नोट: यह अध्याय CBSE कक्षा 12 समाजशास्त्र के 2026-27 पाठ्यक्रम में शामिल नहीं है (CBSE ने इसे हटा दिया है)। अन्य बोर्डों के छात्र अपने बोर्ड का नवीनतम पाठ्यक्रम देखें।
- “मास मीडिया” का अर्थ, और समाजशास्त्री इसकी वृद्धि का अध्ययन क्यों करते हैं
- भारत में प्रिंट, रेडियो और टेलीविज़न की शुरुआत और वृद्धि, स्वतंत्रता से पहले और बाद में
- पुस्तक में दिए गए नामी समाचारपत्र, रेडियो की उपलब्धियाँ और टीवी कार्यक्रम, उनकी तिथियों सहित
- 1990 के दशक से भूमंडलीकरण ने भारत में प्रिंट, टेलीविज़न और रेडियो को कैसे बदला
- मीडिया का राज्य, बाज़ार और भारतीय समाज से संबंध कैसे समझाएँ
1मास मीडिया क्या है, और इसका अध्ययन क्यों
मास मीडिया यानी जनसंपर्क साधन वे रूप हैं जिनके ज़रिए एक साथ बहुत बड़ी संख्या में लोगों तक संचार पहुँचता है, जैसे टेलीविज़न, समाचारपत्र, फ़िल्में, पत्रिकाएँ, रेडियो, विज्ञापन, विडियो खेल और सीडी। इन्हें “मास” इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये मास (बहुत बड़ी संख्या के) दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों तक पहुँचते हैं। इन्हें जनसंचार भी कहा जाता है।
पुस्तक के रोज़मर्रा के उदाहरण: लोग सुबह उठते ही सबसे पहले रेडियो या टेलीविज़न चालू करते हैं; बच्चे मोबाइल फ़ोन पर मिस्ड कॉल देखते हैं; नलसाज, बिजली मिस्त्री और अन्य सेवा देने वाले लोग मोबाइल फ़ोन से जुड़े रहते हैं; दुकानों में छोटे टीवी सेट रहते हैं; विदेश में रहने वाले भारतीय इंटरनेट और टेलीफ़ोन से घर से जुड़े रहते हैं; यहाँ तक कि CBSE बोर्ड के परिणाम और NCERT की पुस्तकें भी इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
ऐतिहासिक वृद्धि
मास मीडिया की संरचना और विषय-वस्तु आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों से तय होती है। स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती दशकों में राज्य की सोच हावी रही, और 1990 के बाद भूमंडलीकरण के दौर में बाज़ार की भूमिका बढ़ी।
द्वंद्वात्मक संबंध
मीडिया और समाज एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। मीडिया की प्रकृति समाज से तय होती है, और साथ ही मीडिया का समाज पर दूरगामी प्रभाव भी पड़ता है।
औपचारिक संगठन ज़रूरी
सामान्य संचार के विपरीत, जनसंचार को बड़े पैमाने की पूँजी, उत्पादन और प्रबंधन के लिए एक औपचारिक संगठन की ज़रूरत होती है, इसीलिए इसमें राज्य और/या बाज़ार की प्रमुख भूमिका रहती है।
असमान पहुँच
अलग-अलग वर्ग के लोग मास मीडिया का प्रयोग अलग-अलग आसानी से कर पाते हैं। पिछले अध्याय के डिजिटल अंतर (यानी तकनीक और इंटरनेट तक असमान पहुँच) को याद करें।
27.1 आधुनिक मास मीडिया का प्रारंभ
मुद्रणालय (प्रिंटिंग प्रेस) पहली आधुनिक मास मीडिया संस्था थी। कई समाजों में मुद्रणकला का इतिहास सदियों पुराना है, पर आधुनिक तकनीक से पुस्तकें छापने का काम सबसे पहले यूरोप में शुरू हुआ। यह तकनीक जोहान गुटनबर्ग ने 1440 में विकसित की, और शुरुआती छपी किताबें धार्मिक ही थीं।
औद्योगिक क्रांति के साथ मुद्रण उद्योग बढ़ा, पर इसके शुरुआती उत्पाद केवल साक्षर अभिजात वर्ग तक ही सीमित रहे। केवल 19वीं सदी के मध्य में, जब तकनीक, परिवहन और साक्षरता में और विकास हुआ, तब समाचारपत्र जन-जन तक पहुँचने लगे। देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग एक जैसे समाचार पढ़ने और सुनने लगे।
विद्वान बेनेडिक्ट ऐंडरसन ने कहा कि इस साझा पठन ने अजनबी लोगों में भी अपनेपन की भावना, यानी “हम की भावना” पैदा की, जिससे राष्ट्रवाद का विकास हुआ। उन्होंने राष्ट्र को “काल्पनिक समुदाय” कहा: वे लोग जो एक-दूसरे को कभी नहीं जानते, फिर भी एक परिवार के सदस्य जैसा महसूस करते हैं।
2.1 राष्ट्रवादी प्रेस और औपनिवेशिक नियंत्रण
19वीं सदी के समाज सुधारक अक्सर समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में लिखते और वाद-विवाद करते थे, और भारतीय राष्ट्रवाद का विकास उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष से गहराई से जुड़ा था। राष्ट्रवादी प्रेस ने उपनिवेश-विरोधी जनमत को जागृत किया, इसीलिए औपनिवेशिक सरकार ने उस पर शिकंजा कसा और सेंसर व्यवस्था लागू की, जैसे 1883 के इलबर्ट बिल आंदोलन के समय हुआ।
| समाचारपत्र | भाषा | संस्थापक / विवरण | वर्ष |
|---|---|---|---|
| संवाद-कौमुदी | बंगला | राजा राममोहन राय: राष्ट्रवादी और लोकतंत्रात्मक दृष्टिकोण वाला पहला प्रकाशन | 1821 |
| मिरात-उल-अखबार | फ़ारसी | राजा राममोहन राय | 1822 |
| बॉम्बे समाचार | गुजराती | फरदूनजी मुर्जबान: गुजराती प्रेस के अग्रदूत, दैनिक पत्र के रूप में शुरू | 1822 |
| शोम प्रकाश | बंगला | ईश्वरचंद्र विद्यासागर | 1858 |
| दि टाइम्स ऑफ़ इंडिया | अंग्रेज़ी | मुंबई में शुरू | 1861 |
| दि पायनियर | अंग्रेज़ी | इलाहाबाद | 1865 |
| दि मद्रास मेल | अंग्रेज़ी | — | 1868 |
| दि स्टेट्समैन | अंग्रेज़ी | कोलकाता | 1875 |
| दि सिविल एंड मिलिटरी गज़ट | अंग्रेज़ी | लाहौर | 1876 |
स्रोत: देसाई, 1948
ब्रिटिश शासन में रेडियो पूरी तरह राज्य के स्वामित्व में था, इसीलिए इस पर राष्ट्रीय विचार व्यक्त नहीं किए जा सकते थे। समाचारपत्र और फ़िल्में स्वायत्त तो थीं, पर ब्रिटिश राज उन पर कड़ी नज़र रखता था। साक्षरता कम होने से प्रसार सीमित था, पर प्रभाव प्रसार से कहीं ज़्यादा था, क्योंकि खबरें बाज़ारों, व्यापारिक केंद्रों और न्यायालयों में मुँह-ज़बानी फैलती थीं। राष्ट्रीय आंदोलन का समर्थन करने के कारण कई राष्ट्रवादी समाचारपत्रों को औपनिवेशिक सरकार की अप्रसन्नता झेलनी पड़ी, जैसे केसरी (मराठी), मातृभूमि (मलयालम) और अमृतबाज़ार पत्रिका (अंग्रेज़ी), पर इससे उन पर कोई असर नहीं पड़ा।
37.2 स्वतंत्र भारत में मास मीडिया
3.1 दृष्टिकोण
जवाहरलाल नेहरू, भारत के पहले प्रधानमंत्री, ने मीडिया से “लोकतंत्र के पहरेदार” की भूमिका निभाने और आत्मनिर्भरता तथा राष्ट्रीय विकास की भावना फैलाने के लिए कहा। मीडिया को अस्पृश्यता, बाल विवाह, विधवा बहिष्कार, जादू-टोना और विश्वास-चिकित्सा जैसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लड़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया, ताकि आधुनिक औद्योगिक समाज के लिए तर्कसंगत और वैज्ञानिक स्वभाव बढ़े। सरकार के फ़िल्म प्रभाग ने समाचार और वृत्तचित्र बनाए, जो हर सिनेमाघर में हर फ़िल्म से पहले दिखाए जाते थे और सरकार की विकास प्रक्रिया दिखाते थे।
3.2 रेडियो
रेडियो प्रसारण 1920 के दशक में कोलकाता और चेन्नई के हैम ब्रॉडकास्टिंग क्लबों से शुरू हुआ, और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1940 के दशक में एक सार्वजनिक प्रसारण प्रणाली में परिपक्व हुआ, जब यह दक्षिण-पूर्व एशिया में मित्र राष्ट्रों की सेनाओं के लिए प्रचार का बड़ा साधन बना। इसी प्रणाली से भारत का अपना रेडियो प्रसारक, आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो, AIR), विकसित हुआ। स्वतंत्रता के समय केवल 6 रेडियो स्टेशन थे, सभी बड़े शहरों में, जो मुख्यतः शहरी श्रोताओं के लिए थे। 1950 तक 5,46,200 रेडियो लाइसेंस पूरे भारत में थे।
1960 के दशक में जब हरित क्रांति के अंतर्गत अधिक उपज देने वाली फ़सलें पहली बार लाई गईं, तो आकाशवाणी ने 1967 से 10 वर्ष से भी अधिक समय तक इन फ़सलों पर देहातों में लगातार प्रचार अभियान चलाया। कई आकाशवाणी केंद्रों में विषय विशेषज्ञों की इकाइयाँ खेतों में जाकर नए धान और गेहूँ उगाने वाले किसानों के अनुभव रिकॉर्ड करती और प्रसारित करती थीं। स्रोत: बी.आर. कुमार, “ए.आई.आर. ब्रॉडकास्ट्स डिड मेक ए डिफरेंस”, द हिंदू, 31 दिसंबर 2006।
युद्धों और विपदाओं ने बार-बार आकाशवाणी को अपना विस्तार करने के लिए प्रेरित किया: 1962 के चीन युद्ध से एक दैनिक कार्यक्रम के लिए “वार्ता” इकाई बनी; अगस्त 1971 में बांग्लादेश संकट के दौरान समाचार सेवा प्रभाग ने सुबह 6 बजे से आधी रात तक हर घंटे समाचार देना शुरू किया; और 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद आकाशवाणी ने चौबीसों घंटे बुलेटिन देने का कदम उठाया।
3.3 टेलीविज़न
टेलीविज़न 1959 में ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया। साइट (सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट) ने अगस्त 1975 से जुलाई 1976 के बीच छह राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक दर्शकों को सीधे प्रसारण किया, जो प्रतिदिन चार घंटे तक 2,400 टीवी सेटों पर सीधे प्रसारित होता था। इसी दौरान दूरदर्शन, भारत की अपनी सरकारी टेलीविज़न सेवा, ने 1975 तक दिल्ली, मुंबई, श्रीनगर और अमृतसर में केंद्र स्थापित किए, और एक ही वर्ष में कोलकाता, चेन्नई और जालंधर में तीन और केंद्र जोड़े। हर केंद्र में समाचार, बच्चों और महिलाओं के कार्यक्रम, किसानों के कार्यक्रम और मनोरंजन का मिश्रण होता था।
जब कार्यक्रमों में विज्ञापन शामिल किए जाने लगे, तो लक्ष्यगत दर्शक वर्ग नगरीय उपभोक्ता वर्ग की ओर झुक गया, और मनोरंजन कार्यक्रम बढ़ गए। 1982 के दिल्ली एशियाई खेलों के दौरान रंगीन प्रसारण शुरू हुआ, और राष्ट्रीय नेटवर्क के तेज़ विस्तार के साथ टेलीविज़न का तेज़ी से व्यावसायीकरण हुआ।
हम लोग (1984-85)
भारत का पहला लंबे समय तक चलने वाला सोप ओपेरा: 17 महीनों में 156 एपिसोड, “मनोरंजन-शिक्षा” रणनीति के साथ। हर 22 मिनट के एपिसोड के अंत में अभिनेता अशोक कुमार का 30-40 सेकंड का उपसंहार आता था। इसे उत्तर भारत में 65-90% और दक्षिण भारत में 20-40% रेटिंग मिली, औसतन 5 करोड़ दर्शक जुड़े, और 4,00,000 से भी अधिक पत्र आए।
बुनियाद (1986-87)
उसी दौर का एक और बेहद लोकप्रिय स्वदेशी सोप ओपेरा, जिसे भारी विज्ञापन राजस्व मिला।
रामायण (1987-88) और महाभारत (1988-90)
धारावाहिक महाकाव्य, जो इसी तरह बेहद लोकप्रिय और दूरदर्शन के लिए व्यावसायिक रूप से सफल रहे।
हम लोग के विज्ञापनों ने भारत में एक नया उपभोक्ता उत्पाद, मैगी 2 मिनट नूडल्स, प्रस्तुत किया, और इसकी तेज़ी से हुई स्वीकृति ने टेलीविज़न विज्ञापन की ताक़त दिखाई। इसी से दूरदर्शन के व्यावसायीकरण की शुरुआत मानी जाती है। (बॉक्स 7.5)
ट्राई (दूरसंचार नियामक, यानी TRAI) की वार्षिक रिपोर्ट 2015-16 के अनुसार, भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा टीवी बाज़ार है। मार्च 2016 तक, पुस्तक के अपने आंकड़ों के अनुसार मौजूदा 2841 मिलियन घरों में से लगभग 18.1 करोड़ घरों में टेलीविज़न सेट थे, जिन्हें केबल टीवी, डीटीएच और आईपीटीवी सेवाओं के साथ-साथ दूरदर्शन के स्थलीय नेटवर्क से भी सेवा मिलती है।
3.4 प्रिंट मीडिया
स्वतंत्रता के बाद प्रिंट मीडिया ने राष्ट्र-निर्माण में भागीदार बनकर विकासात्मक मुद्दों को उठाना और बड़े वर्ग के लोगों की आवाज़ बुलंद करना जारी रखा।
“भारत में पत्रकारिता को एक अंतरात्मा से प्रेरित कार्य माना जाता था… इस आजीविका में पैसा बहुत कम था… यह रूपांतरण ‘हिंदू’ जैसे समाचारपत्र के स्वरूप में आए परिवर्तन से प्रतिबिंबित होता है, जो प्रारंभ में विशुद्ध सामाजिक एवं सार्वजनिक सेवा भाव को लेकर चला था पर आगे चलकर व्यापारी उद्यम में बदल गया।” संपादकीय, “यस्टरडे, टुडे, टुमॉरो”, दि हिंदू, 13 सितंबर 2003, बी.पी. संजय (2006) में उद्धृत।
इस अध्याय की दो सेंसरशिप घटनाओं को न मिलाएँ: औपनिवेशिक सेंसरशिप 1883 के इलबर्ट बिल आंदोलन के बाद आई; स्वतंत्र भारत की प्रेस की सबसे बड़ी चुनौती 1975 में घोषित आपातकाल थी, जिसके बाद 1977 में लोकतंत्र और स्वतंत्र मीडिया दोनों बहाल हुए।
47.3 भूमंडलीकरण और मीडिया
मीडिया के हमेशा से कुछ अंतरराष्ट्रीय आयाम रहे हैं, जैसे नई खबरें इकट्ठा करना और मुख्यतः पश्चिमी फ़िल्मों को विदेशों में बेचना। पर 1970 के दशक तक अधिकांश मीडिया कंपनियाँ राष्ट्रीय सरकारों के नियमों के अंतर्गत घरेलू बाज़ारों में ही काम करती थीं, और सिनेमा, प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलीविज़न अलग-अलग स्वतंत्र क्षेत्रों में बंटे थे। पिछले तीन दशकों में राष्ट्रीय बाज़ारों की जगह एक तरल भूमंडलीय बाज़ार ने ले ली है, और नई तकनीकों ने पहले अलग रहे मीडिया रूपों को आपस में मिला दिया है।
संगीत भूमंडलीकरण को अन्य किसी भी रूप से अधिक आसानी से अपना लेता है, क्योंकि यह उन लोगों तक भी पहुँच जाता है जो लिखी या बोली जाने वाली भाषा नहीं जानते। तकनीक व्यक्तिगत स्टीरियो प्रणालियों से संगीत टेलीविज़न (जैसे एमटीवी) होते हुए कॉम्पेक्ट डिस्क (सीडी) तक पहुँची, और अब इंटरनेट संगीत को डिजिटल रूप से डाउनलोड करने देता है, जिससे कुछ लोगों को लगता है कि सीडी और कैसेट पर आधारित पारंपरिक संगीत उद्योग को ख़तरा है।
4.1 प्रिंट मीडिया और भूमंडलीकरण
बहुत लोगों को डर था कि टेलीविज़न और इंटरनेट के बढ़ने से प्रिंट मीडिया पीछे छूट जाएगा, पर भारत में ऐसा नहीं हुआ; समाचारपत्रों का प्रसार बल्कि बढ़ ही गया। पुस्तक दो कारण देती है: (1) शहरों में बसने वाले साक्षर लोगों की संख्या बढ़ना, और (2) छोटे शहरों और गाँवों के पाठकों की ज़रूरतें शहरी पाठकों से अलग होना, जिन्हें ज़िला और ब्लॉक संस्करणों से पूरा किया गया।
पहले कारण के लिए पुस्तक के आँकड़े: 2003 में हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के दिल्ली संस्करण की 64,000 प्रतियाँ छपती थीं, जो 2005 तक बढ़कर 4,25,000 हो गईं, क्योंकि दिल्ली की एक करोड़ सैंतालीस लाख की जनसंख्या में से 52 प्रतिशत लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदीभाषी क्षेत्रों से आए हैं; इनमें से 47 प्रतिशत की पृष्ठभूमि ग्रामीण है और 60 प्रतिशत 40 वर्ष से कम आयु के हैं।

हिंदी, तेलुगु और कन्नड़ में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज हुई। क्षेत्रवार, उत्तर क्षेत्र में सबसे अधिक 7.83% वृद्धि रही, इसके बाद दक्षिण (4.95%), पश्चिम (2.81%) और पूर्व (2.63%) का स्थान है। जुलाई-दिसंबर 2016 की औसत बिक्री के अनुसार शीर्ष दो हिंदी दैनिक थे दैनिक जागरण (3.92 मिलियन) और दैनिक भास्कर (3.81 मिलियन)। स्रोत: ऑडिट ब्यूरो सर्कुलेशन, 2016-17।
ईनाडु की कहानी: संस्थापक रामोजी राव ने 1974 में तेलुगु समाचारपत्र शुरू करने से पहले एक चिट-फंड (एक बचत योजना जिसमें कई लोग मिलकर पैसा जमा करते हैं और बारी-बारी से पूरी राशि पाते हैं) सफलतापूर्वक चलाया था। मध्य-1980 के दशक के अरक-विरोधी आंदोलन (शराब की बिक्री के विरुद्ध अभियान) से जुड़कर यह देहातों तक पहुँचा, और 1989 में “ज़िला दैनिक” शुरू किए, जो ज़िला-विशेष की सनसनीखेज ख़बरें और छोटे कस्बों के वर्गीकृत विज्ञापन छापते थे। 1998 तक ईनाडु आंध्र प्रदेश के 10 शहरों से छपने लगा और तेलुगु दैनिक प्रसार का 70% हिस्सा इसी का था।
मलयाला मनोरमा और ईनाडु ने ज़िला और ब्लॉक संस्करणों से स्थानीय ख़बरों की शुरुआत की; दिन थंती (तमिल) हमेशा सरल और बोलचाल की भाषा प्रयोग करता रहा; और दैनिक भास्कर समूह ने उपभोक्ता संपर्क कार्यक्रम, घर-घर सर्वेक्षण और अनुसंधान से वृद्धि की।
| पहले का आँकड़ा | 2019 तक | |
|---|---|---|
| भारतीय भाषा दैनिक पाठक | 19.1 करोड़ | 42.5 करोड़ |
| अंग्रेज़ी दैनिक पाठक | लगभग 3.1 करोड़ पर स्थिर | |
2005 में हिंदी दैनिकों में दैनिक जागरण (7.4 करोड़ पाठक) और दैनिक भास्कर (5.1 करोड़ पाठक) सबसे ऊपर थे, जबकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया और द हिंदू, अंग्रेज़ी दैनिक, जिनके पाठकों की संख्या 50 लाख से अधिक, यानी 74 लाख, थी। एक करोड़ पाठकों वाले शीर्ष 10 दैनिकों में से छह हिंदी के, एक तमिल, दो मलयालम और एक अंग्रेज़ी का था। स्रोत: mruc.net
अंग्रेज़ी समाचारपत्र (“राष्ट्रीय दैनिक”) सभी क्षेत्रों में पढ़े जाते हैं, जबकि देशी भाषाओं के समाचारपत्र राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे तेज़ी से बढ़े। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मुक़ाबले के लिए अंग्रेज़ी समाचारपत्रों ने कीमतें घटाईं और कई केंद्रों से अलग संस्करण निकालने लगे।
1980 के दशक के अंत से समाचारपत्र संवाददाता की डेस्क से अंतिम पेज़-प्रूफ तक पूरी तरह स्वचालित हो गए, जिससे कागज़ का प्रयोग समाप्त हुआ। यह संभव हुआ लैन (लोकल एरिया नेटवर्क) से जुड़े पीसी और “न्यूज़मेकर” जैसे समाचार-निर्माण सॉफ़्टवेयरों से। संवाददाता के पुराने औज़ार, यानी आशुलिपि पुस्तिका, पेन, टाइपराइटर और पुराना टेलीफ़ोन, अब डिजिटल रिकॉर्डर, लैपटॉप या पीसी, मोबाइल या सेटेलाइट फ़ोन, मॉडेम, डिश और एंटीना से बदल गए हैं। अमर उजाला (मेरठ आधारित) पुस्तक का उदाहरण है: लगभग 100 संवाददाता-कर्मचारी और उतने ही फ़ोटोग्राफर उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के 13 संस्करणों को सामग्री देते हैं, सभी पीसी और मॉडेम से लैस।
सूचनारंजन (इनफोटेनमैंट) यानी समाचार सामग्री में सूचना और मनोरंजन का मिश्रण, जिसे समाचारपत्रों ने अलग-अलग रुचियों वाले पाठकों को बनाए रखने के लिए अपनाया। वृद्ध पाठक पूरा समाचारपत्र पढ़ते हैं, जबकि युवा पाठक सीधे खेल, मनोरंजन या सामाजिक गपशप के पन्नों पर चले जाते हैं। (बॉक्स 7.11)
4.2 टेलीविज़न और भूमंडलीकरण
1990 के दशक के मध्य से गैर सरकारी चैनलों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। वर्ष 2020 में जब दूरदर्शन 35 से अधिक चैनलों पर अपने कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था, गैर सरकारी टेलीविज़न नेटवर्कों की संख्या 900 के आसपास थी। वर्ष 2002 में औसतन 13.4 करोड़ लोग प्रति सप्ताह उपग्रह टी.वी. देखते थे, जो 2005 में बढ़कर 19 करोड़ हो गए।
1991 के खाड़ी युद्ध ने सीएनएन को लोकप्रिय बनाया, और उसी वर्ष हांगकांग के ह्वामपोआ हचिनसन समूह ने स्टार टीवी शुरू किया, जिससे भारत में निजी उपग्रह चैनलों के आगमन का संकेत मिला। 1992 में हिंदी आधारित उपग्रह मनोरंजन चैनल ज़ी टीवी शुरू हुआ। 2000 तक भारत में 40 निजी केबल और उपग्रह चैनल थे, जिनमें सन टीवी, ईनाडु टीवी, उदय टीवी, राज टीवी और एशियानेट जैसे क्षेत्रीय चैनल भी शामिल थे।
1980 के दशक में जब दूरदर्शन तेज़ी से फैल रहा था, केबल टेलीविज़न उद्योग भी बड़े शहरों में तेज़ी से पनप रहा था, और वीसीआर ने मनोरंजन के विकल्प कई गुना बढ़ा दिए। केबल ऑपरेटर तेज़ी से बढ़े:

भारत में केबल ऑपरेटरों की संख्या: 15 वर्षों में लगभग 600 गुना वृद्धि।
स्टार टीवी, एमटीवी, चैनल [वी], सोनी जैसी पारराष्ट्रीय टीवी कंपनियों के आने से कुछ लोगों को भारतीय युवाओं और संस्कृति पर असर की चिंता हुई। पर शोध से पता चला कि भारत के विविध दर्शकों तक पहुँचने के लिए “जानी-पहचानी” सामग्री ही ज़्यादा असरदार है। अधिकांश विदेशी नेटवर्क अब या तो हिंदी कार्यक्रमों का एक हिस्सा (एमटीवी इंडिया) रखते हैं या पूरा हिंदी चैनल (स्टार प्लस) चलाते हैं; स्टार स्पोर्ट्स और ईएसपीएन हिंदी में ऑडियो ट्रैक देते हैं; बड़ी कंपनियों ने बंगला, पंजाबी, मराठी और गुजराती में क्षेत्रीय चैनल भी शुरू किए हैं।
पुस्तक में स्थानीयकरण का सबसे नाटकीय उदाहरण स्टार प्लस है। पहले हांगकांग से चलने वाले इस पूरी तरह अंग्रेज़ी चैनल ने अक्तूबर 1996 से शाम 7 से 9 बजे तक हिंदी कार्यक्रमों की पट्टी शुरू की, और फ़रवरी 1999 तक पूरी तरह हिंदी चैनल बन गया, अपने अंग्रेज़ी धारावाहिक स्टार वर्ल्ड को दे दिए। इस बदलाव का हिंग्लिश नारा था “आपकी बोली। आपका प्लस प्वाइंट” (बूचर, 2003)।
अधिकांश चैनल चौबीसों घंटे, हफ़्ते के सातों दिन चलते हैं, और समाचारों का स्वरूप जीवंत तथा अनौपचारिक हो गया है, जिससे समाचार पहले से कहीं अधिक तात्कालिक, लोकतंत्रात्मक और आत्मीय बन गए हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या गंभीर राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों की उपेक्षा हो रही है। हिंदी और अंग्रेज़ी में समाचार चैनल, क्षेत्रीय चैनल, और कौन बनेगा करोड़पति, इंडियन आइडल तथा बिग बॉस जैसे रियलिटी शो, जो अधिकतर पश्चिमी कार्यक्रमों पर आधारित हैं, तेज़ी से बढ़े हैं। मनोरंजन टेलीविज़न ने नए सुपरस्टार पैदा किए हैं, जिनकी निजी ज़िंदगी लोकप्रिय पत्रिकाओं और समाचारपत्रों के गपशप-स्तंभों में छाई रहती है।
- चर्चा करेंक्या यह होड़भरी सीधी कवरेज एक तरह की ताक-झाँक (वॉयरिज़्म) है, या टेलीविज़न का सकारात्मक उपयोग है, या दोनों?
सोप ओपेरा ऐसी धारावाहिक, लगातार चलने वाली कहानी है जिसका कोई निश्चित अंत नहीं होता जब तक उसे प्रसारण से पूरी तरह हटा न लिया जाए। अलग-अलग कहानियाँ खत्म हो सकती हैं और पात्र आते-जाते रह सकते हैं, पर नियमित दर्शक पात्रों के व्यक्तित्व और जीवन-अनुभवों से परिचित हो जाते हैं। (बॉक्स 7.13)
4.3 रेडियो और भूमंडलीकरण
2000 में आकाशवाणी के कार्यक्रम भारत के दो-तिहाई घरों में, 24 भाषाओं और 146 बोलियों में, 12 करोड़ से अधिक रेडियो सेटों पर सुने जाते थे। 2002 में निजी स्वामित्व वाले एफ.एम. रेडियो स्टेशन आए, जिससे मनोरंजन कार्यक्रमों को बढ़ावा मिला, पर निजी एफ.एम. चैनलों को राजनीतिक समाचार बुलेटिन प्रसारित करने की अनुमति नहीं है, इसीलिए कई चैनल अपने श्रोताओं को बनाए रखने के लिए किसी ख़ास तरह के लोकप्रिय संगीत में विशेषज्ञता रखते हैं।
| एफ.एम. चैनल | स्वामित्व |
|---|---|
| रेडियो मिर्ची | टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह |
| रेड एफ.एम. | लिविंग मीडिया |
| रेडियो सिटी | स्टार नेटवर्क |
नेशनल पब्लिक रेडियो (अमेरिका) या बीबीसी (ब्रिटेन) जैसे स्वतंत्र सार्वजनिक प्रसारण स्टेशन भारत के प्रसारण परिदृश्य में मौजूद नहीं हैं।
रंग दे बसंती
- भगत सिंह की कहानी से प्रेरित एक गुस्सैल कॉलेज छात्र एक मंत्री की हत्या कर देता है
- फिर अपना संदेश जनता तक पहुँचाने के लिए आकाशवाणी पर कब्ज़ा कर लेता है
लगे रहो मुन्ना भाई
- नायिका एक रेडियो जॉकी है जो “गुड मॉर्निंग मुंबई!” से देश को जगाती है
- नायक भी एक लड़की की जान बचाने के लिए रेडियो स्टेशन का सहारा लेता है
शायद पूरे एशियाई उपमहाद्वीप का इकलौता ग्रामीण एफ.एम. रेडियो स्टेशन। बिहार के राघव महतो ने 1997 में एक मरम्मत की दुकान में मिस्त्री का काम शुरू किया था, और लगभग 2003 में ₹50 में अपना प्रसारण किट खुद बनाया, जिसे पास के तीन मंज़िला अस्पताल पर बाँस के खंभे से बंधी एंटीना से जोड़ा गया। उनका स्टेशन 20 किलोमीटर (12 मील) के दायरे में हज़ारों गाँव वालों तक पहुँचता है, फ़िल्मी गाने, एचआईवी और पोलियो पर जन-हित संदेश, और स्थानीय ख़बरें (गुम बच्चे, नई दुकानें) प्रसारित करता है, भोजपुरी, बॉलीवुड और भक्ति गीतों के लगभग 200 टेपों से। वे स्टेशन से कुछ नहीं कमाते, सिर्फ अपनी मरम्मत की दुकान से महीने के लगभग ₹2,000 कमाते हैं, और उन्हें पता ही नहीं था कि इसके लिए सरकारी लाइसेंस चाहिए। एक बार अवैध बताए जाने पर उन्होंने स्टेशन बंद भी कर दिया था, पर गाँव वालों ने उन्हें फिर से चालू करने के लिए मना लिया। स्रोत: बीबीसी न्यूज़ (अमरनाथ तिवारी), 24 फ़रवरी 2006 को प्रकाशित।
पुस्तक एफ.एम. के भविष्य में बड़ी संभावना देखती है: और अधिक निजीकरण तथा समुदाय-स्वामित्व वाले रेडियो स्टेशनों के उदय से इसकी वृद्धि होगी, साथ ही स्थानीय समाचारों की बढ़ती माँग भी इसमें मदद करेगी, जो बड़े नेटवर्कों की जगह स्थानीय रेडियो के विश्वव्यापी रुझान से मेल खाती है।
5निष्कर्ष
मास मीडिया आज हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है।
अध्याय की अपनी अंतिम पंक्ति
यह अध्याय मीडिया से जुड़े हर अनुभव को नहीं समेट सकता, पर यह मीडिया के मुख्य आयामों पर ध्यान देता है: राज्य और बाज़ार से इसका संबंध, इसका सामाजिक गठन और प्रबंधन, और पाठकों तथा दर्शकों से इसका रिश्ता, यानी मीडिया जिन सीमाओं में काम करता है और जिन तरीकों से यह हमारे जीवन को प्रभावित करता है, दोनों को यह समझाने की कोशिश करता है।
- मास मीडिया यानी एक साथ बहुत बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचने वाले रूप; इसके लिए राज्य और/या बाज़ार के औपचारिक संगठन की ज़रूरत होती है
- मुद्रणालय (गुटनबर्ग, 1440) पहली आधुनिक मास मीडिया संस्था है; समाचारपत्र 19वीं सदी के मध्य से ही जन-जन तक पहुँचे
- बेनेडिक्ट ऐंडरसन: समाचारपत्रों ने राष्ट्रीयता की भावना बनाई, यानी राष्ट्र एक “काल्पनिक समुदाय”
- औपनिवेशिक काल: रेडियो राज्य के स्वामित्व में, प्रेस स्वायत्त पर निगरानी में; इलबर्ट बिल आंदोलन (1883) से सेंसरशिप; केसरी, मातृभूमि, अमृतबाज़ार पत्रिका उत्पीड़ित हुए
- स्वतंत्र भारत: नेहरू ने मीडिया को “लोकतंत्र का पहरेदार” कहा; रेडियो 1920 के दशक में शुरू, 1940 में परिपक्व, स्वतंत्रता पर 6 स्टेशन; टीवी 1959 में शुरू, साइट (1975-76), दूरदर्शन के पहले 4 शहर 1975 तक
- हम लोग, बुनियाद, रामायण, महाभारत दूरदर्शन की सबसे बड़ी सफलताएँ थीं; आपातकाल (1975-77) स्वतंत्र भारत की प्रेस की सबसे बड़ी चुनौती थी
- भूमंडलीकरण (1970/1990 के बाद): राष्ट्रीय बाज़ार भूमंडलीय बाज़ार में बदले; मीडिया रूप आपस में मिले; भारत में प्रिंट मीडिया घटा नहीं, बढ़ा (बॉक्स 7.8, 7.9)
- टीवी: निजी उपग्रह चैनल 1991 के खाड़ी युद्ध और स्टार-टीवी के लॉन्च के बाद आए; स्टार प्लस का हिंदीकरण (1996-99) स्थानीयकरण का मुख्य उदाहरण है
- रेडियो: निजी एफ.एम. 2002 में आया, राजनीतिक समाचार नहीं दे सकता; राघव एफ.एम. मंसूरपुर 1 (बॉक्स 7.14) सामुदायिक रेडियो की पहुँच और सीमाएँ दोनों दिखाता है
- क्या मैं बता सकता हूँ कि समाजशास्त्री मीडिया और समाज के संबंध को “द्वंद्वात्मक” क्यों कहते हैं?
- क्या मैं बॉक्स 7.1 के कम से कम पाँच समाचारपत्र, उनकी भाषा, संस्थापक और वर्ष सहित बता सकता हूँ?
- क्या मैं रेडियो की वृद्धि 6 स्टेशन (1947) से आज के 480 स्टेशन तक बता सकता हूँ?
- क्या मैं “काल्पनिक समुदाय”, “सूचनारंजन” और “सोप ओपेरा” को एक-एक पंक्ति में समझा सकता हूँ?
- क्या मैं स्टार प्लस के हिंदी चैनल बनने की कहानी दोनों मुख्य तिथियों सहित बता सकता हूँ?