- यह अध्याय बाक़ी अध्यायों से अलग क्यों है, और CBSE का पाठ्यक्रम इसके बारे में क्या कहता है
- एक व्यापक विषय को एक ठोस, उत्तर देने लायक़ शोध प्रश्न में कैसे बदलें
- पुस्तक की चार शोध पद्धतियाँ, सर्वेक्षण, साक्षात्कार, प्रेक्षण और ऐतिहासिक पद्धति, और सर्वेक्षण व साक्षात्कार के वे लाभ और कमज़ोरियाँ जो पुस्तक बताती है
- किसी प्रश्न के लिए सही पद्धति कैसे चुनें, अपनी पसंदीदा पद्धति पहले चुनने के बजाय
- पुस्तक के छह सुझाए गए परियोजना विषय, हर एक के साथ पूछे जाने वाले सवाल
- परियोजना की लिखित रिपोर्ट के लिए एक सुझाया गया ढाँचा (नोट्स का अपना)
1पहले यह समझें: यह किस तरह का अध्याय है
इस पुस्तक के बाक़ी सभी अध्याय आपको समाजशास्त्र एक विषय के रूप में पढ़ाते हैं, विचार, विचारक, संस्थाएँ और तथ्य, जिन पर सीधे सवाल पूछे जा सकते हैं। यह अध्याय अलग है। यह समाजशास्त्र का कोई नया विषय नहीं पढ़ाता। यह आपको सिखाता है कि समाजशास्त्रीय शोध का एक छोटा टुकड़ा ख़ुद कैसे करें, यही वह परियोजना कार्य है जो आपकी बोर्ड परीक्षा के साथ-साथ चलता है। शोध के बारे में पढ़ना और उसे वास्तव में करना, दोनों बहुत अलग चीज़ें हैं, और यही फ़र्क़ पाटना इस अध्याय का काम है।
आगे बढ़ने से पहले, पुस्तक स्वयं यह कहती है कि आप कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक ‘समाजशास्त्र परिचय’ के अध्याय 5, “समाजशास्त्र – अनुसंधान पद्धतियाँ” को एक बार फिर देख लें। उस अध्याय में शोध पद्धतियों की सामान्य जानकारी दी गई थी, यह अध्याय उन्हीं पद्धतियों को असली परियोजना विचारों पर लागू करता है, जिन्हें आप स्कूल में वाक़ई आज़मा सकते हैं।
CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र की पाठ्यक्रम-संरचना में इकाई 7, “Suggestions for Project Work” (परियोजना कार्य के लिए सुझाव), 80 अंक के थ्योरी प्रश्नपत्र में “Non-evaluative” (गैर-मूल्यांकित) लिखी है।
इसी पाठ्यक्रम में परियोजना कार्य (Project Work) के अधिकतम 20 अंक हैं: शैक्षणिक वर्ष में विद्यालय स्तर पर की गई परियोजना 15 अंक (परिचय 2, उद्देश्य-कथन 2, शोध प्रश्न 2, पद्धति 3, आँकड़ों का विश्लेषण 4, निष्कर्ष 2) और परियोजना पर आधारित मौखिकी (viva) 5 अंक।
अन्य बोर्ड: पुस्तक यह नहीं बताती कि कोई बोर्ड इस अध्याय का मूल्यांकन कैसे करता है। अपने बोर्ड का वर्तमान पाठ्यक्रम देखें।
2इस पूरे अध्याय के पीछे एक ही विचार
इस अध्याय की लगभग हर बात एक ही नियम से निकलती है। बस यह एक बात समझ लें, बाक़ी सब अपने-आप समझ में आ जाएगा।
शोध प्रश्न वह ठोस, ख़ास बात है जिसका उत्तर आपकी परियोजना ढूँढ़ना चाहती है। शोध पद्धति वह तरीक़ा है जिससे आप उसका उत्तर देने के लिए सबूत जुटाते हैं, जैसे सर्वेक्षण, साक्षात्कार या प्रेक्षण।
“प्रत्येक अनुसंधान प्रश्न यानी शोध विषय पर कार्य करने के लिए एक उपयुक्त अनुसंधान पद्धति की आवश्यकता होती है। एक प्रश्न का उत्तर अक्सर एक से अधिक पद्धतियों से दिया जा सकता है लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि एक अनुसंधान पद्धति सभी प्रश्नों के लिए उपयुक्त हो। दूसरे शब्दों में, अधिकांश शोध प्रश्नों के लिए, शोधकर्ता के पास संभावित पद्धतियों को चुनने की स्वतंत्रता होती है, लेकिन यह चुनाव आमतौर पर सीमित होता है।”
NCERT, भारतीय समाज, अध्याय 7
2.1 पद्धति चुनते समय व्यापक विषय से पद्धति तक

शोध प्रश्न का सावधानीपूर्वक निर्धारण करने के बाद, शोधकर्ता का पहला काम उपयुक्त पद्धति का चयन है। पुस्तक के अनुसार यह चयन दो बातों पर एक साथ निर्भर करता है, अकेले किसी एक पर नहीं:
तकनीकी कसौटियाँ (प्रश्न और पद्धति की संगतता)
यह पद्धति इस ख़ास प्रश्न के लिए कितनी उपयुक्त है? निजी भावनाओं वाले प्रश्न के लिए ऐसी पद्धति चाहिए जिसमें लोग खुलकर बोल सकें, बड़ी आबादी की राय जानने वाले प्रश्न के लिए एक साथ कई लोगों तक पहुँचने वाली पद्धति चाहिए।
व्यावहारिकता
आपके पास वास्तव में कितना समय है? आपके पास लोग और सामग्री, दोनों तरह के कितने संसाधन उपलब्ध हैं? आप किन असली परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, विद्यालय किस तरह का है, छात्र कितने हैं, अनुमति कहाँ से लेनी है।
3पुस्तक का अपना उदाहरण: एक प्रश्न, तीन पद्धतियाँ
पुस्तक एक ही चलते उदाहरण से यह पूरी प्रक्रिया दिखाती है: सह-शिक्षा विद्यालयों की तुलना ‘केवल बालकों’ या ‘केवल बालिकाओं’ वाले विद्यालयों से करना।
पुस्तक इसी व्यापक विषय के लिए दो और विशेष प्रश्न भी देती है, ताकि “सिकोड़ना” क्या होता है यह साफ़ समझ आए: “क्या सह-शिक्षा विद्यालयों के छात्र पढ़ाई में बेहतर करते हैं?” और “क्या केवल बालकों वाले विद्यालय खेल-कूद में हमेशा बेहतर होते हैं?”
3.1 एक ही प्रश्न, दो रास्ते
साक्षात्कार का रास्ता
- छात्रों से सीधे पूछें कि वे अपने विद्यालय के बारे में कैसा महसूस करते हैं
- अलग-अलग तरह के विद्यालयों के उत्तरों में फ़र्क़ देखें
प्रेक्षण का रास्ता
- दोनों तरह के विद्यालयों में समय बिताकर देखें कि छात्र वास्तव में कैसा व्यवहार करते हैं
- कुछ कसौटियाँ निर्धारित करें जिनके आधार पर कहा जा सके कि छात्र अपने विद्यालय से कितना ख़ुश हैं
तीसरा विकल्प सर्वेक्षण है: छात्र अपने विद्यालय के बारे में कैसा महसूस करते हैं, इस पर एक प्रश्नावली बनाएँ, दोनों तरह के विद्यालयों में बराबर संख्या में छात्रों को बाँटें, फिर भरी हुई प्रश्नावलियाँ इकट्ठा करके उनका विश्लेषण करें।
पुस्तक सर्वेक्षण के इसी रास्ते के लिए ये व्यावहारिक कठिनाइयाँ उदाहरण के रूप में देती है, और इसी तरह की और भी समस्याएँ आ सकती हैं: पर्याप्त प्रतियाँ बनाने में समय, मेहनत और पैसा लगता है; कक्षा में प्रश्नावली बाँटने के लिए अध्यापक की अनुमति चाहिए होती है, और पहली बार में यह अनुमति मिले, ज़रूरी नहीं; प्रश्नावली बाँटने के बाद भी कई छात्र उसे भरकर वापस नहीं करते, या सब प्रश्नों के उत्तर नहीं देते। तब यह तय करना होता है कि इससे कैसे निपटा जाए, अधूरी प्रश्नावली भरने वालों के पास दोबारा जाकर पूरा भरने को कहें, या अपूर्ण प्रश्नावलियों को एक तरफ़ छोड़कर ठीक से भरी गई प्रश्नावलियों पर ही विचार करें, या केवल पूरे दिए गए उत्तरों के आधार पर ही निर्णय लें। पुस्तक कहती है कि शोध कार्य के दौरान ऐसी व्यावहारिक समस्याओं से निपटने के लिए तैयार रहना होगा।
4चार शोध पद्धतियाँ
प्रश्न तय होने के बाद आप इन्हीं चार पद्धतियों में से चुनते हैं। हर एक किस काम में अच्छी है, और सर्वेक्षण व साक्षात्कार की जो कमज़ोरियाँ पुस्तक बताती है, उन्हें जान लें, यही जानकारी आपको परियोजना रिपोर्ट में अपनी पद्धति का चुनाव सही ठहराने में काम आएगी।
4.1 सर्वेक्षण प्रणाली
सर्वेक्षण में अपेक्षाकृत बड़ी संख्या में लोगों (30, 1000, 2000 या इससे भी अधिक, “बड़ी संख्या” विषय और संदर्भ पर निर्भर करती है) से एक जैसे तय किए गए प्रश्न पूछे जाते हैं। या तो शोध करने वाला व्यक्ति (जिसे पुस्तक “अन्वेषक” कहती है) ख़ुद पूछकर उत्तर लिख लेता है, या प्रश्नावली उत्तरदाताओं को थमा दी जाती है ताकि वे स्वयं भर सकें।
✓ सर्वेक्षण, ताक़त
- एक साथ बहुत सारे लोगों तक पहुँच सकता है
- परिणाम पूरे समूह या जनसंख्या का सही प्रतिनिधित्व करते हैं
✗ सर्वेक्षण, कमज़ोरी
- प्रश्न पहले से तय होते हैं, बीच में कोई फेरबदल नहीं हो सकता
- अगर उत्तरदाता किसी प्रश्न को ठीक से न समझें तो ग़लत या भ्रामक परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं
- किसी दिलचस्प उत्तर पर आगे और सवाल नहीं पूछे जा सकते
- प्रश्नावलियाँ एक विशेष समय पर खींची गई फ़ोटो की तरह एक निश्चित स्थिति का ही चित्र प्रस्तुत करती हैं, पहले या बाद की बदली हुई स्थिति सर्वेक्षण में शामिल नहीं होती
4.2 साक्षात्कार
साक्षात्कार हमेशा आमने-सामने लिया जाता है और इसमें सर्वेक्षण से कहीं कम लोग शामिल होते हैं (जैसे 5, 20 या 40, आमतौर पर इससे अधिक नहीं)। यह संरचित हो सकता है (पहले से तय प्रश्नों के क्रम में) या असंरचित (जिसमें सिर्फ़ विषय पहले से तय होते हैं, असली प्रश्न बातचीत के दौरान ही उभरते हैं)। साक्षात्कार कम या ज़्यादा गहन भी हो सकता है, एक लंबी बैठक (2 से 3 घंटे) में, या कई बार मिलकर, ताकि पूरी विस्तृत कहानी मिल सके।
✓ साक्षात्कार, ताक़त
- लचीला होता है, किसी अच्छे विषय पर गहराई से जाया जा सकता है
- प्रश्नों को बीच में सुधारा या बदला जा सकता है
- तुरंत स्पष्टीकरण माँगा जा सकता है
✗ साक्षात्कार, कमज़ोरी
- बड़ी संख्या में लोगों तक नहीं पहुँच सकता
- यह व्यक्तियों के एक चयनित समूह के विचारों को ही प्रस्तुत कर सकता है
4.3 प्रेक्षण
प्रेक्षण वह पद्धति है जिसमें शोधकर्ता चुनी हुई परिस्थिति में जो कुछ हो रहा है उसे व्यवस्थित रूप से देखता और दर्ज करता है, बिना पहले से यह तय किए कि क्या प्रासंगिक है और क्या नहीं। (यह सामान्य प्रेक्षण की बात है; पुस्तक के ख़ुशी वाले उदाहरण में यह भी कहा गया है कि छात्र कितने ख़ुश हैं, यह कहने के लिए कुछ कसौटियाँ निर्धारित करनी होंगी।)
जो नहीं हो रहा, वह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है जितना जो हो रहा है। पुस्तक का अपना उदाहरण: अगर आप देख रहे हैं कि अलग-अलग वर्ग के लोग किसी सार्वजनिक स्थान का इस्तेमाल कैसे करते हैं, तो यह जानना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण होता है कि कोई एक वर्ग या समूह, जैसे ग़रीब या मध्य वर्ग के लोग, उस जगह कभी न गए हों या उसे कभी देखा न हो। अनुपस्थिति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
4.4 ऐतिहासिक पद्धति
पुस्तक ऐतिहासिक पद्धति की कोई अलग से औपचारिक परिभाषा नहीं देती, यह सिर्फ़ उदाहरण से समझाई गई है। पुरानी सामग्री, जैसे पुराने समाचारपत्र, पत्रिकाएँ या पुराने टेलीविज़न कार्यक्रम, के आधार पर यह पता लगाना कि कोई चीज़ पहले कैसी थी, यही ऐतिहासिक पद्धति है।
4.5 एक से अधिक पद्धतियों का सम्मिश्रण
पद्धतियों को अकेले ही इस्तेमाल करना ज़रूरी नहीं, इस सम्मिश्रण को अपनाने के लिए अक्सर सिफ़ारिश की जाती है, क्योंकि इससे एक ही प्रश्न को अलग-अलग नज़रिए से देखा जा सकता है।
पुस्तक का अपना उदाहरण: जनसंचार के साधनों (समाचारपत्र, टेलीविज़न) की सामाजिक जीवन में बदलती जगह पर शोध करते समय सर्वेक्षण (आज क्या हो रहा है) और ऐतिहासिक पद्धति (पुराने समाचारपत्र, पत्रिकाएँ और टेलीविज़न कार्यक्रम, पहले कैसा था) दोनों को साथ अपनाना।
5पुस्तक के सुझाए गए छह विषय
ये विषय हैं, तैयार प्रश्न नहीं। हर विषय को एक विशेष प्रश्न में सिकोड़ना अभी भी आपका काम है, और फिर उसी प्रश्न के अनुसार पद्धति चुननी है, ठीक जैसा भाग 3 में दिखाया गया। आप अपने अध्यापकों से परामर्श करके अन्य विषय भी चुन सकते हैं। अधिकांश विषयों के लिए अधिकांश प्रणालियाँ अपनाई जा सकती हैं, लेकिन आपने जिस प्रश्न विशेष को चुना है, उसके लिए अपनाई जाने वाली प्रणाली उपयुक्त होनी चाहिए। जो विषय पाठ्यपुस्तकों से स्पष्ट या प्रत्यक्ष रूप से नहीं लिए गए, उन पर पुस्तक विशेष बल देती है, “क्योंकि पाठ्य सामग्री से संबंधित अपने परियोजनागत विचारों पर सोचना आपके तथा आपके अध्यापकों के लिए अधिक आसान होगा।”
5.1 विषय-दर-विषय
सार्वजनिक परिवहन
लोगों के जीवन में इसकी क्या भूमिका है, इसकी आवश्यकता किन्हें होती है और क्यों? विभिन्न प्रकार के लोग इस पर कितने निर्भर हैं? इससे किस तरह की समस्याएँ जुड़ी हैं? समय के साथ यह कैसे बदला है? क्या इसकी उपलब्धता में अंतर से सामाजिक समस्याएँ पैदा होती हैं? क्या ऐसे समूह हैं जिन्हें सार्वजनिक परिवहन की आवश्यकता नहीं होती, और उनकी इसके प्रति क्या सोच है? आप परिवहन के किसी एक साधन, ताँगा, रिक्शा या रेलगाड़ी, का अपने कस्बे या शहर के संदर्भ में इतिहास भी लिख सकते हैं: इसमें क्या परिवर्तन हुए, किन साधनों से इसका मुक़ाबला रहा, उसमें किसकी जीत या हार हुई और क्यों, इसका भविष्य कैसा होगा, और क्या कोई इसकी कमी महसूस करेगा। दिल्ली में रहने वाले छात्र एक विज्ञान-कथा लिख सकते हैं कि लगभग 50 साल बाद, यानी 2050 या 2060 में, मेट्रो कैसी होगी, और हर कल्पना का कारण वर्तमान परिस्थितियों से जोड़कर दे सकते हैं।
सामाजिक जीवन में संचार माध्यमों की भूमिका
इसमें जनसंचार के साधन (समाचारपत्र, टेलीविज़न, फ़िल्में, इंटरनेट) और परस्पर संपर्क के साधन (दूरभाष, पत्र, मोबाइल फ़ोन, ई-मेल, इंटरनेट) दोनों आते हैं। आप सामाजिक जीवन में संचार माध्यमों के बदलते स्थान और मुद्रित सामग्री, रेडियो, टेलीविज़न जैसे माध्यमों में होने वाले परिवर्तनों का अन्वेषण कर सकते हैं: क्या टेलीविज़न ने रेडियो और समाचारपत्रों के महत्त्व को वास्तव में कम कर दिया है, अथवा प्रत्येक माध्यम का अपना अलग स्थान है, और लोग किसी एक माध्यम को अधिक पसंद क्यों करते हैं? आप फ़िल्मों, पुस्तकों आदि के बारे में विशेष समूहों (वर्गों, आयु समूहों, लिंगों) की पसंद-नापसंद पर, या नए संचार माध्यमों (मोबाइल फ़ोन, इंटरनेट) और उनके प्रभाव के बारे में लोगों के दृष्टिकोण पर भी प्रश्न पूछ सकते हैं। प्रेक्षण से कही गई बातों और वास्तविक व्यवहार के बीच का अंतर जाना जा सकता है, जैसे लोग जितने घंटे टेलीविज़न देखने की बात सोचते हैं, क्या वास्तव में उतने ही घंटे देखते हैं। या यह विश्लेषण किया जा सकता है कि माध्यमों ने विद्यालय और विद्यालयी शिक्षा, पर्यावरण, जाति, धार्मिक संघर्षों, खेल-कूद के कार्यक्रम, स्थानीय बनाम राष्ट्रीय या क्षेत्रीय समाचार जैसे विषयों का कैसा विवेचन किया है।
घर-परिवार में काम आने वाले उपकरण एवं घरेलू कार्य
स्टोव, मिक्सी, इस्तरी, कपड़े धोने की मशीन, ओवन, प्रेशर कुकर। इनके आने से घर के भीतर श्रम-विभाजन, यानी काम का बँटवारा (घर में कौन कौन-सा काम करता है), बदला है या नहीं? इन्हें कौन इस्तेमाल करता है, अधिकतर पुरुष या स्त्रियाँ, जवान या बूढ़े, वेतन-भोगी या निःशुल्क काम करने वाले? इनका प्रयोग करने वाले इनके बारे में क्या महसूस करते हैं? क्या इन उपकरणों ने काम को वास्तव में आसान बना दिया है? क्या घर के भीतर आयु से संबंधित कार्यों में कोई परिवर्तन आया है? एक आसान संस्करण: बस यह देखें कि आज घर के काम कैसे बँटे हैं और हाल में इसमें कोई बदलाव आया है या नहीं।
सार्वजनिक स्थान का उपयोग
खुला मैदान, सड़क किनारे की जगह, ख़ाली भूखंड, दफ़्तरों के बाहर की जगह। कुछ जगहों पर छोटे-मोटे धंधे चलते हैं, कुछ ख़ाली दिखने वाली जगहें विवाह, धार्मिक समारोह या सभाओं के लिए इस्तेमाल होती हैं, और कुछ पर बेघर लोग रहने लगते हैं। विभिन्न वर्गों के लोग सार्वजनिक स्थान के उपयोग के बारे में क्या महसूस करते हैं, और इन वर्गों के लिए इस खाली जगह का क्या उपयोग हो सकता है? आपके पड़ोस की किसी खाली जगह का इस्तेमाल समय के साथ कैसे बदलता रहा है? क्या इसकी वजह से कोई लड़ाई-झगड़ा या मनमुटाव होता है, और इसके क्या कारण हैं?
विभिन्न आयु वर्गों की बदलती हुई आकांक्षाएँ
क्या लोगों की महत्त्वाकांक्षाएँ बड़े होते-होते बदलती हैं, ख़ासकर कम उम्र में? विभिन्न प्रकार के विद्यालयों में कक्षा 5, 8 और 11 जैसे अलग-अलग आयु वर्गों, स्त्री-पुरुष, या विभिन्न पैतृक पृष्ठभूमियों की तुलना करें और देखें कि परिवर्तन का कोई विशेष रूप दिखता है या नहीं। वयस्कों को भी शामिल किया जा सकता है, यह देखने के लिए कि उन्हें ऐसे परिवर्तन याद आते हैं या नहीं, और विद्यालय जाने वाले बच्चों की तुलना में विद्यालयी शिक्षा समाप्त कर चुके लोगों में परिवर्तनों का कोई निश्चित स्वरूप है या नहीं।
एक वस्तु की जीवनी
“वस्तु” का मतलब यहाँ बस वह चीज़ है जिसे आप ख़रीदते या रखते हैं। घर की कोई एक उपभोग वस्तु, टेलीविज़न, मोटरसाइकिल, कालीन, फ़र्नीचर का कोई टुकड़ा, चुनें और उसकी ‘आत्मकथा’ के रूप में उसकी जीवन-कहानी लिखें। अपनी वर्तमान स्थिति तक पहुँचने के लिए उसे विनिमय के किन दौरों से गुज़रना पड़ा? किन सामाजिक संबंधों के माध्यम से वह बनाई, बेची और ख़रीदी गई? उसके मालिकों, यानी आप, आपके परिवार और समुदाय, के लिए उसका क्या प्रतीकात्मक महत्त्व है? अगर वह सोच या बोल सकती, तो जिन लोगों के संपर्क में वह आई है, उनके बारे में क्या कहती?
6पुस्तक की अपनी विषय × पद्धति तालिका
पुस्तक ख़ुद हर विषय के लिए बताती है कि चारों पद्धतियाँ वहाँ कैसी दिख सकती हैं, साथ ही हर एक के लिए एक व्यावहारिक सावधानी भी जोड़ती है। यह जानकारी एक नज़र में देखने के लिए तालिका से बेहतर कोई तरीक़ा नहीं है।
| विषय | प्रेक्षण | सर्वेक्षण | ऐतिहासिक | साक्षात्कार | सावधानी |
|---|---|---|---|---|---|
| सार्वजनिक परिवहन (स्थानीय स्टेशन) | व्यवहार, शिष्टाचार, जगह की हिस्सेदारी | समय के साथ बदलाव पर राय, अनुभव | बदलाव के इतिहास के लिए समाचारपत्र | नियमित बनाम कभी-कभी इस्तेमाल करने वाले, पुरुष बनाम स्त्री | अपेक्षाकृत बड़े शहरों के लिए ही उपयुक्त |
| घरेलू उपकरण | उपयोग के स्वरूप, श्रम-विभाजन (काम का बँटवारा), लैंगिक पक्ष | उपकरणों से जुड़ी अभिवृत्तियाँ (यानी राय/रवैया), स्मृतियाँ | पुराने विज्ञापनों के स्वरूप | अलग-अलग लोगों की किसी उपकरण पर प्रतिक्रिया | इस काम को लड़कों को भी करना चाहिए, यह सिर्फ़ ‘लड़कियों का विषय’ न बने |
| सार्वजनिक स्थानों का उपयोग | अलग-अलग जगहों पर ख़ाली स्थानों का उपयोग कैसे होता है | स्थानों के अलग-अलग उपयोग पर लोगों की राय | पिछले वर्षों में जगह किस तरह इस्तेमाल होती थी | क्या अलग-अलग वर्गों की राय अलग है | ऐसी जगहें चुनें जिन्हें छात्र अच्छी तरह जानते हों |
| बदलती आकांक्षाएँ | उपयुक्त नहीं | अलग-अलग पीढ़ियों के बालक, बालिका, वयस्क (याददाश्त के आधार पर) | इस विषय पर पुराने स्कूली निबंध, अगर उपलब्ध हों | एक समूह से अपने बदलाव पर बात, या अलग-अलग आयु वर्गों से | साक्षात्कार लेने वाले छात्र अपने ही विद्यालय के न हों |
| संचार माध्यम | लोग सार्वजनिक जगह पर फ़ोन कैसे इस्तेमाल करते हैं | लोग कितना टेलीविज़न देखते हैं, क्या पसंद करते हैं | किसी मौजूदा मुद्दे पर मीडिया कवरेज का विश्लेषण | पत्र-लेखन में गिरावट पर राय | पूछें, बताएँ नहीं, यह न मान लें कि गिरावट दुखद ही है |
7अपनी परियोजना रिपोर्ट कैसे लिखें: एक सुझाया गया ढाँचा
पुस्तक रिपोर्ट का कोई ढाँचा नहीं देती। नीचे के सात चरण नोट्स का अपना सुझाव हैं, पुस्तक का नियम नहीं और कोई अंक-योजना भी नहीं। अंतिम रूप अपने अध्यापक के साथ तय करें। (परियोजना कार्य के CBSE अंक भाग 1 के बॉक्स में दिए गए हैं।)
अगर आपसे परियोजना की योजना बताने को कहा जाए, तो इस क्रम में उत्तर देना व्यावहारिक रहेगा: पहले ठोस शोध प्रश्न बताएँ, फिर पद्धति (या पद्धतियाँ) बताएँ, फिर तकनीकी कसौटियों और व्यावहारिकता दोनों के आधार पर अपने चुनाव को सही ठहराएँ।
7.1 अपनी परियोजना के लिए क्या करें, क्या न करें
✓ यह करें
- पद्धति चुनने से पहले हर व्यापक विषय को एक ठोस, उत्तर देने लायक़ प्रश्न में सिकोड़ें
- जब अकेली पद्धति पूरा उत्तर न दे सके, तो पद्धतियाँ मिलाएँ
- सर्वेक्षण में अधूरे और न लौटाए गए उत्तरों के लिए पहले से योजना बनाएँ
- ऐसी जगह या समूह चुनें जहाँ तक आपकी असल में पहुँच हो
✗ यह कभी न करें
- पहले अपनी पसंदीदा पद्धति चुनकर फिर उसमें प्रश्न को ज़बरदस्ती फ़िट न करें
- यह न मानें कि अकेला सर्वेक्षण समय के साथ आया बदलाव दिखा सकता है, पुस्तक प्रश्नावलियों को एक विशेष समय पर खींची गई फ़ोटो जैसा बताती है
- किसी विषय को एक ही लिंग का न बनने दें, जैसा पुस्तक घरेलू उपकरणों के लिए चेताती है
- सबूत जुटाने से पहले अपने निष्कर्ष तय न करें, पूछें, बताएँ नहीं
- क्या मैं एक पंक्ति में बता सकता हूँ कि पद्धति का चयन शोध प्रश्न के सावधानीपूर्वक निर्धारण के बाद क्यों किया जाता है?
- क्या मैं चारों पद्धतियों के नाम, और सर्वेक्षण व साक्षात्कार का पुस्तक में दिया लाभ और कमज़ोरी बता सकता हूँ?
- क्या मैं बिना देखे छहों सुझाए गए विषयों के नाम बता सकता हूँ?
- क्या मैं पुस्तक के सार्वजनिक-स्थान उदाहरण से यह समझा सकता हूँ कि अनुपस्थिति क्यों महत्त्वपूर्ण होती है?
- क्या मुझे पता है कि मेरे बोर्ड का पाठ्यक्रम इस अध्याय और परियोजना कार्य के बारे में क्या कहता है?
- पहले शोध प्रश्न का सावधानीपूर्वक निर्धारण करें, फिर उसके लिए उपयुक्त पद्धति चुनें
- पद्धति का चुनाव तकनीकी कसौटियों और व्यावहारिकता (समय, संसाधन, परिस्थितियाँ) दोनों पर निर्भर करता है
- सर्वेक्षण = बहुत लोग, तय प्रश्न, प्रतिनिधित्व अच्छा पर एक पल की तस्वीर
- साक्षात्कार = कम लोग, आमने-सामने, लचीला पर बड़े समूह का प्रतिनिधित्व नहीं
- प्रेक्षण = बिना पहले से तय किए देखना, अनुपस्थिति भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण
- ऐतिहासिक पद्धति = पुरानी सामग्री से समय के साथ आया बदलाव देखना
- पद्धतियों के सम्मिश्रण की अक्सर सिफ़ारिश की जाती है, जैसे सर्वेक्षण और ऐतिहासिक पद्धति साथ
- छह सुझाए गए विषय: सार्वजनिक परिवहन, संचार माध्यम, घरेलू उपकरण, सार्वजनिक स्थान का उपयोग, बदलती आकांक्षाएँ, वस्तु की जीवनी
- CBSE 2026-27: यह इकाई थ्योरी प्रश्नपत्र में “Non-evaluative” (गैर-मूल्यांकित) है; परियोजना कार्य के 20 अंक हैं (परियोजना 15, मौखिकी 5)