- रामचंद्र शुक्ल का जीवन-परिचय और उनकी प्रसिद्धि के कारण
- उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ कौन थे, और लेखक का उनसे परिचय कैसे बढ़ा
- ‘संस्मरणात्मक निबंध’ किसे कहते हैं, और शीर्षक ‘छाया-स्मृति’ क्यों रखा गया
- निबंध के सभी रोचक किस्सों को क्रम से पहचानना
- चौधरी साहब के व्यक्तित्व की विशेषताओं को उनकी बातों-हरकतों से पहचानना
- पाठ के कठिन शब्दों के अर्थ और परीक्षा-उपयोगी बिंदु
1 लेखक-परिचय: रामचंद्र शुक्ल

इस निबंध के लेखक स्वयं रामचंद्र शुक्ल हैं, इसलिए मुख्य कथावाचक “मैं” शुक्ल जी हैं। उद्धृत संवादों में दूसरे पात्र भी “मैं” कहते हैं, जैसे सब-जज: “मैं तो इनकी सूरत देखते ही इस बात से ‘वाकिफ़’ हो गया।”
आचार्य शुक्ल हिंदी के उच्चकोटि के आलोचक, इतिहासकार और साहित्य-चिंतक माने जाते हैं। सबसे प्रसिद्ध कृति ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पहले हिंदी शब्दसागर की भूमिका थी, बाद में परिष्कृत होकर स्वतंत्र पुस्तक बनी। अन्य ग्रंथ: गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, चिंतामणि (चार खंड), रस मीमांसा; संपादन: जायसी ग्रंथावली, भ्रमरगीत सार।
गद्य शैली विवेचनात्मक है, यानी विचारशीलता और सूक्ष्म तर्क-योजना का मेल, व्यंग्य-विनोद से जीवंत, शब्द-चयन में तत्सम से लेकर प्रचलित उर्दू शब्दों तक, वाक्य-रचना सारगर्भित, सूत्रात्मक, यानी कम शब्दों में गहरी बात।
2 निबंध की विधा: संस्मरणात्मक निबंध
संस्मरणात्मक निबंध वह निबंध है जिसमें लेखक किसी व्यक्ति या घटना से जुड़ी अपनी व्यक्तिगत यादों को सुनाता है, गद्यखंड में यह आत्मकथा और यात्रावृत्तांत जैसी ही एक प्रमुख विधा है।
पाठ में शीर्षक की व्याख्या नहीं दी गई है। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है: साये-सी मन में बनी रहने वाली स्मृतियाँ, जो क्रमबद्ध जीवनी के बजाय अलग-अलग किस्सों के रूप में आती हैं। पाठ्यपुस्तक की भूमिका इतना ही कहती है कि यह निबंध “प्रेमघन की स्मृति में लिखा गया है”।
पाठ के परिचय के अनुसार इस निबंध का मुख्य विषय यह है कि “प्रेमघन के व्यक्तित्व ने शुक्ल जी की समवयस्क मंडली को किस तरह प्रभावित किया, हिंदी के प्रति किस प्रकार आकर्षित किया”; साथ ही यह कि बाल्यावस्था में ही भारतेंदु एवं उनके मंडल के अन्य रचनाकारों, “विशेषतः प्रेमघन के सान्निध्य में शुक्ल जी का साहित्यकार आकार ग्रहण करता है”।
पाठ्यपुस्तक (अंतरा भाग 2) की भूमिका इसी अध्याय के बारे में कहती है:
“रामचंद्र शुक्ल का निबंध ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ प्रेमघन की स्मृति में लिखा गया है जो अत्यंत मनोरम शैली में है। इस रचना में शुक्ल जी अपने जीवन के बाल्य काल को पाठक के साथ बाँटते से लगते हैं। उनकी भाषा में न कोई उलझाव है न जटिलता, बीच-बीच में हास्य और व्यंग्य की छौंक इस पाठ को बार-बार पढ़ने को प्रेरित करती है।”
पाठ्यपुस्तक की भूमिका (पुस्तक का संपादकीय परिचय), इसी अध्याय के बारे में
3 प्रेमघन कौन थे?
उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’: ‘प्रेमघन’ इनका उपनाम है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के मित्र और हिंदी के प्रसिद्ध कवि, रहते थे मिर्जापुर में। निबंध में इन्हें ‘चौधरी साहब’ या ‘उपाध्याय जी’ कहा गया है।
- एक खासे हिंदुस्तानी रईस, वसंत पंचमी-होली पर उनके यहाँ खूब नाच-रंग होता था
- हर अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी, कंधों तक बाल, इधर-उधर टहलना, पीछे-पीछे पान की तश्तरी लिए एक लड़का
- पाठ के शब्दों में, जो बातें उनके मुँह से निकलती थीं, “उनमें एक विलक्षण वक्रता रहती थी” (यहाँ चुटीलापन के अर्थ में), और “उनकी बातचीत का ढंग उनके लेखों के ढंग से एकदम निराला होता था”
“चौधरी साहब का व्यक्तित्व” जैसा प्रश्न पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास (प्रश्न 8) में ही है, इसलिए अच्छी तरह तैयार करें। जवाब में सिर्फ़ “रईस थे” मत लिखिए, कम-से-कम दो असली किस्सों का हवाला देकर बात सिद्ध कीजिए।
4 निबंध की कहानी: क्रम से
4.1 ‘निस्संदेह लोग’: मंडली का मज़ेदार नाम
- 16 वर्ष की उम्र तक मंडली बनी, इसमें काशीप्रसाद जायसवाल, भगवानदास हालना, बदरीनाथ गौंड़, उमाशंकर द्विवेदी मुख्य थे
- बातचीत “लिखने-पढ़ने की हिंदी” में होती, जिसमें ‘निस्संदेह’ जैसे शब्द आते थे
- मुहल्ले के उर्दू-भाषी वकीलों-मुख्तारों-अफ़सरों को यह बोली अनोखी लगती, इसीलिए मंडली का नाम ही ‘निस्संदेह लोग’ पड़ गया
“निस्संदेह लोग” प्रेमघन की नहीं, लेखक और उनके अपने साथियों की मंडली का नाम था। प्रेमघन का ज़िक्र इस प्रसंग में नहीं है।
एक मुसलमान सब-जज से पिता जी ने लेखक का परिचय कराया, “इन्हें हिंदी का बड़ा शौक है।” सब-जज का तुरंत जवाब: “आपको बताने की ज़रूरत नहीं, मैं तो इनकी सूरत देखते ही इस बात से ‘वाकिफ़’ हो गया।” यह भी निबंध की हास्य-शैली का एक नमूना है।
5 चौधरी साहब के व्यक्तित्व की झलकियाँ
गिलास का जवाब
नौकर से गिलास गिरने पर चौधरी साहब का पूरा जवाब: “कारे बचा त नाहीं”। सवाल से पहले अक्सर “क्यों साहब” लगाते थे।
वामनाचार्यगिरि का कवित्त
मिर्जापुर के एक पुराने ढंग के कवि सड़क पर चौधरी साहब पर कवित्त जोड़ रहे थे, ठीक तभी चौधरी साहब बरामदे में खड़े दिख गए। वामनजी ने फ़ौरन अंतिम पंक्ति जोड़ी: “खंभा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाने की” (खंभा टेककर खड़ी मुगल घराने की नारी से उपमा)।
एकादशी का व्यंग्य
पंडित जी ने कहा, “आज एकादशी थी, कुछ जल खाया है।” चौधरी साहब का पलटवार: “जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है?” (खाया-पिया की अदला-बदली से बना व्यंग्य)।
‘घनचक्कर’ की पहेली
एक पड़ोसी के आते ही चौधरी साहब ने उनसे (‘क्यों साहब’ लगाकर) ‘घनचक्कर’ शब्द का अर्थ और लक्षण पूछा। पड़ोसी महाशय ने मज़ाक में जवाब दिया: रात को सोने से पहले सवेरे से रात तक किए सारे काम लिखकर पढ़ जाइए। यानी लोग भी उन्हें ‘बनाने’ की फ़िक्र में रहते थे।
लैम्प का किस्सा
बत्ती भभकने पर भी चौधरी साहब का हाथ नहीं बढ़ा, “अरे! जब फूट जाई तबै चलत आवह” कहते रहे, अंततः चिमनी-ग्लोब चकनाचूर हो गई, “पर चौधरी साहब का हाथ लैम्प की तरफ़ न बढ़ा”। उनकी बेपरवाही का एक उदाहरण।
“इस पुरातत्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का एक अद्भुत मिश्रण रहता था।”
लेखक अपनी मंडली की उस दृष्टि के बारे में, जिससे वे बड़े होकर चौधरी साहब को देखते थे
लैम्प का किस्सा लेखक के सहपाठियों पं. लक्ष्मीनारायण चौबे, बा. भगवानदास हालना, बा. भगवानदास मास्टर इत्यादि की महफ़िल में घटा। पाठ इन तीनों के नाम गिनाकर कहता है: “इन्होंने ‘उर्दू बेगम’ नाम की एक बड़ी ही विनोदपूर्ण पुस्तक लिखी थी”, जिसमें उर्दू की उत्पत्ति, प्रचार आदि का वृत्तांत एक कहानी के ढंग पर दिया गया था।
6 भाषा को लेकर प्रेमघन के अपने विचार
नागरी: “नागर अपभ्रंश से जो शिष्ट लोगों की भाषा विकसित हुई, वही नागरी कहलाई।”
मीरजापुर: ‘मिर्जापुर’ नहीं, ‘मीरजापुर’ लिखते थे, अर्थ करते थे लक्ष्मीपुर, यानी मीर (समुद्र) + जा (पुत्री) + पुर (नगर) = समुद्र की पुत्री का नगर।
7 दोनों व्यक्तित्वों की तुलना: भ्रम न हो
रामचंद्र शुक्ल (लेखक)
- निबंध के “मैं”, कथावाचक स्वयं
- बाद में हिंदी के बड़े आलोचक-इतिहासकार बने
- बचपन में भारतेंदु-मंडल से प्रभावित हुए
उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ (विषय)
- निबंध के केंद्र में, जिनकी याद पर निबंध लिखा गया
- भारतेंदु के मित्र, मिर्जापुर के रईस कवि
- वाक्पटु, “रियासत और तबीयतदारी” वाला व्यक्तित्व
8 शब्दार्थ: कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उत्कंठा | लालसा, बेचैनी |
| आवृत | ढका हुआ, घेरा हुआ |
| लता-प्रतान | लता का फैलाव, लतातंतु |
| परिणत | अन्य रूप में बदला हुआ, परिणाम या रूपांतर को प्राप्त |
| मुख्तार | अधिकार प्राप्त व्यक्ति, व्यक्ति विशेष के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने का अधिकारी, एजेंट |
| अमला | कर्मचारी मंडल |
| वाकिफ़ | जानकार, परिचित |
| वक्रता | टेढ़ापन, कुटिलता (यहाँ चुटीलापन के अर्थ में) |
| परिपाटी | सिलसिला, रीति |
| अपभ्रंश | प्राकृत भाषाओं का परवर्ती रूप, जिनसे उत्तर भारत की आधुनिक आर्य भाषाओं की उत्पत्ति मानी जाती है |
| चित्ताकर्षक | मन को आकर्षित करने वाला |
- क्या मैं शुक्ल जी के जीवन के तीन मुख्य पड़ाव (चित्रकला-अध्यापन, 1905 की सहायक-संपादकी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक/अध्यक्ष) बिना देखे बता सकता हूँ?
- क्या मैं प्रेमघन का पूरा नाम और उनका भारतेंदु-मंडल से संबंध बता सकता हूँ?
- क्या मैं चौधरी साहब के व्यक्तित्व के पक्ष में कम-से-कम दो असली किस्से सुना सकता हूँ?
- क्या मैं शुक्ल और प्रेमघन के बीच भ्रमित हुए बिना हर किस्सा सही व्यक्ति से जोड़ सकता हूँ?
- रामचंद्र शुक्ल (1884-1941), हिंदी के बड़े आलोचक-इतिहासकार, सबसे प्रसिद्ध कृति ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’
- ‘प्रेमघन की छाया-स्मृति’ एक संस्मरणात्मक निबंध है, प्रेमघन (उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी) की स्मृति में लिखा गया
- ‘छाया-स्मृति’ को साये-सी मन में बनी रहने वाली स्मृतियों के रूप में पढ़ा जा सकता है (पाठ में शीर्षक की व्याख्या नहीं दी गई है)
- पिताजी के संस्कार से शुरू होकर, पहली झलक, भारतेंदु के मकान के नीचे पाठक जी से हृदय-परिचय, समवयस्क मंडली, फिर चौधरी साहब से अच्छा परिचय, इसी क्रम में हिंदी-प्रेम बढ़ा
- प्रेमघन एक खासे हिंदुस्तानी रईस थे, जिनकी हर अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी, गिलास, एकादशी, घनचक्कर और लैम्प के किस्सों से यह साफ़ झलकता है
- पाठ्यपुस्तक की भूमिका के अनुसार: “उनकी भाषा में न कोई उलझाव है न जटिलता, बीच-बीच में हास्य और व्यंग्य की छौंक इस पाठ को बार-बार पढ़ने को प्रेरित करती है”