- निराला का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और छायावाद में उनका स्थान बता पाना
- यह समझ पाना कि “बादल राग” मूलतः छह खंडों की कविता है और यहाँ केवल उसका छठा खंड पढ़ाया जाता है
- तीनों पदों (stanzas) को पंक्ति-दर-पंक्ति सरल भाषा में समझा और समझा पाना
- बादल के दोहरे स्वभाव, सृजन और ध्वंस, को उदाहरण सहित स्पष्ट कर पाना
- कविता के प्रमुख बिंब, प्रतीक और अलंकार पहचान पाना
- शब्द-छवि के सभी कठिन शब्दों का सही अर्थ याद रख पाना
1 कवि परिचय: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

1.1 प्रमुख रचनाएँ
काव्य-संग्रह
अनामिका, परिमल, गीतिका, बेला, नए पत्ते, अणिमा, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता
गद्य रचनाएँ
चतुरी चमार, प्रभावती, बिल्लेसुर बकरिहा, चोटी की पकड़, काले कारनामे
निराला रचनावली
निराला की समस्त रचनाओं का संकलन आठ खंडों में प्रकाशित हुआ
पत्रिका-संपादन
“समन्वय” और “मतवाला” पत्रिकाओं का संपादन किया
कवि-परिचय के ये तथ्य पाठ में दिए गए हैं: जन्म वर्ष (1899, महिषादल), निधन वर्ष
(1961, इलाहाबाद), पारिवारिक गाँव (गढ़ाकोला, उन्नाव) और “बादल राग” का मूल काव्य-संग्रह (अनामिका)। इन्हें याद रखें।
2 निराला की भाषा और काव्य-दृष्टि
निराला के काव्य-संसार में संघर्ष और जीवन, क्रांति और निर्माण, ओज और माधुर्य, आशा और
निराशा का द्वंद्व एक साथ चलता है, फिर भी उनका काव्य-संसार किसी सीमा में बँध नहीं पाता। उनकी कविता और
जीवन में कोई फाँक नहीं है, दोनों आपस में घुले-मिले हैं। भाषा की दृष्टि से भी उनकी कविता के
कई रंग हैं; पाठ इनके दो छोर उदाहरण सहित बताता है।
तत्सम शैली
- सामासिक (जुड़े हुए) पदावली और ध्वन्यात्मक बिंबों से भरी भाषा
- उदाहरण: “राम की शक्ति पूजा”, “तुलसीदास”
- कठिन छंद-साधना का प्रतिमान
देशी टटकी शैली
- रोज़मर्रा के देशी शब्दों की सोंधी भाषा
- उदाहरण: “कुकुरमुत्ता”, “रानी और कानी”, “महँगू महँगा रहा”
- आम बोलचाल के करीब
छायावाद को सामान्यतः हिंदी कविता की वह धारा माना जाता है जिसमें प्रकृति का मानवीकरण, कल्पना की
प्रधानता, वैयक्तिक भावुकता और सौंदर्य-चेतना प्रमुख होती है; यह परिभाषा पाठ में नहीं दी गई है। पाठ के अनुसार निराला छायावाद के ऐसे
कवि हैं जो एक ओर कबीर की परंपरा से जुड़ते हैं तो दूसरी ओर समकालीन कवियों के
प्रेरणा-स्रोत भी बनते हैं।
सामान्य अर्थ में मुक्त छंद वह काव्य-रचना है जिसमें पंक्तियाँ किसी तयशुदा मात्रा, तुक या छंद-बंधन में
बँधी नहीं होतीं, बल्कि भाव के अनुसार लंबी-छोटी होती हैं। पाठ के अनुसार निराला जब मुक्त छंद की
बात करते हैं तो केवल छंद और रूढ़ियों का बंधन ही नहीं तोड़ते, काव्य-विषय और युग की सीमाओं को भी लाँघते हैं।
3 “बादल राग” की पृष्ठभूमि
“धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध”
पाठ के अनुसार यह पंक्ति कहने वाले निराला उत्कट आत्मशक्ति और अद्भुत जिजीविषा (जीने की अटूट इच्छा) के कवि हैं, जो हार नहीं मानते
निराला वर्षा ऋतु से विशेष रूप से आकृष्ट होते हैं क्योंकि बादल के भीतर सृजन और ध्वंस
दोनों की ताकत एक साथ समाहित रहती है, और निराला का अपना व्यक्तित्व भी बादल के इसी
दोहरे स्वभाव के बहुत करीब है। पाठ के अनुसार बादल किसान के लिए उल्लास एवं निर्माण का, तो
मज़दूर के संदर्भ में क्रांति एवं बदलाव का अग्रदूत है।
“बादल राग” कविता मूल रूप से संग्रह “अनामिका” में छह खंडों में प्रकाशित है। कक्षा 12
के पाठ्यक्रम में इसका केवल छठा खंड (भाग VI) लिया गया है। इसलिए इसे “पूरी कविता”
कहना ग़लत होगा, यहाँ पढ़ाया गया अंश छठे खंड तक सीमित है। पाठ्यपुस्तक इस खंड को बिना पद-संख्या के एक साथ छापती है; इन नोट्स में पढ़ने की सुविधा के लिए इसे तीन भागों (पद 1, 2, 3) में बाँटा गया है।
किसान के लिए बादल
- उल्लास और निर्माण का अग्रदूत
- सूखी धरती पर हरियाली लाने वाला
- अकाल की चिंता से व्याकुल किसान की आस
मज़दूर के लिए बादल
- क्रांति और बदलाव का अग्रदूत
- पाठ की भूमिका के अनुसार क्रांति वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है
लघुमानव, यानी आम आदमी, के दुख से त्रस्त कवि यहाँ बादल का आह्वान क्रांति के रूप में
करता है, क्योंकि “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते” अर्थात् क्रांति के हल्ले-गुल्ले में छोटे ही
शोभा पाते हैं, बड़े नहीं। किसान-मज़दूर की आकांक्षाएँ बादल को नव-निर्माण के राग के रूप में
पुकार रही हैं। पाठ कहता है: “क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है— इस अर्थ में भी छोटे को देखा जा सकता है।” “अट्टालिका नहीं है
रे” में भी वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज स्पष्ट है।
पाठ की भूमिका के अनुसार गरमी से तपी-झुलसी धरती पर क्रांति के संदेश की तरह बादल आए हैं; हर तरफ़ सब कुछ रूखा-सूखा और मुरझाया-सा है। अकाल की चिंता से व्याकुल किसान ‘हाड़-मात्र’ ही रह गए हैं और पूरी धरती का हृदय दग्ध है। बादलों के अंग-अंग में बिजलियाँ सोई हैं; वज्रपात से उनके शरीर आहत भी हों तो भी वे हिम्मत नहीं हारते, बार-बार गिरकर उठते हैं। गगन-स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर ये बादल दरअसल वीरों का एक प्रमत्त दल दिखाई देते हैं, और चूँकि ये विप्लव के बादल हैं, इसलिए इनका गर्जन-तर्जन अमोघ है।
“बादल राग एक ओर जीवन निर्माण के नए राग का सूचक है तो दूसरी ओर उस भैरव संगीत का, जो नव निर्माण का कारण बनता है।”
4 बादल राग (छठा खंड): पूरा पाठ
पद 1
“तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया—
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया—
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल!
फिर-फिर
बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पर्द्धा धीर।
हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार—
शस्य अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल,
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते,
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।”
पद 2
“अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।”
पद 3
“रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष
अंगना-अंग से लिपटे भी
आतंक अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्र-गर्जन से बादल!
त्रस्त-नयन मुख ढाँप रहे हैं।
जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार,
हाड़-मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार!”
5 पद-दर-पद सरल भावार्थ
5.1 पद 1: बादल का आह्वान, वीर और छोटे पौधे
हवा के सागर (समीर-सागर) पर अस्थिर सुख पर दुख की छाया तिरती है, यानी सुख
टिकता नहीं और दुख की छाया उसी अस्थिर सुख पर पड़ रही है। दुनिया का हृदय, जो तप्त
है (दग्ध), उस पर निर्दय क्रांति (विप्लव) की बाढ़ जैसी माया छा रही है। बादल को कवि
“रण-तरी” यानी युद्ध की नौका कहते हैं, जो आकांक्षाओं से भरी हुई है। पृथ्वी के हृदय
में सोए हुए अंकुर बादल की गर्जन-भेरी सुनकर, नवजीवन की आशा से, सिर ऊँचा करके उसे ताक
रहे हैं।
बादल बार-बार गरजता है, मूसलधार बरसता है, और उसकी घोर वज्र-हुंकार सुनकर पूरा
संसार अपना हृदय थाम लेता है। अशनि-पात (वज्रपात) से शापित सैकड़ों उन्नत वीर क्षत-विक्षत और
हत (घायल) हैं, फिर भी वे आकाश को छूने वाले (गगन-स्पर्शी) और होड़ में धीर (स्पर्द्धा-धीर) हैं। पाठ की भूमिका इन ‘गगन-स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर’ वीरों को बादल ही बताती है: “बादलों के अंग-अंग में बिजलियाँ सोई हैं, वज्रपात से उनके शरीर आहत भी हों तो भी हिम्मत नहीं हारते, बार-बार गिरकर उठते हैं। गगन स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर ये बादल दरअसल वीरों का एक प्रमत्त दल दिखाई देते हैं।” कुछ व्याख्याएँ ‘अचल-शरीर’ के आधार पर इन वीरों को वज्रपात से टूटने वाले ऊँचे वृक्ष या शिखर, और प्रतीक रूप में समाज के बड़े लोग, भी मानती हैं; यह एक व्याख्या है, पाठ का कथन नहीं। दूसरी ओर, वज़न में हल्के छोटे पौधे हिल-हिलकर, खिल-खिलकर हँसते हैं,
हाथ हिलाकर बादल को बुलाते हैं; कविता कहती है, “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा
पाते।”
5.2 पद 2: अट्टालिका (आतंक-भवन) बनाम छोटे
कवि कहता है कि अट्टालिका (ऊँचे महल) वास्तव में अट्टालिका नहीं, “आतंक-भवन” है,
जिसमें रहने वाले (पद 3 के धनी) क्रांति से डरे रहते हैं। क्रांति रूपी जल की बाढ़ (जल-विप्लव-प्लावन)
सदा पंक (कीचड़) पर ही होती है, और छोटे-छोटे
प्रफुल्ल कमलों (क्षुद्र प्रफुल्ल जलज) से सदा पानी छलकता रहता है। इसी तरह रोग और शोक में भी बचपन का कोमल शरीर हँसता रहता है।
पाठ की भूमिका के अनुसार इन पंक्तियों में “वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज” स्पष्ट है।
5.3 पद 3: भयभीत धनी और अकाल-पीड़ित किसान की पुकार
धनिकों का कोष (खज़ाना) रुद्ध यानी रुका हुआ (बंद) पड़ा है, फिर भी उनका तोष (संतोष) क्षुब्ध यानी
अशांत है। वे अंगना (स्त्री) के अंग से लिपटकर भी आतंक के अंक (हृदय) पर काँप रहे हैं। हे बादल!
तेरी वज्र-गर्जन से ये धनी लोग डरकर त्रस्त आँखें और मुँह ढाँप रहे हैं। दूसरी ओर किसान की भुजाएँ जीर्ण
(पुरानी, कमज़ोर) हो चुकी हैं, शरीर शीर्ण (क्षीण) है, फिर भी वह अधीर होकर बादल को
बुलाता है। उसका सार चूस लिया गया है, अब हाड़-मात्र ही उसका आधार बचा है (पाठ की भूमिका इसे अकाल की चिंता से जोड़ती है)।
पद 3 में बादल के लिए दो संबोधन आते हैं: “ऐ विप्लव के वीर!” और “ऐ जीवन के
पारावार!”, यानी हे क्रांति के वीर, हे जीवन के अथाह सागर!
यह न मानें कि “उन्नत शत-शत वीर” और “छोटे पौधे” दोनों बादल से समान रूप
से डरते हैं। वीर अशनि-पात से क्षत-विक्षत हैं, जबकि छोटे पौधे हँसते हैं और हाथ हिलाकर बादल को बुलाते हैं। यह भी याद रखें कि पाठ की भूमिका इन ‘गगन-स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर’ वीरों को बादलों का ही ‘प्रमत्त दल’ बताती है।

| पद | केंद्रीय बिंब | मुख्य भाव |
|---|---|---|
| पद 1 | समीर-सागर, रण-तरी, उन्नत वीर बनाम छोटे पौधे | बादल का आह्वान; वज्रपात से क्षत-विक्षत वीर, और “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते” |
| पद 2 | अट्टालिका (आतंक-भवन), पंक में खिले छोटे कमल, हँसता शिशु | अट्टालिका “आतंक-भवन” है; पाठ के अनुसार यहाँ वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज है |
| पद 3 | रुद्ध कोष वाले भयभीत धनी; अकाल-पीड़ित कृषक, हाड़-मात्र शरीर | जीर्ण-शीर्ण, अधीर कृषक बादल को बुलाता है |
6 प्रमुख बिंब और प्रतीक
| बिंब / शब्द | प्रतीकार्थ |
|---|---|
| समीर-सागर | हवा का विशाल सागर, कविता का प्रारंभिक और सबसे व्यापक बिंब |
| रण-तरी (बादल के लिए) | बादल एक युद्ध-पोत की तरह आकांक्षाओं से भरा है |
| सुप्त अंकुर | पृथ्वी के उर में सोए अंकुर, जो नवजीवन की आशा में सिर ऊँचा करके बादल को ताकते हैं |
| उन्नत शत-शत वीर | पाठ की भूमिका के अनुसार गगन-स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर बादल, जो “वीरों का एक प्रमत्त दल” दिखाई देते हैं; इन्हें ऊँचे वृक्ष या समाज के बड़े लोग मानना एक व्याख्या है |
| छोटे पौधे | पाठ के अनुसार “छोटे” को वंचितों/लघुमानव (आम आदमी) के अर्थ में भी देखा जा सकता है; वे बादल का स्वागत करते हैं |
| अट्टालिका (आतंक-भवन) | ऊँचे महल, जिनमें रहने वाले क्रांति से डरे रहते हैं |
| अकाल-पीड़ित कृषक | जीर्ण-शीर्ण, हाड़-मात्र कृषक, जो अधीर होकर बादल को बुलाता है |
| ऐ जीवन के पारावार! | बादल को जीवन के अथाह, असीम सागर के रूप में देखा गया है |
कला की बात के प्रश्न 4 में पूछा गया है कि कवि बादलों को किस रूप में देखता है; वहीं बताया गया है
कि कालिदास ने “मेघदूत” में मेघों को दूत के रूप में देखा, और विद्यार्थी से अपना कोई काल्पनिक बिंब देने को कहा गया है। निराला के यहाँ
बादल क्रांति और नव-निर्माण के राग से जुड़ा है।
7 अलंकार और काव्य-सौंदर्य
मानवीकरण अलंकार वह अलंकार है जिसमें निर्जीव या प्रकृति की वस्तुओं पर मनुष्य के
से भाव और क्रियाएँ आरोपित की जाती हैं। इस कविता में छोटे पौधे हँसते और हाथ हिलाकर
बादल को बुलाते हैं, सुप्त अंकुर सिर ऊँचा कर ताकते हैं, और शैशव का सुकुमार शरीर रोग-शोक में भी हँसता है।
रूपक अलंकार वह अलंकार है जिसमें उपमेय और उपमान में इतनी समानता मान ली
जाती है कि दोनों को एक ही बता दिया जाता है। बादल को “रण-तरी”, “विप्लव के वीर” और
“जीवन के पारावार” कहना रूपक के उदाहरण हैं।
7.1 प्रमुख काव्य-विशेषताएँ
संबोधन शैली
कविता में बादल को बार-बार सीधे पुकारा गया है, जिससे भावनात्मक तीव्रता बढ़ती है
मुक्त छंद
पंक्तियों की लंबाई असमान है; तुक कहीं-कहीं है (जैसे मूसलधार, संसार, हुंकार), पर कोई तयशुदा बंधन नहीं
सायास विशेषण-प्रयोग
जैसे “अस्थिर सुख”, “निर्दय विप्लव”, “उन्नत शत-शत वीर” जैसे विशेषण अर्थ को गहरा और तीखा बनाते हैं
बिंबधर्मिता
हर पंक्ति किसी दृश्य को आँखों के सामने खड़ा कर देती है, जैसे समीर-सागर, गगन-स्पर्शी वीर
‘कला की बात’ के प्रश्न 3 में संबोधनों की व्याख्या करने और बादल के लिए उनका औचित्य बताने को कहा गया है। इस खंड के संबोधन
याद रखें: “ऐ विप्लव के बादल!” (पद 1), “ऐ विप्लव के वीर!” और “ऐ जीवन के पारावार!” (पद 3), और यह भी कि शेष पाँच खंडों
में कवि ने बादल को किन-किन नामों से पुकारा है।
| संबोधन | कहाँ प्रयोग हुआ |
|---|---|
| ऐ विप्लव के बादल! | पद 1 (इसी छठे खंड में) |
| ऐ विप्लव के वीर! | पद 3 (इसी छठे खंड में) |
| ऐ जीवन के पारावार! | पद 3 (इसी छठे खंड में) |
| अरे वर्ष के हर्ष!, मेरे पागल बादल!, ऐ निर्बंध!, ऐ स्वच्छंद!, ऐ उद्दाम!, ऐ सम्राट!, ऐ विप्लव के प्लावन!, ऐ अनंत के चंचल शिशु सुकुमार! | बादल राग के शेष पाँच खंडों में (कला की बात प्रश्न 3 के अनुसार) |
8 शब्द-छवि (कठिन शब्दों के अर्थ)
बड़े गिरते हैं, छोटे खिलते हैं
कविता के पदों में इस विरोधाभास की झलक मिलती है: अट्टालिका “आतंक-भवन” है और धनी
वज्र-गर्जन से काँपते हैं, जबकि छोटे पौधे हँसते हैं, क्षुद्र जलज से नीर छलकता है, शिशु हँसता है और कृषक बादल को बुलाता है। (वज्रपात से क्षत-विक्षत “वीरों” को पाठ की भूमिका बादल ही बताती है।)
- निराला (1899 महिषादल, निधन 1961 इलाहाबाद) छायावाद और मुक्त छंद के प्रमुख कवि हैं
- “बादल राग” मूल रूप से “अनामिका” में छह खंडों में है, कक्षा 12 में केवल छठा खंड पढ़ाया जाता है
- बादल के भीतर सृजन और ध्वंस की ताकत एक साथ समाहित है; पाठ के अनुसार बादल निराला को प्रिय है क्योंकि उनका व्यक्तित्व बादल के स्वभाव के करीब है
- पद 1: वज्रपात से गगन-स्पर्शी वीर (पाठ की भूमिका में बादलों का “प्रमत्त दल”) क्षत-विक्षत हैं, पर छोटे पौधे हिलते-खिलते हैं
- पद 2: अट्टालिका “आतंक-भवन” है; क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा नीर छलकता है, शिशु रोग-शोक में भी हँसता है
- पद 3: रुद्ध कोष वाले धनी भय से काँपते हैं, जबकि अकाल-पीड़ित किसान बादल को “विप्लव के वीर” और “जीवन के पारावार” कहकर पुकारता है
- प्रमुख अलंकार: मानवीकरण और रूपक; प्रमुख शैली: संबोधन और मुक्त छंद
- लघुमानव के दुख से त्रस्त कवि बादल का आह्वान क्रांति के रूप में करता है; पाठ के अनुसार बादल राग जीवन निर्माण के नए राग और नव निर्माण के कारण बनने वाले भैरव संगीत, दोनों का सूचक है