इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. अध्याय के अनुसार समाजशास्त्र में छात्र शून्य से शुरुआत क्यों नहीं करता?
उत्तर: क्योंकि समाज के बारे में सभी को पहले से ही कुछ न कुछ पता होता है, इतिहास, भूगोल, मनोविज्ञान या अर्थशास्त्र के विपरीत, जिनके बारे में बच्चे से स्कूल से पहले कुछ जानने की उम्मीद नहीं की जाती।
प्र. स्ववाचक को परिभाषित कीजिए।
उत्तर: स्ववाचक (या आत्मवाचक) अपने बारे में सोचने, और अपनी दृष्टि को (जो कि अक्सर बाहर की तरफ़ होती है) लगातार अपनी तरफ़ घुमाने की क्षमता है।
प्र. इस अध्याय में ‘भूलना’ का क्या अर्थ है?
उत्तर: भूलना यानी समाज के बारे में पहले से बने सहज बोध को छोड़ना, ताकि समाज का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हो सके; समाजशास्त्र सीखने का प्रारंभिक चरण मुख्यतः यही भूलने की प्रक्रिया है।
प्र. इस अध्याय में सी. राईट मिल्स को कैसे बताया गया है?
उत्तर: एक प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री, जिन्होंने व्यक्तिगत परेशानियों और सामाजिक मुद्दों के बीच की कड़ियों के बारे में लिखा।
प्र. अध्याय के अनुसार भारत की कितनी जनसंख्या छात्र की उम्र या उससे कम उम्र की है?
उत्तर: भारत की लगभग चालीस प्रतिशत (40%) जनसंख्या।
प्र. इस अध्याय के पूर्वदर्शन के अनुसार अध्याय 2 क्या देखेगा?
उत्तर: अध्याय 2 भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना देखता है, यह भी कि समाजशास्त्री जनसंख्या का अध्ययन कैसे करते हैं, जबकि भारत वर्तमान में विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है और चीन को पीछे छोड़ने का अनुमान है।
प्र. इस अध्याय के पूर्वदर्शन के अनुसार अध्याय 3 क्या देखेगा?
उत्तर: अध्याय 3 जाति, जनजाति और परिवार को भारतीय समाज के आधारभूत रचना खंडों के रूप में फिर से देखता है, जिसमें यह भी शामिल है कि सदियों में जाति कैसे बदली है और परिवार के स्वरूप कैसे बदल रहे हैं।
प्र. इस अध्याय के पूर्वदर्शन के अनुसार अध्याय 5 क्या देखेगा?
उत्तर: अध्याय 5 जाति, जनजाति, लिंग और अन्यथा सक्षम लोगों के संदर्भ में सामाजिक विषमता और बहिष्कार के स्वरूप देखता है।
प्र. इस अध्याय के पूर्वदर्शन के अनुसार अध्याय 6 क्या देखेगा?
उत्तर: अध्याय 6 भारत की अपार सांस्कृतिक विविधता से उठने वाली कठिन चुनौतियों को देखता है, जिसमें ‘विविधता में एकता’ के जटिल पहलू शामिल हैं।
प्र. इस अध्याय के पूर्वदर्शन के अनुसार अध्याय 7 क्या प्रस्तुत करेगा?
उत्तर: अध्याय 7 छात्रों और उनके शिक्षकों दोनों के लिए, पाठ्यक्रम के प्रयोगात्मक घटकों के बारे में चिंतन के लिए कुछ सुझाव देता है।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. अध्याय के अनुसार समाज के बारे में हमारे सहज बोध की दो कठिनाइयाँ क्या हैं? समझाइए।
उत्तर: अध्याय कहता है कि ये आस्थाएँ ग़लत हों यह ज़रूरी नहीं, पर कठिनाई यह है कि वे अक्सर (1) अपूर्ण (संपूर्ण का विलोम) होती हैं, यानी अक्सर हमें सामाजिक वास्तविकता का केवल एक हिस्सा दिखाती हैं; और (2) पूर्वाग्रहपूर्ण (निष्पक्ष का विलोम) होती हैं, यानी सामान्यतः हमारे अपने सामाजिक समूह के हितों एवं मतों की तरफ़ झुकी होती हैं।
प्र. समाजशास्त्र के छात्र के लिए समाज के पूर्व-ज्ञान का एक सहायक और एक बाधक पहलू बताइए।
उत्तर: सहायक: छात्र आम तौर पर समाजशास्त्र से डरते नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है यह मुश्किल विषय नहीं होगा, इसकी विषयवस्तु के बारे में उन्हें पहले से कुछ पता है। बाधक: यही पूर्व-ज्ञान समस्या भी है, क्योंकि समाजशास्त्र को सही ढंग से सीखने के लिए छात्र को पहले वह सब भुलाना पड़ता है जो वह पहले से जानता है।
प्र. अध्याय स्ववाचक के साथ कौन-सी शर्त जोड़ता है?
उत्तर: अध्याय कहता है यह स्वनिरीक्षण आलोचनात्मक होना चाहिए, इसमें समीक्षा अधिक और आत्म-मुग्धता कम होनी चाहिए। किताब के अनुसार स्ववाचक से आप स्वयं को ‘बाहर से’ देख सकते हैं, यानी यह कि दूसरे आपको किस तरह देखते हैं।
प्र. अध्याय के अनुसार वे कोई चार पहचानें बताइए जो व्यक्ति को ‘सामाजिक नक्शे’ पर स्थान देती हैं।
उत्तर: इनमें से कोई चार: आयु वर्ग (जैसे ‘युवा पीढ़ी’), क्षेत्रीय/भाषायी समुदाय (जैसे गुजरात से गुजराती भाषी), आर्थिक वर्ग (माता-पिता के व्यवसाय व आय पर आधारित), धार्मिक समुदाय, और जाति या जनजाति।
प्र. इस अध्याय के अनुसार पहली पुस्तक क्या बताती है, और दूसरी पुस्तक क्या बताती है?
उत्तर: पहली पुस्तक (यह पुस्तक) भारतीय समाज की आधारभूत संरचना का परिचय देती है। दूसरी पुस्तक भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास की विशिष्टताओं पर केंद्रित है।
प्र. अध्याय 4 के पूर्वदर्शन के अनुसार उपनिवेशवाद और विकासशील नीतियों ने भारत में आर्थिक बदलाव किस क्रम में लाए?
उत्तर: अध्याय का अपना क्रम है: भारत के सबसे गहरे और तेज़ आर्थिक बदलाव पहले उपनिवेशवाद से आए, और उसके बाद विकासशील नीतियों से।
प्र. अध्याय 3 के पूर्वदर्शन के अनुसार जाति भारतीय उपमहाद्वीप की विशेषता किस रूप में बताई गई है?
उत्तर: अध्याय जाति को भारतीय उपमहाद्वीप की एक विशिष्ट विशेषता बताता है, जिसने हमेशा विद्वानों का ध्यान खींचा है, और अध्याय 3 पूछता है कि सदियों में यह संस्था कैसे बदली है और आज इसका क्या अर्थ है।
प्र. ‘एक परिचय का परिचय’ वाले हिस्से (1.1) में अध्याय क्या करता है?
उत्तर: पूरी पाठ्यपुस्तक का उद्देश्य भारतीय समाज से सहज बोध के नज़रिए से नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से परिचय कराना है। इस हिस्से में किताब पूछती है कि इस परिचय के परिचय में क्या कहा जा सकता है, और उत्तर में उन व्यापक सामाजिक प्रक्रियाओं की तरफ़ संकेत करती है जो भारतीय समाज को आकार दे रही हैं, जिनके बारे में आगे के पृष्ठों में विस्तार से पढ़ा जाएगा।
प्र. अध्याय के अपने उदाहरण के अनुसार ‘आर्थिक वर्ग’ से क्या मतलब है?
उत्तर: आर्थिक वर्ग सामाजिक नक्शे की एक पहचान है, जो व्यक्ति के माता-पिता के व्यवसाय और परिवार की आय पर निर्भर करती है; अध्याय के अपने उदाहरण हैं निम्न मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. सी. राईट मिल्स के अनुसार व्यक्तिगत परेशानी और सामाजिक मुद्दे में फ़र्क़ स्पष्ट कीजिए, अध्याय के अपने उदाहरणों सहित।
उत्तर: व्यक्तिगत परेशानी हर किसी की व्यक्तिगत चिंता, समस्या या सरोकार है, और इसका अर्थ एक व्यक्ति के अपने ही नज़रिए से बनता है; अध्याय के उदाहरण हैं परिवार या दोस्तों के व्यवहार से नाख़ुशी, या भविष्य की नौकरी की चिंता। इसके विपरीत, सामाजिक मुद्दा बड़े समूहों से जुड़ा होता है, न कि उन एकल व्यक्तियों से जो उन समूहों के सदस्य हैं।
प्र. “सहज-ज्ञान या सहज बोध समाजशास्त्र के लिए बाधक भी है और सहायक भी।” अध्याय के अपने तर्क का उपयोग करते हुए समझाइए।
उत्तर: यह सहायक है क्योंकि छात्रों को समाज के बारे में पहले से कुछ पता होता है, इसलिए वे आम तौर पर समाजशास्त्र से डरते नहीं और उन्हें यह मुश्किल विषय नहीं लगता। यह बाधक इसलिए है क्योंकि यही पूर्व-ज्ञान, हमारा सहज बोध, हमारे अपने सामाजिक समूह के दृष्टिकोण से बनता है, इसलिए यह अक्सर अपूर्ण और पूर्वाग्रहपूर्ण होता है। इसी वजह से समाजशास्त्र सीखने का प्रारंभिक चरण मुख्यतः इस सहज बोध को भुलाना है, ताकि समाज की एक ज़्यादा व्यवस्थित, कम एकतरफ़ा समझ बन सके।
प्र. स्ववाचक क्या है, और अध्याय के अनुसार यह स्वनिरीक्षण कैसा होना चाहिए?
उत्तर: स्ववाचक अपने बारे में सोचने, और अपनी दृष्टि को (जो कि अक्सर बाहर की तरफ़ होती है) लगातार अपनी तरफ़ घुमाने की क्षमता है, ताकि आप देख सकें कि दूसरे आपको कैसे देखते हैं। अध्याय कहता है कि यह स्वनिरीक्षण आलोचनात्मक होना चाहिए: इसमें समीक्षा अधिक और आत्म-मुग्धता कम होनी चाहिए।
प्र. अध्याय के कम से कम चार अपने उदाहरणों का उपयोग करते हुए ‘सामाजिक नक्शे’ की अवधारणा समझाइए।
उत्तर: सामाजिक नक्शा बताता है कि आप समाज में विभिन्न सामाजिक पहचानों के ज़रिए कहाँ स्थित हैं। अध्याय के अपने उदाहरण हैं: आयु वर्ग (सत्रह-अठारह साल का व्यक्ति ‘युवा पीढ़ी’ का सदस्य है; भारत की लगभग 40% जनसंख्या आपकी या आपसे छोटी उम्र के लोगों की है), क्षेत्रीय/भाषायी समुदाय (जैसे गुजरात से गुजराती भाषी, या आंध्र प्रदेश से तेलुगु भाषी), आर्थिक वर्ग (माता-पिता के व्यवसाय और परिवार की आय पर आधारित), और धार्मिक समुदाय, जाति या जनजाति। इनमें से हर पहचान आपको सामाजिक नक्शे पर और सामाजिक संबंधों के जाल में स्थान देती है, और समाजशास्त्र यह अध्ययन करता है कि इन समूहों के बीच संबंध क्या हैं और इनका आपके जीवन के लिए क्या मतलब है।
प्र. अध्याय 2, 3 और 4 में क्या-क्या है, अपने शब्दों में संक्षेप में बताइए, जैसा इस अध्याय में पूर्वावलोकित है।
उत्तर: अध्याय 2 भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना देखता है: भारत वर्तमान में विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है और चीन को पीछे छोड़ने का अनुमान है, और यह अध्याय पूछता है कि क्या जनसंख्या विकास में बाधा है, या उसे विकास में किसी तरह की मदद के रूप में भी देखा जा सकता है। अध्याय 3 जाति, जनजाति और परिवार को भारतीय समाज के आधारभूत रचना खंडों के रूप में फिर से देखता है, यह पूछते हुए कि सदियों में जाति कैसे बदली है और आज इसका क्या अर्थ है, ‘जनजाति’ की संकल्पना भारत में कैसे आई, और परिवार के स्वरूप कैसे बदल रहे हैं। अध्याय 4 बाज़ार को एक सामाजिक संस्था और परिवर्तन के वाहक के रूप में देखता है, यह बताते हुए कि भारत के सबसे गहरे आर्थिक बदलाव पहले उपनिवेशवाद से और फिर विकासशील नीतियों से आए।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में समाजशास्त्र उन सभी विषयों से अलग है जिन्हें आपने पढ़ा हो।” पूर्व-ज्ञान, भूलना और स्ववाचक का हवाला देते हुए इस कथन को पूरी तरह समझाइए।
उत्तर: समाजशास्त्र इसलिए अलग है क्योंकि कोई भी छात्र इसे शून्य से शुरू नहीं करता: इतिहास, भूगोल, मनोविज्ञान या अर्थशास्त्र के विपरीत, जहाँ बच्चे से स्कूल से पहले कुछ जानने की उम्मीद नहीं की जाती, हर कोई समाज में पलने-बढ़ने से ही समाज के बारे में कुछ न कुछ जान चुका होता है। एक छः वर्षीय बच्चा भी सामाजिक संबंधों के बारे में कुछ जानता है, और सत्रह-अठारह साल तक छात्र अपने ही समाज के बारे में बिना उसका औपचारिक अध्ययन किए बहुत कुछ जान चुका होता है। यह पूर्व-ज्ञान सहायक भी है, क्योंकि इससे छात्र विषय से डरते नहीं, और बाधक भी, क्योंकि यह सहज बोध अपने ही सामाजिक समूह के दृष्टिकोण से बनता है और इसलिए अक्सर अपूर्ण, यानी सामाजिक वास्तविकता का सिर्फ़ एक हिस्सा दिखाने वाला, और पूर्वाग्रहपूर्ण, यानी सामान्यतः अपने ही समूह के हितों की तरफ़ झुका हुआ होता है। इसीलिए समाजशास्त्र सीखने का प्रारंभिक चरण मुख्यतः इस सहज बोध को भुलाना है। इससे भी मज़ेदार बात, अध्याय के अनुसार, यह है कि समाजशास्त्र स्ववाचक सिखा सकता है, यानी अपनी ही दृष्टि को आलोचनात्मक ढंग से, समीक्षा ज़्यादा और आत्म-मुग्धता कम रखते हुए, स्वयं की तरफ़ मोड़ने की क्षमता, ताकि आप स्वयं को ‘बाहर से’ देख सकें।
प्र. ‘सामाजिक नक्शे’ और ‘व्यक्तिगत परेशानी बनाम सामाजिक मुद्दे’ की अवधारणाओं का उपयोग करते हुए बताइए कि समाजशास्त्र किसी छात्र को अपने ही जीवन को सहज बोध से अलग ढंग से समझने में कैसे मदद करता है।
उत्तर: सहज बोध किसी व्यक्ति को अपना जीवन सिर्फ़ अपने ही निजी नज़रिए से देखने देता है। समाजशास्त्र इसमें दो औज़ार जोड़ता है। पहला, ‘सामाजिक नक्शा’: हर व्यक्ति को एक साथ कई सामाजिक पहचानों से पहचाना जा सकता है, जैसे आयु वर्ग, क्षेत्रीय/भाषायी समुदाय, आर्थिक वर्ग, धार्मिक समुदाय, और जाति या जनजाति (अध्याय के अपने उदाहरण: सत्रह-अठारह साल का व्यक्ति ‘युवा पीढ़ी’ का सदस्य है, और भारत की लगभग 40% जनसंख्या उसकी या उससे छोटी उम्र के लोगों की है; या गुजरात से गुजराती भाषी)। इस नक्शे पर स्वयं को देखने से पता चलता है कि आपकी अपनी स्थिति उन्हीं समूहों के कई और लोगों के साथ साझा है, सिर्फ़ निजी नहीं। दूसरा, सी. राईट मिल्स का फ़र्क़, व्यक्तिगत परेशानी (एक व्यक्ति की चिंता, जिसका अर्थ उसी के निजी नज़रिए तक सीमित है, जैसे भविष्य की नौकरी की चिंता) और सामाजिक मुद्दा (बड़े समूहों से जुड़ी बात, उन्हें बनाने वाले व्यक्तियों से नहीं), छात्र को यह देखने में मदद करता है कि जो निजी चिंता जैसी लगती है, सामाजिक नक्शे पर रखने के बाद, पूरे सामाजिक समूह द्वारा साझा और इसलिए व्यक्तिगत परेशानी की बजाय सामाजिक मुद्दा निकल सकती है। यही मिलकर सहज बोध से अलग एक व्यवस्थित दृष्टि देता है; स्वयं को ‘बाहर से’ देखने की क्षमता को अध्याय स्ववाचक कहता है।
प्र. यह अध्याय पुस्तक के बाक़ी सभी छह अध्यायों का पूर्वदर्शन देता है। अध्याय 2 से 7 तक हर अध्याय में क्या है, एक-एक या दो-दो पंक्तियों में बताइए।
उत्तर: अध्याय 2, भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना, देखता है कि समाजशास्त्री जनसंख्या का अध्ययन कैसे करते हैं, जबकि भारत वर्तमान में विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है और चीन को पीछे छोड़ने का अनुमान है। अध्याय 3, सामाजिक संस्थाएँ: निरंतरता एवं परिवर्तन, जाति, जनजाति और परिवार को फिर से देखता है। अध्याय 4, बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में, बाज़ार को परिवर्तन के वाहक के रूप में देखता है, जो पहले उपनिवेशवाद और फिर विकासशील नीतियों से आकार लेता है। अध्याय 5, सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप, जाति, जनजाति, लिंग और अन्यथा सक्षम लोगों से जुड़ी विषमता व बहिष्कार देखता है। अध्याय 6, सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ, भारत की ‘विविधता में एकता’ के कठिन और जटिल पहलू की जाँच करता है, और अध्याय 6 की भूमिका में कहा गया है कि सभी असफलताओं एवं कमियों के बावजूद भारत ने इस मोर्चे पर कोई बुरा प्रदर्शन नहीं किया है। अध्याय 7, परियोजना कार्य के लिए सुझाव, छात्रों और शिक्षकों को पाठ्यक्रम के प्रयोगात्मक घटकों के बारे में चिंतन के लिए कुछ सुझाव देता है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक क्या मीना की अपनी चिंता, अपने-आप में, व्यक्तिगत परेशानी है या सामाजिक मुद्दा? क्यों?
उत्तर: यह व्यक्तिगत परेशानी है, क्योंकि यह एक व्यक्तिगत चिंता है जिसका अर्थ मीना के अपने निजी नज़रिए से बनता है।
(ख) 2 अंक पूरे ज़िले के कई छात्रों की यह साझा अनिश्चितता व्यक्तिगत परेशानी की बजाय सामाजिक मुद्दा क्यों मानी जाएगी?
उत्तर: क्योंकि यह ज़िले भर के एक बड़े समूह से जुड़ी है, किसी एक व्यक्ति के निजी अनुभव से नहीं; इसे अकेले मीना को देखकर नहीं समझाया जा सकता।
(ग) 3 अंक ‘सामाजिक नक्शे’ के विचार का उपयोग करते हुए बताइए कि मीना की वे पहचानें जो वह अपने ज़िले के दूसरे छात्रों के साथ साझा करती है (जैसे कोई क्षेत्रीय या भाषायी समुदाय), उसकी निजी चिंता को इस व्यापक सामाजिक मुद्दे से कैसे जोड़ सकती हैं।
उत्तर: सामाजिक नक्शा मीना को क्षेत्रीय या भाषायी समुदाय जैसे समूहों में रखता है, ऐसी पहचानें जो वह ज़िले के कई और छात्रों के साथ साझा करती है जो यही अनिश्चितता झेल रहे हैं। मीना की चिंता को इन साझा पहचानों के ज़रिए देखना, न कि सिर्फ़ एक निजी भावना के रूप में, वही है जो मीना की शिक्षिका (और मीना ख़ुद) को उसकी व्यक्तिगत परेशानी को इस बड़े सामाजिक मुद्दे से जोड़ने देता है, ठीक जैसा मिल्स का फ़र्क़ बताता है।