Class 12 Psychology Chapter 2 Self and Personality Notes in Hindi

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इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • मनोवैज्ञानिक “आत्म” (self) से क्या समझते हैं, और भारतीय व पाश्चात्य दृष्टिकोण में इसका अंतर
  • आत्म-सम्मान, आत्म-सक्षमता और आत्म-नियमन का सही अर्थ, और इनमें अंतर
  • मनोविज्ञान में “व्यक्तित्व” का अर्थ, और इसकी चार विशेषताएँ
  • व्यक्तित्व के अध्ययन के छह उपागम (तरीके), प्ररूप, विशेषक, मनोगतिक, व्यवहारवादी, सांस्कृतिक एवं मानवतावादी
  • मनोवैज्ञानिक व्यक्तित्व का मापन वास्तव में कैसे करते हैं, आत्म-प्रतिवेदन परीक्षण और प्रक्षेपी तकनीकें
परीक्षा स्थिति

यह अध्याय (यूनिट II) CBSE थ्योरी प्रश्नपत्र (कुल 70 अंक) में 13 अंक का है।
CBSE के आधिकारिक 2026-27 पाठ्यक्रम में इस अध्याय के सभी खंड (आत्म, व्यक्तित्व, छह उपागम और मूल्यांकन) सूचीबद्ध हैं।
कक्षा 12 मनोविज्ञान में 30 अंकों का प्रायोगिक (Practical) भाग भी है (केस प्रोफ़ाइल फ़ाइल,
पाँच मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का प्रशासन एवं व्याख्या, तथा मौखिकी), ये नोट्स केवल 70 अंकों की थ्योरी
को कवर करते हैं, प्रायोगिक भाग की जानकारी अपने शिक्षक से अलग से लें।

आत्मव्यक्तिगत अनन्यतासामाजिक अनन्यता
आत्म-सम्मानआत्म-सक्षमताआत्म-नियमन
व्यक्तित्वविशेषकप्ररूपइड, अहं, पराहम्
रक्षा युक्तियाँआत्मसिद्धिप्रक्षेपी तकनीक

1परिचय

आप अक्सर अपने और दूसरों के व्यवहार के बारे में सोचते और उसका मूल्यांकन करते होंगे, जैसे
आप किसी स्थिति में अपने मित्र से अलग ढंग से प्रतिक्रिया क्यों करते हैं, या आपके दूसरों से संबंध
ऐसे क्यों बनते हैं। मनोवैज्ञानिक पहले तरह के प्रश्नों का उत्तर आत्म (self) की अवधारणा से देते
हैं, और दूसरी तरह के प्रश्नों का उत्तर व्यक्तित्व (personality) की अवधारणा से। दोनों अवधारणाएँ
आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं, किताब की अपनी यह पंक्ति याद रखने लायक है।

वास्तव में आत्म व्यक्तित्व के मूल रूप में स्थित होता है।

NCERT, अध्याय 2 की भूमिका

किताब का परिचय: आत्म एवं व्यक्तित्व का अध्ययन न केवल यह समझने में कि हम कौन हैं अपितु हमारी
अनन्यता और दूसरों से हमारी समानताओं को भी समझने में हमारी सहायता करता है।

2आत्म का संप्रत्यय

एक नवजात शिशु को अपने “आत्म” का कोई बोध नहीं होता, बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है, “आत्म”
की धारणा उभरती है और इसका निर्माण माता-पिता, मित्रों, शिक्षकों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों की
भूमिका से होता है। आत्म की संरचना अपने ही अनुभवों के आलोक में बदलती रहती है।

2.1 व्यक्तिगत अनन्यता (पहचान) और सामाजिक अनन्यता

व्यक्तिगत अनन्यता

  • व्यक्ति के वे गुण जो उसे दूसरों से भिन्न बनाते हैं
  • नाम (“मैं करीम हूँ”), गुण (“मैं मेहनती हूँ”), क्षमताएँ (“मैं गायक हूँ”), विश्वास
    (“मैं नियति में विश्वास रखता हूँ”)

सामाजिक अनन्यता

  • व्यक्ति के वे पक्ष जो उसे किसी सामाजिक या सांस्कृतिक समूह से जोड़ते हैं
  • “मैं हिंदू हूँ”, “मैं ब्राह्मण हूँ”, “मैं उत्तर भारतीय हूँ”, समूह से व्युत्पन्न विवरण

2.2 आत्मगत (करने वाला) रूप में आत्म और वस्तुगत (जिस पर किया जाए) रूप में आत्म

कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

जब आत्म कुछ करता है (जैसे “मैं नर्तक हूँ”), तो इसे आत्मगत रूप कहा जाता है।
जब आत्म पर कुछ किया जाता है (जैसे “मैं ऐसा व्यक्ति हूँ जिसे सरलता से आहत किया जा सकता है”),
तो इसे वस्तुगत रूप कहा जाता है। आत्म एक साथ “जानने वाला” भी है और “जाना जाने वाला” भी,
यह इसकी द्वैध स्थिति है।

2.3 आत्म के प्रकार

आत्म के प्रकार
जैविक आत्मएक प्रतिवर्त (बिना सोचे-समझे अपने आप होने वाली क्रिया) से शुरू होता है, भूख से रोता नवजात, और फिर जागरूकता में बदल जाता है (“मैं भूखा हूँ”)
व्यक्तिगत आत्मव्यक्तिगत स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व, उपलब्धि और सुख-सुविधा से जुड़ा
सामाजिक आत्मपारिवारिक या संबंधात्मक आत्म भी कहते हैं, सहयोग, एकता, संबंधन, त्याग, सहायता पर बल
क्या आप जानते हैं?

नवजात शिशु में आत्म का सबसे पहला चिह्न पूर्णतः जैविक होता है, भूख लगने पर दूध के लिए रोना।
इस प्रतिवर्त में अभी कोई जागरूकता नहीं होती, जागरूकता (“मैं भूखा हूँ”) बाद में विकसित होती है।

3आत्म के संज्ञानात्मक (सोच से जुड़े) एवं व्यवहारात्मक (व्यवहार से जुड़े) पक्ष

3.1 आत्म-संप्रत्यय

कंठस्थ करेंपरिभाषा 2

आत्म-संप्रत्यय (या आत्म-धारणा) वह तरीका है जिससे हम स्वयं को देखते हैं, अपनी
क्षमताओं और गुणों के बारे में हमारे विचार। सामान्य स्तर पर यह समग्र रूप से सकारात्मक या
नकारात्मक होता है; विशिष्ट स्तर पर यह और बारीक हो जाता है (जैसे शैक्षिक प्रतिभा की अपेक्षा खेलकूद की बहादुरी के प्रति अधिक सकारात्मक धारणा, या गणितीय कौशल की अपेक्षा पठन-योग्यता के प्रति अधिक सकारात्मक आत्म-संप्रत्यय)।

क्रियाकलाप 2.1 (किताब): “मैं ___ हूँ” वाले वाक्य पूरे कीजिए; इनसे आपकी व्यक्तिगत और सामाजिक अनन्यता, दोनों का पता चलता है।

3.2 आत्म-सम्मान

कंठस्थ करेंपरिभाषा 3

आत्म-सम्मान व्यक्ति का अपने मूल्य या मान के बारे में किया गया मूल्य-निर्णय है। इसे
मापने के लिए व्यक्ति से पूछा जाता है कि “मैं गृह कार्य में अच्छा हूँ” जैसे कथन उसके संदर्भ में
कितने सही हैं।

4क्षेत्र जिनमें आत्म-सम्मान बनता है, शैक्षिक, सामाजिक, शारीरिक/खेलकूद क्षमता, शारीरिक रूप
6-7वर्ष, वह आयु जब तक बच्चों में इन चार क्षेत्रों में आत्म-सम्मान बन जाता है
परीक्षा संकेत

उच्च शैक्षिक आत्म-सम्मान वाले बच्चों का प्रदर्शन विद्यालय में बेहतर होता है, और उच्च सामाजिक
आत्म-सम्मान वाले बच्चे अपने साथियों द्वारा अधिक पसंद किए जाते हैं। सभी क्षेत्रों में निम्न आत्म-सम्मान, दुश्चिंता, अवसाद और समाजविरोधी
व्यवहार से जुड़ा है। स्नेहपूर्ण, सकारात्मक पालन-पोषण से उच्च आत्म-सम्मान बनता है, जबकि माता-पिता
जो हर निर्णय स्वयं ले लेते हैं (भले ही बच्चे को सहायता की आवश्यकता न हो) वहाँ निम्न आत्म-सम्मान बनता है।

3.3 आत्म-सक्षमता

कंठस्थ करेंपरिभाषा 4

आत्म-सक्षमता व्यक्ति का यह विश्वास है कि किसी विशेष स्थिति में सफल होने की क्षमता या
व्यवहार उसमें है, न कि यह कि परिणाम भाग्य या नियति से नियंत्रित होते हैं। यह अवधारणा
बंदूरा के सामाजिक अधिगम सिद्धांत पर आधारित है।

प्रबल आत्म-सक्षमता वाले लोग कम भयभीत होते हैं, और आदतें (जैसे धूम्रपान छोड़ना) बदलने का
निर्णय लेने के बाद उस पर आसानी से अमल कर लेते हैं। समाज, माता-पिता और स्वयं के सकारात्मक
अनुभव, प्रारंभिक वर्षों में सकारात्मक प्रतिरूप प्रस्तुत कर आत्म-सक्षमता विकसित करने में सहायक होते हैं।

3.4 आत्म-नियमन

कंठस्थ करेंपरिभाषा 5

आत्म-नियमन अपने व्यवहार को संगठित और परिवीक्षित (मॉनीटर) करने की योग्यता है।
आत्म-नियंत्रण किसी आवश्यकता की संतुष्टि को विलंबित या आस्थगित करने की विशेष योग्यता है,
यह दीर्घावधि लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

किताब का अपना उदाहरण

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा आत्म-नियंत्रण के लिए तैयार उपाय देती है, व्रत या रोज़ा में
उपवास, और सांसारिक वस्तुओं के प्रति अनासक्ति।

1

अपने व्यवहार का प्रेक्षण

अपने व्यवहार का प्रेक्षण, जिससे आत्म के किसी पक्ष को बदलने, परिमार्जित या सशक्त करने की सूचना मिलती है।

2

आत्म-अनुदेश

स्वयं को कुछ करने और मनोवांछित तरीके से व्यवहार करने का निर्देश देना।

3

आत्म-प्रबलन

ऐसे व्यवहार को पुरस्कृत करना जिसका परिणाम सुखद हो, जैसे परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने पर मित्रों के साथ फिल्म देखने जाना।

4संस्कृति एवं आत्म

4.1 आत्म और समूह की सीमा रेखा

भारतीय और पाश्चात्य अवधारणाओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि
आत्म और अन्य के बीच सीमा रेखा किस प्रकार निर्धारित की गई है।

चित्र 2.1: भारतीय तथा पाश्चात्य सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों में आत्म एवं समूह की सीमा रेखाएँ (किताब के चित्र 2.1 के आधार पर बनाया गया)
चित्र 2.1: भारतीय तथा पाश्चात्य सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्यों में आत्म एवं समूह की सीमा रेखाएँ (किताब के चित्र 2.1 के आधार पर बनाया गया)

पाश्चात्य दृष्टिकोण

  • आत्म और समूह स्पष्ट रूप से परिभाषित सीमाओं के साथ दो भिन्न इकाइयाँ हैं
  • व्यक्ति समूह के भीतर भी अपनी वैयक्तिकता बनाए रखता है
  • स्पष्ट द्विभाजन (या तो यह या वह, बीच का कुछ नहीं), आत्म-अन्य, मनुष्य-प्रकृति, आत्मनिष्ठ-वस्तुनिष्ठ (वही आत्मगत-वस्तुगत भेद, जो ऊपर 2.2 में बताया गया)
  • आत्म और समूह प्रायः एक-दूसरे से दूरी पर रहते हैं: अनेक पाश्चात्य संस्कृतियों का व्यक्तिवादी संस्कृति के रूप में विशेषीकरण किया जाता है

भारतीय दृष्टिकोण

  • आत्म और अन्य के बीच सीमा रेखा परिवर्तनीय है
  • एक क्षण आत्म समूचे ब्रह्मांड या अन्य में विलीन हो जाता है, दूसरे ही क्षण पूर्णतया
    व्यक्तिगत आवश्यकताओं और लक्ष्यों पर केंद्रित हो जाता है
  • आत्म और समूह स्पष्ट द्विभाजन के बजाय सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व में रहते हैं
  • अनेक एशियाई संस्कृतियों का सामूहिकतावादी संस्कृति के रूप में विशेषीकरण किया जाता है

5व्यक्तित्व की अवधारणा

“व्यक्तित्व” (personality) शब्द लैटिन शब्द persona से बना है, वह मुखौटा जिसे रोमन
रंगमंच के अभिनेता अपनी मुख-रूपसज्जा बदलने के लिए पहनते थे। मुखौटा पहनने का
यह अर्थ नहीं था कि अभिनेता में वास्तव में वे गुण थे, ठीक वैसे ही जैसे “सुंदर दिखने वाला” व्यक्ति
ज़रूरी नहीं कि “आकर्षक व्यक्तित्व” वाला भी हो, यह मात्र एक सतही धारणा है, मनोविज्ञान का अर्थ नहीं।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 6

व्यक्तित्व व्यक्ति के अपेक्षाकृत स्थिर और विशिष्ट गुणों को कहते हैं जो विभिन्न स्थितियों
में, एक समयावधि में, उसके व्यवहार को विशिष्टता प्रदान करते हैं।

5.1 व्यक्तित्व की चार विशेषताएँ

1

शारीरिक + मनोवैज्ञानिक

व्यक्तित्व के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक, दोनों घटक होते हैं।

2

विशिष्ट

व्यवहार में इसकी अभिव्यक्ति प्रत्येक व्यक्ति में काफी विशिष्ट होती है।

3

समय के साथ स्थिर

इसकी मुख्य विशेषताएँ समय के साथ आसानी से नहीं बदलतीं।

4

गतिशील (अनुकूलनशील)

आंतरिक आवश्यकताओं या स्थितिजन्य माँगों के कारण कुछ विशेषताएँ बदलती हैं, व्यक्तित्व स्थितियों के अनुकूल ढल जाता है।

बॉक्स 2.1: व्यक्तित्व से संबंधित शब्दावली
शब्द अर्थ
स्वभाव (Temperament) प्रतिक्रिया करने का जैविक रूप से आधारित विशिष्ट ढंग
विशेषक (Trait) व्यवहार करने का स्थिर, सतत और विशिष्ट तरीका
स्ववृत्ति (Disposition) किसी स्थिति विशेष के प्रति एक विशिष्ट ढंग से प्रतिक्रिया करने की सहज प्रवृत्ति
चरित्र (Character) नियमित रूप से घटित होने वाले व्यवहार का समग्र प्रतिरूप
आदत (Habit) अत्यधिक अभ्यस्त व्यवहार के तरीके
मूल्य (Values) महत्वपूर्ण एवं प्राप्त करने योग्य समझे जाने वाले लक्ष्य और आदर्श

6व्यक्तित्व के अध्ययन के प्रमुख उपागम

अंतःक्रियात्मक उपागम

स्थितिपरक विशेषताएँ हमारे व्यवहारों को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं: लोग स्वतंत्र
या आश्रित व्यवहार अपने आंतरिक विशेषक के कारण नहीं, बल्कि स्थिति में उपलब्ध बाह्य पुरस्कार या खतरे के
कारण करते हैं। भिन्न-भिन्न स्थितियों में विशेषकों को लेकर संगति अत्यंत निम्न पाई जाती है (बाज़ार,
न्यायालय या पूजास्थल पर लोगों का व्यवहार देखिए)।

6.1 प्ररूप उपागम

प्ररूप उपागम समानताओं पर आधारित व्यवहारों के एक समुच्चय के आधार पर व्यक्ति को एक व्यापक श्रेणी में रखता है।

सिद्धांतकार / पद्धति प्रस्तावित प्रकार
हिप्पोक्रेट्स (यूनानी चिकित्सक) चार यूमरल: उत्साही, श्लैष्मिक, कोपशील, विवादी
चरक संहिता (आयुर्वेद), त्रिदोष वात, पित्त, कफ, व्यक्ति की प्रकृति निर्धारित करते हैं
त्रिगुण (एक अलग भारतीय प्ररूप-विज्ञान, चरक संहिता के त्रिदोष से अलग) सत्व (स्वच्छता, सत्यनिष्ठा, अनुशासन), रजस (तीव्र क्रिया, इच्छा, ईर्ष्या), तमस (क्रोध, घमंड, अवसाद, आलस्य), सभी तीनों हर व्यक्ति में अलग-अलग मात्रा में मौजूद
शेल्डन (शारीरिक बनावट + स्वभाव) गोलाकृतिक (मोटे, मृदुल, गोल, शिथिल, मिलनसार), आयताकृतिक (मज़बूत पेशीसमूह, ऊर्जस्वी, साहसी), लंबाकृतिक (पतले, नाज़ुक, कुशाग्रबुद्धि, कलात्मक, अंतर्मुखी)
युंग अंतर्मुखी (अकेले रहना पसंद, संघर्ष से बचना, शर्मीला) बनाम बहिर्मुखी (मिलनसार, सामाजिक)
फ्रीडमैन एवं रोजेनमैन टाइप ए (अधीर, जल्दबाज़, हृदय रोग (CHD) का उच्च जोखिम) बनाम टाइप बी (टाइप ए विशेषकों का अभाव)
मॉरिस (विस्तार) टाइप सी, कैंसर-प्रवण, सहयोगशील, विनीत, नकारात्मक भावनाओं का दमन
हाल का विस्तार टाइप डी, अवसाद-प्रवण
आम ग़लती

शेल्डन के शारीरिक प्ररूप, हिप्पोक्रेट्स के यूमरल या त्रिदोष को “विशेषक सिद्धांत” न लिखें,
किताब प्ररूप उपागम (व्यापक श्रेणियाँ) को विशेषक उपागम (विशिष्ट गुण) से स्पष्ट रूप से अलग रखती है।

व्यक्तित्व की प्ररूप-विधियाँ आकर्षक लगती हैं, पर बहुत सरलीकृत हैं, मानव व्यवहार इतना जटिल और
परिवर्तनशील है कि लोग इन श्रेणियों में इतनी सफ़ाई से फिट नहीं बैठते।

6.2 विशेषक उपागम

कंठस्थ करेंपरिभाषा 7

विशेषक (Trait) एक अपेक्षाकृत स्थायी गुण है जिस पर एक व्यक्ति दूसरे से भिन्न होता है।
विशेषक (क) समय के साथ अपेक्षाकृत स्थिर होते हैं, (ख) विभिन्न स्थितियों में सामान्यतः संगत रहते
हैं, और (ग) उनकी तीव्रता एवं संयोजन व्यक्ति-व्यक्ति में भिन्न होते हैं।

ऑलपोर्ट का विशेषक सिद्धांत

ऑलपोर्ट ने विशेषकों का पता लगाने के लिए अंग्रेज़ी भाषा के उन शब्दों का विश्लेषण किया जो किसी व्यक्ति का वर्णन करते हैं।

ऑलपोर्ट के विशेषक
प्रमुख विशेषकव्यक्ति का पूरा जीवन इसी के इर्द-गिर्द घूमता है, गांधी की अहिंसा, हिटलर का नाज़ीवाद (“गांधीवादी”/”हिटलरी” विशेषक)
केंद्रीय विशेषककम व्यापक पर फिर भी सामान्यीकृत, जैसे स्फूर्त, निष्कपट, मेहनती आदि, शंसापत्र या नौकरी की संस्तुति में उपयोग
गौण विशेषकसबसे कम सामान्यीकृत, “आम पसंद है”, “देशी वस्त्र पसंद हैं”

कैटेल एवं आइज़ेंक

सिद्धांतकार पद्धति / संरचना परीक्षण
रेमंड कैटेल भाषा के वर्णनात्मक विशेषणों पर कारक विश्लेषण (एक सांख्यिकीय विधि, जो ढेर सारे शब्दों को कुछ मुख्य समूहों में बाँट देती है) लगाकर 16 प्रमुख/मूल विशेषक (स्थिर, व्यक्तित्व की आधारभूत इकाइयाँ) + पृष्ठ विशेषक (मूल विशेषकों की अंतःक्रिया से उत्पन्न) सोलह व्यक्तित्व कारक प्रश्नावली (16PF)
आइज़ेंक तीन जैविक/आनुवंशिक आयाम: (1) तंत्रिकातापिता बनाम सांवेगिक स्थिरता, (2) बहिर्मुखता बनाम अंतर्मुखता, (3) मनस्तापिता बनाम सामाजिकता (बाद में जोड़ा गया, उच्च अंक वाले में आक्रामक, अहं-केंद्रित और समाजविरोधी होने की प्रवृत्ति) आइज़ेंक व्यक्तित्व प्रश्नावली (EPQ)
परीक्षा संकेत

आइज़ेंक के आयाम पूछे जाएँ तो तीनों को क्रम से, एक-एक पंक्ति में लिखें।

16कैटेल द्वारा कारक विश्लेषण से पहचाने गए मूल विशेषक
3आइज़ेंक के सिद्धांत में व्यक्तित्व आयाम
5बृहत् पाँच कारक मॉडल के कारक

बॉक्स 2.2: बृहत् पाँच कारक मॉडल

पॉल कॉस्टा और रॉबर्ट मैक्रे ने सभी संभावित व्यक्तित्व विशेषकों की जाँच की और पाँच कारकों
का एक समुच्चय पाया, इसे आज व्यक्तित्व के अध्ययन का सबसे अधिक महत्वपूर्ण आनुभविक उपागम माना
जाता है, यह विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न शोध-विधियों में समर्थित पाया गया है।

O

अनुभवों के लिए खुलापन

कल्पनाशील, जिज्ञासु, नए विचारों के लिए खुला ↔ अनम्य

C

अंतर्विवेकशीलता

उपलब्धि-उन्मुख, भरोसेमंद, आत्म-नियंत्रित ↔ आवेगी

E

बहिर्मुखता

सामाजिक रूप से सक्रिय, मुखर, बातूनी ↔ शर्मीला

A

सहमतिशीलता

सहायक, सहयोगी, देखभाल करने वाला ↔ आक्रामक, आत्म-केंद्रित

N

तंत्रिकाताप

चिंतित, परेशान, चिड़चिड़ा ↔ भली-भाँति समायोजित

6.3 मनोगतिक उपागम (फ्रायड)

सिगमंड फ्रायड, एक चिकित्सक, ने यह सिद्धांत अपने नैदानिक अभ्यास से विकसित किया,
सम्मोहन (आरंभ में), मुक्त साहचर्य (मन में आने वाले सारे विचार खुलकर बताना), स्वप्न विश्लेषण,
और त्रुटियों के विश्लेषण का उपयोग करते हुए।

चेतना के स्तर

चित्र 2.2: फ्रायड के सिद्धांत में व्यक्तित्व की संरचना: अहं अधिकतर चेतन में, पराहम् पूर्वचेतना और अचेतन दोनों में, इड पूरी तरह अचेतन में (किताब के चित्र 2.2 के आधार पर बनाया गया)
चित्र 2.2: फ्रायड के सिद्धांत में व्यक्तित्व की संरचना: अहं अधिकतर चेतन में, पराहम् पूर्वचेतना और अचेतन दोनों में, इड पूरी तरह अचेतन में (किताब के चित्र 2.2 के आधार पर बनाया गया)
1

चेतन

वे विचार, भावनाएँ और क्रियाएँ जिनके प्रति हम अभी जागरूक हैं।

2

पूर्वचेतना

वह मानसिक क्रिया जिसके प्रति हम ध्यान देने पर ही जागरूक हो पाते हैं।

3

अचेतन

मूलप्रवृत्तिक इच्छाओं और दमित (अधिकांशतः कामिक) इच्छाओं का भंडार, जिसके प्रति लोग जागरूक नहीं होते।

द्वंद्वों के संदर्भ में असफल निर्णय के परिणामस्वरूप अपसामान्य व्यवहार उत्पन्न होते हैं। फ्रायड ने एक
चिकित्सा प्रक्रिया विकसित की जिसे मनोविश्लेषण कहते हैं: इसका आधारभूत लक्ष्य दमित अचेतन सामग्रियों
को चेतना के स्तर पर ले आना है, जिससे लोग अधिक आत्म-जागरूक और समाकलित तरीके से जीवन व्यतीत कर सकें।

व्यक्तित्व की संरचना: इड, अहं, पराहम्

ये संप्रत्यय हैं, वास्तविक भौतिक संरचनाएँ नहीं, ये अचेतन में ऊर्जा के रूप में होते हैं और इनका अनुमान लोगों के व्यवहार के तरीकों से लगाया जा सकता है। इनके पीछे काम करने वाली मूलप्रवृत्ति (जन्मजात, बिना सिखाए मौजूद प्रेरणा) की शक्ति को समझना ज़रूरी है।

इडसुखेप्सा-सिद्धांत, तात्कालिक संतुष्टि की माँग, नैतिकता की परवाह नहीं
↔
अहंवास्तविकता-सिद्धांत, इड से उत्पन्न, वास्तविकता से समन्वय करता है
↔
पराहम्नैतिकता, पैतृक प्राधिकार का आंतरिकीकरण
किताब का अपना उदाहरण

एक बालक को आइसक्रीम चाहिए। उसका इड कहता है कि आइसक्रीम झटक कर खा ले। उसका अहं
कहता है कि बिना पूछे लेने पर दंड मिल सकता है, इसलिए सबसे अच्छा तरीका है अनुमति माँगना।
यदि वह माँ से पूछकर आइसक्रीम लेता है, तो उसका पराहम् संकेत देता है कि यह व्यवहार
नैतिक रूप से सही है, इसलिए कोई अपराधबोध या दुश्चिंता नहीं होती।

परीक्षा संकेत

तीनों के सिद्धांत सटीक नाम से लिखें, इड = सुखेप्सा-सिद्धांत, अहं = वास्तविकता-सिद्धांत, पराहम् = नैतिकता
की शाखा।

फ्रायड के अनुसार इड दो मूलप्रवृत्तिक शक्तियों से ऊर्जा पाता है, जीवन-प्रवृत्ति (जिस पर फ्रायड
ने अधिक ध्यान दिया) और मृत्यु मूलप्रवृत्ति (कम ध्यान दिया)। इड को ऊर्जा देने वाली जीवन शक्ति को
कामशक्ति या लिबिडो कहा जाता है।

अहं की रक्षा युक्तियाँ

कंठस्थ करेंपरिभाषा 8

रक्षा युक्ति यथार्थ को विकृत कर दुश्चिंता (बेचैनी भरी चिंता) कम करने का अहं का एक तरीका है, जिससे
मूलप्रवृत्तिक आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता से बचा जाता है।

रक्षा युक्ति क्या होता है
दमन (सबसे महत्वपूर्ण) दुश्चिंता उत्पन्न करने वाले विचार पूरी तरह अचेतन में धकेल दिए जाते हैं, “मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों किया”
प्रक्षेपण व्यक्ति अपने ही गुणों का आरोपण दूसरों पर करता है (आक्रामक व्यक्ति दूसरों को अपने प्रति आक्रामक समझता है)
अस्वीकरण यथार्थ को पूरी तरह स्वीकार करने से मना करना (गंभीर बीमारी से इनकार)
प्रतिक्रिया निर्माण अपनी सच्ची भावनाओं के विपरीत व्यवहार अपनाना
युक्तिकरण अतार्किक भावना या व्यवहार को तर्कसंगत दिखाना (परीक्षा में निम्नस्तरीय निष्पादन के बाद नए कलम खरीदकर सोचना कि “वह आगे की परीक्षा में नए कलम के साथ उच्च स्तर का निष्पादन प्रदर्शित करेगा”)
क्या आप जानते हैं?

फ्रायड का यह दावा कि प्रक्षेपण से दुश्चिंता और दबाव कम होता है, अनेक अध्ययनों के परिणामों
द्वारा समर्थित नहीं पाया गया, किताब स्वयं यह संकेत देती है।

मनोलैंगिक विकास की अवस्थाएँ

मौखिक अवस्थाजीवन के आरंभिक महीने, मुख आनंद का केंद्र (आहार, अंगूठा चूसना)
गुदीय अवस्था (2-3 वर्ष)मल-मूत्र नियंत्रण, इड और अहं के बीच संघर्ष
लैंगिक अवस्था (4-5 वर्ष)जननांगों पर बल, इडिपस/इलेक्ट्रा मनोग्रंथि, समान-लिंग वाले माता/पिता जैसा बनने की कोशिश (तादात्मीकरण) द्वारा हल
कामप्रसुप्ति अवस्था (7 वर्ष से यौवनारंभ तक)कामेच्छाएँ सापेक्ष रूप से निष्क्रिय, ऊर्जा सामाजिक/उपलब्धि संबंधी क्रियाओं में
जननांगीय अवस्थामनोलैंगिक परिपक्वता
कंठस्थ करेंपरिभाषा 9

स्थिरण (fixation) किसी अवस्था के सफलतापूर्वक हल न होने पर वहीं विकास रुक जाना है।
प्रतिगमन (regression) किसी बाद की समस्या के अपर्याप्त समाधान पर, विकास की पहले की
अवस्था में लौट जाना है।

नामित शब्द

इडिपस एक यूनानी राजा था जिसने अनजाने में अपने पिता की हत्या की और अपनी माँ से विवाह
किया, बालक की माँ के प्रति प्रेम और पिता के प्रति शत्रुता को इसी नाम से जाना जाता है। बालिकाओं
में यही इलेक्ट्रा मनोग्रंथि कहलाती है, इलेक्ट्रा एक यूनानी पात्र थी जिसने अपने भाई को अपनी माँ
की हत्या के लिए उकसाया था।

उत्तर-फ्रायडवादी उपागम

इन सिद्धांतकारों ने आरंभ में फ्रायड के साथ काम किया, फिर अपने-अपने सिद्धांत विकसित किए,
काम-भावना और आक्रामकता को कम महत्व, और अहं तथा सामाजिक/तार्किक शक्तियों को
अधिक महत्व देते हुए।

1

कार्ल युंग

मनुष्य काम-भावना और आक्रामकता के स्थान पर उद्देश्यों और आकांक्षाओं से अधिक निर्देशित होते हैं।
विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान, व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर की प्रतिस्पर्धी शक्तियाँ हैं। आत्म एकता और
एकात्मकता के लिए प्रयास करता है। युंग ने
सामूहिक अचेतन का प्रस्ताव दिया, वंशागत आद्य प्ररूप (जैसे ईश्वर या धरती माता की
छवि), जो सभी मानव जाति के मिथकों, स्वप्नों और कलाओं में मिलते हैं।

2

कैरन हार्नी

आशावादी दृष्टिकोण, फ्रायड द्वारा स्त्रियों को हीन मानने की धारणा को चुनौती दी, कोई भी लिंग
श्रेष्ठ या हीन नहीं। बचपन के विक्षुब्ध अंतर्वैयक्तिक संबंधों (उदासीन, हतोत्साहित करने वाला और अनियमित पालन-पोषण) से
मूल दुश्चिंता उत्पन्न होती है, जिसके कारण माता-पिता के प्रति एक गहन अमर्ष (गहरी नाराज़गी) और मूल आक्रामकता उत्पन्न होती है।

3

अल्फ्रेड एडलर: जीवन शैली एवं सामाजिक अभिरुचि

व्यष्टि मनोविज्ञान, मानव व्यवहार उद्देश्यपूर्ण और लक्ष्य-निर्देशित है। हर व्यक्ति में बचपन से
हीनता मनोग्रंथि होती है, इसे दूर करना व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है।

4

एरिक फ्रॉम

सामाजिक अभिविन्यास (फ्रायड जैसा जैविक नहीं), मनुष्य मूलतः सामाजिक प्राणी हैं, चरित्र
विशेषक दूसरों के साथ अनुभवों से विकसित होते हैं, स्वतंत्रता तथा न्याय एवं सत्य की खोज से।

5

एरिक एरिक्सन

तार्किक, सचेत अहं प्रक्रियाओं पर बल, विकास एक आजीवन प्रक्रिया है जिसमें अहं-अनन्यता
केंद्रीय है। किशोरावस्था के अनन्यता संकट के लिए प्रसिद्ध।

आम ग़लती

हार्नी और एडलर की व्याख्याओं को न मिलाएँ, दोनों बचपन से जुड़े विकारों की बात करते हैं, पर
हार्नी अशांत माता-पिता-बालक संबंध से मूल दुश्चिंता को जोड़ती हैं, जबकि एडलर अनसुलझी
हीनता मनोग्रंथि को। समीक्षात्मक प्रश्न 6 इनकी “अवसाद” संबंधी व्याख्या का अंतर पूछता है; किताब
दोनों में से किसी की अवसाद-संबंधी व्याख्या अलग से नहीं देती, इसलिए उत्तर में यही अंतर लिखें।

मनोगतिक सिद्धांतों की आलोचनाएँ

किताब की अपनी चार आलोचनाएँ

  • ये सिद्धांत अधिकांशतः व्यक्ति-अध्ययनों पर आधारित हैं, इनमें परिशुद्ध, वैज्ञानिक आधार का अभाव है
  • सामान्यीकरण के लिए कम संख्या में, विशिष्ट व्यक्तियों को प्रतिदर्श के रूप में उपयोग किया गया है
  • संप्रत्यय ठीक से परिभाषित नहीं हैं, वैज्ञानिक परीक्षण कठिन है
  • फ्रायड ने मात्र पुरुषों को मानव व्यक्तित्व विकास का आदि प्ररूप (प्रोटोटाइप) मानकर स्त्रियों के अनुभवों एवं परिप्रेक्ष्यों पर ध्यान नहीं दिया

इसके बजाय यह न लिखें

  • अस्पष्ट कथन जैसे “फ्रायड का सिद्धांत पुराना हो चुका है”, इनकी जगह ये चार बिंदु लिखें

6.4 व्यवहारवादी उपागम

यह उपागम व्यवहार की आंतरिक गतिकी को कोई महत्व नहीं देता, केवल परिभाषित, प्रेक्षणीय और
मापनीय आँकड़ों पर बल देता है। व्यक्तित्व को पर्यावरण के प्रति व्यक्ति की अनुक्रिया (प्रतिक्रिया) के रूप में
समझा जाता है, अनुक्रिया ही व्यक्तित्व की संरचनात्मक इकाई है, जो किसी विशेष आवश्यकता की
संतुष्टि के लिए उत्पन्न होती है।

क्रियाकलाप 2.2 (किताब): अपने व्यक्तित्व का कौन-सा एक पक्ष बदलना चाहेंगे और कौन-सा कभी नहीं, और क्यों। क्रियाकलाप 2.3 (किताब): अपने और मित्रों के उन व्यवहारों को नोट करें जो लोकप्रिय युवा आदर्शों से अपनाए गए हैं।

पावलोवप्राचीन अनुबंधन
+
स्किनरनैमित्तिक अनुबंधन
+
बंदूराप्रेक्षणात्मक अधिगम (विचार-प्रक्रिया और आत्म-नियमन भी जोड़ता है)

6.5 सांस्कृतिक उपागम

व्यक्तित्व को किसी समूह की पारिस्थितिकी (आस-पास के पर्यावरण) और संस्कृति के अनुकूलन (ढल जाने) के रूप में देखा जाता है।
किसी समूह की “आर्थिक अनुरक्षण प्रणाली” (जलवायु, भू-भाग और भोजन की उपलब्धता से निर्धारित)
आर्थिक क्रियाओं, व्यवस्थापन के संरूपों, सामाजिक संरचना, श्रम विभाजन और बाल-पोषण रीतियों को निर्धारित करती है।
अनुष्ठान, उत्सव, धार्मिक क्रियाकलाप, कला, मनोरंजन और खेल-कूद वे साधन हैं जिनके माध्यम से किसी संस्कृति में
लोगों का व्यक्तित्व प्रक्षेपित होता है।

किताब का अपना उदाहरण, झारखंड के बिरहोर

बिरहोर, झारखंड की एक जनजाति, शिकार और वन-उपज इकट्ठा करने (आखेट-संग्रहण) पर आधारित घुमंतू जीवन जीती है। इनके बच्चों
को प्रारंभ से ही सीखने की पर्याप्त स्वतंत्रता दी जाती है और उन्हें स्वतंत्र, स्वायत्त (अपने फ़ैसले खुद लेने वाले) और उपलब्धि-उन्मुख
बनने के लिए सामाजीकृत किया जाता है, ठीक वैसी विशेषताएँ जिनकी उनके जीवन-यापन के तरीके को
आवश्यकता है। इसके विपरीत, कृषि प्रधान समाज बच्चों को आज्ञाकारी, पोषणशील और उत्तरदायी
बनने के लिए सामाजीकृत करते हैं।

6.6 मानवतावादी उपागम

यह उपागम मुख्यतः फ्रायड के सिद्धांत की प्रतिक्रिया में विकसित हुआ, कार्ल रोजर्स और अब्राहम
मैस्लो द्वारा।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 10

रोजर्स का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विचार “पूर्णतः प्रकार्यशील व्यक्ति” (fully functioning person) है;
व्यक्तित्व के विकास के लिए संतुष्टि अभिप्रेरक शक्ति है। हर व्यक्ति का एक वास्तविक आत्म और एक
आदर्श आत्म (वह आत्म जो व्यक्ति बनना अथवा होना चाहता है) होता है। इन दोनों के बीच समरूपता होने पर
व्यक्ति पूर्णतः प्रकार्यशील होता है: समरूपता होने पर व्यक्ति सामान्यतया प्रसन्न रहता है, और विसंगति से प्रायः
अप्रसन्नता और असंतोष की भावनाएँ उत्पन्न होती हैं।

मानव व्यवहार के बारे में रोजर्स के दो आधारभूत अभिग्रह: (1) व्यवहार लक्ष्योन्मुख और सार्थक होता है;
(2) लोग (जो सहज रूप से अच्छे होते हैं) सदैव अनुकूली तथा आत्मसिद्धि वाले व्यवहार का चयन करेंगे।
किताब का चित्र 2.3 “समायोजन एवं आत्म-संप्रत्यय का प्रतिरूप” इसी संबंध से जुड़ा है।

रोजर्स के अनुसार आत्म-संप्रत्यय के स्वस्थ विकास के लिए अशर्त सकारात्मक आदर
आवश्यक है, उनकी सेवार्थी-केंद्रित चिकित्सा (सेवार्थी यानी परामर्श लेने वाला व्यक्ति) इसी स्थिति को बनाने का प्रयास करती है।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 11

मैस्लो की आत्मसिद्धि (self-actualisation) वह स्थिति है जब व्यक्ति अपनी पूर्ण
क्षमता प्राप्त कर लेता है। जैविक, सुरक्षा और आत्मीयता की आवश्यकताएँ (उत्तरजीविता आवश्यकताएँ)
पशुओं में भी पाई जाती हैं, मानव जीवन की वास्तविक यात्रा तो आत्म-सम्मान और आत्मसिद्धि की
आवश्यकताओं की खोज से शुरू होती है।

आत्मसिद्धि की आवश्यकताएँ
आत्म-सम्मान की आवश्यकताएँ
आत्मीयता की आवश्यकताएँ
सुरक्षा की आवश्यकताएँ
जैविक (उत्तरजीविता) आवश्यकताएँ

मैस्लो की आवश्यकता पदानुक्रम, कक्षा XI से पुनरावलोकन, सबसे निचली तीन “उत्तरजीविता आवश्यकताएँ” हैं

बॉक्स 2.3: मानवतावादी सिद्धांतकारों का मत है कि स्वस्थ व्यक्तित्व मात्र समाज के प्रति समायोजन में
ही निहित नहीं होता; उसमें अपने को गहराई से जानने की जिज्ञासा, बिना छद्मवेश के अपनी भावनाओं के प्रति ईमानदार
होना और जहाँ-तहाँ एक जैसा बने रहने की प्रवृत्ति भी सन्निहित होती है।

बॉक्स 2.3: स्वस्थ व्यक्ति कौन है (मानवतावादी दृष्टिकोण)
क्र. विशेषता
1 स्वयं, अपनी भावनाओं और सीमाओं के प्रति जागरूक, अपने को स्वीकार करता है और अपने जीवन को जैसा बनाता है उसके प्रति उत्तरदायी होता है, साथ ही कुछ बन जाने का साहस रखता है
2 “अभी और यहाँ” का अनुभव करता है, फँसा हुआ नहीं है
3 न भूतकाल में जीता है, न चिंताजनक प्रत्याशाओं या विकृत रक्षा-युक्तियों के साथ भविष्य में

7व्यक्तित्व का मूल्यांकन

कंठस्थ करेंपरिभाषा 12

व्यक्तित्व मूल्यांकन किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को समझने का एक औपचारिक प्रयास है,
निदान, प्रशिक्षण, स्थानन (placement) और परामर्श में उपयोगी, न्यूनतम त्रुटि व अधिकतम शुद्धता के साथ
व्यवहार की भविष्यवाणी करना इसका लक्ष्य है।

7.1 आत्म-प्रतिवेदन माप

प्रत्यक्ष, संरचित माप, व्यक्ति स्वयं अपनी भावनाओं की खुलकर रिपोर्ट करता है, अंकों को मानकों
के आधार पर मात्रात्मक रूप से व्याख्यायित किया जाता है।

परीक्षण विकासकर्ता प्रमुख तथ्य
MMPI (मिनेसोटा बहुपक्षीय व्यक्तित्व सूची) हाथवे एवं मैकिन्ले 567 सही/ग़लत कथन, 10 उप-मापनी (जैसे अवसाद, व्यामोह, मनोविदलता), संशोधित रूप MMPI-2
JMPI (जोधपुर बहुपक्षीय व्यक्तित्व सूची) मल्लिक एवं जोशी भारतीय परीक्षण, MMPI की तर्ज़ पर विकसित
EPQ (आइजेंक व्यक्तित्व प्रश्नावली) आइज़ेंक अंतर्मुखी-बहिर्मुखी + संवेगात्मक स्थिर-अस्थिर (32 विशेषक), बाद में मनस्तापिता जोड़ी गई
16PF कैटेल घोषणात्मक कथन, दिए गए विकल्पों में से चुनना, व्यावसायिक मार्गदर्शन में उपयोगी
आम ग़लती

आत्म-प्रतिवेदन मापों में अनेक समस्याएँ पाई जाती हैं, जिनमें से दो हैं सामाजिक वांछनीयता (कथनों को सामाजिक रूप
से स्वीकार्य ढंग से हामी भरना) और अनुमनन (कथन की विषयवस्तु से निरपेक्ष होकर
सहमत होना, “हाँ” कहना)। “आत्म-प्रतिवेदन माप की समस्याएँ” पूछे जाने पर दोनों नाम लिखें।

7.2 प्रक्षेपी तकनीकें

आत्म-प्रतिवेदन माप प्रत्यक्ष विधियाँ हैं (व्यक्ति जानता है कि उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन हो रहा है)।
प्रक्षेपी तकनीकें अप्रत्यक्ष विधियाँ हैं: असंरचित उद्दीपक व्यक्ति को अपनी भावनाओं, इच्छाओं और आवश्यकताओं
का प्रक्षेपण करने देता है, जिससे अचेतन अभिप्रेरणाओं का पता चलता है। सभी प्रक्षेपी तकनीकों की पाँच
समान विशेषताएँ:

  1. उद्दीपक सापेक्ष रूप से अथवा पूर्णतः असंरचित और अनुपयुक्त ढंग से परिभाषित होते हैं।
  2. व्यक्ति को साधारणतया मूल्यांकन का उद्देश्य, अंक प्रदान करने की विधि और व्याख्या नहीं बताई जाती।
  3. व्यक्ति को बता दिया जाता है कि कोई भी अनुक्रिया सही या गलत नहीं होती।
  4. प्रत्येक अनुक्रिया व्यक्तित्व के एक महत्वपूर्ण पक्ष को प्रकट करने वाली समझी जाती है।
  5. अंक प्रदान करना और व्याख्या करना लंबा (अधिक समय लेने वाला) और कभी-कभी आत्मनिष्ठ होता है।
1

रोर्शा स्याही-धब्बा परीक्षण

हर्मन रोर्शा, 10 सममित स्याही धब्बे (5 श्वेत-श्याम, 2 लाल रंग सहित, 3 पेस्टल रंगों में),
लगभग 7″×10″ कार्डबोर्ड पर। दो चरण: निष्पादन (क्या दिखता है) और पूछताछ (कहाँ, कैसे और किस आधार पर)।

2

कथानक संप्रत्यक्षण परीक्षण (TAT)

मॉर्गन एवं मरे, 30 श्वेत-श्याम चित्र कार्ड + 1 खाली कार्ड। व्यक्ति चित्र के बारे में कहानी
बताता है, पहले क्या हुआ, अभी क्या हो रहा, आगे क्या होगा। उमा चौधरी का भारतीय रूपांतरण।

3

रोजेनज्विग का पी-एफ अध्ययन

कुंठाजनक स्थिति के कार्टून चित्र, व्यक्ति बताता है कि कुंठित व्यक्ति क्या करेगा। आक्रामकता
के प्रकार और दिशा का विश्लेषण। पारीक का भारतीय जनसंख्या के लिए रूपांतरण।

4

वाक्य-समापन परीक्षण

अधूरे वाक्य दिए जाते हैं (“मेरे पिता ___”, “मुझे सबसे अधिक भय ___”), वाक्य पूरा करने का
तरीका अभिवृत्ति, अभिप्रेरणा और द्वंद्व दर्शाता है।

5

व्यक्तंकन परीक्षण

व्यक्ति को एक व्यक्ति का चित्र बनाने को कहा जाता है, फिर विपरीत लिंग का, फिर उसके बारे
में कहानी। उदाहरण: असंतुलित रूप से बड़ा सिर, आंगिक मस्तिष्क रोग या सिरदर्द की व्यग्रता का संकेत।

7.3 व्यवहारपरक विश्लेषण (प्रेक्षक विवरण)

विधि क्या शामिल है
साक्षात्कार संरचित (निश्चित प्रश्न व प्रक्रिया) या असंरचित (खुला प्रभाव-निर्माण)
व्यवहारपरक निर्धारण व्यक्ति को भली-भाँति जानने वाले लोग उसे श्रेणियों में रखते हैं। तीन अभिनतियाँ: परिवेश प्रभाव (एक गुण पूरे निर्णय को रंग देता है), मध्य संवर्ग अभिनति (व्यक्तियों को मापनी के मध्य में रखना) और आत्यंतिक अनुक्रिया अभिनति (छोर की स्थितियों में रखना)
प्रेक्षण व्यवहार का सतर्क, प्रशिक्षित प्रेक्षण। प्रेक्षण और साक्षात्कार की सीमाएँ: (1) अपेक्षित व्यावसायिक प्रशिक्षण कठिन और समयसाध्य होता है; (2) मनोवैज्ञानिक में भी परिपक्वता आवश्यक होती है; (3) प्रेक्षक की उपस्थिति मात्र परिणामों को दूषित कर सकती है
नाम निर्देशन सहकर्मी-मूल्यांकन, प्रत्येक व्यक्ति बताता है किसके साथ काम/अध्ययन/खेलना चाहेगा, अत्यधिक विश्वसनीय पर पूर्वाग्रह से प्रभावित हो सकता है
स्थितिपरक परीक्षण जैसे स्थितिपरक दबाव परीक्षण, असहयोगी लोगों के साथ भूमिका-निर्वाह द्वारा तनाव में व्यवहार देखना
त्वरित पुनरावलोकन, परीक्षा से पहले की रात यही पढ़ें
  • आत्म व्यक्तित्व के मूल में है, व्यक्तिगत बनाम सामाजिक अनन्यता, जैविक/व्यक्तिगत/सामाजिक आत्म
  • आत्म-सम्मान, आत्म-सक्षमता (बंदूरा), आत्म-नियमन, आत्म-नियंत्रण
  • भारतीय आत्म (परिवर्तनीय सीमा, सामूहिकतावादी) बनाम पाश्चात्य आत्म (स्थिर सीमा, व्यक्तिवादी)
  • प्ररूप: हिप्पोक्रेट्स, त्रिदोष/त्रिगुण, शेल्डन, युंग, टाइप A/B/C/D
  • विशेषक: ऑलपोर्ट, कैटेल (16PF), आइज़ेंक (EPQ), बृहत् पाँच कारक
  • फ्रायड: चेतन/पूर्वचेतन/अचेतन; इड/अहं/पराहम्; 5 रक्षा युक्तियाँ; 5 मनोलैंगिक अवस्थाएँ; युंग, हार्नी, एडलर, फ्रॉम, एरिक्सन
  • व्यवहारवादी: पावलोव, स्किनर, बंदूरा। सांस्कृतिक: बिरहोर। मानवतावादी: रोजर्स, मैस्लो
  • मूल्यांकन: आत्म-प्रतिवेदन बनाम प्रक्षेपी बनाम व्यवहारपरक विश्लेषण
सभी परिभाषाएँ एक जगह
आत्म-संप्रत्ययस्वयं को और अपनी योग्यताओं को देखने का तरीका
आत्म-सम्मानअपने ही मूल्य के बारे में किया गया मूल्य-निर्णय
आत्म-सक्षमतासफल होने की अपनी क्षमता में विश्वास (बंदूरा)
आत्म-नियमन / आत्म-नियंत्रणअपने व्यवहार का संगठन; संतुष्टि को विलंबित करना
व्यक्तित्वविभिन्न स्थितियों और समय में व्यवहार को विशिष्टता देने वाले स्थिर, विशिष्ट गुण
विशेषकएक अपेक्षाकृत स्थायी गुण जिस पर लोग भिन्न होते हैं
इड / अहं / पराहम्सुखेप्सा-सिद्धांत / वास्तविकता-सिद्धांत / नैतिकता की शाखा, फ्रायड की तीन शक्तियाँ
रक्षा युक्तियथार्थ को विकृत कर दुश्चिंता कम करने का अहं का तरीका
स्थिरण / प्रतिगमनकिसी अवस्था पर विकास रुकना / पहले की अवस्था में लौटना
सामूहिक अचेतनयुंग द्वारा प्रस्तावित आद्य प्ररूपों का वंशागत भंडार
हीनता मनोग्रंथिएडलर द्वारा वर्णित बचपन की अपर्याप्तता की भावना
वास्तविक आत्म / आदर्श आत्मरोजर्स, अभी जो हैं / जो बनना चाहते हैं
आत्मसिद्धिमैस्लो, अपनी पूर्ण क्षमता की प्राप्ति
व्यक्तित्व मूल्यांकनव्यवहार का मूल्यांकन एवं भविष्यवाणी करने की औपचारिक प्रक्रिया
प्रक्षेपी तकनीकअचेतन अभिप्रेरणाओं को उजागर करने वाला असंरचित उद्दीपक
परीक्षा से पहले स्वयं जाँच लें
  • क्या मैं बिना देखे भारतीय और पाश्चात्य आत्म का अंतर एक-एक पंक्ति में बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं फ्रायड की तीनों संरचनाओं के नाम और उनके सिद्धांत बिना देखे बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं सभी पाँच रक्षा युक्तियों को एक-एक उदाहरण के साथ सूचीबद्ध कर सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं मनोलैंगिक विकास की पाँचों अवस्थाओं को सही क्रम में बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं बृहत् पाँच कारकों के नाम बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं दो आत्म-प्रतिवेदन परीक्षण और दो प्रक्षेपी तकनीकें उनके विकासकर्ताओं सहित बता सकता/सकती हूँ?
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