कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 1 देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत नोट्स

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख रचनाएँ बता पाएँगे
  • देवसेना का गीत किस नाटक से लिया गया है और देवसेना की कहानी क्या है, समझा पाएँगे
  • कार्नेलिया का गीत किस नाटक से लिया गया है और कार्नेलिया कौन है, समझा पाएँगे
  • दोनों गीतों की हर पंक्ति का भावार्थ अपने शब्दों में लिख पाएँगे
  • दोनों गीतों के कठिन शब्दों के अर्थ बिना भूले लिख पाएँगे
  • दोनों गीतों में प्रयुक्त अलंकार और रस पहचान पाएँगे, यही “काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए” वाले प्रश्नों की तैयारी है
जयशंकर प्रसादस्कंदगुप्तचंद्रगुप्तदेवसेनाकार्नेलियाविहागरूपक अलंकारमानवीकरण

1 कवि-परिचय: जयशंकर प्रसाद

चित्र 1: जयशंकर प्रसाद (1889-1937), 1991 में भारतीय डाक टिकट पर। चित्र: India Post, Government of India / Wikimedia Commons / GODL-India
चित्र 1: जयशंकर प्रसाद (1889-1937), 1991 में भारतीय डाक टिकट पर। चित्र: India Post, Government of India / Wikimedia Commons / GODL-India

हिंदी साहित्य में जयशंकर प्रसाद का नाम छायावाद के चार बड़े स्तंभों में गिना जाता है। इस अध्याय की दोनों कविताएँ उन्हीं के लिखे नाटकों से ली गई हैं, इसलिए पहले उनका जीवन-परिचय जान लेना ज़रूरी है।

  • जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी में हुआ था। उनका जीवनकाल सन् 1889 से 1937 तक रहा।
  • उनकी विद्यालयी शिक्षा केवल आठवीं कक्षा तक ही हो पाई, किंतु उन्होंने स्वाध्याय (खुद पढ़-पढ़कर सीखने) के दम पर संस्कृत, पालि, उर्दू और अंग्रेज़ी: इन चारों भाषाओं और उनके साहित्य का गहन अध्ययन किया।
  • इसी स्वाध्याय से वे इतिहास, दर्शन, धर्मशास्त्र और पुरातत्त्व के भी प्रकांड (बहुत बड़े) विद्वान बन गए।
  • स्वभाव से वे अत्यंत सौम्य, शांत और गंभीर व्यक्ति थे। वे न तो दूसरों की बुराई करते थे (परनिंदा) और न ही अपनी तारीफ़ खुद करते थे (आत्मस्तुति), दोनों से हमेशा दूर रहते थे।
  • वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। मूलतः वे कवि थे, लेकिन उन्होंने नाटक, उपन्यास, कहानी और निबंध, हर विधा में उच्चकोटि (बहुत ऊँचे दर्जे) की रचनाएँ लिखीं।
  • प्रसाद के पूरे साहित्य में, और विशेषकर उनके नाटकों में, राष्ट्रीय जागरण का स्वर प्रमुख है; पाठ के अनुसार प्राचीन भारतीय संस्कृति के गौरव के माध्यम से प्रसाद जी ने यह काम किया। उनकी कविताओं, कहानियों में भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की झलक मिलती है।
जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ (विधा के अनुसार)
नाटकअजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, राजश्री, ध्रुवस्वामिनी
उपन्यासकंकाल, तितली, इरावती (अपूर्ण)
कहानी संग्रहआँधी, इंद्रजाल, छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप
निबंध संग्रहकाव्य और कला तथा अन्य निबंध
कविताएँझरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, प्रेमपथिक
परीक्षा संकेत

कवि-परिचय में जन्म-मृत्यु वर्ष (1889-1937), जन्मस्थान (काशी) और विधा के अनुसार कुछ प्रमुख रचनाएँ याद रखें। “कामायनी” पाठ में उनकी कविताओं (झरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, प्रेमपथिक) में गिनाई गई है।

आम ग़लती

स्कंदगुप्त और चंद्रगुप्त नाटकों को आपस में न मिलाएँ। याद रखें: देवसेना का गीत = स्कंदगुप्त नाटक से, और कार्नेलिया का गीत = चंद्रगुप्त नाटक से। कार्नेलिया सिकंदर के सेनापति सिल्यूकस की बेटी है और सिंधु के किनारे ग्रीक शिविर के पास बैठकर यह गीत गाती है।

2 देवसेना का गीत

2.1 प्रसंग: कहानी की पृष्ठभूमि

देवसेना का गीत जयशंकर प्रसाद के स्कंदगुप्त नाटक से लिया गया है। गीत समझने से पहले कहानी का संदर्भ जान लेना उपयोगी है।

  • देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन है।
  • उस समय हूणों के आक्रमण से पूरा आर्यावर्त (भारत) संकट में है।
  • इस आक्रमण में बंधुवर्मा सहित उसके पूरे परिवार के सभी लोगों को वीरगति प्राप्त हो जाती है, यानी वे लड़ते हुए वीरतापूर्वक मारे जाते हैं।
  • अकेली बची देवसेना अब दो व्रत लेती है: अपने मृत भाई के स्वप्नों को साकार करना, और राष्ट्रसेवा करना।
  • जीवन में देवसेना को स्कंदगुप्त की चाह थी, किंतु स्कंदगुप्त मालवा के धनकुबेर (बहुत बड़े धनी व्यक्ति) की कन्या विजया का स्वप्न देखते थे।
  • जीवन के अंतिम मोड़ पर स्कंदगुप्त देवसेना को पाना चाहता है।
  • किंतु देवसेना तब तक वृद्ध पर्णदत्त के साथ एक आश्रम में रहती है, वहाँ गाना गाकर भीख माँगती है और महादेवी की समाधि को सँवारने-सजाने का काम करती है।
  • स्कंदगुप्त बार-बार अनुनय-विनय (मिन्नत) करता है, फिर भी देवसेना उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होती। इस पर स्कंदगुप्त आजीवन कुँवारा रहने का व्रत ले लेता है।
  • तब देवसेना अपने ही मन से कहती है: हृदय की कोमल कल्पना अब सो जाए! जिस चीज़ की जीवन में कोई संभावना ही नहीं, जिसे एक बार द्वार से लौटा दिया गया, उसके लिए अब पुकार मचाना ठीक नहीं। आज वह जीवन के भावी सुख, आशा और आकांक्षा, सबसे विदा लेती है।
  • यही कहते हुए वह यह गीत गाती है: “आह! वेदना मिली विदाई!”
  • पाठ के अनुसार जीवन के इस मोड़ पर, अर्थात् जीवन संध्या की बेला में, देवसेना अपने यौवन के क्रियाकलापों को याद कर रही है। अपने आसपास उसे सबकी प्यासी निगाहें ही दिखाई पड़ती हैं और वह स्वयं को इनसे बचाने की कोशिश करती है; फिर भी जो उसके जीवन की पूँजी है, सारी कमाई है, वह उसे बचा नहीं सकी, “यही विडंबना है, यही वेदना है”।
  • प्रलय स्वयं देवसेना के जीवनरथ पर सवार है; वह अपनी दुर्बलताओं और हारने की निश्चितता के बावजूद प्रलय से लोहा लेती रही है, यानी हार स्वीकार नहीं करती।
1

बंधुवर्मा

मालवा का राजा, देवसेना का भाई। हूणों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।

2

विजया

मालवा के धनकुबेर की कन्या, जिसका स्वप्न स्कंदगुप्त देखते थे।

3

पर्णदत्त

वृद्ध व्यक्ति, जिसके साथ देवसेना आश्रम में रहती है।

4

महादेवी

जिनकी समाधि को देवसेना आश्रम में परिष्कृत (सँवारती-सजाती) करती है।

क्या आप जानते हैं?

पाठ के अनुसार देवसेना अपने यौवन के क्रियाकलापों को “भ्रमवश किए गए कर्मों” की श्रेणी में ही रख रही है, और उस समय की गई नादानियों के पश्चाताप स्वरूप उसकी आँखों से आँसू की अजस्र धारा बहती जा रही है। यानी वह अपने यौवन के कामों पर पछताती है।

2.2 मूल काव्यांश: देवसेना का गीत

मूल काव्यांश: पद 1
आह! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।
छलछल थे संध्या के श्रमकण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थी—
नीरवता अनंत अँगड़ाई।

भावार्थ: देवसेना कहती है कि उसे अपने जीवन में मिली भी तो केवल विदाई और वेदना (दर्द)। उसने भ्रमवश (गलतफ़हमी में) जीवन-भर संचित की हुई मधुकरियों (भिक्षा) की भीख लुटा दी, यानी जीवन की संचित पूँजी भ्रम में गँवा दी। शाम के समय के थकान भरे कण आँसुओं की तरह हर पल गिर रहे थे। उसकी पूरी यात्रा में चारों ओर फैली खामोशी (नीरवता) मानो अंतहीन अँगड़ाई लेती रहती थी, यानी सन्नाटा भी उसकी थकान और खालीपन जैसा ही लंबा और उदास था।

मूल काव्यांश: पद 2
श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,
गहन-विपिन की तरु-छाया में,
पथिक उनींदी श्रुति में किसने—
यह विहाग की तान उठाई।
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,
रही बचाए फिरती कबकी।
मेरी आशा आह! बावली,
तूने खो दी सकल कमाई।

भावार्थ: थके हुए स्वप्न की मीठी माया में, घने जंगल की पेड़ों की छाया में, नींद से भरे पथिक के कान में किसने यह आधी रात में गाया जाने वाला विहाग राग छेड़ दिया? आस-पास सबकी निगाहें प्यासी, तृष्णा-भरी (सतृष्ण) थीं, और वह बहुत पहले से खुद को उनसे बचाती फिर रही थी। फिर भी वह अपनी आशा को “बावली” (पगली) कहती है, क्योंकि उसी आशा ने उसकी सकल (सारी) कमाई, यानी जीवन की पूँजी, खो दी।

मूल काव्यांश: पद 3
चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,
प्रलय चल रहा अपने पथ पर।
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,
उससे हारी-होड़ लगाई।

भावार्थ: देवसेना अपने जीवन की तुलना एक रथ से करती है, जिस पर स्वयं विनाश (प्रलय) सवार होकर अपने ही रास्ते पर चला जा रहा है। वह जानती थी कि उसके पैरों में इतना बल नहीं कि वह इस प्रलय से जीत सके, फिर भी उसने अपने कमज़ोर पैरों के बल पर उससे एक ऐसी होड़ लगाई, जिसे हारना पहले से तय था। यह पंक्ति देवसेना के साहस और उसकी निश्चित हार, दोनों को एक साथ दिखाती है।

मूल काव्यांश: पद 4
लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे
इससे मन की लाज गँवाई।

(‘स्कंदगुप्त’ नाटक से)

भावार्थ: अंतिम पद में देवसेना पूरे संसार (विश्व) को संबोधित करते हुए कहती है, यह जो थाती (धरोहर, यानी उसका जीवन और उसकी भावनाएँ) तुमने मुझे सौंपी थी, अब इसे वापस ले लो। उसकी करुणा (दया-भाव, कोमल भावनाएँ) हा-हा करके रो रही है। वह कहती है कि अब यह जीवन उससे सँभाला नहीं जाएगा, और इसी वजह से उसके मन की लाज (मान-मर्यादा) भी चली गई है।

2.3 शब्दार्थ: देवसेना का गीत

शब्द अर्थ
संचित एकत्रित (इकट्ठा किया हुआ)
मधुकरियों भिक्षा (भीख)
नीरवता खामोशी
अनंत अंतहीन, न रुकने वाली
श्रमित परिश्रम करके थका हुआ
विपिन जंगल, वन
उनींदी नींद से भरी हुई
श्रुति सुनने की क्रिया
विहाग अर्धरात्रि में गाया जाने वाला एक राग
सतृष्ण तृष्णा (लालच) के साथ
दीठ दृष्टि, निगाह
काव्य-सौंदर्य: देवसेना का गीत

भाव और रस: पाठ गीत में रस का नाम नहीं देता। गीत में वेदना, निराशा और पश्चाताप प्रधान हैं, इसलिए इसे करुण रस का गीत कहा जा सकता है (कुछ लोग इसे वियोग शृंगार भी मानते हैं)। पाठ के अनुसार यह कविता “वेदना के क्षणों में मनुष्य और प्रकृति के संबंधों को भी व्यक्त करती चलती है”: संध्या के श्रमकण, नीरवता की अँगड़ाई, गहन विपिन की छाया और जीवन-रथ पर चढ़ा प्रलय, सब देवसेना की वेदना के साथ आते हैं।
अलंकार: “नीरवता अनंत अँगड़ाई” और “मेरी आशा…बावली” में मानवीकरण अलंकार है, निर्जीव चीज़ों (खामोशी, आशा) को इंसान जैसा व्यवहार करते दिखाया गया है। “जीवन-रथ पर प्रलय चढ़ना” में रूपक अलंकार है। “आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण” (श्रमकण आँसू की तरह) में उपमा अलंकार है।
भाषा-शैली: गीत खड़ी बोली में है, शब्दावली संस्कृतनिष्ठ (जैसे नीरवता, श्रमित, सतृष्ण) है, और यह गीत की शैली में (पाठ के शब्दों में “गीत के शिल्प में”) रचा गया गेय, तुकांत गीत है: अंतरे “विदाई, लुटाई, अँगड़ाई, उठाई, कमाई, लगाई, गँवाई” की एक ही तुक पर लौटते हैं।

3 कार्नेलिया का गीत

3.1 प्रसंग: कहानी की पृष्ठभूमि

कार्नेलिया का गीत जयशंकर प्रसाद के चंद्रगुप्त नाटक का एक प्रसिद्ध गीत है। इसका प्रसंग देवसेना के गीत से पूरी तरह अलग है, यहाँ विरह नहीं, बल्कि भारत के प्रति प्रेम और प्रशंसा का भाव है।

  • कार्नेलिया सिकंदर के सेनापति सिल्यूकस की बेटी है।
  • वह सिंधु नदी के किनारे, ग्रीक शिविर के पास, एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई है।
  • वह कहती है कि सिंधु का यह मनोहर किनारा मानो उसकी आँखों के सामने एक बिलकुल नया चित्रपट (दृश्य) प्रस्तुत कर रहा है।
  • इस वातावरण से धीरे-धीरे उठती हुई शांत मधुरता (प्रशांत स्निग्धता) मानो उसके हृदय में उतर रही है।
  • उसे लगता है जैसे लंबी यात्रा करके वह ठीक वहीं पहुँच गई है, जहाँ के लिए वह चली थी। वह सोचती है, यह प्रकृति कितनी सुंदर है, कितनी रमणीय (मनभावन) है!
  • फिर वह खुद से पूछती है, कहीं वह भारतीय संगीत का पाठ भूल तो नहीं गई?
  • यह सोचकर वह गीत गाने लगती है: “अरुण यह मधुमय देश हमारा!”
1

सिकंदर

यूनान (ग्रीस) का सम्राट; सिल्यूकस उसका सेनापति है।

2

सिल्यूकस

सिकंदर का सेनापति और कार्नेलिया का पिता।

3

कार्नेलिया

सिल्यूकस की बेटी, जो सिंधु-तट के सौंदर्य से प्रभावित होकर और भारतीय संगीत का पाठ याद करते हुए यह गीत गाती है।

आम ग़लती

कार्नेलिया को सिकंदर की बेटी मत समझिए, वह सिल्यूकस (सिकंदर के सेनापति) की बेटी है।

3.2 मूल काव्यांश: कार्नेलिया का गीत

मूल काव्यांश: पूरा गीत
अरुण यह मधुमय देश हमारा!
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर—नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर—मंगल कुंकुम सारा!
लघु सुरधनु से पंख पसारे—शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए—समझ नीड़ निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल—बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकराती अनंत की—पाकर जहाँ किनारा।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे—भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब—जगकर रजनी भर तारा।

(‘चंद्रगुप्त’ नाटक से)

भावार्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति:

  • अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा: यह लाली लिए, मिठास से भरा हमारा देश है, जहाँ पहुँचकर अनजान क्षितिज को भी एक सहारा मिल जाता है। पाठ के शब्दों में, “अनजान को भी सहारा देना … हमारे देश की विशेषता है”।
  • सरस तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर, छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा: सरस, तांबे जैसे लाल रंग (तामरस) की आभा पर पेड़ों की चोटियाँ (तरुशिखा) मनोहर ढंग से नाच रही हैं। हरियाली पर जीवन का सारा मंगल-कुंकुम (शुभ रंग, जैसे तिलक) मानो बिखर गया है।
  • लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे, उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा: छोटे इंद्रधनुष जैसे रंगीन पंख फैलाए, ठंडी मलय-हवा (दक्षिण की सुगंधित हवा) के सहारे पक्षी जिस ओर उड़ते हैं, उसी को अपना प्यारा घोंसला (नीड़) समझते हैं, पाठ के शब्दों में, “पक्षी भी अपने प्यारे घोंसले की कल्पना कर जिस ओर उड़ते हैं वही यह प्यारा भारतवर्ष है”।
  • बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल, लहरें टकराती अनंत की, पाकर जहाँ किनारा: यहाँ बादल भी मानो करुणा (दया) के आँसुओं से भरे हैं, और अनंत सागर की लहरें भी यहीं आकर अपना किनारा पाती हैं, यानी लहरों को भी किनारा देना इस देश की विशेषता है।
  • हेम कुंभ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे, मदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनी भर तारा: सुबह की उषा (भोर) सोने के कलश में मानो सुख भरकर ढुलकाती (बिखेरती) रहती है, जब रात-भर जागकर तारे मस्ती में (मदिर) ऊँघते (झपकी लेते) रहते हैं।
क्या आप जानते हैं?

इस गीत में भारत की प्रशंसा एक विदेशी युवती, कार्नेलिया, के मुँह से कराई गई है, इसलिए तारीफ़ एक बाहरी व्यक्ति की नज़र से आती है। पाठ के अनुसार इस गीत में “हमारे देश की गौरवगाथा तथा प्राकृतिक सौंदर्य को भारतवर्ष की विशिष्टता और पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया है”।

3.3 शब्दार्थ: कार्नेलिया का गीत

शब्द अर्थ
अरुण लालिमा युक्त
मधुमय मिठास से भरा हुआ
क्षितिज जहाँ धरती और आकाश एक साथ मिलते हुए दिखाई देते हैं
तामरस तांबे जैसा लाल रंग
नीड़ घोंसला
मदिर मस्ती पैदा करने वाला
रजनी रात्रि
मलय समीर दक्षिणी वायु, मलय पर्वत की ओर से आने वाली सुगंधित हवा
काव्य-सौंदर्य: कार्नेलिया का गीत

भाव: देश-गौरव और प्रकृति-सौंदर्य की प्रशंसा, देश-प्रेम का भाव (पाठ में रस का नाम नहीं दिया गया)।
अलंकार: “समीर सहारे”, “बादल बनते”, “जब जगकर” में अनुप्रास अलंकार है (एक जैसी ध्वनि का बार-बार आना)। “बरसाती आँखों के बादल…भरे करुणा जल” में रूपक अलंकार है, बादलों की तुलना सीधे आँखों से कर दी गई है। “लघु सुरधनु से पंख पसारे” (इंद्रधनुष जैसे पंख) में उपमा अलंकार है। “हेम कुंभ ले उषा सवेरे…मदिर ऊँघते रहते जब” में मानवीकरण अलंकार है, उषा और तारों को मनुष्य जैसा व्यवहार करते दिखाया गया है।
भाषा-शैली: यह भी खड़ी बोली में लिखा गया गेय, तुकांत गीत है (“हमारा, सहारा, सारा, प्यारा, किनारा, तारा” की तुक), जिसमें बिंब-विधान (चित्र जैसी कल्पना) बहुत प्रभावी है, भोर, सिंधु-तट, पक्षी, लहरें, हर पंक्ति में एक चित्र बनता है।

4 दोनों गीतों की तुलना

दोनों गीत एक ही कवि (जयशंकर प्रसाद) के लिखे हैं, दोनों खड़ी बोली के गेय, तुकांत गीत हैं, फिर भी दोनों का भाव-जगत बिलकुल अलग है।

देवसेना का गीत

  • स्रोत नाटक: स्कंदगुप्त
  • वक्ता: देवसेना (मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन)
  • भाव: वेदना, निराशा, पश्चाताप (करुण रस कहा जा सकता है)
  • विषय: व्यक्तिगत, अधूरी चाह, भ्रमवश किए कर्मों का पछतावा; मनुष्य और प्रकृति के संबंध

कार्नेलिया का गीत

  • स्रोत नाटक: चंद्रगुप्त
  • वक्ता: कार्नेलिया (विदेशी युवती)
  • भाव: प्रशंसा, उल्लास, गर्व (देश-प्रेम)
  • विषय: सार्वजनिक, भारत की प्राकृतिक सुंदरता और गौरव
Quick Revision: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • जयशंकर प्रसाद (1889-1937), जन्म काशी में, शिक्षा केवल आठवीं तक, बाकी स्वाध्याय से
  • कविताएँ: झरना, आँसू, लहर, कामायनी, कानन कुसुम, प्रेमपथिक; नाटक: अजातशत्रु, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, राजश्री, ध्रुवस्वामिनी
  • देवसेना का गीत: स्कंदगुप्त नाटक से; देवसेना मालवा के राजा बंधुवर्मा की बहन
  • देवसेना का दुःख: हूणों के आक्रमण में परिवार खोना, स्कंदगुप्त की चाह अधूरी रहना, यौवन के भ्रमवश किए कर्मों का पश्चाताप; फिर भी हारने की निश्चितता के बावजूद वह प्रलय से लोहा लेती रही
  • कार्नेलिया का गीत: चंद्रगुप्त नाटक से; कार्नेलिया सिकंदर के सेनापति सिल्यूकस की बेटी
  • कार्नेलिया का गीत सिंधु-तट पर बैठकर गाया गया भारत की प्रशंसा में गीत है
  • देवसेना के गीत में वेदना (करुण रस कहा जा सकता है); कार्नेलिया के गीत में देश-प्रेम का भाव; पाठ किसी रस का नाम नहीं देता
  • दोनों गीत खड़ी बोली में, गेय और तुकांत; मानवीकरण, रूपक और उपमा अलंकार