्पसंख्यक धर्म से नहीं, ग़रीबी और अशिक्षा से परिभाषित होते थे।
5. स्त्रियाँ: समानता, विशेषाधिकार नहीं। बम्बई की हंसा मेहता ने महिलाओं के लिए न्याय की माँग की, आरक्षित सीटों या पृथक चुनाव क्षेत्र की नहीं: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, और वह बराबरी जिसके बिना पारस्परिक आदर और समझ नहीं बन सकते।
निष्कर्ष। इस तरह ‘सुरक्षा’ की माँग हर समूह के लिए भिन्न रूप लेती थी, राजनीतिक पृथक्करण से लेकर आरक्षित सीटों और सामाजिक सुधार तक, और सभा ने अंततः लगभग हर मामले में पृथक्करण के बजाय समावेशन का रास्ता चुना।
7 राजनीतिक परिस्थिति और मज़बूत केंद्र की ज़रूरत
प्र. संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मज़बूत केंद्र सरकार की ज़रूरत के बीच क्या संबंध देखा?
उत्तर:
1. विभाजन एक हकीकत। संविधान सभा के अध्यक्ष को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा: ‘अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है… एक दुर्बल केंद्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी क्योंकि ऐसा केंद्र शांति स्थापित करने में, आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज़ उठाने में सक्षम नहीं होगा।’
2. अम्बेडकर का सीधा तर्क। अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे ‘एक शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र’ चाहते हैं, ‘1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केंद्र बनाया था उससे भी ज़्यादा शक्तिशाली केंद्र’।
3. आर्थिक और सुरक्षा तर्क। सड़कों पर हो रही सांप्रदायिक हिंसा का हवाला देते हुए बहुत सारे सदस्यों ने कहा कि केंद्र की शक्तियाँ बढ़नी चाहिए ताकि वह हिंसा रोक सके। गोपालस्वामी आयंगर ने ज़ोर दिया कि ‘केंद्र ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत होना चाहिए’, और बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि शक्तिशाली केंद्र देश के हित में योजना बना सकेगा, आर्थिक संसाधन जुटा सकेगा, उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सकेगा और देश को विदेशी आक्रमण से बचा सकेगा।
4. प्रांतीय स्वायत्तता की प्रतिबद्धता का उलटना। विभाजन से पहले कांग्रेस ने प्रांतों को काफ़ी स्वायत्तता देने पर सहमति दी थी, कुछ हद तक मुस्लिम लीग को यह भरोसा दिलाने के लिए कि लीग-शासित प्रांतों में दखलअंदाज़ी नहीं होगी; बँटवारे के बाद विकेंद्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे राजनीतिक दबाव नहीं बचे, और ज़्यादातर राष्ट्रवादियों की राय बदल गई।
5. विरोधी आवाज़, पर अल्पमत में। के. सन्तनम ने चेतावनी दी कि अत्यधिक केंद्रीकरण राज्यों को कमज़ोर करेगा और विद्रोह तक ले जा सकता है, पर बहुमत ने सुरक्षा-चिंता को प्राथमिकता दी।
निष्कर्ष। इस तरह विभाजन-पश्चात हिंसा और अनिश्चितता की तात्कालिक राजनीतिक परिस्थिति ने सीधे तौर पर संविधान को केंद्र की ओर झुकाया, तीन-सूची व्यवस्था, अनुच्छेद 356 और वित्तीय केंद्रीकरण के माध्यम से।
8 भाषा-विवाद का समाधान
प्र. संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला?
उत्तर:
1. प्रारंभिक स्थिति। कांग्रेस ने 1930 के दशक से हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया था, गाँधीजी की एक समावेशी, हिंदी-उर्दू मिश्रित कल्पना के अनुरूप।
2. धुलेकर की आक्रामक माँग। सभा के आरंभिक सत्रों में आर.वी. धुलेकर ने माँग की कि जो हिंदुस्तानी नहीं जानते वे सभा में बने रहने योग्य नहीं; नेहरू को व्यवस्था बहाल करने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा।
3. दक्षिण की आपत्ति। मद्रास की जी. दुर्गाबाई ने कहा कि ग़ैर-हिंदी भाषी इलाकों के लोगों को यह अहसास कराया जा रहा है कि यह झगड़ा ‘इस राष्ट्र की साझा संस्कृति पर भारत की अन्य शक्तिशाली भाषाओं के स्वाभाविक प्रभाव को रोकने की लड़ाई है’; शंकरराव देव और टी.ए. रामलिंगम चेट्टियार ने भी संयम की सलाह दी।
4. भाषा समिति का समझौता-सूत्र। भाषा समिति ने सुझाव दिया कि देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी भारत की राजकीय भाषा होगी; हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ना था: पहले 15 साल तक सरकारी कामों में अंग्रेज़ी जारी रहेगी, और प्रत्येक प्रांत अपने कामों के लिए कोई एक क्षेत्रीय भाषा चुन सकेगा। हिंदी को राष्ट्रभाषा के बजाय राजभाषा कहकर समिति ने विभिन्न पक्षों की भावनाओं को शांत करने का प्रयास किया।
5. मिश्रित प्रतिक्रिया। 13 सितंबर 1949 को धुलेकर चाहते थे कि हिंदी को राजभाषा नहीं बल्कि राष्ट्रभाषा घोषित किया जाए, फिर भी उन्होंने कहा कि यह हिंदी को दी गई रियायत नहीं, ‘एक ऐतिहासिक प्रक्रिया की परिणति है’, यह दिखाते हुए कि यह किसी भी पक्ष को पूरी तरह संतुष्ट करने वाला समाधान नहीं था, बल्कि एक व्यावहारिक बीच का रास्ता था।
निष्कर्ष। इस तरह गाँधीजी की व्यापक हिंदुस्तानी की कल्पना अंततः एक संकरी हिंदी-राजभाषा और अंग्रेज़ी की 15-वर्षीय निरंतरता में बदल गई, और प्रत्येक प्रांत को अपने कामों के लिए एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार मिला।
9 मानचित्र कार्य
प्र. वर्तमान भारत के राजनीतिक मानचित्र पर यह दिखाइए कि प्रत्येक राज्य में कौन-कौन सी भाषाएँ बोली जाती हैं। इन राज्यों की राजभाषा को चिह्नित कीजिए। इस मानचित्र की तुलना 1950 के दशक के प्रारंभ के मानचित्र से कीजिए। दोनों मानचित्रों में आप क्या अंतर पाते हैं? क्या इन अंतरों से आपको भाषा और राज्यों के आयोजन के संबंधों के बारे में कुछ पता चलता है।
यह भारत के राजनीतिक मानचित्र पर करने वाला कार्य है; नीचे इसे करने का तरीका दिया गया है।
उत्तर (तरीका):
वर्तमान मानचित्र: हर राज्य में बोली जाने वाली मुख्य भाषाएँ लिखिए और उस राज्य की राजभाषा को रेखांकित कीजिए (एटलस या राज्यों की आधिकारिक सूची की मदद लीजिए)।
1950 के दशक के प्रारंभ का मानचित्र: उस समय के भारत के मानचित्र से तुलना कीजिए और लिखिए कि किन राज्यों की सीमाएँ और नाम बदले हैं।
निष्कर्ष: इन बदलावों को अध्याय की भाषा-बहस से जोड़िए: संविधान सभा में भाषा के मुद्दे पर कई महीनों तक बहस हुई; भाषा समिति ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को राजभाषा बनाने, पहले 15 साल तक अंग्रेज़ी जारी रखने और प्रत्येक प्रांत को अपने कामों के लिए एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार देने का सुझाव दिया। फिर चर्चा कीजिए कि क्या बाद का मानचित्र दिखाता है कि राज्य लोगों की बोली जाने वाली भाषाओं के आधार पर अधिक संगठित हुए।
10 परियोजना कार्य (कोई एक)
प्र. हाल के वर्षों के किसी एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक परिवर्तन को चुनिए। पता लगाइए कि यह परिवर्तन क्यों हुआ, परिवर्तन के पीछे कौन-कौन से तर्क दिए गए और परिवर्तन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी? अगर संभव हो, तो संविधान सभा की चर्चाओं को देखने की कोशिश कीजिए। यह पता लगाइए कि मुद्दे पर उस वक्त कैसे चर्चा की गई। अपनी खोज पर संक्षिप्त रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर (इस परियोजना का तरीका):
हाल का कोई एक संशोधन चुनिए और तीन बातें इकट्ठी कीजिए: यह क्यों किया गया, इसके पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क दिए गए, और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी।
संविधान सभा तक लौटिए: यदि मुद्दा इस अध्याय के किसी विषय (अल्पसंख्यकों के अधिकार, आरक्षण, केंद्र-राज्य शक्तियाँ, भाषा) से जुड़ा है, तो देखिए कि संविधान सभा की बहसों में सदस्यों ने उस पर क्या तर्क दिए, जैसे अध्याय पृथक निर्वाचिका, शक्तिशाली केंद्र और भाषा के प्रश्न पर करता है।
रिपोर्ट लिखिए, यह बताते हुए कि हाल का परिवर्तन संविधान सभा में लिए गए रुख़ को कहाँ आगे बढ़ाता है और कहाँ उससे अलग जाता है।
प्र. भारतीय संविधान की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका अथवा फ्रांस अथवा दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से कीजिए। ऐसा करते हुए निम्नलिखित में से किन्हीं दो विषयों पर गौर कीजिए: धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकार और केंद्र एवं राज्यों के बीच संबंध। यह पता लगाइए कि इन संविधानों में अंतर और समानताएँ किस तरह से उनके क्षेत्रों के इतिहासों से जुड़ी हुई हैं।
उत्तर (इस परियोजना का तरीका):
एक देश और दो विषय चुनिए और दोनों संविधानों के संबंधित हिस्से पढ़िए।
भारतीय पक्ष के लिए अध्याय का प्रयोग कीजिए: भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य व धर्म के बीच पूर्ण विच्छेद नहीं, बल्कि एक विवेकपूर्ण फासला बनाने की कोशिश की गई (अनुच्छेद 25-28, 29, 30, 14, 16, 17); पृथक निर्वाचिका की व्यवस्था नहीं अपनाई गई, निचली जातियों के लिए आरक्षण अपनाया गया; और संविधान में राज्यों की तुलना में केंद्र के अधिकारों की ओर स्पष्ट झुकाव है (तीन सूचियाँ, अनुच्छेद 356, राजकोषीय संघवाद)।
हर अंतर को इतिहास से जोड़िए: भारत के लिए अध्याय स्वयं बताता है कि विभाजन की हिंसा ने संविधान सभा को शक्तिशाली केंद्र की ओर और पृथक निर्वाचिका से दूर धकेला। आप जिस देश को चुनें, उसके इतिहास में भी ऐसे ही कारण खोजिए।
11 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न
अध्याय के भीतर स्रोतों के साथ और “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए प्रश्न, उसी क्रम में जिसमें पुस्तक उन्हें छापती है।
प्र. अध्याय 11 को एक बार फिर देखिए। अब चर्चा कीजिए कि उस समय के राजनीतिक हालात से संविधान सभा में चले बहस-मुबाहिसे पर किस तरह असर पड़ा।
उत्तर: संविधान सभा की बैठकें भारी उथल-पुथल के दौर में हुईं। अगस्त 1946 में कलकत्ता में शुरू हुई हिंसा के साथ उत्तरी और पूर्वी भारत में लगभग साल भर तक दंगे-फसाद का सिलसिला चला, देश-विभाजन की घोषणा के साथ भीषण जनसंहार हुए, करोड़ों शरणार्थी यहाँ से वहाँ जा रहे थे और देशी रियासतों की संवैधानिक स्थिति अजीब हो गई थी। पुस्तक के शब्दों में, बाहर जो कुछ चल रहा था उससे संविधान सभा की बहस भला अछूती कैसे रह सकती थी? इन हालात का बहस पर कई तरह से असर पड़ा: (i) विभाजन के कारण राष्ट्रवादी नेता पृथक निर्वाचिका के प्रस्ताव पर और भड़क गए; पटेल ने इसे ऐसा ‘विष’ कहा जो देश के विभाजन का कारण बना; (ii) दंगों और हिंसा का हवाला देकर बहुत सारे सदस्यों ने ऐसे शक्तिशाली केंद्र की माँग की जो सांप्रदायिक हिंसा को रोक सके, और कांग्रेस ने प्रांतों को काफी स्वायत्तता देने की पुरानी सहमति छोड़ दी; (iii) सांप्रदायिक टकराव के कारण भाषा धार्मिक पहचान की राजनीति से जुड़ गई थी, इसलिए भाषा पर बहस बहुत तीखी हुई; (iv) अंग्रेज़ अभी भारत में ही थे, इसलिए सोमनाथ लाहिड़ी जैसे सदस्यों को लगता था कि सभा ब्रिटिश दबाव में काम कर रही है; और (v) खंडित निष्ठाओं के भय से पंत जैसे नेताओं ने ज़ोर दिया कि हर व्यक्ति को राज्य के निष्ठावान नागरिक के साँचे में ढाला जाए।
प्र. उद्देश्य प्रस्ताव में ‘लोकतांत्रिक’ शब्द का इस्तेमाल न करने के लिए जवाहरलाल नेहरू ने क्या कारण बताया था?
उत्तर: नेहरू ने कहा कि ‘लोकतांत्रिक’ शब्द इसलिए नहीं रखा गया क्योंकि यह तो स्वाभाविक ही है कि ‘गणराज्य’ शब्द में यह शब्द पहले ही निहित होता है, और वे अनावश्यक और अनुपयोगी शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहते थे। उन्होंने माना कि यह सोचा जा सकता है कि कोई गणराज्य लोकतांत्रिक न हो, परंतु ‘हमारा पूरा इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि हम लोकतांत्रिक संस्थानों के ही पक्षधर हैं’; हमारा लक्ष्य लोकतंत्र है, ‘लोकतंत्र से कम कुछ भी नहीं’। शब्द के बजाय प्रस्ताव में लोकतंत्र की विषयवस्तु, और आर्थिक लोकतंत्र की विषयवस्तु भी, दी गई है, जो शब्द के प्रयोग से कहीं अधिक है। इस लोकतंत्र का स्वरूप कैसा होगा, यह सदन को तय करना था।
प्र. स्रोत 2 में वक्ता को ऐसा क्यों लगता है कि संविधान सभा ब्रिटिश बंदूकों के साये में काम कर रही है।
उत्तर: वक्ता, कम्युनिस्ट सदस्य सोमनाथ लाहिड़ी, के अनुसार अंग्रेज़ों की जबरदस्ती ‘इसी समय की जा रही है’। 1946-47 के जाड़ों में अंग्रेज़ अभी भारत में ही थे; नेहरू के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार वायसराय और लंदन में बैठी ब्रिटिश सरकार के निर्देशों पर ही काम कर सकती थी। ब्रिटिश योजना ने भावी संविधान को अंग्रेज़ों की संतुष्टि पर आश्रित बना दिया था, और मामूली से मामूली मतभेद के लिए भी संघीय न्यायालय, इंग्लैंड या ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली के दरवाज़े पर जाना पड़ता। ब्रिटिश सेना और उनके आर्थिक व वित्तीय शिकंजे के कारण मूल रूप से सत्ता अभी भी अंग्रेज़ों के हाथ में थी, और एटली विभाजन की धमकी भी दे चुके थे। इसलिए लाहिड़ी को लगता था कि संविधान सभा अंग्रेज़ों की बनाई हुई है और अंग्रेज़ों की योजना को उन्हीं की इच्छा के अनुसार साकार करने का काम कर रही है। उन्होंने सुझाव दिया कि यहाँ और अभी स्वतंत्रता की घोषणा की जाए।
प्र. जवाहरलाल नेहरू ने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ पर अपने भाषण में कौन से विचार पेश किए?
उत्तर: 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव पेश करते हुए नेहरू ने: (i) भारत को एक ‘स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य’ घोषित किया, जो अपने नागरिकों को न्याय, समानता और स्वतंत्रता का आश्वासन देगा, और जिसमें अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों, दमित व अन्य पिछड़े वर्गों के लिए ‘पर्याप्त सुरक्षात्मक प्रावधान’ होंगे; (ii) अमेरिकी और फ्रांसीसी क्रांति तथा रूसी क्रांति का हवाला देकर भारत के संविधान निर्माण को मुक्ति व स्वतंत्रता के लंबे ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा बताया, जिनकी सफलताओं से सीखना और विफलताओं से बचना था; (iii) कहा कि ‘हम सिर्फ़ नकल करने वाले नहीं हैं’, शासन की व्यवस्था ‘हमारे लोगों के स्वभाव के अनुरूप और उनको स्वीकार्य’ होनी चाहिए; (iv) कहा कि हमारा लक्ष्य लोकतंत्र है, ‘लोकतंत्र से कम कुछ भी नहीं’, और प्रस्ताव में लोकतंत्र तथा आर्थिक लोकतंत्र की विषयवस्तु दी गई है, जबकि उसका स्वरूप सदन तय करेगा; (v) स्वयं को समाजवाद का समर्थक बताया; और (vi) कहा कि सभा की ताकत जनता से आती है और उसे ‘जनता के दिलों में समायी आकांक्षाओं और भावनाओं’ को पूरा करना है। सार यह कि लोकतंत्र के उदारवादी विचारों और आर्थिक न्याय के समाजवादी विचारों का एक-दूसरे में समावेश करके भारतीय संदर्भ में उनकी रचनात्मक व्याख्या की जानी थी।
प्र. स्रोत 3 और 4 को पढ़िए। पृथक निर्वाचिकाओं के विरोध में कौन-कौन से तर्क दिए गए हैं?
उत्तर: सरदार पटेल (स्रोत 3): पृथक निर्वाचिका के आंदोलन के कारण ही अब हम एक विभाजित राष्ट्र हैं; एक भी ऐसा स्वतंत्र देश नहीं जहाँ पृथक निर्वाचिका हो; विभाजन के बाद भी यह व्यवस्था बनाए रखी गई तो ‘यहाँ जीने का कोई मतलब नहीं होगा’; अंग्रेज़ों ने यह व्यवस्था अपने शासन की सुविधा के लिए की थी, और ‘अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो गए हैं’, जिसे हमें और नहीं बढ़ाना; इसे छोड़ने में अल्पसंख्यकों का भी भला है। गोविंद वल्लभ पंत (स्रोत 4): पृथक निर्वाचिका अल्पसंख्यकों के लिए ‘आत्मघाती’ साबित होगी और उन्हें बहुत भारी नुकसान पहुँचाएगी; हमेशा के लिए अलग-थलग कर दिए जाने पर वे कभी खुद को बहुसंख्यकों में रूपांतरित नहीं कर पाएँगे और निराशा का भाव उन्हें अपंग बना देगा; वे कभी एक महान राष्ट्र का अभिन्न अंग बनकर उसकी नियति निर्धारित नहीं कर पाएँगे; हवाबंद कमरे में अलग रखे जाने पर उन्हें हवा के लिए भी औरों पर निर्भर रहना पड़ेगा; और पृथक निर्वाचिकाओं से जीतकर आने वाले अल्पसंख्यक कभी प्रभावी योगदान नहीं दे पाएँगे।
प्र. जी.बी. पंत निष्ठावान नागरिकों के अभिलक्षणों को कैसे परिभाषित करते हैं?
उत्तर: पंत के अनुसार निष्ठावान नागरिक (i) आत्मानुशासन की कला का प्रशिक्षण लेता है; (ii) अपने लिए कम तथा औरों के लिए ज़्यादा फिक्र करता है; (iii) उसकी निष्ठा खंडित नहीं होती, सारी निष्ठाएँ केवल राज्य पर केंद्रित होती हैं; और (iv) वह प्रतिस्पर्धी निष्ठाएँ नहीं रखता, न ही अपने अपव्यय पर अंकुश लगाने की बजाय बृहत्तर हितों की उपेक्षा करता है, क्योंकि ऐसा हो तो ‘ऐसे लोकतंत्र का डूबना निश्चित है’। उन्होंने यह भी कहा कि हमें समुदाय के रूप में नहीं, नागरिक के रूप में सोचना चाहिए, क्योंकि ‘महत्त्व केवल नागरिक का होता है’।
प्र. रंगा द्वारा ‘अल्पसंख्यक’ की अवधारणा को किस तरह परिभाषित किया गया है?
उत्तर: एन.जी. रंगा ने ‘अल्पसंख्यक’ शब्द की व्याख्या आर्थिक स्तर पर की। उनकी नज़र में असली अल्पसंख्यक तथाकथित पाकिस्तानी प्रांतों में रहने वाले हिंदू, सिख या मुसलमान नहीं, बल्कि ‘इस देश की जनता’ थी: गरीब और दबे-कुचले लोग, जो इतने उत्पीड़ित हैं कि साधारण नागरिक के अधिकारों का लाभ भी नहीं उठा पा रहे। इनमें वे आदिवासी हैं जिनकी ज़मीन व्यापारी छीन लेते हैं और उन्हें बंधनों में जकड़कर गुलाम बना लेते हैं, और वे गाँव वाले हैं जिनका शोषण सूदखोर, ज़मींदार और मालगुजार करते हैं, और जिनमें मूलभूत शिक्षा तक नहीं है। इन असली अल्पसंख्यकों को सुरक्षा चाहिए, ‘सहारे’ और ‘एक सीढ़ी’ चाहिए, और इसके लिए ‘केवल इस प्रस्ताव से काम चलने वाला नहीं है’।
प्र. आदिवासियों के लिए सुरक्षात्मक उपायों की माँग करते हुए जयपाल सिंह कौन-कौन से तर्क देते हैं?
उत्तर: (i) उनके लोगों को ‘पिछले 6,000 साल से अपमानित किया जा रहा है, उपेक्षित किया जा रहा है’; उनके समाज का पूरा इतिहास भारत के गैर-मूल निवासियों के हाथों लगातार शोषण और छीनाझपटी का इतिहास रहा है। (ii) आदिवासी कबीले संख्या की दृष्टि से अल्पसंख्यक नहीं हैं, लेकिन उन्हें संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि उन्हें वहाँ से बेदखल कर दिया गया जहाँ वे रहते थे, उनके जंगलों और चारागाहों से वंचित कर दिया गया और नए घरों की तलाश में भागने को मजबूर किया गया। (iii) उन्हें आदिम और पिछड़ा मानते हुए शेष समाज उन्हें हिकारत की नज़र से देखता है, इसलिए आदिवासियों और शेष समाज के बीच का भावनात्मक और भौतिक फासला खत्म होना चाहिए: ‘आपको हमारे साथ घुलना-मिलना चाहिए। हम आपके साथ मेलजोल चाहते हैं।’ (iv) वे पृथक निर्वाचिका के हक में नहीं थे, लेकिन विधायिका में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व के लिए सीटों के आरक्षण को ज़रूरी मानते थे, ताकि औरों को आदिवासियों की आवाज़ सुनने और उनके पास आने के लिए मजबूर किया जा सके। उन्होंने नेहरू के इस वचन पर विश्वास जताया कि स्वतंत्र भारत में सबके पास अवसरों की समानता होगी।
प्र. एक शक्तिशाली केंद्र सरकार की हिमायत में क्या दलीलें दी जा रही थीं?
उत्तर: (i) नेहरू ने संविधान सभा के अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा कि अब जबकि विभाजन एक हकीकत बन चुका है, एक दुर्बल केंद्रीय शासन देश के लिए हानिकारक होगा, क्योंकि ऐसा केंद्र शांति स्थापित करने में, आम सरोकारों के बीच समन्वय स्थापित करने में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरे देश के लिए आवाज़ उठाने में सक्षम नहीं होगा। (ii) अम्बेडकर ‘एक शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र’ चाहते थे, ‘1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केंद्र बनाया था उससे भी ज़्यादा शक्तिशाली केंद्र’। (iii) देश को टुकड़े-टुकड़े कर रही हिंसा का हवाला देते हुए बहुत सारे सदस्यों ने कहा कि केंद्र की शक्तियों में भारी इज़ाफा होना चाहिए ताकि वह सांप्रदायिक हिंसा को रोक सके; गोपालस्वामी आयंगर ने कहा कि ‘केंद्र ज़्यादा से ज़्यादा मजबूत होना चाहिए।’ (iv) संयुक्त प्रांत के बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि शक्तिशाली केंद्र ही देश के हित में योजना बना सकता है, उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को जुटा सकता है, उचित शासन व्यवस्था स्थापित कर सकता है और देश को विदेशी आक्रमण से बचा सकता है। (v) विभाजन के बाद विकेंद्रीकृत संरचना के लिए पहले जैसे राजनीतिक दबाव (मुस्लिम लीग को भरोसा दिलाना) नहीं बचे थे; औपनिवेशिक शासन द्वारा थोपी गई एकल व्यवस्था पहले से मौजूद थी; और केंद्रीयतावाद अब अफरा-तफरी पर अंकुश लगाने तथा देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए ज़रूरी माना जाने लगा।