NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग I के अध्याय 4 ‘विचारक, विश्वास और इमारतें’ के अभ्यास के सभी प्रश्नों (100-150 शब्दों वाले पाँच प्रश्न, लगभग 500 शब्दों के चार लघु निबंध, मानचित्र कार्य और दोनों परियोजना कार्य) के पूरे आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न (चर्चा कीजिए और चित्रों के साथ दिए प्रश्न)। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।
1 उपनिषद चिंतक बनाम नियतिवादी-भौतिकवादी
प्र. क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर: हाँ, तीनों बिल्कुल अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुँचे।
1. उपनिषद चिंतक। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से आगे उपनिषदों में जीवन के अर्थ, परलोक, और क्या पुनर्जन्म पिछले कर्मों का परिणाम है, इस बारे में बढ़ती खोजी जिज्ञासा दिखती है। छांदोग्य उपनिषद में स्व (आत्मन्) की प्रकृति पर गहन चिंतन मिलता है, जो साथ ही धान के दाने से भी छोटा और सभी लोकों से बड़ा बताया गया है।
2. आजीविक (नियतिवादी)। मक्खलि गोसाल के अनुसार सुख और दुख निश्चित हैं, इन्हें सद्गुण या तप से नहीं बदला जा सकता, ‘जैसे धागे का गोला फेंक देने पर लुढ़कते-लुढ़कते अपनी पूरी लंबाई तक खुलता जाता है उसी तरह मूर्ख और विद्वान दोनों ही पूर्व निर्धारित रास्ते से होते हुए दुःखों का निदान करेंगे।’
3. लोकायत (भौतिकवादी)। अजीत केसकंबलिन् के अनुसार न कोई दान है, न यज्ञ, न यह लोक न परलोक; व्यक्ति केवल चार तत्वों से बना है, जो मृत्यु पर बिखर जाते हैं, इसलिए मृत्यु के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता।
निष्कर्ष। उपनिषद चिंतक स्व और कर्म पर खोजी चिंतन करते हैं, आजीविक नियतिवाद अपनाते हैं, और लोकायत भौतिकवाद; इसलिए तीनों के विचार स्पष्ट रूप से भिन्न थे, यद्यपि तीनों एक ही सक्रिय वाद-विवाद की दुनिया का हिस्सा थे।
2 जैन धर्म की केंद्रीय शिक्षाएँ
प्र. जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
1. सजीव संसार और अहिंसा। जैन धर्म मानता है कि पूरा संसार सजीव है, पत्थरों, चट्टानों और पानी में भी जीवन है, इसलिए जीवों को हानि न पहुँचाना, अहिंसा, केंद्रीय है, और इसने भारतीय चिंतन को व्यापक रूप से आकार दिया है।
2. कर्म और मुक्ति। जन्म और पुनर्जन्म कर्म से निर्धारित होते हैं; केवल तपस्या और संयम, जो संसार त्यागकर प्राप्त होते हैं, व्यक्ति को इससे मुक्त कर सकते हैं, इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया।
3. पाँच व्रत। जैन भिक्षु-भिक्षुणियों के पाँच व्रत हैं: हत्या से विरत रहना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन, और अपरिग्रह यानी संपत्ति का त्याग।
4. तीर्थंकर परंपरा। जैन परंपरा वर्धमान (महावीर, छठी शताब्दी ई.पू.) से पहले 23 तीर्थंकर मानती है, शाब्दिक रूप से वे जो लोगों को अस्तित्व की नदी पार कराते हैं।
5. प्रसार। जैन धर्म प्राकृत, संस्कृत और तमिल में साहित्य रचते हुए पूरे भारत में फैला, जो सदियों तक मंदिर-पुस्तकालयों में संरक्षित रहा।
3 भोपाल की बेगमों की भूमिका
प्र. साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1. शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901)। उन्होंने साँची कनखेड़ा की अपनी यात्रा का वर्णन दर्ज किया, जिसमें पत्थर की मूर्तियाँ, बुद्ध की प्रतिमाएँ और एक प्राचीन प्रवेश-द्वार का उल्लेख है, साथ ही मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम के दौरे का भी, जिन्होंने स्थल के चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े और गुंबदों में गड्ढे खोदे।
2. वित्तपोषण। शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया; सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए भी अनुदान दिया।
3. प्रकाशन को समर्पण। उन्होंने जॉन मार्शल के साँची पर खंडों के प्रकाशन का भी वित्तपोषण किया, जिन्हें मार्शल ने उन्हीं को समर्पित किया।
निष्कर्ष। साँची का बचना समझदार निर्णयों (बेगमों के संरक्षण-कार्य सहित) और अच्छे भाग्य दोनों का परिणाम था, जबकि फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्रवेश-द्वार को विदेश ले जाने की माँग पर अंततः प्लास्टर-कास्ट प्रतिकृतियों पर संतुष्ट हो गए और मूल यहीं रहा।
प्र. महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की। (क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की? (ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की? (ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं? (घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थीं? (ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?
उत्तर:
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तिथि शासक हुविष्क के शासन-वर्ष (तैंतीसवें वर्ष), मौसम (गर्म मौसम) और उसके पहले महीने के आठवें दिन से निश्चित की, न कि किसी स्वतंत्र संवत् से।
(ख) उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति संभवतः धार्मिक पुण्य अर्जित करने, अपनी और अपने परिवार की भक्ति व्यक्त करने, और स्वयं को त्रिपिटक-ज्ञाता के रूप में सार्वजनिक रूप से दर्ज कराने के लिए स्थापित की होगी।
(ग) वे अपनी मौसी (माँ की बहन) भिक्खुनी बुद्धमिता का नाम लेती हैं, और यह भी दर्ज करती हैं कि उनके माता-पिता ने उनके साथ मिलकर मूर्ति स्थापित की।
(घ) वे त्रिपिटक जानती थीं, जैसा अभिलेख में स्पष्ट लिखा है।
(ङ) उन्होंने यह ग्रंथ अपने गुरु, भिक्खु बल से सीखा, जो स्वयं त्रिपिटक के ज्ञाता थे।
5 संघ में शामिल होने के कारण
प्र. आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?
उत्तर:
1. सामाजिक बराबरी। संघ के भीतर सभी सदस्य समान माने जाते थे, अपनी पहले की सामाजिक पहचान त्यागकर; राजा और धनी गृहपति श्रमिकों, दासों और शिल्पियों के साथ बराबरी से रहते थे।
2. आचरण को महत्व। बौद्ध धर्म ने जन्म पर आचरण को महत्व दिया, और कमज़ोरों के प्रति मेत्ता (सहभाव) व करुणा पर बल दिया, जिसने अभिजात और सामान्य दोनों वर्गों को आकर्षित किया।
3. सामाजिक अस्थिरता से मुक्ति। बौद्ध धर्म तेज़ी से बढ़ा, तेज़ी से हो रहे सामाजिक परिवर्तन से अस्थिर और मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट लोगों को आकर्षित करते हुए, जैसे पुन्ना, एक दासी, जो थेरी बनीं।
4. स्त्रियों के लिए अवसर। आनंद की मध्यस्थता से स्त्रियों को भी संघ में प्रवेश मिला; महाप्रजापति गोतमी, बुद्ध की पालक माँ, पहली नियुक्त भिक्खुनी बनीं, जिससे स्त्रियों को भी धार्मिक नेतृत्व और शिक्षण (थेरी) का अवसर मिला।
6 साँची की मूर्तिकला और बौद्ध साहित्य
प्र. साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
उत्तर:
1. चारणचित्र शैली। साँची की नक़्क़ाशी एक घुमंतू कथाकार के कपड़े के स्क्रॉल, या चारणचित्र, की तरह काम करती है। पहली नज़र में ग्रामीण लगने वाला एक दृश्य कला-इतिहासकारों द्वारा वेसान्तर जातक के रूप में पहचाना गया, एक उदार राजकुमार के बारे में जिसने सब कुछ दान कर दिया; इसे पढ़ने के लिए चित्र को ग्रंथ से मिलाना ज़रूरी था।
2. प्रतीकों की भाषा। कई आरंभिक शिल्पियों ने बुद्ध को मानव रूप में दिखाने से बचा और इसके बजाय प्रतीकों का प्रयोग किया: ध्यान के लिए ख़ाली आसन, महापरिनिब्बान के लिए स्तूप, प्रथम उपदेश के लिए चक्र। बिना बौद्ध साहित्य जाने इन्हें पढ़ना असंभव है; ज्ञान-प्राप्ति स्थल का वृक्ष ‘एक वृक्ष’ नहीं बल्कि जीवन की एक विशिष्ट घटना के लिए खड़ा है।
3. सीमाएँ: लोक-परंपराएँ। हर नक़्क़ाशी बौद्ध सिद्धांत नहीं है। शालभंजिका (वृक्ष पकड़े स्त्री) एक शुभ, बौद्ध-पूर्व लोक-प्रतीक है जो स्तूप की सजावट में समाहित हो गया; इसे बौद्ध ग्रंथ अकेले नहीं समझा सकते।
4. ग़लत पठन की चेतावनी। जेम्स फर्गुसन ने अनूदित बौद्ध ग्रंथों की पहुँच के बिना साँची के सर्प-प्रतीक का अध्ययन किया और ग़लत निष्कर्ष निकाला कि साँची वृक्ष और सर्प-पूजा का केंद्र था, यह एक वास्तविक प्रतीक को ग़लत ढाँचे से पढ़ने का उदाहरण है।
5. हमेशा एक उत्तर नहीं। महाबलीपुरम के शिला-फलक को कुछ कला-इतिहासकार गंगावतरण मानते हैं तो अन्य अर्जुन के तप के रूप में पढ़ते हैं, यद्यपि दोनों पक्ष चित्र को ग्रंथ से मिलाने की विधि पर सहमत हैं।
निष्कर्ष। बौद्ध साहित्य का ज्ञान साँची की मूर्तिकला समझने में बहुत सहायक है, विशेषकर प्रतीकों और कथाओं को पहचानने में, पर यह पर्याप्त नहीं: लोक-परंपराओं और असहमति की गुंजाइश को समझने के लिए चित्र और ग्रंथ दोनों का सावधानीपूर्वक मेल ज़रूरी है।
7 साँची के दो परिदृश्य
प्र. चित्र 4.32 और 4.33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नज़र आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन से ग्रामीण और कौन से शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर:
चित्र 4.32: ग्रामीण परिदृश्य। वास्तुकला: गोल, फूस जैसी छत वाली छोटी-छोटी साधारण झोंपड़ियाँ, जिनके द्वार पर लोग बैठे हैं। पेड़-पौधे और जानवर: पूरे दृश्य में पेड़ और घने पत्तों वाले पौधे हैं; गाय-भैंस, हिरण जैसे पशु और एक हाथी दिखते हैं, कुछ नीचे पानी के पास। काम-धंधे: लोग पशुओं और पेड़ों के बीच खड़े हैं, कुछ कंधे या सिर पर सामान ले जा रहे हैं, यानी रोज़मर्रा के साधारण काम।
चित्र 4.33: शहरी परिदृश्य। वास्तुकला: एक बड़ी दो-मंज़िला इमारत, जिसके ऊँचे नक्काशीदार स्तंभों के शीर्ष पर पशु-आकृतियाँ हैं, दोनों मंज़िलों के बीच वेदिका जैसा छज्जा है और नीचे के कक्षों के ऊपर मेहराबदार (घोड़े की नाल जैसी) खिड़कियाँ हैं। पेड़-पौधे और जानवर: प्राकृतिक वनस्पति लगभग नहीं है; पशु जीवित झुंडों के रूप में नहीं, बल्कि स्तंभों के शीर्ष पर सजावटी मूर्तियों के रूप में हैं। काम-धंधे: आभूषण पहने, अच्छे वस्त्रों वाले स्त्री-पुरुष इमारत के कक्षों में बैठे हैं, कुछ के साथ सेवक हैं, जैसे किसी महल या धनी नगरवासी के घर में।
कारण। चित्र 4.32 में झोंपड़ियाँ, पेड़, पशुओं के झुंड और साधारण काम करते लोग हैं, जो गाँव या वन के जीवन के लक्षण हैं। चित्र 4.33 में स्तंभों, छज्जों और मेहराबदार खिड़कियों वाली बहुमंज़िला इमारत और आराम से बैठे सजे-धजे लोग हैं, जो नगर के जीवन के लक्षण हैं।
निष्कर्ष। इसलिए चित्र 4.32 ग्रामीण परिदृश्य है और चित्र 4.33 शहरी परिदृश्य। एक ही स्मारक पर दोनों तरह का जीवन उकेरा जाना दानात्मक अभिलेखों से मेल खाता है, जिनसे पता चलता है कि गाँवों और शहरों, दोनों के अनेक लोगों ने स्तूप को बनाने और सजाने के लिए दान दिया।
प्र. वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1. मुक्तिदाता का विचार। मुक्तिदाता का विचार केवल बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं था; वैष्णव धर्म (विष्णु प्रमुख देवता) और शैव धर्म (शिव प्रमुख देवता) इसके साथ-साथ बढ़े, दोनों भक्ति पर केंद्रित, भक्त और भगवान के बीच प्रेम के रूप में देखी जाती।
2. अवतार और लिंग। वैष्णव धर्म ने दस अवतारों के इर्द-गिर्द पंथ विकसित किए, वे रूप जो देवता ने संसार को अव्यवस्था से बचाने के लिए धारण किए; स्थानीय देवताओं को इनमें से किसी अवतार के रूप में पहचानना बिखरी परंपराओं को एकीकृत करने का एक तरीका था। शिव को अधिकतर लिंग से प्रतीकित किया जाता था, कभी-कभार मानव रूप में।
3. मूर्तिकला पढ़ने की कुंजी। ऐसी मूर्तिकला को पढ़ने के लिए मुकुट, आभूषण और आयुधों (हाथों में पकड़े हथियार या शुभ वस्तुएँ) के पीछे की कथाएँ जानना ज़रूरी है, जो मुख्यतः पुराणों में बचीं, ब्राह्मणों द्वारा सरल संस्कृत में संकलित, सबको ज़ोर से पढ़कर सुनाने के लिए। वासुदेव-कृष्ण मथुरा के एक स्थानीय देवता के रूप में शुरू हुए और वहाँ से व्यापक पंथ में फैले।
4. मंदिर-निर्माण। लगभग उसी समय जब स्तूप अपने परिपक्व रूप तक पहुँचे, दैवी मूर्तियों को रखने के लिए पहले मंदिर बनाए जा रहे थे: सबसे पुराना एक छोटा वर्गाकार गर्भगृह था; बाद में ऊँचा शिखर खड़ा किया गया, और मंदिर की दीवारों पर मूर्तिकला उकेरी गई। बाद के मंदिर सभा-कक्ष, दीवारों, प्रवेश-द्वारों और जल-व्यवस्था सहित कहीं अधिक विस्तृत हो गए।
5. गुफ़ा-मंदिर। एक समानांतर धारा में कुछ मंदिर सीधे पहाड़ की चट्टान काटकर कृत्रिम गुफ़ा के रूप में गढ़े गए; इसकी जड़ें तीसरी शताब्दी ई.पू. में अशोक द्वारा आजीविक संन्यासियों के लिए बनवाई गुफ़ाओं में मिलती हैं, और यह परंपरा आठवीं शताब्दी में एलोरा के एकाश्म (एक ही चट्टान से तराशे) कैलाशनाथ मंदिर में अपनी पराकाष्ठा तक पहुँची।
9 स्तूप कैसे और क्यों बनाए गए
प्र. स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
1. क्यों बनाए गए। कुछ स्थान इसलिए पवित्र बने क्योंकि उनमें अवशेष, बुद्ध के शारीरिक अवशेष या उनके प्रयोग की वस्तुएँ, स्तूप नामक टीलों में दफ़न थे; यह परंपरा शायद बौद्ध धर्म से पहले की है पर इससे घनिष्ठता से जुड़ गई। महापरिनिब्बान सुत्त के अनुसार बुद्ध ने मृत्यु-शय्या पर आनंद से कहा कि चार चौराहों पर स्तूप बनाए जाने चाहिए, और वहाँ माला-इत्र चढ़ाने या प्रणाम करने वाले को लंबे समय तक लाभ मिलेगा। अशोकावदान कहती है कि अशोक ने बुद्ध के अवशेष हर महत्वपूर्ण नगर में बाँटे और उन पर स्तूप बनवाने का आदेश दिया।
2. कैसे बनाए गए: वित्तपोषण। निर्माण की लागत चंदे से जुटाई जाती थी, और रेलिंग-स्तंभों के अभिलेख दानदाताओं को गिनाते हैं: सातवाहन वंश के शासक, हाथीदाँत कारीगरों की श्रेणी जिसने साँची के एक द्वार के हिस्से का ख़र्च उठाया, और अपना नाम, गृह-नगर, पेशा व नातेदार दर्ज कराने वाले सैकड़ों सामान्य दानी स्त्री-पुरुष, साथ ही स्वयं भिक्खु-भिक्खुनी भी।
3. संरचना। एक परिपक्व स्तूप में अंड (अवशेष रखने वाला अर्धगोलाकार भाग), हर्मिका, यष्टि (छत्री सहित), और चारों ओर की रेलिंग होती थी। साँची-भरहुत के शुरुआती दौर के टीले अपेक्षाकृत सादे थे, बस लकड़ी-बाँस की बाड़ की नक़ल में गढ़ी पत्थर की रेलिंग और चारों दिशाओं के भव्य नक़्क़ाशीदार द्वार भर लिए हुए; अमरावती और शाह-जी-की-ढेरी जैसे बाद के टीलों में यह नक़्क़ाशी बेहद विस्तृत रूप ले चुकी थी।
4. उपयोग। पूजक पूर्वी प्रवेश-द्वार से प्रवेश करते और दक्षिणावर्त चलते, टीला दाईं ओर रखते हुए, सूर्य के पथ की नक़ल करते हुए। दूसरी शताब्दी ई.पू. तक भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप खड़े थे।
10 मानचित्र कार्य
प्र. विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइए।
उत्तर: इन्हें अपने रेखांकित विश्व मानचित्र पर दिखाइए। तालिका में हर इलाका और उस तक पहुँचने वाला मार्ग है; नीचे के चरण बताते हैं कि मानचित्र कैसे बनाएँ।
| निशान लगाने वाला इलाका | उपमहाद्वीप से दिशा | मार्ग |
|---|---|---|
| मध्य एशिया | उत्तर-पश्चिम | स्थल |
| चीन | मध्य एशिया के आगे उत्तर-पूर्व | स्थल, मध्य एशिया होकर |
| कोरिया और जापान | चीन के आगे सुदूर पूर्व | स्थल, चीन होकर; जापान तक थोड़ी समुद्री यात्रा |
| श्रीलंका | दक्षिण | जल |
| म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया | दक्षिण-पूर्व | जल, बंगाल की खाड़ी पार करके |
निशान कैसे लगाएँ: (1) उत्तर भारत को छायांकित कीजिए, जहाँ बुद्ध ने उपदेश दिए, और लिखिए “बौद्ध धर्म का आरंभ”। (2) तालिका के आठों इलाकों को छायांकित करके उनके नाम लिखिए। (3) स्थल मार्ग को ठोस तीर से दिखाइए: उत्तर भारत से उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम होते हुए मध्य एशिया, फिर पूर्व में चीन और वहाँ से कोरिया; कोरिया से जापान तक थोड़ी समुद्री यात्रा (टूटी रेखा)। (4) जल मार्गों को टूटी रेखा वाले तीरों से दिखाइए: एक दक्षिण में श्रीलंका तक, और एक बंगाल की खाड़ी पार करके म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक। (5) संकेत-सूची बनाइए: ठोस तीर = स्थल मार्ग, टूटी रेखा वाला तीर = जल मार्ग।
अध्याय का खंड 4 बौद्ध धर्म के प्रसार की ठीक यही दो दिशाएँ बताता है।
11 परियोजना कार्य (कोई एक)
प्र. इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परंपराओं में से क्या कोई परंपरा आपके अड़ोस-पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।
उत्तर: कैसे करें: अध्याय की कोई एक परंपरा (बौद्ध, जैन, वैष्णव या शैव) चुनिए जो आपके आसपास मानी जाती हो, और उसके पूजा-स्थल पर जाइए। दर्ज कीजिए: (1) आज प्रयुक्त ग्रंथ (जैसे त्रिपिटक, जैन सूत्र, पुराण) और वे आज कैसे संरक्षित व संप्रेषित होते हैं (छपी पुस्तकें, पाठ, शिक्षा, रिकॉर्डिंग), और इसकी तुलना विहारों तथा मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सुरक्षित पांडुलिपियों से; (2) क्या मूर्तियों की पूजा होती है, और उनकी तुलना अध्याय के प्रतीकों (रिक्त आसन, चक्र, स्तूप) तथा बुद्ध, बोधिसत्त, तीर्थंकर, विष्णु के अवतारों और शिव-लिंग की मूर्तियों से; (3) इमारत की तुलना स्तूप (अंड, हर्मिका, यष्टि, वेदिका, तोरणद्वार) और प्रारंभिक मंदिर (एक द्वार वाला गर्भगृह, बाद में शिखर, सभास्थल और तोरण) से। अपनी रिपोर्ट रेखाचित्रों या तसवीरों के साथ प्रस्तुत कीजिए।
प्र. इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परंपराओं से जुड़े अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तसवीरें इकट्ठी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक तसवीर दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर: कैसे करें: अलग-अलग काल और इलाकों की पाँच तसवीरें चुनिए (जैसे साँची के तोरणद्वार का फलक, मथुरा की बुद्ध मूर्ति, गांधार का बोधिसत्त, अजंता का चित्र और एहोल का वराह)। शीर्षक हटाकर दिखाइए और हर व्यक्ति का वर्णन लिखिए। रिपोर्ट में तुलना कीजिए: लोगों ने क्या आसानी से पहचाना, क्या ग़लत पढ़ा या समझ नहीं पाए, और उनकी अपनी पृष्ठभूमि ने उनके देखने को कैसे प्रभावित किया। अपने निष्कर्षों को अध्याय के खंड 11 से जोड़िए: प्रतीक और कथाएँ वही समझ पाते हैं जो उनके पीछे की परंपराओं से परिचित हैं, और लोग अपरिचित चीज़ों को परिचित चीज़ों के पैमाने से समझने की कोशिश करते हैं।
12 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न
अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों व चित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।
प्र. शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वर्णन की तुलना चित्र 3 (चित्र 4.3) से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?
उत्तर: समानताएँ। शाहजहाँ बेगम पत्थर की मूर्तियों, एक प्राचीन तोरणद्वार और उन गुंबदनुमा ढाँचों का वर्णन करती हैं जिनके बीचोंबीच कनिंघम ने खुदाई की; चित्र 4.3 में भी यही दिखता है: पहाड़ी पर स्तूप का विशाल गोलार्ध वाला गुंबद, उसके पास एक नक्काशीदार पत्थर का तोरणद्वार और टीले के चारों ओर पत्थर की वेदिका।
असमानताएँ। बेगम ऐसे अवशेषों का वर्णन करती हैं जिनका यूरोपीय लोग अभी निरीक्षण, चित्रांकन और खुदाई कर रहे थे, और वे बुद्ध की मूर्तियों का उल्लेख करती हैं जो चित्र में साफ़ नहीं दिखतीं। चित्र में साफ़-सुथरा, मरम्मत किया हुआ स्तूप-समूह है: सीढ़ियाँ, वेदिका, और गुंबद के ऊपर हर्मिका व छत्री, जो बेगमों के अनुदान और भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के संरक्षण-कार्य का परिणाम है। (हिंदी संस्करण इस प्रश्न में ‘चित्र 3’ छापता है; अभिप्राय चित्र 4.3 से है।)
प्र. यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए।
उत्तर: ऋग्वेद के छंदों (स्रोत 1) और खंड 2.1 के अनुसार यज्ञ इन उद्देश्यों से किए जाते थे: (1) अग्नि के माध्यम से आहुति देवताओं तक पहुँचाना; (2) खूब सारे खाद्य पदार्थ और प्रचुर धन पाना; (3) पुष्टिवर्धक अद्भुत गाय और मवेशी पाना; (4) वंश को आगे बढ़ाने वाला पुत्र पाना; (5) अच्छा स्वास्थ्य और लंबी आयु पाना; (6) घरों के मालिक घर-परिवार के कल्याण के लिए यज्ञ करते थे, और सरदार व राजा राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ ब्राह्मण पुरोहितों से करवाते थे।
प्र. क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?
उत्तर: इस उद्धरण के आधार पर काफ़ी हद तक हाँ। मक्खलि गोसाल कहते हैं कि सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं और तपस्या या सद्गुण से बदले नहीं जा सकते, जैसे फेंका गया धागे का गोला पूरी लंबाई तक खुलता जाता है; यह ‘सब कुछ पूर्व निर्धारित है’ वाली नियतिवादी सोच है। अजीत केसकंबलिन् कहते हैं कि दान, यज्ञ या परलोक जैसी कोई चीज़ नहीं, मनुष्य चार तत्वों से बना है जो मृत्यु पर उन्हीं में मिल जाते हैं; यह भौतिकवादी सोच है। पर इन नामों का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए: इन परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, हम उन्हें केवल एक प्रतिद्वंद्वी परंपरा (सुत्त पिटक) से जानते हैं, जिसने उनके विचारों को सरल या बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया हो सकता है।
प्र. जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं वजहों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में क्या समस्याएँ सामने आती हैं?
उत्तर: (1) हमें दूसरी, अक्सर प्रतिद्वंद्वी परंपराओं के विवरणों पर निर्भर रहना पड़ता है, जैसे आजीविकों और लोकायतों के बारे में बौद्ध ग्रंथों पर; ये विवरण पक्षपाती या अधूरे हो सकते हैं। (2) केवल कुछ अंश बचते हैं, इसलिए उनके पूरे विचार और समय के साथ उनमें आए बदलाव नहीं जाने जा सकते। (3) उन्हें दिए गए नाम (नियतिवादी, भौतिकवादी) अक्सर दूसरों के दिए होते हैं, उनके अपने नहीं। (4) जो विश्वास और रीति-रिवाज कभी लिखे ही नहीं गए, उनके निशान बहुत कम बचते हैं। (5) ग्रंथों के बिना मूर्तियों और इमारतों को ग़लत पढ़ा जा सकता है, जैसे जेम्स फर्गुसन ने अनूदित बौद्ध ग्रंथों के अभाव में साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया।
प्र. महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तर्क आपको सबसे ज़्यादा युक्तियुक्त लगता है?
उत्तर: एक आदर्श उत्तर: सबसे युक्तियुक्त तर्क यह है कि संपूर्ण विश्व और उसके सारे खज़ाने भी राजा को संतोष नहीं दे सकते और न उसे बचा सकते हैं, क्योंकि मृत्यु होने पर सब कुछ पीछे छूट जाएगा और केवल धर्म ही उसकी रक्षा करेगा। यह तर्क मृत्यु की निश्चितता पर टिका है, जिसे कोई नकार नहीं सकता, और दिखाता है कि उस क्षण धन और राज्य का कोई मूल्य नहीं। उनकी उपमाएँ भी प्रभावित करती हैं: जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से; और सुख त्यागने वाले वायु की तरह और स्वतंत्र उड़ते पक्षियों की तरह विचरते हैं।
प्र. क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?
उत्तर: हाँ। अहिंसा, यानी इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना, आज भी प्रासंगिक है: युद्धों, आतंकवाद और रोज़मर्रा की हिंसा के बीच यह बिना किसी को हानि पहुँचाए विवाद सुलझाने का मार्ग देती है; हर जीव के प्रति सम्मान पशुओं, वनों और पर्यावरण की रक्षा को बल देता है; और अनेक धर्मों वाले समाज में सहिष्णुता और करुणा को बढ़ाता है। पाठ्यपुस्तक भी कहती है कि जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है। (हिंदी संस्करण इस प्रश्न में ‘बीसवीं सदी’ छापता है, अंग्रेज़ी संस्करण ‘इक्कीसवीं सदी’; उत्तर दोनों के लिए समान है।)
प्र. क्या आप इसकी लिपि को पहचान सकते हैं?
उत्तर: चौदहवीं सदी की जैन पांडुलिपि का यह पन्ना देवनागरी लिपि में (जैन पांडुलिपियों में प्रयुक्त उसके रूप में, जिसे जैन नागरी भी कहते हैं) लिखा है, लाल और नीले अलंकृत पृष्ठ पर सुनहरे अक्षरों में।
प्र. यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?
उत्तर: शायद नहीं। कहानी जाने बिना अमरावती की यह मूर्ति एक घोड़े और उसके चारों ओर सेवकों व आकृतियों की भीड़, शायद किसी राजसी जुलूस का दृश्य लगती। केवल वही दर्शक, जो जानता है कि वृद्ध, बीमार, लाश और संन्यासी को देखने के बाद सिद्धार्थ सत्य की खोज में महल छोड़कर निकल गए, इसे बुद्ध के महल से जाने का दृश्य पहचान सकता है। इसीलिए इतिहासकारों को ऐसी मूर्तियों के पीछे के ग्रंथों और परंपराओं को जानना पड़ता है।
प्र. आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे।
उत्तर: सेवकों के लिए दी गई सलाह (‘पाँच तरह से’) के ढंग पर वे ऐसे रहे होंगे: माता-पिता: बुढ़ापे में उनका भरण-पोषण करना, उनके प्रति अपने कर्तव्य निभाना, परिवार की अच्छी परंपराएँ बनाए रखना; शिक्षक: उनके आने पर उठकर सम्मान देना, उनकी सेवा करना और लगन से सीखना; पत्नी: उसका आदर और शिष्टता से व्यवहार करना, उसके प्रति निष्ठावान रहना, घर में उसे अधिकार देना और उसकी ज़रूरतें पूरी करना। सेवकों वाली सलाह की तरह इनमें भी आपसी कर्तव्य और मानवीय, नैतिक व्यवहार पर बल रहा होगा।
प्र. बुद्ध द्वारा सिगल को दी गई सलाह की तुलना असोक द्वारा उसकी प्रजा (अध्याय 2) को दी गई सलाह से कीजिए। क्या आपको कुछ समानताएँ और असमानताएँ नज़र आती हैं?
उत्तर: समानताएँ। दोनों नौकरों और दासों के साथ मानवीय व्यवहार करने को कहते हैं, और दोनों श्रमणों व ब्राह्मणों के प्रति आदर और उदारता की सीख देते हैं। दोनों का बल कर्मकांड पर नहीं, दैनिक जीवन के नैतिक आचरण पर है।
असमानताएँ। बुद्ध की सलाह एक शिक्षक द्वारा एक धनी गृहपति को दी गई है और व्यावहारिक ब्योरों (काम, भोजन, मज़दूरी, बीमारी में परिचर्या, छुट्टी) से भरी है। असोक का धम्म एक राजा का पूरी प्रजा के लिए संदेश था, जो चट्टानों और स्तंभों पर उत्कीर्ण कराया गया और धम्म महामात्त जैसे अधिकारियों द्वारा फैलाया गया; इसमें बड़ों के प्रति आदर और दूसरों के धर्मों व परंपराओं के प्रति सम्मान की बात भी थी।
प्र. बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं?
उत्तर: (1) खोखले कर्मकांड का खंडन: पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति नहीं मिलती, वरना सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाते। (2) सम्यक कर्म: वे कर्म ही न करें जिनका डर पानी की ओर खींचता है। (3) अलौकिक शक्ति नहीं, विवेक और तर्क से समझाना, जो बुद्ध की अपनी पद्धति थी। (4) जन्म नहीं, आचरण का महत्त्व: एक दासी ब्राह्मण को सही मार्ग बताती है। (5) करुणा: वह ब्राह्मण से अपने शरीर को ठंड से बचाने को कहती है।
प्र. क्या आप बता सकते हैं कि ये नियम क्यों बने?
उत्तर: ये नियम भिक्खुओं के जीवन को सादा और अनुशासित रखने के लिए बने। कंबल/गलीचे का नियम (कम से कम छः वर्ष प्रयोग) संपत्ति इकट्ठी करने से रोकता था। भोजन का नियम (केवल दो-तीन कटोरे, अन्य भिक्खुओं के साथ बाँटना) लालच रोकता था और यह सुनिश्चित करता था कि भोजन-दान देने वाले उपासकों पर बोझ न पड़े। बिस्तर का नियम संघ की साझा संपत्ति की देखभाल और शिष्टाचार (विदाई लेकर जाना) सिखाता था। नियम टूटने पर अपराध स्वीकरण से संघ के भीतर अनुशासन बना रहता था और उन लोगों में संघ का सम्मान बना रहता था जिनके दान पर वह निर्भर था।
प्र. पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
उत्तर: संसार में पुन्ना को सज़ा के डर से और ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से कड़ी ठंड में भी रोज़ पानी में उतरना पड़ता था। संघ में आ जाने पर सभी को बराबर माना जाता था, क्योंकि पुरानी पहचान त्याग दी जाती थी, इसलिए वह दासी की निम्न स्थिति से मुक्त हो सकती थी। बौद्ध शिक्षाओं में जन्म की बजाय अच्छे आचरण को महत्त्व और कमज़ोरों के प्रति मित्रता व करुणा का भाव था। संघ में आई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ और थेरी बन सकती थीं, और पुन्ना की तरह थेरीगाथा में संकलित पद्य रच सकती थीं।
प्र. चित्र 4.15 को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाज़ों को पहचान सकते हैं?
उत्तर: चित्र 4.15 (स्तूप की पूजा) में लोग एक स्तूप के चारों ओर इकट्ठे हैं: कुछ हाथ जोड़कर सिर नवा रहे हैं, कुछ चढ़ावा ला रहे हैं, और ऊपर की आकृतियाँ मालाएँ लिए दिखती हैं। ये महापरिनिब्बान सुत्त में बताए रीति-रिवाज़ों से मेल खाते हैं: स्तूप पर धूप या माला चढ़ाना, वहाँ सिर नवाना, और उसकी उपस्थिति में हृदय में शांति लाना।
प्र. साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10 क) और छायाचित्र (चित्र 4.3) में क्या समानताएँ और फ़र्क हैं?
उत्तर: समानताएँ। दोनों एक ही इमारत दिखाते हैं: वेदिका से घिरा गोल टीला, एक तोरणद्वार, और टीले के ऊपर चौकोर ढाँचा (हर्मिका)।
फ़र्क। मापचित्र समतलीय (ऊपर से) परिप्रेक्ष्य है: इसमें सही गोल आकार, चारों दिशाओं के चारों तोरणद्वार, परिक्रमा-पथ और सीढ़ियाँ दिखती हैं, और यह पैमाने पर बनाया जा सकता है। छायाचित्र स्तूप को वैसे दिखाता है जैसे एक दर्शक एक ओर से देखता है: गुंबद की ऊँचाई, ऊपर की छत्री, पत्थर की बनावट, पहाड़ी और आसपास के पेड़, पर केवल एक तोरणद्वार और वेदिका का एक हिस्सा।
प्र. इस इमारत की कौन-सी विशेषताएँ नक्शे में सबसे ज़्यादा स्पष्ट हैं? कौन-सी विशेषताएँ ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य से देखने पर ज़्यादा स्पष्ट होती हैं?
उत्तर: नक्शा (चित्र 4.10 क): टीले का गोल आकार, वेदिका और परिक्रमा-पथ का घेरा, चारों मुख्य दिशाओं में खड़े चार तोरणद्वार, और बीच में चौकोर हर्मिका।
ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य (चित्र 4.10 ख): अंड की ऊँचाई और गोलार्ध वाली आकृति, उसके ऊपर हर्मिका और छत्री सहित यष्टि, वेदिका वाला ऊँचा चबूतरा, और तोरणद्वारों की ऊँचाई।
प्र. खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया।
उत्तर: (1) भोपाल की शासकों, शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम, ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया; सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए भी अनुदान दिया। (2) पूर्वी तोरणद्वार ले जाना चाहने वाले फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए, इसलिए मूल कृति अपनी जगह रही। (3) सौभाग्य से इस पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी, और यह चीज़ें यूरोप के संग्रहालयों में ले जाने वालों से भी बचा रहा। (4) 1818 में खोज के समय यह अच्छी हालत में था, तीन तोरणद्वार खड़े थे। (5) एच.एच. कोल की खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात साँची के लिए मान ली गई, और बाद में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण ने इसकी मरम्मत और संरक्षण किया।
प्र. क्या आपको ऐसा लगता है कि साँची के तक्षक पटचित्र को खुलते हुए दर्शाना चाह रहे थे?
उत्तर: हाँ, ऐसा लगता है। तोरण की आड़ी शहतीरों के सिरे कसकर मुड़े सर्पिल (घुमावदार) आकार में हैं, बिल्कुल लपेटे हुए पटचित्र के सिरों जैसे, और उनके बीच के उत्कीर्ण फलक ऐसे फैले हैं जैसे खुलते हुए पटचित्र पर चित्र। यह खंड 9.1 में बताए घुमक्कड़ कथावाचकों के चारणचित्रों से मेल खाता है, जिन्हें कहानी सुनाते समय खोला जाता था।
प्र. मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्टी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।
उत्तर: मिट्टी (पकी मिट्टी या टेराकोटा) से छोटी मूर्तियाँ, खिलौने और फलक बनते थे, जो सस्ते होने के कारण आम घरों तक पहुँचते थे। धातु, विशेषकर काँसे, की मूर्तियाँ ढलाई से बनती थीं (जैसे मोम की ढलाई की विधि से), जिन्हें जुलूसों में ले जाया जा सकता था। हड्डी और हाथी दाँत से छोटी आकृतियाँ, कंघियाँ और फलक तराशे जाते थे; अध्याय बताता है कि साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना था। पत्थर सबसे अच्छी तरह बचता है, इसलिए इन सामग्रियों की कृतियाँ आज इतिहासकारों को कम मिलती हैं।
प्र. मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फ़र्क से क्या बात समझ में आती है?
उत्तर: विष्णु का वराह अवतार बाकी सभी आकृतियों से बहुत बड़ा उकेरा गया है, जबकि जिस पृथ्वी देवी को वे बचा रहे हैं वह उनके कंधे पर छोटी-सी बैठी है और बाकी आकृतियाँ उनके पैरों के पास बहुत छोटी हैं। यह अनुपात वराह की शक्ति और पृथ्वी की रक्षा करने वाले के रूप में उनके महत्त्व को दिखाता है; आकृति का आकार उसका दर्जा बताता है, वास्तविक आकार नहीं।
प्र. कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए।
उत्तर: देवी आगे छलाँग लगाते सिंह पर सवार हैं; उनकी अनेक भुजाएँ उठे हुए आयुध थामे हैं, एक से धनुष खींचा जा रहा है; उनकी सेना उसी दिशा में आगे बढ़ रही है जबकि शत्रु पक्ष पीछे झुकता और हटता दिखता है; शरीर मुड़े और तने हुए हैं, जैसे युद्ध में। यह फलक दुर्गा और महिषासुर (भैंसे के रूप वाले असुर) के युद्ध की कथा दिखाता है, जो पुराणों में मिलती है और जिसमें देवी संसार के लिए संकट बने असुर का वध करती हैं।
प्र. गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।
उत्तर: मंदिर एक ऊँचे चबूतरे पर खड़ा है जिसके सामने सीढ़ियाँ हैं। सीढ़ियाँ बीच के चौकोर देवालय के एक द्वार तक जाती हैं: यही गर्भगृह का प्रवेशद्वार है। देवालय के ऊपर पत्थर का एक टूटा हुआ, सीढ़ीनुमा ऊँचा ढाँचा उठता है: यही शिखर के अवशेष हैं।
प्र. संभव है कि आपने कोई भी धार्मिक अनुष्ठान देखा हो तो उसका वर्णन कीजिए। क्या इसे किसी रूप में हमेशा के लिए दर्ज़ किया जाता है?
उत्तर: एक आदर्श उत्तर: मेरे मोहल्ले में हर वर्ष एक उत्सव की शोभा यात्रा निकलती है: लोग देवता की मूर्ति को गलियों में ले जाते हैं, भजन गाते हैं, फूल चढ़ाते हैं और प्रसाद बाँटते हैं। इसे पत्थर या चित्रकला में स्थायी रूप से दर्ज नहीं किया जाता; लोग इसे याद रखते हैं और अगली पीढ़ी को सिखाते हैं, आजकल कुछ फ़ोटो या वीडियो बन जाते हैं, पर भजन, अनुष्ठान का क्रम और उसका अर्थ मुख्यतः स्मृति और व्यवहार में ही जीवित हैं। जैसा अध्याय कहता है, बहुत से धार्मिक रीति-रिवाज स्थायी दृश्य माध्यमों में दर्ज़ नहीं किए गए।