इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. चैत्य किसे कहते थे?
उत्तर: कुछ पवित्र स्थान, वृक्ष, चट्टानें या प्राकृतिक सुंदरता वाले स्थल, जो संभवतः ‘चिता’ (दाह-संस्कार स्थल) से संबंधित शब्द से चैत्य कहलाते थे।
प्र. निब्बान का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर: निब्बान का शाब्दिक अर्थ है अहंकार और इच्छा का बुझना।
प्र. संतचरित्र क्या है?
उत्तर: किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी, जो हमेशा शब्दशः सटीक न भी हो, पर यह बताती है कि उस परंपरा के अनुयायी क्या मानते थे।
प्र. शालभंजिका किसे कहा जाता है?
उत्तर: वह स्त्री जिसके स्पर्श से लोकप्रिय विश्वास के अनुसार वृक्ष फूलते-फलते थे, एक शुभ, बौद्ध-पूर्व प्रतीक जो स्तूप की सजावट में समाहित हो गया।
प्र. महायान और हीनयान का शाब्दिक अर्थ लिखिए।
उत्तर: महायान का अर्थ है ‘महान वाहन’ और हीनयान का अर्थ है ‘छोटा वाहन’।
प्र. अध्याय के अनुसार उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों ने अपरिचित भारतीय मूर्तियों को समझने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया?
उत्तर: उन्होंने इनकी तुलना अपनी परिचित प्राचीन यूनानी कला परंपरा से की, यानी ‘परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना’ तैयार किया; इसीलिए यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित उत्तर-पश्चिम की बुद्ध और बोधिसत्त मूर्तियों को उन्होंने भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. त्रिपिटक के तीन भागों के नाम लिखिए और बताइए कि प्रत्येक में क्या है।
उत्तर: विनय पिटक (मठवासी नियम), सुत्त पिटक (बुद्ध की शिक्षाएँ), और अभिधम्म पिटक (दर्शनशास्त्र)।
प्र. अनिच्च और अनत्त में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: अनिच्च का अर्थ है संसार क्षणभंगुर और सतत परिवर्तनशील है; अनत्त का अर्थ है संसार आत्मा-रहित है, जिसमें कुछ भी स्थायी नहीं।
प्र. जैन धर्म के पाँच व्रत लिखिए।
उत्तर: हत्या, चोरी और झूठ से दूर रहना; ब्रह्मचर्य का पालन करना; और संपत्ति रखने से दूर रहना।
प्र. एक परिपक्व स्तूप की संरचना के भाग लिखिए।
उत्तर: अंड (अवशेष रखने वाला अर्धगोलाकार भाग), हर्मिका, यष्टि (छत्री सहित), और चारों ओर की रेलिंग।
प्र. महाप्रजापति गोतमी कौन थीं, और उनका क्या महत्व था?
उत्तर: बुद्ध की पालक माँ, जो आनंद की मध्यस्थता से संघ में स्त्रियों के प्रवेश के बाद पहली नियुक्त भिक्खुनी बनीं।
प्र. फा-शिएन और श्वैन त्सांग कौन थे, और उनका योगदान क्या था?
उत्तर: चीनी बौद्ध यात्री, जो भारत आए और बौद्ध ग्रंथ चीन ले गए, जिससे बौद्ध साहित्य चीन में संरक्षित व प्रसारित हुआ।
3 3 अंक के प्रश्न
प्र. स्त्री-पुरुष संघ में क्यों शामिल हुए होंगे, आपके अनुसार कारण बताइए।
उत्तर: संघ में सामाजिक भेद मिट जाते थे, राजा और धनी गृहपति श्रमिकों, दासों व शिल्पियों के साथ बराबरी से रहते थे; जन्म के बजाय आचरण को महत्व, कमज़ोरों के प्रति मेत्ता-करुणा, और तेज़ी से बदलते सामाजिक ढाँचे से अस्थिर-असंतुष्ट लोगों के लिए यह आकर्षक था।
प्र. पुन्ना और ब्राह्मण के संवाद (थेरीगाथा) से बौद्ध दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर: पुन्ना एक दासी थी, जिसने ठंड में स्नान-अनुष्ठान कर रहे एक ब्राह्मण से पूछा कि यदि स्नान से पाप धुल जाता तो मेंढक, कछुए और जल-सर्प भी स्वर्ग चले जाते। उसका तर्क शुद्ध बौद्ध तर्क है: किसी कर्म को उसकी नैतिक विषय-वस्तु से आँकना चाहिए, शरीर पर किए किसी अनुष्ठान से नहीं।
प्र. विनय पिटक के किन्हीं तीन नियमों का वर्णन कीजिए, और बताइए कि वे वास्तव में क्या करते थे।
उत्तर: एक नया ऊनी कंबल दूसरा बनाए जाने से पहले कम से कम छह वर्ष रखा जाना चाहिए; घर जाने वाला भिक्खु केवल दो-तीन कटोरे भोजन बाँटने के लिए स्वीकार कर सकता था; संघ-आवास से लिया बिस्तर प्रस्थान से पहले वापस रखना होता था। ये नियम व्यक्तिगत संचय को रोकते और सामूहिक, न कि व्यक्तिगत, स्वामित्व लागू करते थे।
प्र. एच.एच. कोल का तर्क क्या था, और वह साँची में सफल पर अमरावती में विफल क्यों हुआ?
उत्तर: कोल का तर्क था कि प्राचीन कला की मूल कृतियाँ देश से लूटने देना एक आत्मघाती और अक्षम्य नीति है; संग्रहालयों को प्लास्टर-कास्ट रखना चाहिए, मूल कृति मूल स्थल पर ही रहनी चाहिए। कोल अमरावती के मामले में अधिकारियों को राज़ी नहीं कर पाए, पर खोज की जगह पर ही संरक्षण की उनकी बात साँची के लिए मान ली गई। पाठ्यपुस्तक के अनुसार शायद अमरावती की खोज (1796) थोड़ी पहले हो गई थी, जब तक विद्वान खोज की जगह पर ही संरक्षण का महत्त्व नहीं समझ पाए थे।
प्र. शालभंजिका और सर्प जैसे प्रतीक बौद्ध स्मारकों में क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर: ये बौद्ध सिद्धांत से नहीं, बल्कि लोकप्रिय, बौद्ध-पूर्व विश्वासों से आए शुभ प्रतीक हैं, जो सिद्ध करते हैं कि हर नक़्क़ाशी बौद्ध सिद्धांत नहीं है; ये स्तूप की सजावट में सैद्धांतिक प्रतीकों (ख़ाली आसन, चक्र) के साथ-साथ समाहित हो गए।
प्र. बुद्ध और बोधिसत्त को आरंभिक शिल्पियों ने किन प्रतीकों से दर्शाया, और प्रत्येक किस घटना के लिए खड़ा है?
उत्तर: ध्यान के लिए एक ख़ाली आसन, महापरिनिब्बान के लिए एक स्तूप, और सारनाथ में प्रथम उपदेश के लिए एक चक्र। प्रत्येक प्रतीक बुद्ध के जीवन की किसी विशिष्ट घटना के लिए खड़ा है, शाब्दिक वस्तु के लिए नहीं।
4 4 अंक के प्रश्न
प्र. उपनिषद चिंतकों के विचार आजीविकों (नियतिवादियों) और लोकायतों (भौतिकवादियों) से किस प्रकार भिन्न थे?
उत्तर: उपनिषद चिंतक जीवन के अर्थ, परलोक और क्या पुनर्जन्म पिछले कर्मों का परिणाम है, इस पर गहराई से खोजी चिंतन करते थे। आजीविक (मक्खलि गोसाल) मानते थे कि सुख-दुख निश्चित हैं, इन्हें सद्गुण या तप से नहीं बदला जा सकता, नियति सबका मार्ग तय करती है। लोकायत (अजीत केसकंबलिन्) मानते थे कि न कोई दान है, न यज्ञ, न यह लोक न परलोक; व्यक्ति केवल चार तत्वों से बना है जो मृत्यु पर बिखर जाते हैं। इस तरह तीनों बिल्कुल अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुँचे: उपनिषद चिंतक वैदिक परंपरा के भीतर रहकर यज्ञ की नयी व्याख्या करते थे (स्रोत 2 में बहती पवन को ही सच्चा यज्ञ कहा गया है), आजीविक सब कुछ पूर्व निर्धारित मानते थे, और लोकायत मृत्यु के बाद किसी भी अस्तित्व को नकारते थे।
प्र. जैन धर्म की केंद्रीय शिक्षाओं का सार दीजिए।
उत्तर: जैन धर्म मानता है कि पूरा संसार सजीव है, पत्थरों-चट्टानों-पानी में भी जीवन है, इसलिए अहिंसा केंद्रीय है, जिसने भारतीय चिंतन को व्यापक रूप से आकार दिया है। जन्म और पुनर्जन्म कर्म से निर्धारित होते हैं; केवल तपस्या और संयम, जो संसार त्यागकर प्राप्त होते हैं, व्यक्ति को इससे मुक्त कर सकते हैं, इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना अनिवार्य नियम बन गया। भिक्षु-भिक्षुणियाँ पाँच व्रत लेते थे: हत्या, चोरी और झूठ से दूर रहना, ब्रह्मचर्य का पालन, और संपत्ति रखने से दूर रहना। वर्धमान (महावीर) से पहले जैन परंपरा 23 तीर्थंकर मानती है, और जैन धर्म प्राकृत-संस्कृत-तमिल साहित्य के माध्यम से पूरे भारत में फैला।
5 5 अंक के प्रश्न
प्र. साँची की मूर्तिकला समझने में बौद्ध साहित्य का ज्ञान किस हद तक सहायक है?
उत्तर: साँची की नक़्क़ाशी एक चारणचित्र की तरह काम करती है; बिना ग्रंथ पढ़े ग्रामीण लगने वाला एक दृश्य वेसान्तर जातक निकला। शिल्पियों ने बुद्ध को ख़ाली आसन, स्तूप, चक्र जैसे प्रतीकों से दर्शाया, जिन्हें बिना बौद्ध साहित्य जाने पढ़ना असंभव है; ज्ञान-प्राप्ति स्थल का वृक्ष एक विशिष्ट घटना के लिए खड़ा है, ‘एक वृक्ष’ के लिए नहीं। पर कुछ नक़्क़ाशी (शालभंजिका, सर्प) बौद्ध-पूर्व लोक-विश्वासों से आई हैं, जिन्हें बौद्ध ग्रंथ अकेले नहीं समझा सकते। जेम्स फर्गुसन का उदाहरण दिखाता है कि ग्रंथ के बिना पढ़ना ग़लत निष्कर्ष (सर्प-पूजा केंद्र) तक ले जा सकता है। इसलिए साहित्य बहुत सहायक है, पर पर्याप्त नहीं, चित्र और ग्रंथ दोनों का मेल ज़रूरी है, और महाबलीपुरम जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि यह मेल भी हमेशा एक ही उत्तर नहीं देता।
प्र. वैष्णव और शैव धर्म के उदय से जुड़ी मूर्तिकला और स्थापत्य के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर: मुक्तिदाता का विचार बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं था; वैष्णव धर्म (विष्णु) और शैव धर्म (शिव) साथ-साथ बढ़े, दोनों भक्ति पर केंद्रित। वैष्णव धर्म ने दस अवतारों के इर्द-गिर्द पंथ विकसित किए; शिव को अधिकतर लिंग से प्रतीकित किया जाता था, कभी-कभार मानव रूप में। ऐसी मूर्तिकला पढ़ने के लिए मुकुट, आभूषण और आयुधों की कथाएँ जानना ज़रूरी है। ये कथाएँ पुराणों में बचीं, जो सरल संस्कृत में सबको सुनाने के लिए रचे गए; वासुदेव-कृष्ण जैसे स्थानीय देवता इस तरह व्यापक पंथों में समाहित हुए। साथ ही पहले मंदिर बनने लगे: सबसे पुराना एक छोटा वर्गाकार गर्भगृह था, बाद में ऊँचा शिखर जुड़ा और दीवारों पर मूर्तिकला उकेरी गई; कुछ मंदिर सीधे चट्टान से गुफ़ा के रूप में तराशे गए, जो एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर में अपने शिखर पर पहुँचे।
प्र. स्तूप कैसे और क्यों बनाए गए, इसकी चर्चा कीजिए।
उत्तर: स्तूप बुद्ध के अवशेष या उनके प्रयोग की वस्तुएँ दफ़नाने के लिए टीलों के रूप में बनाए गए; महापरिनिब्बान सुत्त के अनुसार बुद्ध ने मृत्यु-शय्या पर आनंद से कहा कि चार चौराहों पर स्तूप बनाए जाएँ। अशोकावदान के अनुसार अशोक ने अवशेष हर महत्वपूर्ण नगर में बाँटे। दूसरी शताब्दी ई.पू. तक भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप खड़े थे। ये राजाओं (सातवाहन), श्रेणियों (हाथीदाँत कारीगर) और सैकड़ों सामान्य स्त्री-पुरुषों के दान से बने, जिनके नाम रेलिंगों-स्तंभों के अभिलेखों में दर्ज हैं। एक परिपक्व स्तूप में अंड, हर्मिका, यष्टि-छत्री और चारों ओर रेलिंग होती थी; पूजक पूर्वी द्वार से प्रवेश कर दक्षिणावर्त परिक्रमा करते, सूर्य-पथ की नक़ल करते हुए।
प्र. अमरावती और साँची के स्तूपों के भाग्य की तुलना कीजिए, और बताइए कि यह औपनिवेशिक भारत में पुरातात्विक संरक्षण के इतिहास के बारे में क्या प्रकट करता है।
उत्तर: अमरावती 1796 में एक स्थानीय राजा को मिला जो पत्थर खोदने लगा; कॉलिन मेकेंज़ी की रिपोर्ट अप्रकाशित रही; 1854 में वाल्टर इलियट ने पट्टिकाएँ एकत्र कीं (एलियट संगमरमर); शिलाएँ कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक बिखर गईं; एच.एच. कोल के विरोध के बावजूद आज महाचैत्य एक तुच्छ छोटा टीला मात्र है। साँची 1818 में खोजा गया, चार में से तीन प्रवेश-द्वार खड़े मिले; यहाँ भी प्रवेश-द्वार बाहर ले जाने के प्रस्ताव आए, पर अंततः कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा, और खोज की जगह पर ही संरक्षण की कोल की बात साँची के लिए मान ली गई। यह दिखाता है कि किसी स्मारक का बचना केवल उसके महत्व पर नहीं, बल्कि इस पर भी निर्भर करता था कि वह कब खोजा गया: पाठ्यपुस्तक के अनुसार शायद अमरावती तब खोजा गया जब विद्वान मूल स्थान पर संरक्षण का महत्त्व नहीं समझ पाए थे।
प्र. धनवती के अभिलेख (कुषाण शासक हुविष्क के 33वें वर्ष) को पढ़िए और बताइए: उसने अपने अभिलेख की तिथि कैसे दी, उसने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की होगी, उसके नातेदार कौन थे, वह कौन-सा ग्रंथ जानती थी, और उसने इसे किससे सीखा?
उत्तर: धनवती ने अपने अभिलेख की तिथि शासक हुविष्क के शासन-वर्ष (तैंतीसवें वर्ष), मौसम (गर्म मौसम) और महीने-दिन (पहले महीने का आठवाँ दिन) से दी। उसने बोधिसत्त की मूर्ति संभवतः पुण्य अर्जित करने और अपने परिवार की भक्ति व्यक्त करने के लिए स्थापित की होगी। उसके नातेदारों में उसकी मौसी (माँ की बहन) भिक्खुनी बुद्धमिता और उसके माता-पिता शामिल थे, जिन्होंने साथ मिलकर मूर्ति स्थापित की। वह त्रिपिटक जानती थी, जो उसने अपने गुरु भिक्खु बल से सीखा, जो स्वयं त्रिपिटक के ज्ञाता थे।
6 6 अंक के प्रश्न
प्र. क्या हम अध्याय में वर्णित प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन को पूरी तरह ‘देख’ सकते हैं? चर्चा कीजिए।
उत्तर: उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वान अपरिचित (बहु-भुजी, अर्ध-पशु) आकृतियों को अपनी परिचित यूनानी मूर्तिकला से तुलना कर समझने का प्रयास करते थे; उत्तर-पश्चिम की यूनानी-प्रभावित बुद्ध-बोधिसत्त मूर्तियाँ इसीलिए उन्हें बहुमूल्य लगती थीं। अध्याय इसे ‘परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना’ तैयार करना कहता है। चित्र को ग्रंथ से मिलाना बेहतर तरीक़ा है, पर यह भी हमेशा एक उत्तर नहीं देता: महाबलीपुरम के फलक को कुछ इतिहासकार गंगावतरण मानते हैं, अन्य इसे अर्जुन के तप के रूप में पढ़ते हैं। जेम्स फर्गुसन ने अनूदित ग्रंथों के अभाव में साँची को ग़लत ढंग से सर्प-पूजा केंद्र मान लिया। अंततः, अधिकतर धार्मिक जीवन जैसे दैनिक अभ्यास, त्योहार और मौखिक विश्वास कभी किसी स्मारक या चित्र में दर्ज ही नहीं हुए; यह अध्याय जिन बचे हुए भव्य अवशेषों पर केंद्रित है, वे शाब्दिक रूप से हिमशैल का बस एक सिरा हैं। इसलिए हम बहुत कुछ पुनर्निर्मित कर सकते हैं, पर पूरी तस्वीर कभी नहीं देख सकते।
प्र. बुद्ध की शिक्षाओं और जैन धर्म के मूल संदेश की तुलना कीजिए: समानताएँ और अंतर बताइए।
उत्तर: समानताएँ: दोनों परंपराओं ने वेदों की प्रामाणिकता और यज्ञ-केंद्रित ब्राह्मणीय व्यवस्था पर सवाल उठाए, व्यक्तिगत सामर्थ्य पर बल दिया (कोई भी मुक्ति के लिए प्रयास कर सकता है, चाहे जन्म कुछ भी हो), और दोनों ने संन्यास व मठवासी संगठन (संघ) को केंद्रीय माना; महावीर और बुद्ध दोनों छठी शताब्दी ई.पू. के आसपास हुए, जब गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे। अंतर: जैन धर्म पूरे संसार को सजीव मानता है और अहिंसा को केंद्र में रखता है, कर्म के चक्र से मुक्ति त्याग और तपस्या से मिलती है; बौद्ध धर्म मध्यम मार्ग (कठोर तप और भोग के बीच संयम) सिखाता है और अनिच्च-अनत्त-दुक्ख जैसी अवधारणाओं पर बल देता है, निब्बान को लक्ष्य मानता है। जैन धर्म में महावीर से पहले 23 तीर्थंकर माने जाते हैं जबकि बौद्ध धर्म बुद्ध के व्यक्तिगत जीवन-वृत्तांत (संतचरित्र) पर अधिक केंद्रित है। बाद में बौद्ध धर्म में महायान के उदय से मूर्ति-पूजा और बोधिसत्त जैसी मुक्तिदाता अवधारणा आई, जिसका जैन धर्म में सीधा समानांतर नहीं है।
7 केस स्टडी
— गृहस्थ सिगल को दी गई सलाह, सुत्त पिटक (स्रोत 5)
(क) 2 अंक यह सलाह किस ग्रंथ से ली गई है, और यह किसे दी गई थी?
उत्तर: यह सलाह सुत्त पिटक से ली गई है; यह गृहस्थ सिगल को दी गई सलाह है।
(ख) 3 अंक इस सलाह के अनुसार स्वामी को अपने सेवकों की देखभाल किन पाँच तरीक़ों से करनी चाहिए?
उत्तर: क्षमता के अनुसार काम देकर, भोजन और मज़दूरी देकर, बीमारी में परिचर्या करके, सुस्वादु भोजन बाँटकर, और समय-समय पर छुट्टी देकर।
(ग) 3 अंक यह गद्यांश बुद्ध की सामाजिक शिक्षाओं के बारे में क्या दर्शाता है?
उत्तर: बुद्ध ने सामाजिक जगत को दैवी नहीं बल्कि मानवीय रचना माना, इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों से मानवीय-नैतिक बनने का आग्रह किया, यह अपेक्षा करते हुए कि व्यक्तिगत नैतिक आचरण स्वामी-सेवक सहित सामाजिक संबंधों को बेहतर बना सकता है।
— महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8)
(क) 2 अंक यह प्रसंग किस अवसर का वर्णन करता है?
उत्तर: बुद्ध की मृत्यु-शय्या पर आनंद द्वारा उनके अवशेषों का क्या किया जाए, यह पूछे जाने का प्रसंग।
(ख) 3 अंक बुद्ध ने आनंद के प्रश्न पर पहले क्या उत्तर दिया, और बाद में स्तूप कहाँ बनाने को कहा?
उत्तर: पहले कहा कि आनंद स्वयं अपने कल्याण पर ध्यान दे, अवशेषों की चिंता में न उलझे; बाद में पूछे जाने पर कहा कि चार महापथों के चौक पर स्तूप बनाए जाएँ।
(ग) 3 अंक इस प्रसंग से स्तूप-पूजा की उत्पत्ति के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर: यह दिखाता है कि अवशेष-पूजा और स्तूप-निर्माण की परंपरा बुद्ध की अपनी शुरुआती प्राथमिकता (आत्म-प्रयास पर बल) से थोड़ी अलग, एक बाद की व्यवस्था थी, जिसे अनुयायियों के अनुरोध पर स्वीकृति दी गई, और यही परंपरा आगे चलकर बौद्ध धर्म की सबसे बड़ी पहचान बन गई।