- बुद्धि, अभिक्षमता, व्यक्तित्व और मूल्य जैसे मनोवैज्ञानिक गुणों को कैसे परिभाषित और मूल्यांकित किया जाता है
- एनसीईआरटी अध्याय में दिए गए बुद्धि के सिद्धांत: बिने, स्पीयरमैन, थर्स्टन, जेन्सेन, गिलफोर्ड, गार्डनर, स्टर्नबर्ग और पास मॉडल
- बुद्धि लब्धि (IQ) और मानसिक आयु से बुद्धि कैसे मापी जाती है, और बौद्धिक अशक्तता तथा प्रतिभाशालिता की पहचान कैसे होती है
- संस्कृति बुद्धिमत्तापूर्ण व्यवहार का अर्थ कैसे बदल देती है, और भारतीय परंपरा इसमें क्या जोड़ती है
- सांवेगिक बुद्धि, अभिक्षमता और सर्जनात्मकता क्या हैं, और इनका बुद्धि से क्या संबंध है
CBSE 2026-27 मनोविज्ञान पाठ्यक्रम में सिद्धांत प्रश्नपत्र 70 अंक का है (7 इकाइयाँ), और यह अध्याय इकाई I, मनोवैज्ञानिक गुणों में विभिन्नताएँ: 13 अंक है। प्रैक्टिकल 30 अंक का है: प्रैक्टिकल फ़ाइल और केस प्रोफ़ाइल 10, मौखिक परीक्षा 5, और दो परीक्षण 15। वर्ष भर में आप पाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रशासन और व्याख्या करते हैं। ये नोट्स अध्याय 1 के सिद्धांत भाग को कवर करते हैं।
1व्यक्तिगत भिन्नताएँ: लोग एक जैसे क्यों नहीं होते
अपने मित्रों, सहपाठियों और संबंधियों को देखें तो पता चलता है कि वे प्रत्यक्षण करने (यानी इंद्रियों से जानकारी ग्रहण कर उसे समझने), सीखने, सोचने और कार्य करने में एक दूसरे से भिन्न होते हैं। भिन्न होना स्वाभाविक है: लोग शारीरिक विशेषताओं (कद, वज़न, शक्ति, बालों का रंग) में भिन्न होते हैं; उनमें मनोवैज्ञानिक विशेषताओं में भी भिन्नताएँ पाई जाती हैं: बुद्धिमान या मंद, प्रभावी या विनम्र, सर्जनशील या नहीं, जावक (बहिर्मुखी, लोगों में घुलने-मिलने वाला) या विनिवर्तित (अंतर्मुखी, अकेले रहना पसंद करने वाला)। व्यक्तिगत भिन्नताओं का अध्ययन गाल्टन के समय से ही आधुनिक मनोविज्ञान का मुख्य अध्ययन क्षेत्र रहा है।
व्यक्तिगत भिन्नताएँ व्यक्तियों की विशेषताओं और व्यवहार के स्वरूपों में पाए जाने वाले वैशिष्ट्य तथा विचलनशीलता को कहते हैं।
लोग भिन्न क्यों होते हैं? इस पर दो मत हैं। कुछ मनोवैज्ञानिक यह विश्वास करते हैं कि हमारे व्यवहार हमारे व्यक्तिगत विशेषकों से प्रभावित होते हैं। कुछ दूसरे मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि हमारे व्यवहार स्थितिपरक कारकों से अधिक निर्धारित होते हैं, इसे स्थितिवाद कहते हैं। स्थितिवादी परिप्रेक्ष्य बाह्य कारकों के प्रभाव को व्यवहार के लिए अपेक्षाकृत अधिक प्रभावकारी मानता है; कभी-कभी स्थिति का प्रभाव इतना शक्तिशाली होता है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तित्व विशेषकों वाले लोगों का व्यवहार लगभग समान होता है।
व्यक्तिगत विशेषक दृष्टिकोण
- व्यवहार हमारे व्यक्तिगत विशेषकों से प्रभावित होता है
स्थितिवाद
- व्यवहार व्यक्ति की परिस्थिति या वर्तमान दशाओं से अधिक प्रभावित होता है
- उदाहरण: सामान्यतः आक्रामक व्यक्ति भी अपने सर्वोच्च अधिकारी के सामने विनम्र व्यवहार कर सकता है
2मनोवैज्ञानिक गुणों का मूल्यांकन
मूल्यांकन करने का अर्थ व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक गुणों का मापन करने से है; मापन के अंतर्गत व्यक्तियों के गुणों की तुलना करने की अनेक मानक विधियाँ अपनाई जा सकती हैं। किसी गुण का अस्तित्व तभी स्वीकार किया जाता है जब उसका मापन वैज्ञानिक विधि से किया जा सके।
मूल्यांकन औपचारिक (वस्तुनिष्ठ, मानकीकृत, व्यवस्थित; प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों द्वारा किया गया) या अनौपचारिक (व्यक्ति और मूल्यांकनकर्ता के अनुसार बदलता रहता है, इसलिए व्यक्तिनिष्ठ व्याख्या के लिए खुला रहता है) हो सकता है। किस गुण का मूल्यांकन करना है यह हमारे उद्देश्य पर निर्भर करता है: कमज़ोर विद्यार्थी की बौद्धिक शक्ति-कमज़ोरी, समायोजन में असफल व्यक्ति का व्यक्तित्व, या कम अभिप्रेरित (जिसका अभिप्रेरणा यानी उत्साह/इच्छाशक्ति कम है) व्यक्ति की अभिरुचियाँ। मूल्यांकन के बाद इस सूचना से व्यक्ति के भावी व्यवहार का पूर्वकथन किया जा सकता है और आवश्यकता हो तो हस्तक्षेप करके व्यवहार बदलने का प्रयास किया जा सकता है।
मनोवैज्ञानिक गुण रेखीय अथवा एकविमीय नहीं होते; वे सामान्यतया बहुविमात्मक होते हैं। किसी व्यक्ति के पूर्ण मूल्यांकन के लिए देखना होगा कि वह विभिन्न क्षेत्रों, जैसे संज्ञानात्मक, सांवेगिक, सामाजिक आदि में कैसा व्यवहार या निष्पादन करता है।
2.1 मनोवैज्ञानिक गुणों के पाँच क्षेत्र
बुद्धि
पर्यावरण को समझने, सविवेक चिंतन (सोच-समझकर, तर्कपूर्ण ढंग से सोचना) करने तथा चुनौतियों के सामने उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की व्यापक क्षमता।
अभिक्षमता
किसी व्यक्ति की कौशलों के अर्जन के लिए अंतर्निहित संभाव्यता; प्रशिक्षण के बाद व्यक्ति क्या कर सकेगा, इसका पूर्वकथन करने में सहायक।
अभिरुचि
किसी एक या अधिक विशिष्ट क्रियाओं में स्वयं को अधिक व्यस्त रखने की वरीयता।
व्यक्तित्व
व्यक्ति की अपेक्षाकृत स्थायी विशेषताएँ जो उसे दूसरों से भिन्न बनाती हैं: प्रभावी/विनम्र, जावक (बहिर्मुखी)/विनिवर्तित (अंतर्मुखी) आदि।
मूल्य
आदर्श व्यवहार के बारे में स्थायी विश्वास, जो अपने व्यवहार का मानक तय करता है और दूसरों को आँकने में भी काम आता है: राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक या आर्थिक।
2.2 पाँच मूल्यांकन विधियाँ (कक्षा 11 से स्मरण)
| विधि | क्या है |
|---|---|
| मनोवैज्ञानिक परीक्षण | मानसिक/व्यवहारपरक विशेषताओं का वस्तुनिष्ठ, मानकीकृत मापक; क्लिनिकल निदान, निर्देशन, चयन, स्थानन और प्रशिक्षण में व्यापक उपयोग। |
| साक्षात्कार | व्यक्ति से एक-से-एक बातचीत करके सूचना लेना: परामर्शद-सेवार्थी, घर-घर सर्वेक्षण, कर्मचारी चयन, या पत्रकार का साक्षात्कार। |
| व्यक्ति अध्ययन (केस स्टडी) | किसी व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक गुणों और मनोसामाजिक-भौतिक पर्यावरण के संदर्भ में उसके इतिहास का गहन अध्ययन; क्लिनिकल मनोवैज्ञानिकों द्वारा व्यापक उपयोग; साक्षात्कार, प्रेक्षण, प्रश्नावली और परीक्षणों से बनता है। |
| प्रेक्षण | स्वाभाविक रूप से घटित व्यवहार का व्यवस्थित, संगठित, वस्तुनिष्ठ रिकॉर्ड (जैसे मातृ-शिशु अंतःक्रिया); कमज़ोरी: प्रेक्षक का स्थिति पर कम नियंत्रण और व्यक्तिनिष्ठ व्याख्या की संभावना। |
| आत्म-प्रतिवेदन | व्यक्ति स्वयं अपने बारे में तथ्यात्मक सूचना और मत देता है: साक्षात्कार अनुसूची, प्रश्नावली, परीक्षण या डायरी से। |
3बुद्धि: बदलती परिभाषाएँ
सामान्यजन की “बुद्धि” की समझ मनोवैज्ञानिक समझ से भिन्न है। ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश इसे प्रत्यक्षण, सीखने, समझने और जानने की योग्यता कहता है। आरंभिक सिद्धांतकारों ने भी इन्हीं गुणों के आधार पर बुद्धि को परिभाषित किया।
| कौन | बुद्धि की परिभाषा |
|---|---|
| अल्फ्रेड बिने | अच्छा निर्णय लेने, अच्छा बोध करने और अच्छा तर्क प्रस्तुत करने की योग्यता। |
| वेश्लर | व्यक्ति की वह समग्र क्षमता जिसके द्वारा वह सविवेक चिंतन करता है, सोद्देश्य (किसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया गया) व्यवहार करता है, और अपने पर्यावरण से प्रभावी ढंग से निपटता है। |
| गार्डनर और स्टर्नबर्ग | बुद्धिमान व्यक्ति न केवल पर्यावरण से अनुकूलन करता है बल्कि उसमें सक्रियता से परिवर्तन भी करता है। |
4बुद्धि के सिद्धांत
बुद्धि के सिद्धांत दो व्यापक उपागमों में बाँटे जा सकते हैं।
मनोमितिक/संरचनात्मक उपागम
- बुद्धि = योग्यताओं का एक समुच्चय
- एक ही संज्ञानात्मक (सोचने-समझने से जुड़ा) सूचकांक (जैसे बुद्धि लब्धि) में व्यक्त
सूचना प्रक्रमण उपागम
- तर्कना और समस्या समाधान में उपयोग होने वाली प्रक्रियाओं का वर्णन
- बुद्धि की संरचना पर नहीं, बुद्धिमान व्यक्ति कैसे कार्य करता है इस पर बल
4.1 मनोमितिक उपागम: चार प्रतिनिधि सिद्धांत
बिने: एक-कारक सिद्धांत
बिने ने बुद्धि को योग्यताओं का एक समुच्चय माना, जिसका उपयोग किसी भी समस्या के समाधान में किया जा सकता है। बिने के परीक्षण से संकलित आँकड़ों का विश्लेषण होने पर यह सिद्धांत विवादग्रस्त हो गया।
चार्ल्स स्पीयरमैन (1927): द्वि-कारक सिद्धांत
कारक विश्लेषण से: एक सा-कारक (सामान्य, सभी निष्पादन में उभयनिष्ठ) तथा कई वि-कारक (विशिष्ट योग्यताएँ)। श्रेष्ठ गायक, वास्तुकार, वैज्ञानिक और खिलाड़ी सा-कारक में उच्च हो सकते हैं, पर उनकी अपनी विशिष्ट वि-कारक योग्यताएँ भी होती हैं।
लुईस थर्स्टन: प्राथमिक मानसिक योग्यताएँ
सात अपेक्षाकृत स्वतंत्र प्राथमिक योग्यताएँ (नीचे तालिका देखें)।
आर्थर जेन्सेन: पदानुक्रमिक मॉडल
प्रथम स्तर: साहचर्यात्मक अधिगम, निर्गत लगभग आगत के समान (रट कर सीखना, स्मृति)। द्वितीय स्तर: संज्ञानात्मक सक्षमता, उच्च-स्तरीय कौशल जो आगत को प्रभावी निर्गत में बदलते हैं।
| थर्स्टन की सात प्राथमिक मानसिक योग्यताएँ |
|---|
| (1) वाचिक बोध: शब्दों, संप्रत्ययों और विचारों के अर्थ को समझना |
| (2) संख्यात्मक योग्यताएँ: संख्यात्मक और अभिकलनात्मक कार्यों में गति और परिशुद्धता |
| (3) देशिक संबंध: प्रतिरूपों और रचनाओं का मानस-प्रत्यक्षीकरण |
| (4) प्रात्यक्षिक गति: विस्तृत प्रत्यक्षीकरण करने की गति |
| (5) शब्द प्रवाह: शब्दों का प्रवाह और नम्यता के साथ उपयोग |
| (6) स्मृति: सूचनाओं के पुनःस्मरण में परिशुद्धता |
| (7) आगमनात्मक तर्कना: दिए गए तथ्यों से सामान्य नियम निकालना |
जे.पी. गिलफोर्ड का बुद्धि-संरचना मॉडल बौद्धिक विशेषताओं को तीन विमाओं में वर्गीकृत करता है: संक्रियाएँ (संज्ञान, स्मृति अभिलेखन, स्मृति प्रतिधारण, अपसारी उत्पादन यानी एक समस्या के कई संभावित उत्तर सोचना, अभिसारी उत्पादन यानी एक ही सही उत्तर तक पहुँचना, मूल्यांकन), विषय-वस्तु (चाक्षुष, श्रवणात्मक, प्रतीकात्मक, अर्थविषयक, व्यवहारात्मक) और उत्पाद (इकाई, वर्ग, संबंध, व्यवस्था, रूपांतरण, निहितार्थ)। यह वर्गीकरण 6×5×6 होने से इस मॉडल में 180 प्रकोष्ठ हैं, हर प्रकोष्ठ में कम से कम एक कारक होने की प्रत्याशा है।
4.2 बहु-बुद्धि का सिद्धांत: हावर्ड गार्डनर
गार्डनर (जिन्होंने अत्यधिक प्रतिभाशाली व्यक्तियों का अध्ययन किया) ने प्रस्तावित किया कि बुद्धि एक तत्व नहीं बल्कि कई भिन्न, स्वतंत्र बुद्धियों का अस्तित्व है; किसी एक बुद्धि की अधिकता यह संकेत नहीं करती कि दूसरी बुद्धि अधिक होगी या कम। विभिन्न बुद्धियाँ समस्या-समाधान के लिए आपस में अंतःक्रिया करते हुए साथ कार्य करती हैं। उन्होंने आठ प्रकार की बुद्धियाँ बताईं:
| बुद्धि का प्रकार | योग्यता | किनमें अधिक पाई जाती है |
|---|---|---|
| भाषागत | भाषा का प्रवाह और नम्यता से उत्पादन एवं उपयोग | कवि, लेखक |
| तार्किक-गणितीय | तार्किक-आलोचनात्मक चिंतन, अमूर्त तर्कना, प्रतीकों का प्रहस्तन | वैज्ञानिक, नोबेल पुरस्कार विजेता |
| देशिक | दृश्य/मानसिक बिंबों का निर्माण, उपयोग, परिमार्जन | विमान-चालक, नाविक, मूर्तिकार, चित्रकार, वास्तुकार, शल्य-चिकित्सक |
| संगीतात्मक | सांगीतिक लय और रचनाओं का उत्पादन और प्रहस्तन | पुस्तक कोई व्यवसाय नहीं बताती: ऐसे व्यक्ति ध्वनियों और स्पंदनों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं और ध्वनियों के नए प्रतिरूप रचते हैं |
| शारीरिक-गतिसंवेदी | संपूर्ण शरीर या उसके अंगों का लोचपूर्ण, सर्जनात्मक उपयोग | धावक, नर्तक, अभिनेता/अभिनेत्रियाँ, खिलाड़ी, जिमनास्ट, शल्य-चिकित्सक |
| अंतर्वैयक्तिक (दूसरों से जुड़ी) | दूसरों की अभिप्रेरणाओं, भावनाओं और व्यवहारों को समझना; मधुर संबंध बनाना | मनोवैज्ञानिक, परामर्शद, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, धार्मिक नेता |
| अंतःव्यक्ति (स्वयं से जुड़ी) | अपनी निजी भावनाओं, अभिप्रेरणाओं और इच्छाओं को जानना | दार्शनिक, आध्यात्मिक नेता |
| प्रकृतिवादी | प्राकृतिक जगत की विशेषताओं को पहचानना | शिकारी, किसान, पर्यटक, वनस्पतिविज्ञानी, प्राणीविज्ञानी, पक्षीविज्ञानी |
4.3 बुद्धि का त्रिचापीय सिद्धांत: राबर्ट स्टर्नबर्ग (1985)
स्टर्नबर्ग का त्रिचापीय सिद्धांत बुद्धि को समझने के लिए सूचना प्रक्रमण उपागम के अंतर्गत आने वाले सिद्धांतों का एक प्रतिनिधि सिद्धांत है।
स्टर्नबर्ग के अनुसार, “बुद्धि वह योग्यता है जिससे व्यक्ति अपने पर्यावरण के प्रति अनुकूलित होता है, अपने तथा अपने समाज और संस्कृति के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु पर्यावरण के कुछ पक्षों का चयन करता है और उन्हें परिवर्तित करता है।”

घटकीय (विश्लेषणात्मक)
समस्या समाधान के लिए सूचनाओं का विश्लेषण; विद्यालय में सफलता। तीन उप-घटक: ज्ञानार्जन घटक (कार्य करने की विधि सीखना), मेटा/उच्च स्तरीय घटक (क्या और कैसे करना है, इसकी योजना), निष्पादन घटक (वास्तव में करना)।
आनुभविक (सर्जनात्मक)
नई समस्याओं के समाधान हेतु पूर्व अनुभवों का सर्जनात्मक उपयोग; सर्जनात्मक निष्पादन और नए आविष्कारों में प्रदर्शित।
सांदर्भिक (व्यावहारिक)
दैनिक पर्यावरणी माँगों से निपटना: “व्यावहारिक बुद्धि” या “व्यावसायिक समझ”। व्यक्ति पर्यावरण से अनुकूलन करता है, उसे चुनता है, या अपनी आवश्यकतानुसार बदल लेता है।
4.4 पास मॉडल: जे.पी. दास, जैक नागलीरी तथा किर्बी (1994)
यह मॉडल (योजना, अवधान-भाव प्रबोधन, सहकालिक-आनुक्रमिक) कहता है कि बुद्धिमानीपूर्ण व्यवहार मस्तिष्क की तीन “इकाइयों” के साथ मिलकर काम करने से बनता है: हर इकाई का अपना अलग काम है, पर तीनों एक-दूसरे पर निर्भर भी हैं। इन प्रक्रियाओं का स्वरूप अंतःक्रियात्मक तथा गतिशील होता है। यह मॉडल बुद्धि के सूचना प्रक्रमण उपागम का प्रतिनिधित्व करता है।
दास तथा नागलीरी ने एक परीक्षण माला भी विकसित की है: संज्ञानात्मक मूल्यांकन प्रणाली (CAS): वाचिक और अवाचिक दोनों प्रकार के कृत्य, आयु 5 से 18 वर्ष तक, विद्यालयीय शिक्षा से अप्रभावित मूल संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के मापन के लिए, जिसका उपयोग अधिगम-संबंधी कठिनाइयों को दूर करने में किया जाता है।
5बुद्धि में व्यक्तिगत भिन्नताएँ
5.1 आनुवंशिकता और पर्यावरण
प्रमाण मुख्यतः जुड़वाँ और दत्तक बच्चों के अध्ययन से मिलते हैं। पुस्तक ये सहसंबंध देती है:
बाल्यावस्था में अलग-अलग करके पाले गए जुड़वाँ बच्चों की बौद्धिक, व्यक्तित्व तथा व्यवहारपरक विशेषताओं में भी पर्याप्त समानता दिखाई देती है। दत्तक बच्चों की बुद्धि जन्म देने वाले माता-पिता से अधिक मिलती-जुलती है, गोद लेने वाले माता-पिता से कम: परंतु आयु बढ़ने के साथ बच्चे की बुद्धि गोद लेने वाले माता-पिता के स्तर के निकट पहुँचती जाती है। सुविधावंचित घरों से उच्च सामाजिक-आर्थिक परिवारों में गोद लिए गए बच्चों की बुद्धि में बड़ी वृद्धि देखी जाती है। पर्यावरणी वंचन बुद्धि घटाता है; प्रचुर पोषण, अच्छी पारिवारिक पृष्ठभूमि और गुणवत्तायुक्त शिक्षा बुद्धि बढ़ाते हैं। सामान्यतया मनोवैज्ञानिकों में इस पर सहमति है कि बुद्धि दो चीज़ों की जटिल अंतःक्रिया का परिणाम है: आनुवंशिकता (प्रकृति) एक सीमा तय करती है, और पर्यावरण (पोषण) उसी सीमा के भीतर वास्तविक विकास को दिशा देता है।
5.2 बुद्धि का मूल्यांकन: मानसिक आयु, कालानुक्रमिक आयु, बुद्धि लब्धि
1905 में अल्फ्रेड बिने और थियोडोर साइमन ने बुद्धि के औपचारिक मापन का पहला सफल प्रयास किया। उनके 1908 के संशोधन ने मानसिक आयु (MA) का संप्रत्यय दिया: यह व्यक्ति के बौद्धिक विकास को उसकी आयु वर्ग के अन्य व्यक्तियों की तुलना में मापता है। कालानुक्रमिक आयु (CA) जन्म से अब तक की जैविक आयु है। बिने और साइमन के अनुसार, मंदता वह स्थिति है जिसमें मानसिक आयु, कालानुक्रमिक आयु से दो वर्ष कम होती है।
1912 में जर्मन मनोवैज्ञानिक विलियम स्टर्न ने बुद्धि लब्धि (IQ) का संप्रत्यय दिया:
प्रश्न: एक 10 वर्ष के बच्चे की मानसिक आयु 12 वर्ष है। बुद्धि लब्धि ज्ञात करें। यदि मानसिक आयु 7 वर्ष हो तो?
चरण 1: 120 (तीव्रबुद्धि बच्चा, MA, CA से अधिक)
चरण 2: 70 (मंदबुद्धि बच्चा, MA, CA से कम)
नियम: यदि मानसिक आयु तथा कालानुक्रमिक आयु बराबर हो तो बुद्धि लब्धि 100 होती है; मानसिक आयु अधिक हो तो 100 से अधिक, और कम हो तो 100 से कम।
(i) एक 14 साल के बच्चे की मानसिक आयु 16 वर्ष है: बुद्धि लब्धि = (16 ÷ 14) × 100 ≈ 114। (ii) 12 साल के एक बच्चे की बुद्धि लब्धि 90 है: मानसिक आयु = (90 × 12) ÷ 100 = 10.8 वर्ष।
जनसंख्या में बुद्धि लब्धि प्राप्तांक एक सममित, घंटाकार सामान्य वक्र बनाते हैं, जिसका माध्य 100 होता है।

| बुद्धि लब्धि वर्ग | वर्णनात्मक वर्गनाम | जनसंख्या प्रतिशत |
|---|---|---|
| 130 से अधिक | अतिश्रेष्ठ | 2.2 |
| 120-130 | श्रेष्ठ | 6.7 |
| 110-119 | उच्च औसत | 16.1 |
| 90-109 | औसत | 50.0 |
| 80-89 | निम्न औसत | 16.1 |
| 70-79 | सीमावर्ती | 6.7 |
| 70 से कम | बौद्धिक रूप से अशक्त | 2.2 |
बुद्धि परीक्षणों का एक व्यावहारिक उपयोग यह है कि इनसे बहुत अधिक तथा बहुत कम बुद्धि वाले व्यक्तियों की पहचान की जा सकती है। 90-110 बुद्धि लब्धि वाले व्यक्ति सामान्य बुद्धि के कहलाते हैं। लगभग 2% जनसंख्या, जिनकी बुद्धि लब्धि 130 से अधिक है, बौद्धिक रूप से प्रतिभाशाली कहलाते हैं; उतने ही प्रतिशत, बुद्धि लब्धि 70 से कम वाले, बौद्धिक रूप से अशक्त कहलाते हैं। दोनों समूह संज्ञानात्मक, सांवेगिक और अभिप्रेरणात्मक विशेषताओं में सामान्य जनसंख्या से काफ़ी भिन्न होते हैं।
5.3 बौद्धिक न्यूनता
अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ मेंटल डिफ़िशेंसी (AAMD) के अनुसार बौद्धिक अशक्तता “उस अवसामान्य साधारण बौद्धिक प्रकार्यात्मकता से है जो व्यक्ति की विकासात्मक अवस्थाओं में प्रकट होती है तथा उसके अनुकूलित व्यवहार में न्यूनता से संबंधित होती है।”
इस परिभाषा की तीन विशेषताएँ हैं: (1) अवसामान्य बौद्धिक प्रकार्यात्मकता: बुद्धि लब्धि 70 से कम; (2) अनुकूलित व्यवहार में न्यूनता: स्वतंत्र होने और पर्यावरण से प्रभावी ढंग से समायोजन करने की क्षमता में कमी; (3) विकासात्मक अवस्था में ही प्रकट होना: 0 से 18 वर्ष की आयु के मध्य।
(बौद्धिक रूप से अशक्त व्यक्तियों की अन्य विशेषताओं के बारे में अध्याय 4 में और पढ़ेंगे।)
5.4 बौद्धिक प्रतिभाशालिता
प्रतिभाशाली व्यक्तियों का अध्ययन 1925 में शुरू हुआ, जब लेविस टर्मन ने बुद्धि लब्धि 130 और उससे अधिक वाले लगभग 1500 बच्चों के जीवन का अनुसरण करना शुरू किया, यह जानने के लिए कि बुद्धि व्यावसायिक सफलता और जीवन-समायोजन से कैसे संबंधित है।
प्रतिभा
- असाधारण सामान्य योग्यता
- विस्तृत क्षेत्रों में श्रेष्ठ निष्पादन में दिखती है
प्रवीणता
- किसी एक विशिष्ट क्षेत्र (आध्यात्मिक, सामाजिक, सौंदर्यपरक) में उल्लेखनीय योग्यता
- अत्यधिक प्रवीण व्यक्ति कभी-कभी “अद्भुत-प्रतिभाशाली” कहलाते हैं
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अध्यापकों के दृष्टिकोण से प्रतिभाशालिता उच्च योग्यता, उच्च सर्जनात्मकता और उच्च प्रतिबद्धता के संयोजन पर निर्भर करती है। प्रतिभाशाली बच्चे प्रारंभ में ही लक्षण दिखाते हैं: अधिक अवधान विस्तृति, अच्छी प्रत्यभिज्ञान स्मृति (पहले देखी या सुनी चीज़ को तुरंत पहचान लेने की स्मृति), नवीनता के प्रति रुझान, पर्यावरणी परिवर्तनों के प्रति संवेदनशीलता, भाषा-कौशल का शीघ्र प्रकटीकरण। प्रतिभाशालिता को केवल श्रेष्ठ शैक्षिक निष्पादन मान लेना सही नहीं: श्रेष्ठ मनोगतिक योग्यता (शारीरिक कौशल और तालमेल) वाले खिलाड़ी भी प्रतिभाशाली होते हैं।
- उन्नत तार्किक चिंतन, प्रश्न करने की प्रवृत्ति और समस्या समाधान की योग्यता
- सूचना प्रक्रमण की उच्च गति
- सामान्यीकरण और विभेदन की श्रेष्ठ योग्यता
- मौलिक और सर्जनात्मक चिंतन का उन्नत स्तर
- अंतर्भूत अभिप्रेरणा और आत्म-सम्मान का उच्च स्तर
- स्वतंत्र, अननुरूप चिंतन; लंबी अवधि तक अकेले अध्ययन की वरीयता
पहचान के लिए केवल परीक्षण प्राप्तांक ही पर्याप्त नहीं: अध्यापकों का निर्णय, विद्यालय-उपलब्धि अभिलेख, माता-पिता का साक्षात्कार, समकक्षियों और स्वयं का निर्धारण भी बौद्धिक मूल्यांकन के साथ-साथ उपयोग किए जा सकते हैं। प्रतिभाशाली बच्चों को विशेष ध्यान और जीवन-समृद्धि कार्यक्रम (फलद चिंतन, योजना-निर्माण, निर्णयन, संप्रेषण कौशल बढ़ाने वाले) चाहिए।
6बुद्धि परीक्षणों के प्रकार
वैयक्तिक परीक्षण में परीक्षणकर्ता को सौहार्द स्थापित करना होता है और परीक्षार्थी की भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहना होता है; उत्तर मौखिक, लिखित या वस्तुओं के प्रहस्तन से दिए जा सकते हैं। समूह परीक्षण में ऐसा सौहार्द नहीं बनता; उत्तर सामान्यतः लिखित, अक्सर बहुविकल्पी होते हैं।
शाब्दिक परीक्षणों में मौखिक/लिखित उत्तर चाहिए (केवल साक्षर व्यक्तियों के लिए)। अशाब्दिक परीक्षणों में चित्रों का उपयोग होता है, जैसे रैवेंस प्रोग्रेसिव मैष्ट्रिसेस (RPM), जिसमें अपूर्ण प्रतिरूप को दिए गए विकल्पों में से पूरा करना होता है। निष्पादन परीक्षणों में एकांशों के उत्तर के लिए लिखित भाषा आवश्यक नहीं, जैसे कोह का ब्लॉक-डिज़ाइन परीक्षण, जिसमें लकड़ी के गुटकों से दिए गए समय में एक डिज़ाइन बनाना होता है; निष्पादन परीक्षण भिन्न-भिन्न संस्कृतियों में आसानी से दिए जा सकते हैं।
अप्रशिक्षित परीक्षणकर्ता द्वारा उपयोग किए जाने पर बुद्धि परीक्षण: खराब प्रदर्शन से बच्चे पर कलंक लगा सकते हैं और उसके आत्म-सम्मान को हानि पहुँचा सकते हैं; माता-पिता, अध्यापकों और बड़ों के भेदभावपूर्ण आचरण को न्योता दे सकते हैं; मध्यवर्गीय/उच्चवर्गीय पक्ष वाले परीक्षण सुविधावंचित बच्चों की बुद्धि लब्धि को कम आँक सकते हैं; और सर्जनात्मक व व्यावहारिक बुद्धि को माप नहीं पाते, जिनका जीवन-सफलता से भी कम संबंध होता है। पुस्तक की अपनी सलाह: प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की सहायता लें।
संस्कृति-निष्पक्ष बनाम संस्कृति-अभिनत: अमेरिका-यूरोप में बने परीक्षण नगरीय, मध्यवर्गीय सांस्कृतिक लोकाचार दर्शाते हैं और पश्चिमी समूहों पर मानकीकृत होते हैं, इसलिए एक ऐसा परीक्षण बनाना लगभग असंभव है जो सभी संस्कृतियों में समान रूप से सार्थक हो। मनोवैज्ञानिक संस्कृति-निष्पक्ष परीक्षण बनाने का प्रयास करते हैं: एकांश सभी संस्कृतियों में सर्वनिष्ठ अनुभवों का मूल्यांकन करें, या ऐसे प्रश्न रखे जाएँ जिनमें भाषा का उपयोग न हो; अशाब्दिक और निष्पादन परीक्षण यह सांस्कृतिक अभिनति कम कर देते हैं।
6.1 भारत में बुद्धि परीक्षण
| अग्रणी | योगदान |
|---|---|
| एस.एम. मोहसिन | हिंदी भाषा में बुद्धि परीक्षण का पथप्रदर्शक प्रयास, 1930 में |
| सी.एच. राइस | बिने के परीक्षण को उर्दू और पंजाबी में मानकीकृत किया |
| महलानोबिस | बिने के परीक्षण को बंगाली में मानकीकृत किया |
| लांग तथा मेहता | मानसिक मापन पुस्तिका: भारतीय भाषाओं के 103 बुद्धि परीक्षणों की सूची |
| एन.एल.ई.पी.टी. (एन.सी.ई.आर.टी. में) | भारतीय परीक्षणों का प्रलेखन और आलोचनात्मक पुनरीक्षण |
| जे.एम. ओझा | DAT का भारतीय अनुकूलन |
| तालिका 1-2: शाब्दिक परीक्षण | निर्माता |
|---|---|
| सी.आई.ई. शाब्दिक समूह बुद्धि परीक्षण | उदय शंकर |
| सामान्य मानसिक योग्यता का समूह परीक्षण | एस. जलोटा |
| समूह बुद्धि परीक्षण | प्रयाग मेहता |
| बिहार टेस्ट ऑफ इंटेलिजेंस | एस.एम. मोहसिन |
| समूह बुद्धि परीक्षण | मनोविज्ञान ब्यूरो, इलाहाबाद |
| स्टैनफोर्ड-बिने परीक्षण (तृतीय संस्करण) का भारतीय अनुकूलन | एस.के. कुलश्रेष्ठ |
| सामान्य मानसिक योग्यता (हिन्दी) परीक्षण | एम.सी. जोशी |
| तालिका 1-2: निष्पादन परीक्षण | निर्माता |
|---|---|
| सी.आई.ई. अशाब्दिक समूह बुद्धि परीक्षण | पुस्तक में नाम नहीं |
| निष्पादन परीक्षणमाला | भाटिया |
| ‘ड्रॉ ए मैन’ परीक्षण | प्रमिला पाठक |
| वेश्लर एडल्ट परफारमेन्स इंटेलिजेंस टेस्ट का भारतीय अनुकूलन | आर. रामलिंगस्वामी |
इनमें से भाटिया की निष्पादन परीक्षणमाला काफ़ी प्रचलित है।
7संस्कृति तथा बुद्धि
बुद्धि की एक प्रमुख विशेषता पर्यावरण से अनुकूलन में सहायता करना है; संस्कृति बौद्धिक विकास के लिए एक संदर्भ प्रदान करती है। रूसी मनोवैज्ञानिक वाइगॉट्सकी का विश्वास था कि व्यक्ति की तरह संस्कृति का भी अपना एक जीवन होता है: उसका विकास और परिवर्तन होता है। उन्होंने कहा कि संस्कृति एक सामाजिक संदर्भ प्रदान करती है जिसमें व्यक्ति रहता है, विकसित होता है और जगत को समझता है; प्रारंभिक मानसिक प्रक्रियाएँ (रोना, माता की आवाज़ पर ध्यान देना, चलना) सर्वव्यापी हैं, परंतु उच्च मानसिक प्रक्रियाएँ जैसे समस्या-समाधान मुख्यतः संस्कृति की उपज हैं।
तकनीकी बुद्धि (पश्चिमी)
- सामान्यीकरण, अमूर्तकरण, गति, न्यूनतम प्रयास, मानसिक प्रहस्तन को महत्व
- अवधान, प्रेक्षण, विश्लेषण, निष्पादन, उपलब्धि-प्रवणता के कौशल
- तर्कना-निर्णय पर आधारित निजी उपलब्धि = बुद्धि
गैर-पश्चिमी समाज
- संज्ञानात्मक सक्षमता के साथ-साथ लोगों से जुड़ने के सामाजिक-सांवेगिक कौशलों को भी महत्व
- कुछ समाज आत्म-परावर्तन और सामूहिक उन्मुखता को व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक महत्व देते हैं
- पश्चिमी प्रभाव से यह भेद धीरे-धीरे मिट रहा है
7.1 भारतीय परंपरा में बुद्धि
भारतीय परंपरा में बुद्धि को जिस प्रकार समझा गया है उसे “समाकलित बुद्धि” कहा जा सकता है: एक समग्र दृष्टिकोण जो संज्ञानात्मक और असंज्ञानात्मक दोनों प्रक्रियाओं तथा उनके समाकलन को समान महत्व देता है, और समाज व वैश्विक पर्यावरण से व्यक्ति के संबंधों पर बल देता है। संस्कृत शब्द “बुद्धि” पश्चिमी संप्रत्यय से कहीं अधिक व्यापक है: जे.पी. दास के अनुसार, इसमें मानसिक प्रयास, दृढ़ निश्चय, अनुभूतियाँ और मत, ज्ञान-विभेदन-समझ जैसी संज्ञानात्मक क्षमताओं के साथ-साथ अंतर्विवेक-संकल्प-अभिलाषाओं पर आधारित आत्मज्ञान भी सम्मिलित है।
संज्ञानात्मक क्षमता
संदर्भ के प्रति संवेदनशीलता, समझ, विभेदन क्षमता, समस्या समाधान, प्रभावी संप्रेषण।
सामाजिक क्षमता
सामाजिक व्यवस्था के प्रति सम्मान, बड़ों-छोटों-वंचितों के प्रति प्रतिबद्धता, दूसरों की चिंता, दूसरों का परिप्रेक्ष्य समझना।
सांवेगिक क्षमता
अपने संवेगों पर आत्म-नियमन और आत्म-परिवीक्षण, ईमानदारी, शिष्टता, अच्छा आचरण, आत्म-मूल्यांकन।
उद्यमी क्षमता
प्रतिबद्धता, अध्यवसाय, धैर्य, कठिन परिश्रम, सतर्कता, लक्ष्यनिर्देशित व्यवहार।
8सांवेगिक बुद्धि
सांवेगिक बुद्धि के संप्रत्यय के प्रवर्तक सैलोवी तथा मेयर ने इसे इस प्रकार परिभाषित किया: “अपने तथा दूसरे व्यक्तियों के संवेगों का परिवीक्षण करने और उनमें विभेदन करने की योग्यता तथा प्राप्त सूचना के अनुसार अपने चिंतन तथा व्यवहारों को निर्देशित करने की योग्यता।”
सांवेगिक बुद्धि, बुद्धि के संप्रत्यय को बौद्धिक क्षेत्र से आगे बढ़ाकर संवेगों को भी इसमें सम्मिलित करती है: यह “बुद्धि का भावात्मक पक्ष” है, और भारतीय परंपरा के बुद्धि-संप्रत्यय पर आधारित है। जीवन में सफल होने के लिए उच्च बुद्धि लब्धि और शैक्षिक निष्पादन ही पर्याप्त नहीं: कई उच्च शैक्षिक प्रतिभा वाले व्यक्ति परिवार, कार्यस्थल और अंतर्वैयक्तिक संबंधों में असफल रह जाते हैं। सांवेगिक लब्धि (EQ) सांवेगिक बुद्धि की मात्रा बताने में उसी प्रकार उपयोग होती है जैसे बुद्धि लब्धि (IQ) बुद्धि की मात्रा बताती है।
- अपनी भावनाओं और संवेगों को जानना और उनके प्रति संवेदनशील होना
- दूसरों के संवेगों को उनकी शरीर भाषा, आवाज़, स्वरक और चेहरे के भावों (आनन अभिव्यक्तियों) से जानना और संवेदनशील होना
- अपने संवेगों को अपने विचारों से जोड़ना ताकि समस्या समाधान और निर्णय में उन्हें ध्यान में रखा जा सके
- अपने संवेगों की प्रकृति और तीव्रता के शक्तिशाली प्रभाव को समझना
- शांति और सामंजस्य के लिए अपने संवेगों और उनकी अभिव्यक्तियों को नियंत्रित करना
विद्यार्थियों की सांवेगिक बुद्धि बढ़ाने वाले कार्यक्रम शैक्षिक उपलब्धि पर लाभप्रद प्रभाव डालते हैं, सहयोगी व्यवहार को प्रोत्साहित करते हैं और समाज-विरोधी गतिविधियाँ कम करते हैं।
9विशिष्ट योग्यताएँ: अभिक्षमता
अभिक्षमता किसी विशेष क्षेत्र की विशेष योग्यता है: व्यक्ति की वह विशेषताओं का संयोजन जो प्रशिक्षण के बाद किसी विशेष ज्ञान या कौशल के अर्जन की क्षमता दर्शाता है। अभिक्षमता परीक्षण भविष्य के निष्पादन का पूर्वकथन करते हैं।
समान बुद्धि वाले व्यक्ति भी विशिष्ट कौशलों में भिन्न हो सकते हैं: पुस्तक का उदाहरण: गणित में अमन से, साहित्य में अविनाश से, गाने में शबनम से, और स्कूटर की समस्या में जॉन से सहायता ली जाती है।
अभिरुचि
- किसी क्रिया को करने की वरीयता
अभिक्षमता
- उस कार्य को करने की संभाव्यता या विभवता
सफलता के लिए दोनों आवश्यक हैं: उच्च यांत्रिक अभिक्षमता और अभियांत्रिकी में अभिरुचि रखने वाला विद्यार्थी सफल यांत्रिक अभियंता बनने की अधिक संभावना रखता है। अकेली अभिरुचि या अकेली अभिक्षमता से यह संभावना उतनी नहीं बनती।
अभिक्षमता परीक्षण दो रूपों में मिलते हैं: स्वतंत्र (विशेषीकृत): लिपिकीय, यांत्रिक, आंकिक, टंकण अभिक्षमता परीक्षण; और बहुल (सामान्यीकृत) परीक्षणमालाएँ: विभेदक अभिक्षमता परीक्षण (DAT), सामान्य अभिक्षमता परीक्षणमाला (GATB), आर्म्ड सर्विसेस व्यावसायिक अभिक्षमता परीक्षणमाला (ASVAB)। शैक्षिक पर्यावरण में DAT का सर्वाधिक उपयोग होता है, जिसमें 8 स्वतंत्र उप-परीक्षण हैं: शाब्दिक तर्कना, आंकिक तर्कना, अमूर्त तर्कना, लिपिकीय गति-परिशुद्धता, यांत्रिक तर्कना, देशिक संबंध, वर्तनी, और भाषा का उपयोग। जे.एम. ओझा ने DAT का भारतीय अनुकूलन विकसित किया।
10सर्जनात्मकता
सर्जनात्मकता नूतन, उपयुक्त और उपयोगी विचारों, वस्तुओं या समस्या-समाधानों को उत्पन्न करने की योग्यता है।
सर्जनात्मकता किसी नई समस्या के समाधान, आविष्कार, कविता, चित्र, नई रासायनिक प्रक्रिया, कानूनी नवाचार, या रोग-रोकथाम में सफलता के रूप में दिख सकती है। पुस्तक रवींद्रनाथ टैगोर, आइंसटीन, सी.वी. रमन और रामानुजन को उत्कृष्ट सर्जनात्मक योगदान के उदाहरण के रूप में नाम देती है: परंतु सर्जनात्मकता केवल प्रतिष्ठित व्यक्तियों तक सीमित नहीं; मिट्टी के बर्तन बनाने, बढ़ईगिरी या भोजन बनाने में लगा साधारण व्यक्ति भी सर्जनशील हो सकता है, भले ही वह किसी श्रेष्ठ वैज्ञानिक या लेखक के स्तर का न हो।
पुस्तक आइंसटीन के सापेक्षता सिद्धांत को सर्जनात्मकता के उच्चतम स्तर का उदाहरण बताती है: पूर्णतया नए विचार, तथ्य, सिद्धांत या उत्पाद प्रस्तुत करना। सर्जनात्मकता का एक अन्य स्तर यह भी है जिसमें व्यक्ति पहले से स्थापित विचारों या वस्तुओं को नए परिप्रेक्ष्य में रखकर या उनकी नई उपयोगिता प्रस्तुत करके उनमें परिवर्तन करता है।
बच्चे बाल्यावस्था के प्रारंभिक वर्षों में कल्पनाशक्ति विकसित करने लगते हैं, परंतु सर्जनात्मकता की अभिव्यक्ति मुख्य रूप से शारीरिक तथा अवाचिक क्रियाओं के माध्यम से करते हैं; भाषा और बौद्धिक प्रकार्यों का पूर्ण विकास होने पर अभिव्यक्ति शाब्दिक रूप से भी होने लगती है।
आनुवंशिकता और पर्यावरण: इसमें कोई असहमति नहीं कि सर्जनात्मकता आनुवंशिकता तथा पर्यावरण दोनों द्वारा निर्धारित होती है। सर्जनात्मक संभाव्यता की सीमाएँ आनुवंशिकता नियत करती है; उसका कितना विकास होगा, किस आयु में और किस रूप-दिशा में, यह मुख्य रूप से पर्यावरणी कारकों (अभिप्रेरणा, प्रतिबद्धता, पारिवारिक समर्थन, समकक्षियों का प्रभाव, प्रशिक्षण के अवसर) से तय होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सर्जनात्मक संभाव्यता को वर्तमान स्तर से ऊँचे स्तर तक बढ़ा सकता है।
10.1 सर्जनात्मकता और बुद्धि
पुस्तक का उदाहरण: सुनीता समय पर काम पूरा करती है, कक्षा में उच्चतम ग्रेड पाती है, शीघ्र समझती है और सामग्री को सटीक रूप से पुनःप्रस्तुत करती है, परंतु शायद ही कभी अपना कोई मौलिक विचार रखती है: उसे अधिक बुद्धिमान कहा जाता है। रीता औसत छात्रा है जो स्वयं के तरीकों से सीखना पसंद करती है, घर में माँ की सहायता करने के तरीकों में सुधार करती है और अपने दत्तकार्य करने के नए-नए तरीके खोज लेती है: उसे अधिक सर्जनशील कहा जाता है।
टर्मन ने 1920 में पाया कि उच्च बुद्धि लब्धि वाले व्यक्ति आवश्यक रूप से सर्जनशील नहीं होते: सर्जनात्मक विचार बिना बहुत उच्च बुद्धि लब्धि वाले व्यक्तियों में भी आ सकते हैं। कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी प्रदर्शित किया है कि जिन बच्चों की पहचान प्रतिभाशाली के रूप में की गई थी, उनमें से शायद ही किसी एक ने भी जीवन में किसी क्षेत्र में अपनी सर्जनात्मकता के कारण प्रसिद्धि प्राप्त की हो। उच्च और निम्न दोनों प्रकार की सर्जनात्मकता, उच्च बुद्धि तथा औसत बुद्धि वाले बच्चों दोनों में पाई गई है।
शोधकर्ताओं ने पाया है कि सर्जनात्मकता तथा बुद्धि में सकारात्मक संबंध होता है। पुस्तक का निष्कर्ष, जिसे शब्दशः याद करना उपयोगी है: “सर्जनात्मकता के लिए एक विशेष मात्रा में बुद्धि का होना आवश्यक है परंतु उस विशेष मात्रा से अधिक बुद्धि का सर्जनात्मकता से सहसंबंध नहीं होता।” यह वाक्य ठीक इसी रूप में याद रखें: “सर्जनात्मकता बुद्धि से कैसे संबंधित है” प्रश्न का यही उत्तर है।
सर्जनात्मकता परीक्षण
- मुक्त-अंत: कई संभावित उत्तर
- अपसारी चिंतन का उपयोग
- मापन: विविध विचार, नए संबंध, कारण-परिणाम का अनुमान, वस्तुओं का नए ढंग से उपयोग
बुद्धि परीक्षण
- एक निश्चित सही उत्तर अपेक्षित
- अभिसारी चिंतन का उपयोग
- मापन: स्मृति, तार्किक तर्कना, परिशुद्धता, प्रत्यक्षज्ञान-योग्यता, स्पष्ट चिंतन
सर्जनात्मकता परीक्षणों के प्रमुख निर्माता: गिलफोर्ड, टोरेंस, खटेना, वालाश तथा कोगन, परमेश, बाकर मेंहदी, पासी। हर परीक्षण की एक मानकीकृत विधि, विधिपुस्तिका और व्याख्या-संदर्शिका होती है, जिसका उपयोग विस्तृत प्रशिक्षण के बाद ही किया जा सकता है।
क्रियाकलाप 1.1 (बुद्धिमान व्यक्तियों के गुणों का पता लगाना): कक्षा के सबसे बुद्धिमान सहपाठी और तीन अन्य बुद्धिमान व्यक्तियों के गुण लिखकर उनकी तुलना करें। क्रियाकलाप 1.2 (कुछ ‘व्यावहारिक’ बातें): नए विद्यालय/कॉलेज में अच्छे अंक पाने के लिए दिए गए कार्यों का कोटि क्रम तय कर सहपाठियों से मिलाएँ। क्रियाकलाप 1.3: बुद्धि लब्धि का अभिकलन (ऊपर हल किया गया)। परियोजना विचार: (1) पड़ोस के पाँच व्यक्तियों का पाँचों क्षेत्रों में प्रेक्षण-साक्षात्कार कर उनकी मनोवैज्ञानिक परिच्छेदिका की तुलना; (2) पाँच व्यवसायों में सफल निष्पादन के लिए अपेक्षित मनोवैज्ञानिक गुणों का विश्लेषण कर रिपोर्ट।
- व्यक्तिगत भिन्नताएँ = लोगों की विशेषताओं और व्यवहार में वैशिष्ट्य; व्यक्तिगत विशेषक बनाम स्थितिवाद
- पाँच क्षेत्र मूल्यांकित होते हैं: बुद्धि, अभिक्षमता, अभिरुचि, व्यक्तित्व, मूल्य: परीक्षण, साक्षात्कार, व्यक्ति अध्ययन, प्रेक्षण, आत्म-प्रतिवेदन से
- बुद्धि के सिद्धांत: स्पीयरमैन (सा+वि कारक, 1927), थर्स्टन (7 प्राथमिक योग्यताएँ), जेन्सेन (स्तर I/II), गिलफोर्ड (180 प्रकोष्ठ), गार्डनर (8 बहु-बुद्धियाँ), स्टर्नबर्ग (त्रिचापीय: घटकीय/आनुभविक/सांदर्भिक, 1985), दास-नागलीरी-किर्बी (पास: अवधान, सहकालिक-आनुक्रमिक, योजना, 1994)
- IQ = MA/CA × 100 (स्टर्न, 1912); बिने-साइमन (1905, 1908) ने MA दिया; माध्य IQ = 100; तालिका 1-1 का वर्गीकरण
- बौद्धिक अशक्तता: AAMD की तीन-विशेषता परिभाषा; निम्न/सामान्य/तीव्र/अतिगंभीर स्तर। प्रतिभाशालिता: टर्मन 1925, 1500 बच्चे, IQ 130+; अध्यापकों का दृष्टिकोण: योग्यता + सर्जनात्मकता + प्रतिबद्धता
- परीक्षण: वैयक्तिक/समूह, शाब्दिक/अशाब्दिक/निष्पादन, संस्कृति-निष्पक्ष/अभिनत; भारत: मोहसिन, राइस, महलानोबिस, NLEPT
- संस्कृति बुद्धि को आकार देती है: तकनीकी बुद्धि (पश्चिम) बनाम समाकलित बुद्धि/बुद्धि (भारतीय परंपरा, 4 पक्ष)
- सांवेगिक बुद्धि (सैलोवी-मेयर): बुद्धि का भावात्मक पक्ष; अभिक्षमता ≠ अभिरुचि; सर्जनात्मकता के लिए कुछ बुद्धि ज़रूरी, पर गारंटी नहीं
- क्या मैं सा-कारक/वि-कारक का भेद और इसके प्रतिपादक का नाम बता सकता हूँ?
- क्या मैं बिना देखे गार्डनर की सभी 8 बुद्धियाँ बता सकता हूँ?
- क्या मैं त्रिचापीय सिद्धांत के तीन भाग और पास मॉडल की तीन इकाइयाँ समझा सकता हूँ?
- क्या मैं MA और CA से IQ निकाल सकता हूँ, और तालिका 1-1 के सही आँकड़े याद हैं?
- क्या मैं AAMD की बौद्धिक अशक्तता की परिभाषा और उसकी तीन विशेषताएँ बता सकता हूँ?
- क्या मैं समाकलित बुद्धि और भारतीय परंपरा में बुद्धि के चार पक्ष समझा सकता हूँ?
- क्या मैं पुस्तक के अपने शब्दों में बता सकता हूँ कि सर्जनात्मकता बुद्धि से कैसे संबंधित है?