कक्षा 12 हिंदी अंतरा भाग 2 अध्याय 6 भरत-राम का प्रेम / पद (तुलसीदास) नोट्स

इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • तुलसीदास का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख रचनाएँ पहचान सकेंगे
  • रामचरितमानस के “भरत-राम का प्रेम” अंश में भरत के मन की आत्मग्लानि और राम-प्रेम को समझ सकेंगे
  • गीतावली के दो पदों में माता कौशल्या की विरह-वेदना को अपने शब्दों में लिख सकेंगे
  • अवधी के कठिन शब्दों का अर्थ बता सकेंगे और चौपाई-दोहा छंद तथा पद-शैली में अंतर कर सकेंगे
  • दिए गए अंशों में उपमा और उत्प्रेक्षा अलंकार पहचान सकेंगे
तुलसीदासरामचरितमानसगीतावलीचौपाई-दोहाअवधीभक्तिकाललोकमंगल

1 कवि-परिचय: तुलसीदास

तुलसीदास (सन् 1532-1623) हिंदी के प्रमुख भक्त-कवियों में गिने जाते हैं। उनका जन्म बाँदा ज़िले के राजापुर गाँव में हुआ था, हालाँकि कुछ विद्वान उनका जन्मस्थान सोरों, एटा भी मानते हैं। पाठ्यपुस्तक भी जन्मस्थान पर कोई अंतिम फ़ैसला नहीं देती, यह अब भी विद्वानों में मतभेद का विषय है।

चित्र 1: तुलसीदास, सन् 1952 के भारतीय डाक टिकट (1 आना मूल्यवर्ग) पर। चित्र: India Post, भारत सरकार / GODL.
चित्र 1: तुलसीदास, सन् 1952 के भारतीय डाक टिकट (1 आना मूल्यवर्ग) पर। चित्र: India Post, भारत सरकार / GODL.
आम ग़लती

तुलसीदास का बचपन बहुत कष्टमय था। बालपन में ही उनका अपने माता-पिता से बिछोह (जुदाई) हो गया था और वे भिक्षाटन (भीख माँगकर) करके अपना जीवन-यापन करने को विवश हुए। कहा जाता है कि गुरु नरहरिदास की कृपा से उन्हें रामभक्ति का मार्ग मिला। रत्नावली से उनका विवाह होने और पत्नी की बातों से प्रभावित होकर घर छोड़ने (गृहत्याग) की कथा प्रसिद्ध है, किंतु पाठ स्वयं कहता है कि “इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता”। विवाह और गृहत्याग, दोनों इसी कथा का हिस्सा हैं। परीक्षा में इसे सिद्ध तथ्य की तरह मत लिखिए, “कहा जाता है” शब्द ज़रूर जोड़िए।

पारिवारिक जीवन से विरक्त होने के बाद तुलसीदास काशी, चित्रकूट, अयोध्या आदि तीर्थों में भ्रमण करते रहे। सन् 1574 में अयोध्या में उन्होंने रामचरितमानस की रचना आरंभ की, जिसका कुछ अंश उन्होंने काशी में लिखा। बाद में वे काशी में ही रहने लगे और वहीं उनका निधन हुआ।

सन् 1532राजापुर (बाँदा) में जन्म, विद्वानों में विवाद के साथ (सोरों, एटा भी संभावित)
बालपनमाता-पिता से बिछोह, भिक्षाटन से जीवन-यापन
बाद मेंकहा जाता है, गुरु नरहरिदास की कृपा से रामभक्ति का मार्ग मिला; रत्नावली से विवाह और गृहत्याग की कथा प्रसिद्ध है, पर इसका पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता
सन् 1574अयोध्या में रामचरितमानस की रचना आरंभ, कुछ अंश काशी में लिखा
सन् 1623काशी में निधन, वहीं जीवन के अंतिम वर्ष बिताए

तुलसीदास को “लोकमंगल की साधना के कवि” कहा जाता है, और उन्हें “समन्वय का कवि” भी कहते हैं। उनका भावजगत धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से बहुत व्यापक है। मानव-प्रकृति और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतर्दृष्टि और व्यापक जीवनानुभव के कारण ही वे रामचरितमानस में लोकजीवन के विभिन्न पक्षों का उद्घाटन कर सके। मानस में उनके हृदय की विशालता, भाव-प्रसार की शक्ति और मर्मस्पर्शी (हृदय को छू लेने वाले) स्थलों की पहचान की क्षमता पूरे उत्कर्ष के साथ व्यक्त हुई है।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 1

लोकमंगल: समस्त लोक (समाज) के कल्याण और भलाई की भावना। पाठ्यपुस्तक के शब्दों में, “तुलसीदास लोकमंगल की साधना के कवि हैं।”

तुलसी को मानस में जिन प्रसंगों की अभिव्यक्ति का अवसर नहीं मिला, उनको उन्होंने कवितावली, गीतावली आदि में व्यक्त किया है। विनयपत्रिका में विनय (नम्रता से प्रार्थना) और आत्म-निवेदन के पद हैं। इस प्रकार तुलसी के काव्य में विश्वबोध और आत्मबोध का अद्वितीय समन्वय हुआ है।

1

रामचरितमानस

हिंदी का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य माना जाता है। मुख्यतः दोहा और चौपाई छंद में रचित। भाषा अवधी।

2

कवितावली

कवित्त और सवैया छंद में रचित उत्कृष्ट रचना।

3

गीतावली

पद शैली की रचना (गाई जाने वाली, कृष्ण गीतावली भी इसी शैली में)।

4

विनयपत्रिका

पद शैली की रचना, विनय और आत्म-निवेदन के पद।

इनके अतिरिक्त दोहावली स्फुट (बिखरे हुए, असंबद्ध) दोहों का संकलन है। तुलसीदास की रचनाओं में भाव, विचार, काव्यरूप, छंद-विवेचन और भाषा की विविधता मिलती है। ब्रज और अवधी दोनों ही भाषाओं पर तुलसी का असाधारण अधिकार था।

परीक्षा संकेत

तुलसीकृत बारह कृतियाँ प्रामाणिक (असली, मान्य) मानी जाती हैं, परंतु रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली और विनयपत्रिका ही उनकी ख्याति के आधार हैं। चारों नाम क्रम से याद रखिए।

2 भरत-राम का प्रेम (रामचरितमानस से)

2.1 प्रसंग: भरत की आत्मग्लानि, साधु-सभा में

पाठ्यपुस्तक में प्रस्तुत चौपाई और दोहे रामचरितमानस के अयोध्या कांड से लिए गए हैं। इन छंदों में राम-वनगमन के पश्चात् भरत की मनोदशा का वर्णन किया गया है। भरत भावुक हृदय से बताते हैं कि राम का उनके प्रति अत्यधिक प्रेमभाव है, राम बचपन से ही भरत को खेल में भी सहयोग देते रहते थे और उनका मन कभी नहीं तोड़ते थे। भरत कहते हैं कि इस प्रेमभाव को भाग्य सहन नहीं कर सका, और माता के रूप में उसने व्यवधान (रुकावट) उपस्थित कर दिया। यह संकेत कैकेयी की ओर है, हालाँकि पाठ यहाँ सीधे नाम नहीं लेता। राम के वनगमन से अन्य माताएँ और अयोध्या के सभी नगरवासी अत्यंत दुखी हैं।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 2

चौपाई-दोहा छंद: रामचरितमानस की मुख्य छंद-शैली। एक “चौपाई” चार चरणों की होती है, जो पाठ में दो पंक्तियों में छपते हैं (हर पंक्ति में “।” से अलग दो चरण), और कुछ चौपाइयों के बाद एक दोहा (दो पंक्तियों का छंद, विषय को समेटने वाला) आता है। इस पाठ में तीन ऐसे खंड हैं, हर खंड कुछ चौपाई-पंक्तियों से शुरू होकर एक दोहे पर समाप्त होता है।

यह पूरा अंश भरत का सभा में कहा गया लंबा कथन है: “साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ”, यानी भरत साधुओं की सभा में, गुरु (पाठ में “मुनिनाथ”, प्रसंग से गुरु वशिष्ठ) और प्रभु श्रीराम के निकट अपने मन की बात कहते हैं।

2.2 मूल पाठ (खंड 1): राम के स्वभाव का स्मरण

मूल पाठ: खंड 1 (चौपाई + दोहा)
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े ।।
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।।
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
मो पर कृपा सनेहु बिसेखी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।
सिसुपन तें परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही।।

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।

भावार्थ: भरत का शरीर पुलकित (रोमांचित) हो उठता है, सभा में खड़े होकर वे बोलते हैं, उनकी कमल जैसी आँखों में प्रेम के आँसू बढ़ आए हैं। भरत कहते हैं कि उन्हें जो कहना था, वह गुरु (मुनिनाथ) पहले ही कह चुके हैं, इससे अधिक वे और क्या कहें। वे कहते हैं कि वे अपने स्वामी (राम) का स्वभाव जानते हैं (“मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ”), राम अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। भरत पर तो उनकी कृपा और स्नेह विशेष रहा है, खेलते समय भी भरत ने उन्हें कभी अप्रसन्न होते नहीं देखा। बचपन से ही राम ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा, कभी उनका मन नहीं तोड़ा। भरत ने अपने मन में प्रभु की कृपा की यह रीति देखी है: खेल में भरत हार भी जाते, तो भी राम उन्हें ही जितवा देते थे (“हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही”)। दोहे में भरत कहते हैं कि स्नेह और संकोच (शर्म) के कारण वे राम के सम्मुख कभी कुछ कह नहीं पाए, और आज तक उनके प्रेम-प्यासे नेत्र राम के दर्शन से तृप्त नहीं हुए (“दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन”)।

2.3 मूल पाठ (खंड 2): स्वयं को दोष और आत्मग्लानि

मूल पाठ: खंड 2 (चौपाई + दोहा)
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।।
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।
फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली।।
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेंहि भल मोरा।।
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

साधु सभाँ गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।

भावार्थ: भरत कहते हैं कि विधाता (भाग्य) उनका यह दुलार सहन नहीं कर सका, इसलिए उसने माता के बहाने (मिस) से बीच में नीच बाधा डाल दी (“नीच बीचु जननी मिस पारा”)। पर तुरंत ही वे स्वयं को टोकते हैं: “यहउ कहत मोहि आजु न सोभा”, यानी यह कहना भी आज उन्हें शोभा नहीं देता; अपनी समझ से कौन साधु और पवित्र हुआ है? माता मंद (बुरी) है और मैं साधु-सदाचारी हूँ (“मातु मंदि मैं साधु सुचाली”), हृदय में ऐसा लाना ही करोड़ों कुचालों के समान है। भरत दृष्टांत देकर पूछते हैं: “फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली”, यानी क्या कोदो में उत्तम धान फल सकता है? क्या काला घोंघा मोती उत्पन्न कर सकता है? अर्थात बुरी माता का पुत्र अच्छा कैसे हो सकता है। सपने में भी किसी को लेशमात्र दोष नहीं है (“सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू”); उनका अपना दुर्भाग्य ही अथाह सागर है। अपने ही पापों का परिणाम समझे बिना उन्होंने माता को कटु वचन (काकू) कहकर व्यर्थ ही जलाया (दुखी किया)। हृदय में खोजकर वे हर तरफ़ से हार गए हैं, एक ही तरह से उनका भला है: उनके गुरु गोसाईं (वशिष्ठ) हैं और स्वामी सीता-राम हैं, इसीलिए परिणाम उन्हें अच्छा लगता है (“लागत मोहि नीक परिनामू”)। दोहे में भरत साधु-सभा में, गुरु और प्रभु के निकट, सच्चे भाव से यह बात कहते हैं; यह प्रेम है या प्रपंच, झूठ है या सच, यह मुनि रघुराउ (राम) ही जानते हैं (“जानहिं मुनि रघुराउ”)।

2.4 मूल पाठ (खंड 3): वनगमन का विवरण और अंतिम प्रश्न

मूल पाठ: खंड 3 (चौपाई + दोहा)
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।
देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जरहिं दुसह जर पुर नर नारीं।।
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
बिन पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ ऐहि घाएँ।।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तापस तीछी।।

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।
—रामचरितमानस से

भावार्थ: भरत कहते हैं कि राजा (दशरथ) ने मरकर प्रेम का प्रण निभाया, और माता की कुबुद्धि का सारा जगत साक्षी है (“जननी कुमति जगतु सबु साखी”)। अयोध्या की व्याकुल माताओं को देखा नहीं जाता, नगर के स्त्री-पुरुष असहनीय दुख की आग में जल रहे हैं। भरत स्वीकार करते हैं: “महीं सकल अनरथ कर मूला”, यानी इस सारे अनर्थ की जड़ वे ही हैं; यह सुनकर-समझकर उन्होंने सारी पीड़ा सही। यह सुनकर राम मुनि का वेष धारण करके, लक्ष्मण और सीता के साथ, बिना जूतों के, पैदल वन को चले गए। भरत कहते हैं कि इस आघात को सहकर भी वे जीवित रह गए, इसके साक्षी स्वयं शंकर हैं। फिर निषाद का स्नेह देखकर भी भरत का वज्र-सा कठोर हृदय फट न गया, भरत यहाँ स्वयं को धिक्कारते हैं। अब भरत ने सब कुछ अपनी आँखों से देख लिया; जीता हुआ जीव जड़ (निष्ठुर) होकर सब कुछ सह लेता है, यह कहकर भरत अपने ही जीवित रहने पर स्वयं को कोसते हैं। जिन्हें देखकर रास्ते की साँपिन और बिच्छू तक अपना भयंकर विष त्याग देते हैं (यह राम की महिमा का संकेत है)। अंतिम दोहे में भरत कहते हैं, वे ही रघुनंदन (राम), लक्ष्मण और सीता जिसे अहितकारी (शत्रु जैसे) लगे, उस (माता) के पुत्र को छोड़कर दैव (भाग्य) यह असहनीय दुख और किससे सहवाएगा? यानी यह दुख भोगना भरत का ही भाग्य है। भरत यहाँ परोक्ष रूप से स्वयं को और अपनी माता को कठघरे में खड़ा करते हैं।

2.5 शब्दार्थ: भरत-राम का प्रेम

शब्द अर्थ
ठाढ़े खड़े होना
कोह क्रोध
मिस बहाना, माध्यम
बिसेखी विशेष
खुनिस क्रोध, अप्रसन्नता
सुचि पवित्र, शुद्ध
कोदव एक जंगली कंद मूल, मोटे चावल की एक किस्म
सुसाली धान
मुकुता मोती
संबुक घोंघा
उदधि सागर
अघ पाप
नीक सही, ठीक
सतिभाऊ शुद्ध भाव से
साखी साक्षी
पयादेहि पैदल, नंगे पाँव
कुलिस कुलिश, वज्र
बेहू भेदन
बीछीं बिच्छू, एक ज़हरीला जीव
तनय पुत्र
काव्य-सौंदर्य: भरत-राम का प्रेम

भाषा और छंद: यह अंश अवधी भाषा में चौपाई-दोहा छंद में रचित है, यही रामचरितमानस की मूल छंद-योजना है।
भाव-सौंदर्य: भरत का चरित्र यहाँ आत्मत्याग, आत्मग्लानि और भ्रातृ-प्रेम की पराकाष्ठा (चरम सीमा) के रूप में उभरता है, वे माता पर कठोर वचन कहते हैं (“मातु मंदि”, “जननी कुमति जगतु सबु साखी”), पर फिर स्वयं को टोकते हैं (“यहउ कहत मोहि आजु न सोभा”) और अंततः स्वयं को ही अनर्थ की जड़ मानते हैं (“महीं सकल अनरथ कर मूला”)।
दृष्टांत अलंकार: “फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि संबुक काली” में लोक-जीवन के दृष्टांतों (उदाहरणों) से गहरी बात सरल भाषा में कही गई है।
तद्भवता: अवधी के लोक-प्रचलित (तद्भव) शब्द-रूप, जैसे “सनेह”, “दरसन”, “सिसुपन”, भाषा को सहज बनाते हैं।

3 पद (गीतावली से)

3.1 प्रसंग: माता कौशल्या की विरह-वेदना

इस पाठ के अगले अंश में गीतावली के दो पद दिए गए हैं। पहले पद में राम के वनगमन के बाद माता कौशल्या के हृदय की विरह-वेदना (जुदाई का दुख) का वर्णन किया गया है, वे राम की वस्तुओं को देखकर उनका स्मरण करती हैं और बहुत दुखी हो जाती हैं। दूसरे पद में माँ कौशल्या राम के वियोग में दुखी अश्वों (घोड़ों) को देखकर राम से एक बार पुनः अयोध्यापुरी आने का निवेदन करती हैं।

कंठस्थ करेंपरिभाषा 3

पद: भक्तिकाल में गाई जाने वाली एक गेय (गाने योग्य) काव्य-रचना, जिसमें भाव सीधे और सरल शब्दों में, संगीतमय ढंग से व्यक्त होते हैं। “पद” शैली चौपाई-दोहा से अलग है: पद किसी राग में गाने के लिए रचा जाता है। गीतावली, कृष्ण गीतावली और विनयपत्रिका, तीनों पद-शैली की रचनाएँ हैं।

3.2 मूल पाठ (पद 1): वस्तुओं को देखकर स्मरण

मूल पाठ: पद (1)
जननी निरखति बान धनुहियाँ।
बार बार उर नैननि लावति प्रभुजू की ललित पनहियाँ।।
कबहुँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सवारे।
‘उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे’।।
कबहुँ कहति यों ‘बड़ी बार भइ जाहु भूप पहँ, भैया।
बंधु बोलि जेंइय जो भावै गई निछावरि मैया’
कबहुँ समुझि वनगमन राम को रहि चकि चित्रलिखी सी।
तुलसीदास वह समय कहे तें लागति प्रीति सिखी सी।।

भावार्थ: माता (कौशल्या) राम के बाण और छोटे धनुष को निहारती (देखती) हैं। वे बार-बार प्रभु (राम) की सुंदर छोटी जूतियों (पनहियाँ) को अपने हृदय और आँखों से लगाती हैं। कभी वे पहले की तरह सवेरे जाकर प्रिय वचन कहकर जगाती हैं, “उठहु तात! बलि मातु बदन पर, अनुज सखा सब द्वारे”, यानी उठो बेटा, माता तुम्हारे मुख पर बलिहारी जाती है, छोटा भाई और सखा (मित्र) सब द्वार पर खड़े हैं। कभी वे कहती हैं कि बहुत देर हो गई है भैया, राजा (पिता) के पास जाओ, भाइयों को बुलाकर जो अच्छा लगे वह भोजन करो, माता तुम पर न्योछावर है। कभी वे राम के वनगमन को याद करके चित्र में खींची हुई-सी स्तब्ध (चकित, निश्चल) रह जाती हैं। तुलसीदास कहते हैं कि उस पल का वर्णन करते समय भी मानो प्रेम फिर से नए सिरे से सीखा जा रहा हो, इतना गहरा है वह भाव।

3.3 मूल पाठ (पद 2): घोड़ों की दुर्दशा और निवेदन

मूल पाठ: पद (2)
राघौ! एक बार फिरि आवौ।
ए बर बाजि बिलोकि आपने बहुरो बनहिं सिधावौ।।
जे पय प्याइ पोखि कर-पंकज वार वार चुचुकारे।
क्यों जीवहिं, मेरे राम लाडिले! ते अब निपट बिसारे।।
भरत सौगुनी सार करत हैं अति प्रिय जानि तिहारे।
तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे।।
सुनहु पथिक! जो राम मिलहिं बन कहियो मातु संदेसो।
तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो।।
—गीतावली से

भावार्थ: कौशल्या कहती हैं, “राघौ! एक बार फिरि आवौ”, यानी हे राघव (राम), एक बार फिर लौट आओ; अपने इन सुंदर घोड़ों को देखकर फिर भले ही वन को चले जाना। जिन घोड़ों को राम स्वयं दूध पिलाकर, अपने कमल-जैसे हाथों से सहलाकर, बार-बार प्यार से पुकारकर पाला था, वे अब यह कैसे जिएँगे, हे मेरे प्यारे राम, जब तुमने उन्हें बिल्कुल भुला दिया है? भरत उनकी सौ गुना अधिक देखभाल करते हैं, यह जानकर कि वे तुम्हें बहुत प्रिय हैं। फिर भी वे दिन-प्रतिदिन मुरझाते (झाँवरे होते) जा रहे हैं, मानो पाले (हिम) से मारे हुए कमल हों। कौशल्या किसी राहगीर (पथिक) से कहती हैं कि यदि वन में राम मिलें तो उन्हें माता का यह संदेश कह देना। अंतिम पंक्ति में (तुलसी की छाप के साथ) माता कहती हैं कि उन्हें और सबसे बढ़कर इन (घोड़ों) की बड़ी चिंता (अंदेसो) है (“तुलसी मोहिं और सबहिन तें इन्हको बड़ो अंदेसो”)।

3.4 शब्दार्थ: पद

शब्द अर्थ
धनुहियाँ बाल धनुष
पनहियाँ जूतियाँ
बार देरी
जेंइय जीमना, भोजन करना
सवारे सवेरे
चित्रलिखी-सी चित्र के समान
सिखी सीखी गई
बाजि घोड़ा
पोखि सहलाना, प्यार करना, हाथ फेरना
निपट बिल्कुल
सार देखभाल, ध्यान
झाँवरे कुम्हलाना, मलिन होना
अंदेसो अंदेशा, चिंता
काव्य-सौंदर्य: पद

वात्सल्य और विरह: दोनों पदों में माँ का वात्सल्य (ममता) और पुत्र-वियोग की गहरी वेदना एक साथ उभरती है, कौशल्या राम की वस्तुओं और उनके पाले हुए घोड़ों में अपने पुत्र को खोजती हैं।
भाषा-शैली: पद-शैली में रचित, गेय (गाने योग्य) लय के साथ, बोलचाल के करुण संबोधन (“उठहु तात”, “राघौ! एक बार फिरि आवौ”) भाव को सीधे हृदय तक पहुँचाते हैं।
बिंब: “मनहुँ कमल हिममारे” जैसे दृश्य-बिंब पाठक की आँखों के सामने दृश्य खड़ा कर देते हैं।

अलंकार: पद (प्रश्न-अभ्यास का उत्तर)

उपमा अलंकार के दो उदाहरण: “रहि चकि चित्रलिखी सी” (कौशल्या की तुलना चित्र में खींची हुई आकृति से, “सी” उपमा-वाचक शब्द के साथ) और “लागति प्रीति सिखी सी” (प्रेम की तुलना नए सिरे से सीखे गए भाव से)।
उत्प्रेक्षा अलंकार: “तदपि दिनहिं दिन होत झाँवरे मनहुँ कमल हिममारे”, घोड़ों के दिन-प्रतिदिन मुरझाने की कल्पना पाले से मारे हुए कमल जैसी की गई है, “मनहुँ” (मानो) वाचक शब्द से यह संभावना व्यक्त होती है।

क्या आप जानते हैं?

“भरत-राम का प्रेम” अंश में माता का नाम नहीं आता; भरत “जननी”, “मातु” कहकर ही बात करते हैं, और प्रसंग से यह संकेत कैकेयी की ओर माना जाता है। भरत माता पर दोष डालते भी हैं (“मातु मंदि”, “जननी कुमति जगतु सबु साखी”), पर तुरंत स्वयं को टोकते हैं (“यहउ कहत मोहि आजु न सोभा”) और अंत में स्वयं को ही “सकल अनरथ कर मूला” कहते हैं।

4 दोनों अंशों की तुलना

यह पूरा पाठ एक ही कवि (तुलसीदास) का है, फिर भी दोनों अंशों का स्रोत-ग्रंथ, छंद और भाव-भूमि अलग-अलग है।

भरत-राम का प्रेम

  • स्रोत: रामचरितमानस (अयोध्या कांड)
  • छंद: चौपाई-दोहा शैली
  • वक्ता: भरत (साधु-सभा में, गुरु और राम के निकट)
  • भाव: आत्मग्लानि, आत्मत्याग, भ्रातृ-प्रेम
  • लंबाई: 3 खंड, 22 चौपाई-पंक्तियाँ + 3 दोहे

पद

  • स्रोत: गीतावली
  • छंद/शैली: पद-शैली (गेय)
  • वक्ता: माता कौशल्या (कवि तुलसीदास द्वारा वर्णित)
  • भाव: वात्सल्य, विरह-वेदना
  • लंबाई: 2 पद, हर एक 8 पंक्तियों का

योग्यता-विस्तार (पाठ्यपुस्तक): (1) ‘महानता लाभलोभ से मुक्ति तथा समर्पण त्याग से हासिल होता है’ को केंद्र में रखकर इस कथन की पुष्टि कीजिए। (2) भरत के त्याग और समर्पण के अन्य प्रसंगों को भी जानिए। (3) आज के संदर्भ में राम और भरत जैसा भ्रातृप्रेम क्या संभव है? अपनी राय लिखिए। (इनके उत्तर-संकेत NCERT समाधान में दिए गए हैं।)

परीक्षा संकेत

“भरत-राम का प्रेम” को कभी केवल “राम की प्रशंसा” मत लिखिए, इसका मूल भाव भरत की आत्मग्लानि और आत्मत्याग है, राम का चरित्र तो भरत के कथन के माध्यम से ही सामने आता है। इसी तरह “पद” में कौशल्या की व्यथा को केवल “दुख” मत लिखिए, यह विशेष रूप से वियोग/विरह की वेदना है, वस्तुओं और घोड़ों के माध्यम से व्यक्त हुई।

त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • तुलसीदास (सन् 1532-1623), जन्म राजापुर (बाँदा), गुरु नरहरिदास (कहा जाता है), रत्नावली से विवाह और गृहत्याग की कथा प्रसिद्ध (पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलता), निधन काशी में
  • प्रमुख रचनाएँ (4): रामचरितमानस (दोहा-चौपाई, अवधी), कवितावली (कवित्त-सवैया), गीतावली और विनयपत्रिका (पद शैली), कुल 12 प्रामाणिक कृतियाँ
  • तुलसीदास को “लोकमंगल की साधना के कवि” और “समन्वय का कवि” कहा जाता है
  • “भरत-राम का प्रेम”: रामचरितमानस के अयोध्याकांड से, भरत की आत्मग्लानि, “हारेंहूँ खेल जितावहिं मोंही” (राम भरत को हारने पर भी जितवाते) और “महीं सकल अनरथ कर मूला” (भरत स्वयं को दोषी मानते हैं) दो पंक्तियाँ ध्यान देने योग्य हैं
  • भरत माता को दोष देते हैं (“मातु मंदि”, “जननी कुमति”), “फरइ कि कोदव बालि सुसाली” के दृष्टांत से कहते हैं कि बुरी माता का पुत्र अच्छा कैसे हो सकता है, फिर स्वयं को टोकते हैं कि ऐसा कहना भी उन्हें शोभा नहीं देता
  • “पद”: गीतावली से, माता कौशल्या की विरह-वेदना, पद 1 में राम की वस्तुएँ देखकर स्मरण (“रहि चकि चित्रलिखी सी”), पद 2 में घोड़ों की दुर्दशा देखकर राम से लौट आने का निवेदन (“मनहुँ कमल हिममारे”)
  • अलंकार: उपमा (चित्रलिखी सी, सिखी सी), उत्प्रेक्षा (मनहुँ कमल हिममारे)
  • भाषा और छंद में अंतर: भरत-राम का प्रेम, अवधी और चौपाई-दोहा; पद, गेय पद-शैली