- मार्क्स, वेबर और दुर्खाइम ने औद्योगीकरण को नगरीकरण और आमने-सामने के संबंधों की जगह अनजान व्यावसायिक संबंधों से कैसे जोड़ा, और मार्क्स का ‘अलगाव’ क्या है
- भारतीय औद्योगीकरण पश्चिमी प्रतिमान से कैसे अलग है, और संगठित तथा असंगठित क्षेत्र वास्तव में क्या हैं
- 1990 के दशक से उदारीकरण ने भारतीय उद्योग को कैसे बदला, वास्तविक उदाहरणों सहित
- भारत में लोग वास्तव में काम कैसे पाते हैं, मिस्त्री और बदली कामगार से लेकर सरकारी रोज़गार और स्व-रोज़गार योजनाओं तक
- खनन, आईटी और बीड़ी उद्योग जैसे घरेलू काम में कार्यावस्थाएँ कैसी हैं
- मज़दूर संघ और हड़ताल क्यों होते हैं, 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक के उदाहरण से
| बोर्ड | अंक | स्थिति |
|---|---|---|
| CBSE 2026-27 | 10 | पाठ्यक्रम की इकाई 12 (भाग B, भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास) |
अन्य बोर्डों के विद्यार्थी अपने बोर्ड का वर्तमान पाठ्यक्रम और अंक-विभाजन स्वयं देख लें।
1काम से बना एक शहर
मुंबई का फ़िल्म उद्योग शुरुआत के लिए अच्छी जगह है, क्योंकि यह इस पूरे अध्याय की बात एक ही तस्वीर में दिखाता है। फ़िल्म सेट पर काम करने वाले नर्तक, जोखिम भरे कार्य करने वाले कलाकार और अतिरिक्त कलाकार, कनिष्ठ कलाकार संघ के सदस्य हैं। इस संघ की माँग है कि आठ घंटे की शिफ्ट हो, वाजिब मेहनताना मिले और कार्यावस्था सुरक्षित हो, ठीक वैसे ही जैसे किसी भी अन्य उद्योग के मज़दूर माँगते हैं। फ़िल्मी सितारे और कपड़ा मिलों के मालिक जुहू जैसी जगहों पर रहते हैं, जबकि अतिरिक्त कलाकार और कपड़ा मिल के मज़दूर गिरणगाँव जैसी जगहों पर रहते हैं। मुंबई के लोग कहाँ रहते हैं, क्या खाते हैं और कैसे कपड़े पहनते हैं, इसी के आधार पर बँटे हुए हैं। फिर भी वे शहर की कुछ साझा चीज़ों से जुड़े हैं, वही फ़िल्में और मैच देखना, वही प्रदूषित हवा में साँस लेना, और अपने बच्चों के अच्छा करने की एक जैसी आकांक्षा।
इस अध्याय का सवाल सीधा है पर जवाब उलझा हुआ है। लोग कहाँ और किस तरह का काम करते हैं, यह उनकी पहचान का बड़ा हिस्सा है। जाति, नातेदारी का संजाल, लिंग और क्षेत्र जैसी सामाजिक संस्थाएँ भी काम को संगठित करने के तरीके और उत्पाद को बाज़ार में भेजने के तरीके को प्रभावित करती हैं। यही वजह है कि काम समाजशास्त्रियों के शोध का एक बड़ा क्षेत्र है, केवल आर्थिक तथ्य नहीं।
2औद्योगिक समाज की कल्पना
समाजशास्त्र के अधिकतर बड़े काम तब लिखे गए जब औद्योगीकरण नया था और मशीनें महत्वपूर्ण होती जा रही थीं। कार्ल मार्क्स, मैक्स वेबर और एमील दुर्खाइम ने उद्योग को कई सामाजिक विशेषताओं से जोड़ा, नगरीकरण, और ग्रामीण इलाकों के आमने-सामने के संबंधों की समाप्ति, जहाँ लोग अपने या जान-पहचान के भूस्वामी के खेतों में काम करते थे। इनकी जगह आधुनिक कारखानों और कार्यस्थलों के अनजान, व्यावसायिक संबंधों ने ले ली।
अलगाव (मार्क्स) वह स्थिति है जिसमें लोग अपने कार्य से प्रसन्न नहीं होते और उसे केवल जीवित रहने के लिए करते हैं। उनकी उत्तरजीविता भी इस बात पर निर्भर करती है कि मशीनें मानवीय श्रम के लिए कितना स्थान छोड़ती हैं।
औद्योगीकरण में श्रम का विस्तृत विभाजन होता है, लोग अधिकतर अपने कार्य का अंतिम रूप नहीं देख पाते, क्योंकि उन्हें उत्पाद का केवल एक छोटा सा पुर्जा बनाना होता है। यह काम अक्सर दोहराने वाला और थकाने वाला होता है, फिर भी, जैसा पुस्तक कहती है, बेरोज़गार रहने से यह स्थिति अच्छी है।
आधुनिकीकरण के सिद्धांतकार क्लार्क कैर का तर्क है कि 21वीं शताब्दी का औद्योगीकृत भारत, 19वीं शताब्दी के भारत की तुलना में 21वीं शताब्दी के चीन या संयुक्त राज्य अमेरिका से अधिक समानता रखेगा, यानी अलग-अलग देश समय के साथ अपनी पुरानी संस्कृति छोड़कर एक जैसे (अभिसरित) होते जाते हैं। पुस्तक आपसे यह सोचने को कहती है, क्या संस्कृति नई तकनीक के साथ मिट जाती है, या संस्कृति ही तय करती है कि लोग नए उत्पादों को कैसे अपनाते हैं?
औद्योगीकरण जो कम करता है
- रेलगाड़ियों, बसों और साइबर कैफे में जातीय भेदभाव का महत्त्व घटता है
- कुछ परंपरागत सामाजिक असमानताएँ वास्तव में कम हो रही हैं
जो बना रहता है या बढ़ता है
- भेदभाव के पुराने रूप नए कारखानों और कार्यस्थलों में भी टिके रहते हैं
- कुछ सामाजिक असमानता घटने पर भी आर्थिक (आय) असमानता बढ़ रही है
- मेडीसिन, कानून और पत्रकारिता जैसे अच्छे वेतन वाले व्यवसायों में उच्च जाति के लोगों का वर्चस्व आज भी बना हुआ है
- महिलाओं को अक्सर समान काम के लिए पुरुषों से कम वेतन मिलता है
3भारत में औद्योगीकरण
3.1 पश्चिमी प्रतिमान से अलग एक रास्ता
भारत में औद्योगीकरण का अनुभव पश्चिमी प्रतिमान से कुछ मामलों में मिलता है और कुछ में अलग है। तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि औद्योगिक पूँजीवाद का कोई एक मानक प्रतिमान नहीं है। एक स्पष्ट अंतर यह है कि लोग वास्तव में किस तरह का काम कर रहे हैं।
विकसित देशों में अधिकतर लोग सेवा क्षेत्र में, फिर उद्योग में काम करते हैं, और 10 प्रतिशत से कम कृषि में लगे हैं (आई.एल.ओ. यानी अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के आँकड़े)। 2018-19 में भारत का अपना पैटर्न इससे बहुत अलग दिखता है:

भारत के लगभग 43% कामगार कृषि में हैं, फिर भी आर्थिक वृद्धि में कृषि का हिस्सा तेज़ी से घटा है, जबकि सेवा क्षेत्र आधे से अधिक हिस्सा देता है। यही वजह है कि पुस्तक इसे “बहुत गंभीर स्थिति” कहती है, जिस क्षेत्र में सबसे अधिक लोग कार्यरत हैं वही क्षेत्र उन्हें पर्याप्त आमदनी देने में सक्षम नहीं है।
2018-19 के लिए उद्योगवार रोज़गार का हिस्सा इस प्रकार है, कृषि 42.5%, खदान एवं खनन 0.4%, निर्माण 12.1%, व्यापार-होटल-रेस्तराँ 12.6%, यातायात-भंडारण-संचार 5.9%, और सामुदायिक-सामाजिक-व्यक्तिगत सेवाएँ 13.8%।
3.2 स्व-रोज़गार, वेतनभोगी या अनियमित मज़दूर?
विकसित देशों से एक और बड़ा अंतर है, नियमित वेतनभोगी रोज़गार में लोगों की संख्या। विकसित देशों में अधिकतर लोग औपचारिक रूप से कार्यरत होते हैं। भारत में 52 प्रतिशत से अधिक कामगार स्व-रोज़गारी हैं, केवल लगभग 24 प्रतिशत नियमित वेतनभोगी रोज़गार में हैं, और लगभग 24 प्रतिशत अनियमित मज़दूर हैं।
इन क्षेत्रों को कैसे परिभाषित किया जाए, इस पर मतभेद है। एक परिभाषा के अनुसार संगठित (औपचारिक) क्षेत्र की इकाई में 10 या अधिक लोग पूरे वर्ष रोज़गार में रहते हैं। सरकारी तौर पर इनका पंजीकरण होना चाहिए, ताकि कर्मचारियों को उपयुक्त वेतन या मज़दूरी, पेंशन और अन्य सुविधाएँ मिलना सुनिश्चित हो सके। भारत में 90 प्रतिशत से अधिक कार्य, चाहे वह कृषि, उद्योग अथवा नौकरी हो, असंगठित (अनौपचारिक) क्षेत्र में आते हैं।
अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों से मेल-मिलाप कम
बहुत कम भारतीयों को बड़ी फर्मों में काम करने का अनुभव मिलता है, जहाँ वे दूसरे क्षेत्रों के लोगों से मिल पाएँ। अधिकतर काम छोटे पैमाने के कार्यस्थलों में होता है, जहाँ वेतन बढ़ना या नौकरी जाना निश्चित नियमों से नहीं बल्कि वैयक्तिक संबंधों से तय होता है।
सुरक्षित नौकरियाँ बहुत कम
बहुत ही कम भारतीयों को सुविधाओं वाली सुरक्षित नौकरी मिलती है, और जिन्हें मिलती है उनमें से दो-तिहाई सरकारी नौकरी में हैं। यही कारण है कि लोग सरकारी नौकरी पाने के लिए इतनी मेहनत करते हैं। सरकारी रोज़गार ने जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारों को पार करने में भी बड़ी भूमिका निभाई है, एक समाजशास्त्री का तर्क है कि भिलाई स्टील प्लांट में सांप्रदायिक दंगे न होने का कारण यही है कि वहाँ भारत के हर हिस्से के लोग साथ काम करते हैं। दूसरे लोग इस तर्क पर प्रश्न उठा सकते हैं।
मज़दूर संघ का अनुभव बहुत कम
बहुत कम लोग संघ के सदस्य होते हैं, जो संगठित क्षेत्र की एक विशेषता है, इसलिए असंगठित क्षेत्र के कामगारों को उचित वेतन और सुरक्षित कार्यावस्था के लिए सामूहिक रूप से लड़ने का अनुभव ही नहीं मिलता। सरकार ने असंगठित क्षेत्र पर निगरानी के लिए नियम बनाए हैं, लेकिन व्यवहार में नियोजक या ठेकेदार की मनमर्जी ही चलती है।
3.3 भूमंडलीकरण, उदारीकरण और भारतीय उद्योग
भूमंडलीकरण दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं के आपस में जुड़ने की बड़ी प्रक्रिया है, जिसका पूरा विवरण अगले अध्याय (भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन) में है। यहाँ हम इसका वह हिस्सा देखते हैं जो सीधे भारतीय उद्योगों पर असर डालता है, यानी उदारीकरण। 1990 के दशक से सरकार ने उदारीकरण की नीति अपनाई है। निजी कंपनियों, विशेषकर विदेशी फर्मों को दूरसंचार, नागरिक उड्डयन और ऊर्जा जैसे उन क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया जो पहले सरकार के लिए आरक्षित थे। उद्योग खोलने के लिए अब लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है, और विदेशी वस्तुएँ अब भारतीय दुकानों में आसानी से मिल जाती हैं।
उदारीकरण से बहुदेशीय कंपनियों ने कई भारतीय कंपनियों को खरीद लिया, और कुछ भारतीय कंपनियाँ खुद बहुदेशीय बन गईं। पुस्तक का अपना उदाहरण है, कोका कोला ने पारले पेय को खरीदा। पारले की सालाना आमदनी 250 करोड़ रुपये थी, जबकि केवल कोका कोला का विज्ञापन बजट 400 करोड़ रुपये था, इतने बड़े विज्ञापन ने स्वाभाविक रूप से कोला के उपभोग को बढ़ाया और कई परंपरागत पेयों की जगह ले ली।
पुस्तक के अनुसार उदारीकरण का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र खुदरा व्यापार हो सकता है। पुस्तक आपसे पूछती है कि भारतीय डिपार्टमेंटल स्टोर, किराने की दुकान, पड़ोस या छोटे शहरों की कपड़े की दुकान में से कहाँ से खरीदारी करना पसंद करते हैं।
सरकार सार्वजनिक कंपनियों में अपना हिस्सा बेच रही है, इसे विनिवेश कहा जाता है, यानी सार्वजनिक कंपनियों के अपने हिस्से निजी क्षेत्र की कंपनियों को बेचना। कई सरकारी कर्मचारी डरते हैं कि विनिवेश के कारण उनकी नौकरी चली जाएगी। मॉडर्न फूड, जिसे सरकार ने सस्ता और स्वास्थ्यवर्धक खाना उपलब्ध कराने के लिए बनाया था, इसी तरह निजीकरण की जाने वाली पहली कंपनी बनी, और इसके 60 प्रतिशत कर्मचारियों को पहले पाँच वर्षों में ही जबरन सेवामुक्त कर दिया गया।
कुल मिलाकर, भारत अभी भी मुख्यतः एक कृषि प्रधान देश है। सेवा क्षेत्र, यानी दुकानें, बैंक, आई.टी. उद्योग, होटल, अधिक लोगों को रोज़गार दे रहा है, और शहरी मध्यवर्ग तथा उसके मूल्य बढ़ रहे हैं। फिर भी बहुत कम भारतीयों को सुरक्षित रोज़गार मिलता है, और नियमित वेतनभोगी काम की छोटी सी संख्या भी अनुबंधित मज़दूरी बढ़ने से असुरक्षित होती जा रही है। सरकारी रोज़गार, जो कल्याण का एक बड़ा साधन था, अब घट रहा है, और विश्व स्तर पर उदारीकरण तथा निजीकरण का संबंध बढ़ती आय-असमानता से जुड़ा दिखाई देता है।
जिस समय बड़े उद्योगों में सुरक्षित रोज़गार घट रहा है, उसी समय सरकार उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण की नीति भी अपना रही है। ये उद्योग आस-पास के लोगों को रोज़गार नहीं देते, बल्कि भारी प्रदूषण फैलाते हैं। ऐसे विस्थापितों में लगभग 40 प्रतिशत आदिवासी हैं, जो कम मुआवज़े का विरोध करते हैं और अंततः बड़े शहरों के फुटपाथ पर दिहाड़ी मज़दूरी करने को मजबूर होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे अध्याय 3 में हितों की प्रतियोगिता पर चर्चा हुई थी।
4लोग काम किस तरह पाते हैं
बहुत कम लोगों को विज्ञापन या रोज़गार कार्यालय से नौकरी मिलती है। स्व-रोज़गार करने वाले, जैसे नलसाज, बिजली मिस्त्री और बढ़ई एक तरफ़, और निजी ट्यूशन देने वाले अध्यापक, वास्तुकार तथा स्वतंत्र छायाचित्रकार दूसरी तरफ़, अपने निजी संपर्कों पर निर्भर रहते हैं, और सोचते हैं कि उनका काम ही उनका विज्ञापन है। मोबाइल फ़ोन ने इनके लिए ज़्यादा लोगों तक पहुँचना आसान बना दिया है।
फ़ैक्ट्री के कामगारों को रोज़गार देने का तरीका भिन्न होता है। पहले बहुत से कामगार ठेकेदार या काम देने वालों से रोज़गार पाते थे। कानपुर कपड़ा मिल में रोज़गार दिलाने वाले को मिस्त्री बोलते थे, और वे खुद भी वहाँ काम करते थे। वे मज़दूरों के समान क्षेत्रों या समुदायों से आते थे, परंतु मालिक उन पर कृपालु होते थे, अतः वे सब कामगारों के मुखिया बन जाते थे। दूसरी तरफ़ मिस्त्री कामगारों पर समुदाय संबंधी दबाव भी डालता था। आजकल काम दिलाने वाले का महत्त्व कम हो गया है, और कार्यकारिणी तथा यूनियन दोनों ही अपने लोगों को काम दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ कामगार यह भी चाहते हैं कि उनका काम उनके बच्चों को दे दिया जाए।
बदली कामगार छुट्टी पर गए स्थायी मज़दूर के स्थान पर काम करता है। बहुत से बदली कामगार एक ही कंपनी में बहुत लंबे समय से काम कर रहे होते हैं, किंतु उन्हें सबके समान स्थायी पद और सुरक्षा नहीं दी जाती। इसी को पुस्तक संगठित क्षेत्र में अनुबंधित कार्य कहती है।
इन योजनाओं का उद्देश्य हाशिए पर खड़े लोगों, जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं महिलाओं सहित सभी वर्गों के लिए रोज़गार और स्व-रोज़गार बढ़ाना है, और पुस्तक के अनुसार इन प्रयासों ने भारत के युवाओं को, जिन्हें जनांकिकीय डिविडैंट भी कहा जाता है, विकास की प्रक्रिया से जोड़ा है।
पहले कृषि मज़दूर अपने कर्ज़े के बदले ज़मींदार के पास बंधुआ मज़दूर की तरह रहते थे। उद्योग में अनियत कामगार के रूप में आया मज़दूर अभी भी कर्ज़दार है, पर अनुबंधक के अन्य सामाजिक दायित्वों से बँधा नहीं होता। इस अर्थ में वह औद्योगिक समाज में अधिक मुक्त है, और अनुबंध तोड़कर किसी और के यहाँ काम ढूँढ़ सकता है।
कभी-कभी पूरा परिवार ही प्रवास कर जाता है, और बच्चे अपने माता-पिता की मदद करते हैं
5काम को किस तरह किया जाता है?
मैनेजर का मुख्य काम मज़दूरों को नियंत्रित रखना और उनसे अधिक काम कराना होता है, इसके दो तरीके हैं, काम के घंटे बढ़ाना, या समान समय में उत्पादन बढ़ाना। मशीनें उत्पादन तो बढ़ाती हैं, लेकिन साथ ही मज़दूरों की जगह लेने का ख़तरा भी पैदा करती हैं। मार्क्स और महात्मा गांधी दोनों ने मशीनीकरण को रोज़गार के लिए ख़तरा माना।
भारत के सबसे पुराने उद्योगों में से एक, कपड़ा मिल, के कामगार अपने आप को मशीन के विस्तार की तरह वर्णित करते हैं, यानी वे खुद को मशीन का ही एक हिस्सा जैसा महसूस करते हैं।
“आपको ऊर्जा की आवश्यकता होती है, आँखें, गर्दन, टाँगें, हाथ और शरीर का प्रत्येक हिस्सा घूमता है। बुनाई के काम में लगातार टकटकी लगानी पड़ती है, आप कहीं नहीं जा सकते, आप का पूरा ध्यान मशीन पर केंद्रित होना चाहिए। जब चार मशीनें चल रही हों तो चारों को चलना चाहिए, उन्हें रुकना नहीं चाहिए।”
रामचंद्र, 1940 से कानपुर कपड़ा मिल में काम करने वाले बुनकर (जोशी, 2003)
गांधी (1924, क्रियाकलाप 5.2 में उद्धृत) ने लिखा कि वे मशीनों के नहीं बल्कि “मशीनों के प्रति पागलपन” के विरोधी हैं, जो हज़ारों मज़दूरों को काम से हटाकर सड़क पर भूख से मरने को छोड़ देता है। 1934 में उन्होंने कहा कि चरखा अपनाने से राष्ट्र न केवल बेरोज़गारी की समस्या हल करता है, बल्कि यह भी घोषित करता है कि “हमारी किसी भी राष्ट्र का शोषण करने की इच्छा नहीं है”, और अमीरों द्वारा गरीबों के शोषण को भी समाप्त करना चाहता है।
उद्योग जितना अधिक मशीनीकृत होता है, उतने ही कम लोगों को काम मिलता है, लेकिन जो बचते हैं उन्हें मशीन की गति से काम करना पड़ता है। मारुति उद्योग लिमिटेड में हर मिनट दो कारें तैयार होती हैं। मज़दूरों को पूरे दिन में केवल 45 मिनट का विश्राम मिलता है, दो चाय की छुट्टियाँ साढ़े सात-साढ़े सात मिनट की और आधे घंटे की एक भोजन छुट्टी। अधिकतर मज़दूर 40 वर्ष की उम्र तक थककर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लेते हैं। कंपनी ने सफ़ाई, सुरक्षा और पुर्जों का उत्पादन तक बाह्यस्रोतों से करवाया है, पुर्जे हर दो घंटे में नियत समय पर (जस्ट-इन-टाइम) भेजे जाते हैं, जिससे कंपनी की लागत तो कम रहती है, पर मज़दूर तनाव में रहते हैं।
सेवा क्षेत्र में सॉफ़्टवेयर में काम करने वाले लोग मध्यम वर्गीय और पूर्णतः शिक्षित होते हैं, और उनका कार्य स्वतःस्फूर्त एवं रचनात्मक होता है। फिर भी बॉक्स 5.1 दिखाता है कि उनका कार्य भी टायलरिज्म लेबर प्रक्रिया के अनुरूप ही होता है (पुस्तक से बाहर: यह नाम फ़्रेडरिक टेलर के उस तरीके से आया है जिसमें काम को छोटे, समय से बँधे हिस्सों में बाँटा जाता है)।
आईटी में औसत कार्यदिवस 10 से 12 घंटे का होता है, और परियोजना की अंतिम सीमा आने पर रातभर दफ़्तर में रुकना, जिसे “नाइट आउट” कहा जाता है, असामान्य नहीं है। इसका एक कारण भारत और ग्राहक देश के बीच का समय-अंतर है, जिससे सम्मेलन शाम को होते हैं जबकि अमेरिका में तब कार्यदिवस शुरू हो रहा होता है। दूसरा कारण यह है कि बाह्यस्रोतीकृत परियोजनाओं की लागत और समय-सीमा आठ घंटे के काम-दिवस के हिसाब से कम आँकी जाती है, जिससे इंजीनियरों को अतिरिक्त घंटे काम करना पड़ता है। “फ्लैक्सी-टाइम” सैद्धांतिक रूप से घंटे चुनने की छूट देता है, पर व्यवहार में इसका अर्थ है जब तक काम पूरा न हो तब तक रुकना, और बिना दबाव के भी लोग साथियों के दबाव या बॉस को दिखाने के लिए देर तक रुकते हैं।
इन कार्य घंटों के परिणामस्वरूप बंगलोर, हैदराबाद और गुड़गाँव जैसे स्थानों में, जहाँ बहुत-सी आई.टी. कंपनियाँ और कॉल सेंटर हैं, दुकानों और रेस्तराँ ने भी अपने खुलने का समय बदल दिया है और वे देर तक खुलने लगे हैं। पति-पत्नी दोनों के नौकरी करने पर बच्चों को शिशुपालन गृह में छोड़ा जाता है, और संयुक्त परिवार, जो लगभग लुप्त हो गए थे, फिर से बनने लगे हैं, क्योंकि दादा-दादी बच्चों को सँभालने में मदद करते हैं।
दक्षता ह्रास: प्रसिद्ध समाजशास्त्री हैरी ब्रेवरमैन यह तर्क देते हैं कि वास्तव में मशीनों का प्रयोग कार्यकर्ताओं की दक्षता को कम करता है। उदाहरण के लिए, पहले वास्तुकार को नक्काशी में दक्षता भी हासिल थी, परंतु अब कंप्यूटर उनके बहुत से काम कर देता है।
यह समाजशास्त्र के एक महत्वपूर्ण विवाद से जुड़ा है: क्या औद्योगीकरण और ज्ञान पर आधारित कार्य, जैसे सूचना तकनीक, से समाज की कुशलता बढ़ रही है? भारत में सूचना तकनीक की वृद्धि को वर्णित करने के लिए प्रायः एक सूक्ति सुनने में आती है, ‘नॉलेज इकॉनोमी’ (ज्ञान आर्थिकी)। पुस्तक तुलना करने को कहती है: जो किसान मौसम, मिट्टी और बीज की समझ से कई सौ फ़सलें उगाना जानता है, और एक सॉफ़्टवेयर व्यवसायी, दोनों ही अपने कार्यों में दक्ष हैं, लेकिन अलग तरह से।
6कार्यावस्थाएँ
सरकार ने कार्यावस्था सुधारने के लिए कई कानून बनाए हैं। खनन को देखें, जहाँ केवल कोयले की खानों में ही 5.5 लाख मज़दूर काम करते हैं। खदान एक्ट, 1952, जिसे अब व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति कोड, 2020 में शामिल कर लिया गया है, सप्ताह में अधिकतम काम के घंटे, अतिरिक्त घंटों का भुगतान और सुरक्षा नियम तय करता है। बड़ी कंपनियाँ इनका पालन करती हैं, पर छोटी खानों और खुली खानों में अक्सर नहीं होता, और उप-ठेकेदारी भी बहुत बढ़ गई है, कई ठेकेदार मज़दूरों का सही रजिस्टर तक नहीं रखते, जिससे वे दुर्घटना और लाभ की ज़िम्मेदारी से बच जाते हैं। खनन ख़त्म होने पर कंपनी को गड्ढे भरकर जगह पहले जैसी बना देनी चाहिए, पर पुस्तक साफ़ कहती है कि “वे ऐसा नहीं करते हैं।”
भूमिगत खान के ख़तरे
- बाढ़, आग, छत और दीवारों का धँसना
- गैसों का उत्सर्जन और वेंटिलेशन की विफलता
- श्वास संबंधी बीमारियाँ, क्षय रोग और सिलिकोसिस (पत्थर की धूल फेफड़ों में जमने से होने वाली गंभीर बीमारी)
खुली खान के ख़तरे
- तेज़ धूप और बारिश में काम
- खान के फटने और चीज़ों के गिरने से चोट
- भारत में खनन दुर्घटनाओं की दर अन्य देशों से काफ़ी ज़्यादा है
तट के किनारे मछली प्रसंस्करण से जुड़े उद्योगों में मुख्यतः तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल की एकल युवा महिलाएँ काम करती हैं, युवा महिलाओं को आज्ञाकारी (विनम्र) और डटकर काम करने वाली माना जाता है। दस-बारह महिलाएँ एक छोटे कमरे में रहती हैं, कभी-कभी बारी-बारी से। कई पुरुष भी अकेले प्रवास करते हैं, या तो अविवाहित होते हैं या परिवार को गाँव में छोड़ आते हैं। इन प्रवासियों के पास सामाजिकता के लिए बहुत कम समय होता है, जो थोड़ा समय मिलता है वह भी अन्य प्रवासी कामगारों के साथ बीतता है, इससे अकेलापन और असुरक्षा तो बढ़ती है, पर कई युवा महिलाओं के लिए यह कुछ स्वतंत्रता और आर्थिक स्वायत्तता भी लाता है।
7घरों में होने वाला काम
घरों में होने वाला काम अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसमें लेस, ज़री या ब्रोकेड, गलीचे, बीड़ी और अगरबत्ती जैसे उत्पाद बनाना शामिल है, और यह काम मुख्यतः महिलाएँ और बच्चे करते हैं। एक एजेंट कच्चा माल देता है और बना हुआ उत्पाद वापस ले जाता है, कामगारों को बनाए गए नगों की संख्या के हिसाब से पैसा मिलता है।
एक व्यक्ति औसतन दिन में 100 बंडल तेंदु पत्ते (हर बंडल में 50 पत्ते) इकट्ठा कर सकता है। 2020-21 में कोविड-19 महामारी के दौरान सैकड़ों-हज़ारों आईटी कामगारों ने घर से काम किया, पुस्तक का अपना क्रियाकलाप 5.3 आपसे इसकी तुलना घर-आधारित काम से करने को कहता है, ताकि दोनों में समानता और अंतर दोनों समझ आएँ।
8हड़तालें एवं मज़दूर संघ
कभी-कभी काम की बुरी दशाओं के कारण कामगार हड़ताल कर देते हैं: हड़ताल में कामगार काम पर नहीं जाते। तालाबंदी में व्यवस्थापक मिल का दरवाज़ा बंद कर मज़दूरों को अंदर आने से रोकते हैं। हड़ताल का फ़ैसला कठिन होता है, क्योंकि प्रबंधन अतिरिक्त मज़दूर बुला सकता है, और मज़दूरों के लिए बिना वेतन के गुज़ारा करना मुश्किल हो जाता है।
मिल मालिकों ने आधुनिकीकरण और मशीनों पर निवेश नहीं किया। आज वे उस मिल की ज़मीन रीयल एस्टेट डीलरों को बेचकर सुख-सुविधा संपन्न इमारतें बनवाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह सवाल खड़ा होता है कि मुंबई का भविष्य कौन तय करेगा, वे मज़दूर जिन्होंने इसे बनाया, या मिल मालिक और स्थावर संपदा व्यापारी।
प्रश्न 1 का ढाँचा. अपने आस-पास के किसी व्यवसाय का वर्णन पुस्तक की चार पंक्तियों में करें: (क) कार्य शक्ति का सामाजिक संघटन: जाति, जेंडर, आयु, क्षेत्र; (ख) मज़दूर प्रक्रिया: काम किस तरह किया जाता है; (ग) वेतन एवं अन्य सुविधाएँ; (घ) कार्यावस्था: सुरक्षा, आराम का समय, कार्य के घंटे इत्यादि।
प्रश्न 3, उदारीकरण और रोज़गार के प्रतिमान. पुस्तक के बिंदु लिखें: पहले सरकार के लिए आरक्षित क्षेत्रों में निजी और विदेशी फर्मों का निवेश; बहुदेशीय कंपनियों द्वारा भारतीय कंपनियों की खरीद (पारले और कोका कोला); विनिवेश (मॉडर्न फूड, 60% कर्मचारी जबरन सेवामुक्त); स्थायी कर्मचारी घटाकर बाह्यस्रोतों और अनुबंध पर काम; सेवा क्षेत्र में अधिक लोग; सुरक्षित रोज़गार बहुत कम और सरकारी रोज़गार भी घट रहा है; आमदनी की असमानताएँ बढ़ रही हैं।
- मार्क्स, वेबर, दुर्खाइम ने उद्योग को नगरीकरण और अनजान व्यावसायिक संबंधों से जोड़ा; ‘अलगाव’ मार्क्स का शब्द है
- सामाजिक असमानताएँ कम हो रही हैं, लेकिन आर्थिक या आय से संबंधित असमानताएँ बढ़ रही हैं
- भारत 2018-19 में लगभग 43% प्राथमिक क्षेत्र में, लगभग 25% द्वितीयक क्षेत्र में और लगभग 32% तृतीयक क्षेत्र में
- संगठित क्षेत्र (एक परिभाषा): इकाई में 10 या अधिक लोग पूरे वर्ष रोज़गार में, सरकारी पंजीकरण; भारत का 90% से अधिक कार्य असंगठित है
- 1990 के दशक से उदारीकरण, पारले-कोका कोला, मॉडर्न फूड का विनिवेश, और बाह्यस्रोतीकरण
- बदली कामगार और मिस्त्री, मुद्रा योजना/आत्मनिर्भर भारत/मेक इन इंडिया योजनाएँ
- मारुति उद्योग लिमिटेड और बॉक्स 5.1 मशीनी गति और टायलरिज्म वाले काम को दिखाते हैं, ब्रेवरमैन का दक्षता-ह्रास तर्क
- खनन में 5.5 लाख कोयला मज़दूर, खदान एक्ट 1952/व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम करने की स्थिति कोड 2020
- बीड़ी उद्योग की शृंखला: तेंदु पत्ते से ठेकेदार, घरेलू कामगार, उत्पादक, वितरक और थोक विक्रेता होते हुए पान की दुकान तक
- 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक, डॉ. दत्ता सामंत, लगभग ढाई लाख मज़दूर, लगभग 2 वर्ष, लगभग 1 लाख की नौकरी गई
- क्या मैं अलगाव को मार्क्स के अपने अर्थ में समझा सकता हूँ, केवल अकेलेपन का पर्याय नहीं?
- क्या मुझे संगठित क्षेत्र की परिभाषा और 90% से अधिक असंगठित क्षेत्र का आँकड़ा याद है?
- क्या मैं पारले-कोका कोला उदाहरण दोनों आँकड़ों, 250 करोड़ और 400 करोड़ रुपये, सहित बता सकता हूँ?
- क्या मैं बीड़ी उद्योग की पूरी शृंखला तेंदु पत्ते से पान की दुकान तक बता सकता हूँ?
- क्या मैं 1982 की बंबई टैक्सटाइल स्ट्राइक को नेता, अवधि और परिणाम सहित बता सकता हूँ?