- एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में समाजशास्त्र बाक़ी विषयों से अलग क्यों है, और आपका अपना “सहज बोध” ही आपके ख़िलाफ़ क्यों जा सकता है
- “स्ववाचक” (self-reflexivity) का क्या मतलब है: स्वयं को “बाहर से” देखना सीखना
- “सामाजिक नक्शे” पर स्वयं को कैसे पहचानें
- सी. राईट मिल्स के अनुसार व्यक्तिगत परेशानी और सामाजिक मुद्दे में फ़र्क़
- इस पुस्तक के आगे आने वाले छह अध्यायों में क्या-क्या है
CBSE के 2026-27 के कक्षा 12 समाजशास्त्र पाठ्यक्रम में इकाई 1 “भारतीय समाज: एक परिचय” को गैर-मूल्यांकित (Non-evaluative) बताया गया है, यानी CBSE के थ्योरी पेपर में इसके कोई अंक नहीं हैं। फिर भी इसे छोड़ें नहीं: यह आपकी पाठ्यपुस्तक में है और यह बताता है कि समाजशास्त्र है क्या।
अगर आप किसी दूसरे बोर्ड से पढ़ते हैं, तो अपने बोर्ड का 2026-27 का पाठ्यक्रम देखकर पता करें कि यह अध्याय परीक्षा में है या नहीं।
1 एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में समाजशास्त्र बाक़ी सभी विषयों से अलग क्यों है
इतिहास, भूगोल, मनोविज्ञान या अर्थशास्त्र के बारे में सोचिए। जब कोई बच्चा स्कूल में दाख़िल होता है, तो किसी से यह उम्मीद नहीं की जाती कि उसे इन विषयों के बारे में पहले से कुछ पता हो, इसीलिए इन्हें शून्य से पढ़ाया जाता है। एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में समाजशास्त्र अलग है। समाजशास्त्र में कोई भी व्यक्ति शून्य से शुरुआत नहीं करता, क्योंकि समाज के बारे में सभी को पहले से कुछ न कुछ पता होता है, इसे किसी ने विधिवत “सिखाया” नहीं होता। एक छः वर्षीय बच्चा भी समाज और सामाजिक संबंधों के बारे में कुछ न कुछ जानता है। जब तक आप सत्रह-अठारह साल के होते हैं, आप अपने समाज के बारे में बहुत कुछ जान चुके होते हैं, इसलिए नहीं कि आपने इसका अध्ययन किया, बल्कि इसलिए कि आप इसी समाज में रहते और पले-बढ़े हैं।
1.1 पूर्व-ज्ञान: सहायक भी, बाधक भी
समाज के बारे में यह “पहले से पता होना” समाजशास्त्र के छात्र के लिए दोनों तरफ़ से असर डालता है।
सहायक कैसे
- आम तौर पर छात्र समाजशास्त्र से डरते नहीं
- उन्हें लगता है कि यह मुश्किल विषय नहीं होगा, क्योंकि इसकी विषयवस्तु के बारे में उन्हें पहले से कुछ पता है
बाधक कैसे
- यही पूर्व-ज्ञान ख़ुद एक समस्या बन जाता है
- समाजशास्त्र को सही तरीक़े से सीखने के लिए पहले अपने सहज बोध को “भूलना” पड़ता है
समाज के बारे में पहले से बने-बनाए सहज-ज्ञान को छोड़ना और उधेड़ना, ताकि समाज का वैज्ञानिक अध्ययन शुरू हो सके, इसी को समाजशास्त्र सीखने के शुरुआती चरण में “भूलने” की प्रक्रिया कहा गया है।
किताब इसे एक उदाहरण से समझाती है: जैसे किसी बुने हुए स्वेटर को नये सिरे से बुनने के लिए पहले की बुनाई उधेड़नी पड़ती है, वैसे ही समाजशास्त्र सीखने से पहले हमें समाज के बारे में अपनी पूर्व धारणाओं को उधेड़ना पड़ता है।
1.2 भूलना क्यों ज़रूरी है: अपूर्ण और पूर्वाग्रहपूर्ण ज्ञान
समाज के बारे में हमारा पूर्व-ज्ञान, यानी हमारा सहज बोध (या Common sense), तटस्थ ढंग से नहीं बनता। यह उस सामाजिक समूह और सामाजिक वातावरण के दृष्टिकोण से बनता है जिसमें हम समाजीकृत होते हैं। हमारा सामाजिक संदर्भ समाज और सामाजिक संबंधों के बारे में हमारे मतों, आस्थाओं और अपेक्षाओं को आकार देता है। ये आस्थाएँ ग़लत ही हों, यह ज़रूरी नहीं, परंतु यह ग़लत हो भी सकती हैं। किताब के अनुसार असली कठिनाई यह है कि वे अक्सर अपूर्ण और पूर्वाग्रहपूर्ण होती हैं।
किताब के अनुसार सहज बोध की आस्थाओं की दो कठिनाइयाँ हैं, वे अक्सर:
1. अपूर्ण होती हैं (संपूर्ण का विलोम)
2. पूर्वाग्रहपूर्ण होती हैं (निष्पक्ष का विलोम)
इसलिए हमारा “बिना सीखा” सहज बोध अक्सर हमें सामाजिक वास्तविकता का केवल एक हिस्सा दिखाता है, और यह सामान्यतः हमारे अपने सामाजिक समूह के हितों एवं मतों की तरफ़ झुका होता है। यही वजह है कि समाजशास्त्र सबसे पहले इसे भुलवाना चाहता है।
यह न लिखें कि समाज के बारे में सहज बोध पूरी तरह “ग़लत” होता है। किताब कभी ऐसा नहीं कहती, वह कहती है कि यह ग़लत हो भी सकता है और नहीं भी, लेकिन अक्सर अपूर्ण और पूर्वाग्रहपूर्ण होता है।
2 स्ववाचक: स्वयं को “बाहर से” देखना
किताब के शब्दों में, “इससे भी मज़ेदार बात यह है कि” समाजशास्त्र आपको दिखा सकता है कि दूसरे आपको कैसे देखते हैं, और सिखा सकता है कि आप स्वयं को बाहर से कैसे देखें। किताब इस क्षमता को स्ववाचक कहती है।
स्ववाचक (या कभी-कभी आत्मवाचक) अपने बारे में सोचने, और अपनी दृष्टि को (जो कि अक्सर बाहर की तरफ़ होती है) लगातार अपनी तरफ़ घुमाने की क्षमता है।
किताब एक शर्त जोड़ती है: यह स्वनिरीक्षण आलोचनात्मक होना चाहिए, यानी इसमें समीक्षा अधिक और आत्म-मुग्धता कम होनी चाहिए।
3 सामाजिक नक्शा: आप समाज में कहाँ हैं?
एक “सामाजिक नक्शा” आपको बताता है कि आप समाज में कहाँ स्थित हैं। किताब इस विचार को सत्रह-अठारह साल के छात्र के उदाहरण से समझाती है: आप उस सामाजिक समूह के सदस्य हैं जिसे “युवा पीढ़ी” कहा जाता है, और आपकी या आपसे छोटी उम्र के लोग भारत की लगभग 40% जनसंख्या हैं। पर उम्र सिर्फ़ एक पहचान है, सामाजिक नक्शे पर आपको और भी पहचानें रखती हैं।
3.1 सामाजिक नक्शे पर आपकी पहचानें
आयु वर्ग
“युवा पीढ़ी”: किताब का अपना उदाहरण है 17-18 साल या उससे कम उम्र के लोग, यानी भारत की लगभग 40% जनसंख्या।
क्षेत्रीय / भाषायी समुदाय
किताब के अपने उदाहरण: गुजरात से गुजराती भाषी, या आंध्र प्रदेश से तेलुगु भाषी।
आर्थिक वर्ग
यह आपके माता-पिता के व्यवसाय और परिवार की आय पर निर्भर करता है, जैसे निम्न मध्यम वर्ग या उच्च वर्ग।
धार्मिक समुदाय
किसी विशेष धार्मिक समुदाय की सदस्यता।
जाति या जनजाति
किसी जाति, जनजाति या अन्य ऐसे सामाजिक समूह की सदस्यता।
इनमें से हर पहचान आपको सामाजिक नक्शे पर, और सामाजिक संबंधों के जाल में, एक जगह देती है। समाजशास्त्र आपको बताता है कि समाज में कैसे-कैसे समूह हैं, उनके आपसी संबंध क्या हैं, और इसका आपके अपने जीवन के लिए क्या मतलब है।
4 व्यक्तिगत परेशानियाँ और सामाजिक मुद्दे: सी. राईट मिल्स
समाजशास्त्र सिर्फ़ लोगों या समूहों को नक्शे पर जगह देने से कहीं ज़्यादा कर सकता है। जैसा सी. राईट मिल्स, एक प्रसिद्ध अमेरिकी समाजशास्त्री, ने लिखा है, समाजशास्त्र “व्यक्तिगत परेशानियों” और “सामाजिक मुद्दों” के बीच की कड़ियाँ उजागर करने में मदद कर सकता है।
4.1 मिल्स का यह फ़र्क़
व्यक्तिगत परेशानी
- हर किसी की व्यक्तिगत चिंता, समस्या या सरोकार
- किताब के अपने उदाहरण: घरवालों/दोस्तों के व्यवहार से नाख़ुश होना; भविष्य की नौकरी की चिंता; गर्व, तनाव, आत्मविश्वास या उलझन
- एक व्यक्ति से जुड़ी होती है, और उसी के निजी नज़रिए से अर्थ पाती है
सामाजिक मुद्दा
- बड़े समूहों से जुड़ा होता है, न कि उन्हें बनाने वाले एकल व्यक्तियों से
- इसे किसी एक व्यक्ति के निजी अनुभव तक सीमित नहीं किया जा सकता
व्यक्तिगत परेशानी हर किसी की व्यक्तिगत चिंता, समस्या या सरोकार है, जिसका अर्थ एक व्यक्ति के अपने नज़रिए तक सीमित रहता है। सामाजिक मुद्दा बड़े समूहों से जुड़ा होता है, न कि उन एकल व्यक्तियों से जो उन समूहों के सदस्य हैं। (सी. राईट मिल्स, जैसा इस अध्याय में बताया गया है।)
5 एक परिचय का परिचय…
इस पाठ्यपुस्तक का पूरा मक़सद है भारतीय समाज से आपका परिचय कराना, लेकिन सहज बोध के नज़रिए से नहीं, बल्कि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से। किताब अपने इस हिस्से (1.1) को “एक परिचय का परिचय…” कहती है और पूछती है, “इस परिचय के परिचय में क्या कहा जा सकता है?” उत्तर में वह उन व्यापक सामाजिक प्रक्रियाओं की तरफ़ संकेत करती है जो भारतीय समाज को आकार दे रही हैं, जिनके बारे में आप आगे के पृष्ठों में विस्तार से पढ़ेंगे।
6 पाठ्यपुस्तक का पूर्वदर्शन
यह समाजशास्त्र की दो पाठ्यपुस्तकों में से पहली है।
6.1 दो पाठ्यपुस्तकें, एक पाठ्यक्रम
पहली पुस्तक: भारतीय समाज (यह पुस्तक)
- भारतीय समाज की आधारभूत संरचना
- सात अध्याय, अध्याय 1 से 7
दूसरी पुस्तक: भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास
- भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास की विशिष्टताएँ
- आठ अध्याय, दूसरी पुस्तक के अध्याय 1 से 8 (साइट पर अध्याय 8 से 15)
6.2 इस पुस्तक के हर अध्याय में क्या है
| अध्याय | शीर्षक | क्या देखता है |
|---|---|---|
| 2 | भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना | भारत आज विश्व का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश है, अनुमान है कि यह चीन को पीछे छोड़ देगा; समाजशास्त्री एवं जनसांख्यिकीविद् जनसंख्या का अध्ययन कैसे करते हैं; जनसंख्या के कौन से पक्ष सामाजिक तौर पर महत्त्वपूर्ण हैं; और क्या जनसंख्या विकास में बाधा है या मदद के रूप में भी देखी जा सकती है |
| 3 | सामाजिक संस्थाएँ: निरंतरता एवं परिवर्तन | जाति, जनजाति और परिवार भारतीय समाज के आधारभूत रचना खंड हैं: जाति सदियों में कैसे बदली है, आज इसका क्या अर्थ है, और परिवार के स्वरूप कैसे बदल रहे हैं |
| 4 | बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में | बाज़ार एक शक्तिशाली सामाजिक संस्था और परिवर्तन का वाहक है; सबसे गहरा प्रभाव डालने वाले एवं त्वरित आर्थिक परिवर्तन पहले उपनिवेशवाद से आए, फिर विकासशील नीतियों से; भारत में विभिन्न प्रकार के बाज़ारों का उदय कैसे हुआ और इसने किन नयी प्रक्रियाओं को जन्म दिया |
| 5 | सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप | जाति, जनजाति, लिंग और अन्यथा सक्षम लोगों से जुड़ी विषमता और बहिष्कार; जाति बहिष्कार रोकने वाले आंदोलन कितने सफल रहे; जनजातीय आंदोलनों की विशेष समस्याएँ और जनजातीय पहचान का पुनःस्थापन; महिलाओं का शोषण करने वाली संस्थाओं पर महिला आंदोलनों का प्रभाव |
| 6 | सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ | भारत की अपार विविधता, “विविधता में एकता” का जटिल पहलू; युवा वयस्क सामुदायिक संघर्ष, क्षेत्रीय या भाषायी उग्रराष्ट्रीयता एवं जातिवाद का सामना कैसे करें; और यह क्यों ज़रूरी है कि भारत का कोई भी अल्पसंख्यक ख़ुद को असुरक्षित न महसूस करे |
| 7 | परियोजना कार्य के लिए सुझाव | छात्रों और शिक्षकों के लिए, पाठ्यक्रम के प्रयोगात्मक घटकों के बारे में चिंतन के लिए कुछ सुझाव |
यह न लिखें कि अध्याय 4 “उपनिवेशवाद के बारे में” है। किताब के पूर्वदर्शन के अनुसार अध्याय 4 बाज़ार को एक शक्तिशाली संस्था के रूप में देखता है। उपनिवेशवाद और उसके बाद विकासशील नीतियाँ वे शक्तियाँ बताई गई हैं जिनसे सबसे गहरे आर्थिक परिवर्तन आए; यही भारत में बाज़ारों के उदय का संदर्भ है।
किताब कहती है: “सभी असफलताओं एवं कमियों के बावजूद भारत ने इस मोर्चे पर कोई बुरा प्रदर्शन नहीं किया है।” यानी किताब भारत के रिकॉर्ड को बुरा नहीं मानती, पर इसे पूर्ण सफलता भी नहीं कहती।
- क्या मैं बता सकता हूँ कि समाजशास्त्र इतिहास, भूगोल, मनोविज्ञान या अर्थशास्त्र से अलग क्यों है?
- क्या मैं सहज बोध की दोनों कठिनाइयाँ (अपूर्ण और पूर्वाग्रहपूर्ण), कोष्ठक के विलोम सहित, शब्दशः बता सकता हूँ?
- क्या मैं स्ववाचक की परिभाषा दे सकता हूँ, “आलोचनात्मक होना चाहिए” वाली शर्त सहित?
- क्या मैं कम से कम चार पहचानें गिना सकता हूँ जो किसी को सामाजिक नक्शे पर रखती हैं?
- क्या मैं किताब के अपने उदाहरणों सहित व्यक्तिगत परेशानी और सामाजिक मुद्दे में फ़र्क़ बता सकता हूँ?
- क्या मैं अध्याय 2 से 7 तक हर अध्याय के बारे में एक-एक पंक्ति बता सकता हूँ?
- एक महत्त्वपूर्ण अर्थ में समाजशास्त्र अन्य विषयों से अलग है: इसमें कोई भी शून्य से शुरुआत नहीं करता, क्योंकि समाज के बारे में आपको पहले से कुछ पता होता है
- पूर्व-ज्ञान सहायक भी है (विषय से डर नहीं लगता) और बाधक भी (पहले इसे भूलना पड़ता है)
- समाज के बारे में सहज बोध अक्सर अपूर्ण (संपूर्ण का विलोम) और पूर्वाग्रहपूर्ण (निष्पक्ष का विलोम) होता है
- स्ववाचक का मतलब है अपनी दृष्टि को लगातार अपनी तरफ़ घुमाना; यह स्वनिरीक्षण आलोचनात्मक हो (समीक्षा अधिक, आत्म-मुग्धता कम)
- सामाजिक नक्शा: आयु वर्ग, क्षेत्र/भाषा, आर्थिक वर्ग, धर्म, जाति/जनजाति, हर एक आपको समाज में जगह देता है
- सी. राईट मिल्स: व्यक्तिगत परेशानी एक व्यक्ति से जुड़ी है; सामाजिक मुद्दा बड़े समूहों से
- यह दो में से पहली पुस्तक है: पहली भारतीय समाज की आधारभूत संरचना बताती है, दूसरी सामाजिक परिवर्तन एवं विकास
- आगे के अध्याय: 2 जनसांख्यिकी, 3 जाति/जनजाति/परिवार, 4 बाज़ार, 5 विषमता एवं बहिष्कार, 6 सांस्कृतिक विविधता, 7 परियोजना कार्य (प्रयोगात्मक घटक)
- 1 अंकस्ववाचक को परिभाषित कीजिए।
- 2 अंककिताब के अनुसार समाज के बारे में सहज बोध की दो कठिनाइयाँ क्या हैं?
- 4 अंककिताब के अपने उदाहरणों सहित, व्यक्तिगत परेशानी और सामाजिक मुद्दे में फ़र्क़ स्पष्ट कीजिए।
- 6 अंक“सहज-ज्ञान या सहज बोध समाजशास्त्र के लिए बाधक भी है और सहायक भी।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।